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भारत को भाषाओं के माध्यम से समझना
02-Jul-2019 11:05 AM 1140     

नयी शिक्षा नीति के प्रारूप में भारतीय भाषाओं से संबंधित व्यापक सुझाव दिए गए हैं। इनमें भाषाओं की शिक्षा और भाषाओं द्वारा शिक्षा विषयक चार आधारभूत मान्यताएं हैं। प्रथम, भाषा संज्ञानात्मक विकास का साधन है और बच्चे स्वभावतः एक से अधिक भाषाओं को सीखने की क्षमता से युक्त होते हैं। द्वितीय, भाषा संस्कृति को आत्मसात करने और उसे विकसित करने का आगत है। इसके माध्यम से सांस्कृतिक नैरन्तर्य को समझा जा सकता है। भाषाओं का ज्ञान ही प्राचीनतम संस्कृति को समझने, आधुनिक ज्ञान-विज्ञान के प्रतिमानों के विश्लेषण और "ग्लोबल" समाज के लिए विवेकवान नागरिक विकसित कर सकता है। तृतीय, वे भाषाएं जो बाजार, रोजगार या कह लें ज्ञान आधारित अर्थव्यवस्था के लिए आवश्यक हैं उनकी उपेक्षा कर प्रतिगमन करने की आवश्यकता नहीं है। चतुर्थ, भाषाओं को पढ़ाने के तरीके इस तरह के अपनाने होंगे कि उसके लिए न तो अनुवाद के सहारे की जरूरत हो और न ही विधियां ऐसी बोझिल हो कि भाषा के सीखने में रस का लोप हो जाए। यह ध्यान रखा जाए कि भाषा शिक्षण ऐसी शिक्षण पद्धतियों से युक्त हो जहां भाषा और परिवेश के बीच कोई कृत्रिम दीवार न हो। इसके साथ-साथ विभिन्न भाषाओं में अलग-अलग ज्ञानानुशासनों के लिए पर्याप्त सामग्री तैयार की जाए।
स्पष्ट है कि प्रस्तावित नीति 21वीं सदी के भारत को समझने और उसकी जरूरतों को पूरा करने के लिए भारतीय भाषाओं की महत्ता को स्वीकार करती है। यहां रेखांकित करना आवश्यक है कि इस मसौदे में जहां-जहां भारतीय भाषाओं का संदर्भ आया है वहां इसे बहुवचन के अर्थ में, सांस्कृतिक अस्मिता के प्रतीक रूप में और सामासिक संस्कृति के लक्षण के रूप में स्थापित किया गया है। इसमें भाषाओं के लिए विद्यालयों से लेकर विश्वविद्यालयों तक विशेष संवर्धन कार्यक्रमों की व्यवस्था की गयी है। उदाहरण के लिए- मातृभाषा को केन्द्र में रखकर त्रि-भाषा सूत्र को सक्रिय क्रियान्वयन, विद्यालयों में भाषा शिक्षकों की नियुक्ति के दायरे का विस्तार, अध्यापक शिक्षा में स्थानीय भाषाओं के शिक्षकों की तैयारी का प्रस्ताव, विश्वविद्यालय स्तर पर भारतीय भाषाओं के लिए अध्ययन केन्द्रों/विभागों की स्थापना, भारतीय भाषाओं को वर्तमान अकादमिक संस्कृति के आयामों-शोध, प्रकाशन और प्रसार से युक्त करना, विज्ञान शिक्षण के लिए अंग्रेजी के साथ मातृभाषा का उपयोग और भारत की शास्त्रीय भाषाओं के शिक्षण की सुविधा उपलब्ध कराना। यह नीति प्रयोजनमूलक लक्ष्यों को ध्यान में रखते हुए अंग्रेजी भाषा की दक्षता के विकास की संभावनाओं को भी साकार करना चाहती है। इस नीति में भाषाएं भावी पीढ़ी के लिए केवल साक्षरता के रूप में परिकल्पित नहीं है बल्कि भाषाओं में निहित ज्ञानराशि को समझने का माध्यम है। यह ज्ञानराशि ही वास्तविक भारत है। इसमें बर्तन बनाने वाले, लोहे का काम करने वाले, चमड़े के शिल्पियों जैसे कामगारों के, किसानों के और आधुनिक पेशेवरों के अभ्यासजन्य और अनुभवजन्य ज्ञान संचित हैं। यह बंधुत्व और सहिष्णुता की चेतना, प्रकृति से एकता, देशज विज्ञान की संपोषीयता का माध्यम है।
