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विभाजन की त्रासदी और संप्रदायवाद विरोधी स्वर कृष्णा सोबती
01-Nov-2019 11:04 AM 416     

सांप्रदायिकता का धर्म से, धर्म की शिक्षाओं से, धर्म के दार्शनिक पहलुओं से, धर्म में बुराइयों व सुधारों से, जनता की धार्मिक आकांक्षाओं से कोई सरोकार नहीं होता। सांप्रदायिक ताकतें धार्मिक प्रतीकों तथा धार्मिक आस्थाओं का अपनी सुविधा और जरूरतों के अनुसार इस्तेमाल करती हैं। वे धर्म को हथियार बनाती हैं। सांप्रदायिक राजनीति के कारण, भारत दो टुकड़ों में बंट गया। धर्म के आधार पर एक अखंड भूखंड, वहां की संस्कृति, भाषा का विभाजन अवैज्ञानिक, अव्यवहारिक था। इसलिये कालांतर में पाकिस्तान के भी दो टुकड़े हो गए और बांग्लादेश बना। 1947 में जब विभाजन हुआ तो लाखों की संख्या में लोग अपनी ज़मीन से उखड़े, हिंसा हुई। जिन्होंने यह माना था कि विभाजन सांप्रदायिकता की समस्या का समाधान है, वे पूरी तरह गलत साबित हुए, क्योंकि आज़ादी के बाद भारत में दंगों का एक लंबा सिलसिला चलता रहा। सांप्रदायिकता बढ़ती ही गई जो आज भी बदस्तूर जारी है। ज़िंदगी के लंबे लेखकीय सफ़र में भले ही कृष्णा सोबती की स्वीकारोक्ति के अनुसार "मेरे पास कोई दस्तावेज़ी रौबीली राजनीतिक दबदबे वाली गहन प्रखर सामग्री उपलब्ध नहीं।" फिर भी एक आम नागरिक की हैसियत से जो कुछ व्यक्तिगत, सामूहिक रूप से देखा, परखा उसी के आधार पर सांप्रदायिकता के जो खंड-खंड चित्र उकेरे, वे मूल्यांकन की दृष्टि से किसी भी श्रेष्ठ रचना के समानान्तर ही नहीं, उससे कोसों आगे हैं। एक लोकतंत्र का आम किंतु जागरूक नागरिक अपने भीतर की भाषा और अंतर्नयनों से बाहर के परिदृश्य को किस प्रकार, किस कोण से मापता है- देश की राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक समग्रता को किस शब्दावली में परिभाषित करता है, हवा में घुली-मिली विसंगतियों और विरोधाभासों से कैसे जूझता है, इस समग्र क्रिया और प्रतिक्रिया को वर्तमान व अतीत की यादों के सहारे जिस अनगढ़ और खुरदरे रूप में प्रस्तुत करती हैं, वह प्रभाव की दृष्टि से अप्रतिम है। वे नित नये सांप्रदायिक चेहरों को बेनकाब होते देखती हैं। हर रोज सांप्रदायिकता को पोशाकें बदलते देखती हैं। सांप्रदायिकता धर्म और राजनीति से गुजरती हुई साहित्य तक उतर आई है। राजनीति गुट और खेमे व्यावहारिक रिश्तों के नाम पर रचनात्मक अंतर्विरोधों के बदले अपने-अपने मैत्री समूह प्रस्तुत करने लगे। राजनीतिक रुझानों के चलते राजनैतिक दल सुगढ़ भोलेपन से समूचे बौद्धिक वर्ग को मनचाहा और मनमाना क्रम अर्थात् क्रमांक देते हैं। गुजरात लेखिका का जन्म स्थान है। गुजरात के दंगे उनमें अतीत बोध को आंदोलित करते हैं। सांप्रदायिक सद्भावना और बाहरी-भीतरी शांति की छटपटाहट से उनका संवेदनशील मन बुरी तरह आहत होता है। वे कहती हैं- "आज के