ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
अनावरण आदतें
01-May-2018 07:29 PM 1680     

अनावरण
परत-दर-परत
मैं खोलती गई
तुम्हारा दिया उपहार!

पहले जिज्ञासा ने
उसे देर तक उकेरा
फिर संशय जागा
ऐसा क्या है इसमें?
जो इतने सारे आवरण हैं।

तब भय जन्मा
मैंने और आगे
अनावरण का कार्यक्रम
स्थगित कर दिया।

आज भोर की
सुनहरी किरणों के
मीठे से आग्रह ने
विवश कर दिया मुझे
पुनः उसे खोलने को।

फिर आधा लिपटा
आधा खुला
डिब्बा मैं उठा लाई।
बिना रुके, बिना डरे
खोलती गई उसे।

भीतर से निकली
जीने की शक्ति
जागी तब मन में
तुम्हारे प्रति भक्ति।

आदतें
कुछ ख़रीद कर पढ़ना
यूँ तो मेरी आदत में
शामिल ही नहीं था।

पुस्तकालयों से ली किताबों से
उम्र भर पढ़ाई की।
अब जब उम्र के
इस मोड़ पर जीवन में
कुछ सुविधाएँ आई हैं
अपनी विलासिता के लिए
किताबें खरीदने का सिलसिला
शुरू किया।

स्थिति ये है कि खरीदती हूँ मैं
पढ़ते हैं लोग।
ली हुई किताबें लौटाना
शायद लोगों की आदत में
शामिल नहीं है।

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