विडंबना है कि उक्त ज्ञान राशि धीरे-धीरे हमारी शिक्षा की मुख्यधारा में संकुचित हो चुकी है। इसका ही दुष्परिणाम है कि भावी पीढ़ी अपने आनंद और पीड़ा के रंगों का चुनाव गंगा-जमुना के मैदानों, अरावली, सह्याद्री या दण्डाकारण्य आदि की लोकसंस्कृति से, केरल और तमिलनाडु के मृदु-कठोर भावों से कर पाने में सक्षम नहीं है। दुर्भाग्य यह है अपनी इस अक्षमता का उसे भान तक नहीं है क्योंकि वह अपनी जरूरतों को दूसरों की भाषा से पूरा करने का प्रशिक्षण प्राप्त कर रही है। इस तरह की एक पूरी पीढ़ी ने देखा है कि अंग्रेजी न आने के कारण उसे कितनी चुनौतियों का सामना करना पड़ा। यह पूरी पीढ़ी मां-बाप की भूमिका में अपने बच्चों को उसी अंग्रेजी का संस्कार देना चाह रही है जिसकी कमी से वे जूझते रहे। दुकान से लेकर डाइनिंग टेबल तक बच्चों को अंग्रेजी के शब्दों और "मैनेरिज़्म" का पाठ दिया जा रहा है। इस अभ्यास से लगभग हर अभिभावक खुद को आश्वस्त कर रहा है कि उसके पाल्य को आने वाले जीवन में किसी आर्थिक संकट का सामना नहीं करना पड़ेगा। ऐसी दशा में प्रस्तावित शिक्षा नीति का वाचन करते हुए बार-बार यही सवाल उपजता है कि क्या इस नीति के अनुरूप अभिभावक अपने बच्चों के लिए अंग्रेजी भाषा और माध्यम की शिक्षा के बरक्स मातृभाषा में शिक्षा को स्वीकार करेगें? यह सवाल उस वर्ग के लिए अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है जिसकी सामाजिक गतिशीलता के लिए भाषा की सांस्कृतिक पूंजी का अभाव बड़ी समस्या है। यह सवाल केवल अभिभावकों के स्तर तक ही सीमित नहीं है। इसके समांतर अगला प्रश्न है कि क्या स्कूल नामक संस्था नवउदारवादी दबावों के बीच भारतीय भाषाओं में ज्ञान रचना के लिए तैयार हैं? इन दोनों ही सवालों के लिए अक्सर "औपनिवेशिक" प्रभाव की दुहाई देते हुए हम पल्ला झाड़ लेते हैं। लेकिन हमें अपनी असफलता को भी स्वीकारना होगा कि आजाद भारत में मजबूत भाषा नीतियों के बावजूद पाठ्यचर्या के माध्यम और भाषा के रूप में भारतीय भाषाएं उपेक्षित हैं। इसका सरलीकृत कारण नीति का कमजोर क्रियान्वयन नहीं है बल्कि आर्थिक अवसरों, सामाजिक प्रतिष्ठा और सांस्कृतिक आभिजात्यता के नाम पर लोक जीवन का अंग्रेजीकरण है। इसके प्रभाव में भारतीय भाषाएं धीरे-धीरे अनौपचारिक कार्य-व्यापार तक सीमित होती जा रही है। वर्तमान में भाषा की एक नयी समस्या है कि एक वर्ग बोलचाल, रोजमर्रा के व्यवहार और औपचारिक प्रयोग से अंग्रेजी को अपनी मातृभाषा बनाने पर तुला है। इसी वर्ग के जैसा बनने के लिए शेष समाज अपने "संस्कृतिकरण" के लिए उनकी भाषा को अपना रहा है। यह भाषा (अंग्रेजी) आज भी सामाजिक गतिशीलता की सीढ़ी में ऊपरी पायदान पर जाने का माध्यम है। उक्त के आलोक में इस नीति में इस सवाल का उत्तर खोजा जाना चाहिए कि अंग्रेजी के सांस्कृतिक आव्रजन से निपटने के लिए भारतीय भाषाओं को कैसे समर्थ बनाया जाए? इस सवाल के जवाब के लिए दो कसौटियां हो सकती हैं। पहली, हमारी भाषाएं आधुनिक राजनीतिक-आर्थिक गठजोड़ में कितनी कारगर हैं? दूसरी, हमारे वयस्क, खासकर शिक्षित वर्ग या सिविल सोसाइटी ने अपनी-अपनी मातृभाषाओं को विचार-विश्लेषण की दृष्टि से कितना समर्थ किया है? इन दोनों सवालों के उत्तर ही प्रस्तावित शिक्षा नीति के भाषा संबंधी सुझावों की सार्थकता का प्रमाण होगें।