गुजरात-परिदृश्य को देखकर मैं ंिवक्षुब्ध हूँ। मार-काट, आगजनी, बलात्कार, ज़िन्दा नागरिकों को आग में भूनना- हमारे पिछले पचास वर्षों पर कलंक है।" गुजरात दंगों के दौरान उन्होंने देखा कि अपराध करने वालों की सहायता और सुरक्षा करने वालों की बिरादरी बहुत बड़ी है। उसके जाल का ताना-बाना एक दूसरे से इतनी गहराई से जुड़ा है कि वहाँ सही और गलत को लेकर कोई धर्म संकट नहीं, धर्म कांटा उन्हीं के कब्जे में है। सांप्रदायिक माफिया के हाई सर्किट गलियारे से मनुष्य जो सीख सकता है, वह इतना ही कि उनके सामने दीन-हीन नजर आया जाय, तो वे तुम्हें कुछ नहीं कहेंगे। बात का सारांश इतना ही है कि आम आदमी समझ लें, ऊँचाई और सच्चाई दोनों सत्ताधारियों के लॉकर में बंद हैं। वे चाहे तो तुम्हें सरौंपा दें और न चाहे तो ठेंगा दिखायें। लैंगिक असमानता भी कृष्णा सोबती की दृष्टि में एक तरह की सांप्रदायिकता है, जिसके तहत स्त्री और पुरुषों के अलग-अलग खांचे और सांचे तय कर दिये गये हैं। विविध वर्गों से पात्रों का चयन उनकी मन की गहराई में बस सांप्रदायिक सद्भाव को ही अभिव्यक्त करता है। अपने देश के इतिहास के लम्बे गलियारों में से स्वतंत्रता प्राप्ति तक पहुँचते हमें न जाने कितने अंधियारे पार करने पड़े हैं।" हमें सावधान होना होगा। साहित्य में भी इसकी बाँट शुरू है। हिंदू लेखन, मुस्लिम लेखन, हिन्दुत्व लेखन, महिला लेखन, ब्राह्मण लेखन, ठाकुर लेखन और न जाने कितने-कितने कुल-गोत्रों के लेखन। हिन्दुस्तान का विभाजन एक बड़ी ऐतिहासिक घटना है। इसका सोबती की कथा-दृष्टि और जीवन चेतना पर बहुत प्रभाव पड़ा। वे इसे अपने जीवन में कभी भूल नहीं सकीं, "लोकतंत्र की सुरक्षा के लिये किसी भी देश के नागरिक समाज को धार्मिक क्रूरता के नाम पर भाँजना किसी राजनीतिक दल और विचारधारा के लिये खतरनाक ही साबित होगा।" सोबती ऐसी लेखिका हैं, जिनके भीतर अपने देश या राष्ट्र के अलावा मातृभूमि, पितृभूमि और जन्मस्थान का अहसास भी हमेशा जिंदा रहा है। उनका जन्म पाकिस्तान में हुआ था और वे देश विभाजन का हादसा झेलते हुए, बचते और मुसीबतों को झेलते हुए देश विभाजन के दौर में ही दिल्ली पहुँची थीं। देश विभाजन के दौर की अमानुषिकता-मानुषिकता, घृणा-प्रेम, रक्त-आँसू, आग और शरणार्थियों के काफिले-सब कुछ उन्होंने अपनी आँखों से देखा था। खेत, घर-आंगन, चूल्हा-चौका बँटने से देश का बँटना एक बड़ा मामला था, जिसका दर्द कृष्णा सोबती ने अपने बौद्धिक मानस पर झेला था। उन्होंने अपनी टिप्पणी "हिन्द-पाक संबंधों में बँटवारा, टकराव और पड़ोसीपन" में अपना दर्द इन शब्दों में व्यक्त किया है- "जो बच गया सरहद पार कर गया, धड़कते बदनों वाली जानदारों की कतार में खड़ा अपना नया "आइडेंटिटी कार्ड" बनवा रहा है, कोई मसीहा ढूँढ़ रहा है।" उन्होंने अपनी स्मृतियों को खो नहीं दिया और ज़िंदगी की नई राहें तलाशना भी बंद नहीं किया, यह उनकी खासियत है। इस देश में राष्ट्रीय चेतना का स्तर शुरू से ऊँचा रहा है, जो हिंदुओं, मुसलमानों और सिखों के मिले-जुले स्वाधीनता संघर्ष की एक महान उपलब्धि है। यही कारण है कि भारत के लोग अपने को भारतीय नागरिक समझने लगे थे। इसी परिप्रेक्ष्य में लेखिका कहती हैं- "अपनी बात को लो, लोकतान्त्रिक भारत का नागरिक होने के नाते, न सिर्फ हिन्दू हूँ, न मुसलमान, न इसाई, न सिख और न पारसी। एक नागरिक होने के अस्तित्व और चेतना से जुड़े हैं।" सोबती में नागर बोध है। उनकी चेतना भारतीय और महानगरीय है। उन्होंने साहित्य में हमेशा भारतीय होने का अहसास व्यक्त किया है। वे इतिहास, संस्कृति और साहित्यिक परंपराओं से जुड़ी रहने के बावजूद रूढ़ियों का हमेशा विरोध करती रही हैं। वे मानती हैं कि जनमानस हमेशा परिवर्तन के दौर से गुजरता है और धर्मनिरपेक्ष देश में लोकतांत्रिक मूल्य ही राष्ट्रीय जीवन की आधारशिला होते हैं। राष्ट्रीय विकास के लिये अपने इतिहास और संस्कृति से परिचित होना बहुत जरूरी है। संप्रदायवाद इतिहास और संस्कृति के ऐसे पन्नों को ज्यादा खोलता है, जो मानव भविष्य का निर्माण करने के बजाय उसे बिगाड़ने तथा मानवता को जोड़ने के बजाय उसे तोड़ने का काम करते हैं। भारत विभाजन के दौर में बढ़ी सांप्रदायिकता का आम जन-जीवन पर व्यापक असर पड़ा था। इसका असर कथा साहित्य पर भी पड़ा था। हिन्दी के लेखकों में भीष्म साहनी और कृष्णा सोबती ऐसे कथाकार हैं, जिनका विभाजन की विभीषिका से सीधा सामना हुआ। इन्हें अपने परिवार के साथ पाकिस्तान छोड़कर भारत आना पड़ा। इन्होंने शरणार्थी होने का दर्द झेला और अपनी आँखों से खून-खराबा और लूट-मार को देखा। देश विभाजन के बाद सबसे अधिक कष्ट शरणार्थियों को झेलना पड़ा। शरणार्थी शिविरों का जीवन बड़ा ही कष्टपूर्ण और दर्द-भरा था। इस नारकीय जीवन की उन्होंने कल्पना तक नहीं की थी। ये सभी शरणार्थी दूसरे के द्वारा बचाए जा रहे इतिहास के शिकार थे। कई लोग अपने वतन में नहीं लौट पाए थे और अपने परिवार से बिछुड़ गये थे। सोबती ने विभाजन, सांप्रदायिकता, शरणार्थी-जीवन और भ्रष्टाचार के दृश्य अपनी आँखों के सामने देखे थे। उनकी इस विषय पर कहानियाँ हैं, "मेरी माँ कहाँ" (1950), "डरो मत मैं तुम्हारी रक्षा करूँगा" (1949) और "सिक्का बदल गया" (1948)। इन्होंने एक वृहद् उपन्यास भी लिखा- "ज़िन्दगीनामा"। इसके अलावा उन्होंने अपने जीवन के बारे में लिखा- "गुजरात से गुजरात" (2002)। इसमें सांप्रदायिकता की विभीषिका जगह-जगह उनकी स्मृतियों के माध्यम से व्यक्त हुई है। सोबती ने देश विभाजन के दौर की सांप्रदायिकता को अपनी आंखों के सामने घटित होते देखा है। उन्होंने हिंसा, लूट-मार के दृश्य देखे हैं तो मानवीयता के भी दृश्य देखे हैं। वो ऐसी लेखिका हैं, जिन्होंने मोहभंग और मूल्यहीनता के दौर में मानवीय मूल्यों में