स्वतंत्रता के बाद के शिक्षा संबंधी लगभग हर दस्तावेज में भारत की बहुभाषिकता को इसकी अनन्य विशेषता माना गया है। राष्ट्रीय एकता और सांस्कृतिक संवेदना की दृष्टि से भारतीय भाषाओं के बीच आपसी संवाद को बढ़ाने की वकालत की गयी है। इसी के क्रियान्वयन हेतु त्रि-भाषा सूत्र का जन्म हुआ जिसके द्वारा मातृभाषा के अलावा किन्हीं अन्य दो भाषाओं के सीखने के अवसर को भावी नागरिकों में भारत की वृहद् और विविधतामयी समझ के विकास के लिए आवश्यक माना गया। वर्तमान में वह पीढ़ी हमारे सामने है जिसकी शिक्षा त्रि-भाषा सूत्र के मॉडल में हुयी। इस सूत्र में पली-बढ़ी पीढ़ी अंग्रेजी भाषा और इसके प्रभाव में पाश्चात्य विश्वदृष्टि से लबरेज है। उसके लिए त्रि-भाषा सूत्र आधारभूत भाषायी साक्षरता से आगे नहीं बढ़ पाया। इसी कारण उसकी भाषा, विज्ञान, गणित और सामाजिक विज्ञान में उन शब्दों की भरमार है जो पाश्चात्य अर्थ से भारतीय समाज की चिंता प्रकट करते हैं। तात्पर्य है कि भाषाओं की शिक्षा द्वारा भारतीय संस्कृति को पोषित करने का रास्ता बहुत संकीर्ण रहा है। भारत के बारे में बनी भ्रान्तियों और धारणाओं का एक कारण भारतीय भाषाओं के ज्ञान के अभाव में भारत की गयी विवेचना है। अपने यहां संस्कृति के आदर्शों को राजनीतिक मुहावरों के नाम पर भुनाया गया है। हिंदी बनाम हिंदुस्तानी और हिंदी बनाम शेष भारतीय भाषाओं के विवाद इसके उदाहरण मात्र हैं। जबकि हिंदी के पास एक ऐतिहासिक विरासत है जो इसे भारतीय अस्मिता और भारत की "लिंग्वा फ्रैंका" के रूप में स्थापित करती है। यहां उल्लेखनीय है कि यदि हिंदी, हिंदुस्तान का सांस्कृतिक प्रतिनिधित्व करती है तो अन्य भारतीय भाषाएं भी इसके ही सम्मान्य हैं। इनके बीच किसी विवाद की कोई गुंजाइश नहीं है। वस्तुतः भारत की भाषायी चेतना में नए शब्दों का निर्माण, प्रचलित शब्दों की स्वीकृति और लोक के टकसाल में भाषा के सिक्कों का निर्माण अद्वितीय विशेषता है। यह केवल किसी एक भाषा के लिए सत्य नहीं है। लगभग सभी भारतीय भाषाओं के कोश शब्द संपदा संपन्न और समावेशी है। हमारे यहां शब्द को ब्रह्म मानने की परंपरा है। यह निर्विवाद रूप से भारत के हर सांस्कृतिक समुदाय के लिए सत्य है। इस सत्य को स्वीकारने के लिए एक से अधिक भाषाओं और इनके माध्यम से संस्कृतियों को जानना आवश्यक है। नई शिक्षा नीति इस दिशा में पहल करती नज़र आती है बशर्ते इसके लिए हमारे अभिभावक और शिक्षक तैयार हो और यह पहल राजनीतिक व आर्थिक मोर्चों पर भी भारतीय भाषाओं को मजबूत करे। इन दोनों उपायों के बिना घर की भाषा और स्कूल की भाषा का अंतर कायम रहेगा। अंततः इसका नुकसान "घर की भाषा" को ही उठाना पड़ेगा।
वर्तमान में भारत की भाषाओं और बोलियों के शब्द मर रहे हैं। उनका प्रयोग न्यूनतम होता जा रहा है। बहुभाषिकता की उपेक्षा और भाषा की उपयोगितावादी दृष्टि के बीच भाषा-संस्कृति-व्यक्ति के संबंध को मजबूत करने के लिए भारतीय भाषाओं में सीखने-सिखाने की संस्कृति को पोषित करना अपरिहार्य है। भारतीय संस्कृति कोई एक या दो हजार साल पुराना नहीं है यह तो अति प्राचीन और समृद्ध है। इस संस्कृति की धाराओं में निरंतरता और नूतनता है। इसे समझने, सराहने और जीवन में आनंद का आधार बनाने के लिए भारतीय भाषाओं की संपदा को अपनाना होगा। इसका अभिप्राय किसी भी भारतीय भाषाओं के बीच वैमनस्य या अंग्रेजी की उपेक्षा नहीं है। बल्कि व्यक्ति की संज्ञानात्मक क्षमता का उपयोग करते हुए उसमें लोकोन्मुखी वैज्ञानिक दृष्टि और सांस्कृतिक समरसता के मूल्यों के बीज रोपना है। इस नीति की सार्थकता इस तथ्य में निहित है कि कैसे यह समाज के हर बच्चे की "भाषाओं को ताकत" दे? कैसे यह भाषाओं की दक्षता के संवर्धन द्वारा भावी पीढ़ी को "भारत की खोज" में मदद करे? कैसे भाषाओें का ज्ञान जीवन और जीविका की कुशलता को शक्ति दे?

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