अपनी आस्था को बरकरार रखा। कहानी "मेरी माँ कहाँ" बलूच रेजिमेंट के एक पाकिस्तानी सैनिक यूनुस खाँ की बदलती हुई संवेदना पर आधारित है। यह पाकिस्तानी सैनिक अपने वतन की आजादी के लिये लड़ रहा था। चारों तरफ चीखें थीं, लाशें थीं, गोलियों की बौछारें थीं। "मेरी मां कहाँ" में देश विभाजन के बाद सांप्रदायिक दंगे के ही दर्दनाक दृश्य नहीं हैं, एक धर्मोंन्मादी मुसलमान के खोये हुए एक सपने का यथार्थ में बदलने का चित्र भी है। पाकिस्तान बनने के साथ यूनुस खां को लगता है कि जैसे खोई हुई मुगल सल्तनत अब वापस लौट आई है। उस कत्लेआम के बीच एक हिन्दू बच्ची जिंदा बची हुई थी, वह घायल थी। यह चरम अमानवीयता के बीच भी एक इन्सान के भीतर बची-खुची मानवीयता को ढूंढ़ निकालने की कोशिश है कि यूनुस खाँ उस बच्ची को अपनी गाड़ी में बैठा लेता है और अस्पताल ले आता है। इसी तरह लेखिका संप्रदायवाद का प्रबलता से विरोध करती हैं, पर धर्म का निषेध नहीं करती। वह धर्म से एक बड़ा अर्थ लेती हैं। सोबती "लोक" को महत्ता देती हैं। यह लोक ग्रामीण नहीं है, बल्कि वह समूची जनता है, जिसमें व्यावहारिक ज्ञान का आधार पोथियां नहीं हैं। लोक के प्रति आस्था कृष्णा सोबती को मनुष्यता के प्रति आस्था की ओर ले जाती है। उन्हें मनुष्य की अजस्त्र शक्ति में विश्वास है। सोबती जिस तरह अंध-राष्ट्रवाद का विरोध करती हैं, उसी तरह विशुद्ध संस्कृति की अवधारणा का भी विरोध करती हैं। उनकी आस्था मिलीजुली संस्कृति में हैं। इसलिये उनका स्पष्ट मत है, "मात्र हिंदुत्व अभियान लोक की वैयक्तिक और सामूहिक चेतना को कैसे प्रतिष्ठित करेगा।" उनका जोर बार-बार आत्म-निरीक्षण पर है। उनका स्पष्ट विचार है कि कोई सांप्रदायिक संगठन संपूर्ण भारतीय समाज का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता। कृष्णा सोबती की एक कहानी है "डरो मत, मैं तुम्हारी रक्षा करूँगा"। यह कहानी काफी छोटी है। इसमें जो घटना है, उससे स्थान का पता नहीं चलता। चारों तरफ "मारो-मारो, काटो", "अल्ला-हो-अकबर" और "हर हर महादेव" के बीच दो अलग-अलग धर्मों का एक प्रेमी युगल भय से आक्रांत है। एक हिंसक सांप्रदायिक झुंड लड़की को मार डालने के लिये दरवाजे तक आ पहुँचा है। युवक को भरोसा देना चाहता है, "डरो मत, मैं तुम्हारी रक्षा करूँगा।" हिंसक झुंड के लोग लड़की को मार डालते हैं। कृष्णा सोबती की सांप्रदायिकता पर आधारित कहानियों में सबसे अच्छी, चर्चित और मील का पत्थर है "सिक्का बदल गया"। यह शीर्षक एक संकेत है- "राजपाट बदल गया", पर इसका निहितार्थ है- पुराने मानवीय मूल्य, मानवीय सद्भाव और संबंधों का अंत हो गया। देश-विभाजन काल के सांप्रदायिक दंगों में देश के दोनों तरफ सदियों से चले आ रहे मनुष्य के रागात्मक रिश्तों पर जो प्रहार हुए, वह कथाकारों का मुख्य रूप से विषय बना। बँटवारे को विषय बनाकर लिखी गई कहानियां उस दौर की हिंसा और कत्लेआम की महज फोटोग्राफी नहीं हैं। ये कहानियाँ, जिनमें कृष्णा सोबती की "सिक्का बदल गया" भी है, शिल्प की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण हैं। ये नई कहानी की पृष्ठभूमि बनाती हैं। "सिक्का बदल गया" न केवल अंतर्वस्तु की दृष्टि से एक बहुत समृद्ध कहानी है, बल्कि शिल्प की दृष्टि से भी बेजोड़ है। इस कहानी में शाहनी के अपने पुश्तैनी स्थान और यहाँ के लोगों से रागात्मक संबंध के अलावा स्थानीय मुसलमानों का एक इतिहास से भी सम्बन्ध टूटना एक दर्द भरी आवाज़ बनकर आता है। इस विराट ऐतिहासिक विभाजन के अंतिम निष्कर्ष को गाँव के बुजुर्ग मुसलमानों ने दो छोटे वाक्यों में इस तरह से कहा- शाहजी, हम तुम्हारी हिफ़ाज़त नहीं कर सके। राज पलट गया, सिक्का बदल गया। "सिक्का बदल गया" का शेरा, दाऊद खां, पटवारी बेगू आदि के लिये अर्थ है "राजपाट बदल गया" पर शाहनी के लिये इसका अर्थ महज राजनीतिक परिवर्तन नहीं है, बल्कि मूल्यों और लक्ष्यों का बदल जाना है। शाहनी के खेत मीलों तक फैले हुए थे। ज़मीनों से लगे हुए कुएँ शाहनी के थे। एक बड़ी हवेली थी, जिसमें सोने-चांदी से भरी संदूकचियों के अलावा समृद्धि के कई चिह्न थे। विभाजन के बाद इन सारी चीजों के संदर्भ बदल गये थे। अब ये चीजें शाहनी की नहीं थीं। समस्या थी कि अब पाकिस्तान बन गया था और शाहनी को मोहमाया छोड़कर पाकिस्तान से भारत चले जाना था, इसी में उनकी जान की सलामती थी। शाहनी अपनी जमीन-जायदाद के बीच अकेली थी। उसे सब कुछ बदलता हुआ दिखने लगा और यह अहसास हो गया कि अब इस हवेली में उसके लिये कोई जगह नहीं है, उसे पाकिस्तान छोड़ना पड़ेगा। कथाकार अमानुषिक भावनाओं के बीच मानवता के चिह्न भी तलाश कर लेता है। वह उन स्मृतियों को ताजा करता है, जब एक भिन्न सामाजिक-सांस्कृतिक माहौल में हिंदू-मुसलमान आपस में मिल जुलकर रहते थे। एकाएक एक-दूसरे के खून का प्यासा हो जाना और मजहबी जुनून में लूट-मार मचाना संभव नहीं था। यही वजह है कि दोस्तों के उकसाने के बावजूद मजहबी जुनून में काफी बर्बर हो चुका शेरा शाहनी का कत्ल नहीं करता, एक जगह थम जाता है। शाहनी हिंदू थी, अकेली थी और करुणा से भरी हुई थी। उसे अपनी ज़मीन-जायदाद खोने का गम नहीं था। उसे गम था- इन्सानियत के मिटने का, सिक्का बदल रहा था। फिर भी उस मुस्लिम बस्ती के लोग चाहते थे कि शाहनी बचकर जल्दी शरणार्थी शिविर में चली जाय। कहीं प्रेम बचा हुआ था! "गुजरात से गुजरात" में कृष्णा सोबती ने अपना ही जीवन कथात्मक शैली में लिखा है। यह रचना आत्मजीवनी के साथ कथा भी है। इसमें कथारस है। यह जीवनी रानी के दरबार, राजशाही, स्वतंत्र भारत की लोकतांत्रिक करवट, दत्तक पुत्र तेजसिंह को शिक्षा देने की जिम्मेदारी और एक शिक्षिका के रूप में कृष्णा सोबती के मानवीय स्वाभिमान के रोचक वृत्तांतों से भरी है। वे पाकिस्तान से भारत आईं। दोनों जगह के मजहबी उम्माद ने उन्हें काफी विचलित किया। उस समय की स्मृतियों का लेखा-जोखा "गुजरात से गुजरात" में है। इसकी शुरुआत ही मजहबी उन्माद के दृश्य से होती है जो कथात्मक रूप में सामने आया है- "हिन्द राय के पुत्र थे तीन। सियो/तियो/और/धियो।" "कौन है कातिल। कौन हत्यारा-जुल्मी। कौन बेखौफ जल्लाद!" इस वृत्तांत में दहशत और आतंक के वातावरण में भी इतिहास के सामने साहस से भरा प्रश्न है- कौन है कातिल? कृष्णा सोबती अपने जीवन की स्मृतियों से पल्ला नहीं झाड़तीं, बल्कि उन्हें सहेजकर उपस्थित करती हैं। वे अपने जीवन को याद करती हैं और स्मृतियों को एक कथात्मक सूत्र में पिरो देती हैं। वे हमेशा महसूस करती हैं कि परछाइयां हमेशा पीछा कर रही हैं। उन्हें एक से बढ़कर एक वीभत्स दृश्य याद आते हैं, जो उन्हें विचलित करते हैं खासकर शरणार्थी शिविरों का दृश्य। आज़ादी के बाद भी सड़क पर कचरे की तरह फैली शरणार्थियों की भीड़। "गुजरात से गुजरात" के जीवन-वृत्तांत कहीं-कहीं काव्यात्मक हो उठे हैं। उनकी भाषा में एक काव्यात्मक दर्द है। वे लिखती हैं- "ज्ञान और ईमान/गीता और कुरान/दोनों अपने नाखून कुतर रहे हैं।/सूफी मजार खामोश है। मंदिर भौचक्क तक रहे हैं/इन सबके बीच गुम हो गया है हमारा राष्ट्रीय गान।" इस जीवन वृत्तांत में कृष्णा सोबती की दर्द से भरी स्मृतियां फिल्म की रील की तरह खुलती जाती हैं। लेखिका कहती हैं कि स्वतंत्र भारत के लोग पाकिस्तान से आये शरणार्थी को कैसी दया और स्पर्धा से देखते हैं, "विभाजन! यह लोग यहां के है। यहीं जन्मे पले हैं। तुम बाहर के हो। तभी शरणार्थी हो। यह भी बंटवारा है।" एक विभाजन मनुष्य के बाह्य और आंतरिक जीवन में कितने अधिक विभाजन ला देता है और सिलसिला बना रहता है, यह कथाकार ने बड़ी मार्मिकता से दिखाया है। शरणार्थी शिविरों में आए रसद-पानी का एक बड़ा हिस्सा भ्रष्टाचार में लिप्त व्यक्ति कैसे हड़प लेते हैं। यह भ्रष्टाचार का एक बड़ा अमानवीय और क्रूर रूप है, जो कथाकार ने दिखाया है। "गुजरात से गुजरात" में सिरोही रियासत की यात्रा और राज व्यवस्था के अंतर्गत काम करते हुए कृष्णा सोबती ने देश-विभाजन की घटना को एक व्यापक फलक पर प्रस्तुत किया है। विभाजन ने भौगोलिक सीमाओं को बांटा ज़रूर, लेकिन मानवीय मूल्यों को खत्म नहीं कर पाया। सोबती एक साक्षात्कार के दौरान अपने इसी अनुभव को बांटती हैं- "भारत का विभाजन तीन पीढ़ी पुराना है। मेरी पीढ़ी के लेखकों के लिये वह किसी ऐतिहासिक घटना के बजाय जीवन्त इतिहास ज़्यादा है।" जिस युग में साम्प्रदायिकता का जहर नहीं फैला था। उस समय भी साम्प्रदायिकता के चेहरे को कृष्णा सोबती बड़ी ही सूक्ष्मता से पकड़ती हैं। "जिंदगीनामा" की प्रासंगिकता का सूत्र दरअसल सांप्रदायिक सद्भाव से जुड़ता है। लेखिका ने उसी खोई हुई संस्कृति को अपनी बेमिसाल शैली में रचने की कोशिश की है जिसे सदियों की पंक्तियों को उपन्यास में जब-तब दोहराया है। सोबती ने विभाजन पूर्व पंजाब का चित्र प्रस्तुत करके, इतिहास के उस दर्द को अधिक गहरा और तीखा बना दिया है, जिसके कारण देश का विभाजन हुआ। "ज़िंदगीनामा" में मानवीय प्रेम के आवेग को आकर्षक ढंग से प्रस्तुत किया गया है। सच्चे अर्थों में इसी में वह ताकत है, जिसके सामने धर्म, संप्रदाय, जाति, ऊँच-नीच का बंधन टूट जाता है। सांझी पंजाबी संस्कृति से लेखिका का गहरा भावनात्मक लगाव है, इसलिए डेरा जट्टा गाँव को उन्होंने इस सांझी संस्कृति के प्रतीक रूप में चित्रित किया है। उनकी जीवन-दृष्टि व औपन्यासिक संरचना की दृष्टि अधिकांशतः इस संस्कृति के जीवंत चित्रण में केंद्रित है। सांझी पंजाबी संस्कृति के निर्माण में करीब तीन सौ वर्ष पुराने सिख धर्म की भी काफी प्रभावी भूमिका है, जिसने लेखिका की जीवन-दृष्टि के निर्माण में भी सक्रिय भूमिका निभाई है। उपन्यास का समर्पण ही गुरु गोविंद सिंह के फारसी भाषा में लिखे खत की इन प्रसिद्ध पंक्तियों से हुआ है, जिनका अर्थ है- "जब दूसरे सब रास्ते कारगर न हो सकें तो जुल्म के खिलाफ तलवार उठा लेना जायज है।" लेखिका गुरुवाणी के प्रभावित होने से हिन्दू-सिख-मुसलमान तीनों समुदायों में परस्पर सौहाद्र्र व प्रेम को सांझी पंजाबी संस्कृति का प्राण मानती हैं। कृष्णा सोबती की जीवन-दृष्टि के इस उदार मानवीय पक्ष के कारण ही गाँव डेरा जट्टा के हिन्दू-सिख-मुसलमान खिलाड़ी की तरह रहते और तमाम तरह के त्योहार ईद, दीवाली, वैशाखी आदि एक साथ और मिलजुल कर खुशी से मनाते हैं। यहाँ तक कि कई बार स्त्री-पुरुष संबंधों में धर्म आड़े नहीं आता। अलिए की धी (पुत्री) राबयां जो मुस्लिम परिवार से है, शाह जी को ही अपना आराध्य मान बैठी है। एक विधवा ब्राह्मणी पात्र एक मुसलमान को दिल दे बैठी है। लेखिका की दृष्टि में यह सब मानवीय कार्य-व्यापार है, जिसमें धर्म का दखल नहीं होना चाहिए और वह इन संबंधों को सकारात्मक स्वीकृति से चित्रित करती है। देश-विभाजन के बाद न सांप्रदायिक दंगे बंद हुए और न धार्मिक कट्टरवाद का बढ़ना रूका। सोबती का सांप्रदायिकता की समस्या को विषय बनाकर बहुत कम रचनाएं लिखने के बावजूद साहित्यिक दुनिया में अपनी एक सशक्त धर्मनिरपेक्ष छवि बनाई है। उन्होंने सांप्रदायिकता के सवाल को एक स्त्री के दृष्टिकोण से देखकर उसे बहुत संवेदनशील बना दिया है। बकौल कथाकार सोबती के- "जो लोग धर्मनिरपेक्षता को तंगदिली और संकीर्णता से "सूडो" धर्मनिरपेक्षता का नाम देते हैं, उन्हें इतना तो समझना ही चाहिये कि सदियों-सदियों से भारत का जो सामाजिक-सांस्कृतिक ताना-बाना बुना जा चुका है, उसे देश का विभाजन भी नष्ट नहीं कर पाया। सिर्फ़ हमारी पीढ़ी ही नहीं, आज का औसत भारतीय भी धर्मनिरपेक्षता में विश्वास रखता है।"

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