ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
थोड़ी-सी मोहब्बत भी ज़रूरी है जिगर में
01-Oct-2016 12:00 AM 7618     

शायर जनाब दिनेश ठाकुर की किताब परछाइयों के शहर में के बकमाल शेरों पर नज़र डालें :
कभी तुम जड़ पकड़ते हो
कभी शाखों को गिनते हो
हवा से पूछ लो न
ये शजर कितना पुराना है
समय ठहरा हुआ सा है
हमारे गाँव में अब तक
वही पायल, वही छमछम,
वही दरिया पुराना है
झीलों की नगरी उदयपुर में जन्मे दिनेश की शायरी में गर्मी से तपती धरती पर बारिश की पहली बूंदों से उठी मिट्टी की महक है, झीलों-सी गहराई है, शादाब घने पेड़ों के नीचे मिलने वाली ठंडक है, ज़र्द पत्तों के डाल से बिछुड़ने का दर्द है। वो अपने अशआर से हमें चौंकाते भी हैं और सोचने पर मजबूर भी करते हैं।
यही दस्तूर है शायद वफादारी की दुनिया में
जिसे जी जान से चाहो वही तकलीफ देती है
कज़ा का खौफ लेकर जी रहे हैं सब ज़माने में
हकीकत में सभी को ज़िन्दगी तकलीफ देती है
दिनेश अपनी शायरी में बोलचाल की भाषा के लफ़्ज़ों का इस्तेमाल करते हैं इसीलिए उनकी ग़ज़लें पढ़ते हुए गुनगुनाने को दिल करता है। नए विचारों और शिल्प में नए प्रयोग करना उनका प्रिय शगल है। बंधी बँधाई लीक पर चलना उन्हें गवारा नहीं। अपने लिए नयी ज़मीन तलाशना किसी भी शायर के लिए बहुत बड़ी चुनौती होती है, दिनेश इस चुनौती को स्वीकारते हैं और कामयाब भी होते हैं।
परछाइयों के शहर में दरअसल दिनेश का दूसरा ग़ज़ल संग्रह है। उनका पहला ग़ज़ल संग्रह हम लोग भले हैं कागज़ पर लगभग दस साल पहले शाया हुआ था, जिसे बहुत सराहना मिली। इस किताब की भूमिका में मशहूर शायर ज़नाब शीन काफ निजाम ने बहुत कमाल की बात कही है कि - अगर सिर्फ बहर, रदीफ़ और काफिये से निर्मित दो पद शेर नहीं, तो अखबार की सुर्खी भी शेर नहीं। हेराक्लिटस ने कहा था- मेरी बात नहीं मेरे कहने में जो बात बोलती है उसे सुनो। वो बात अकथित है। कथन में अकथित को छुपाना अगर शेर साजी है तो कथन में अकथित को पढ़ना ही ग़ज़ल पढ़ना है। दिनेश की ग़ज़लें उनके इस कथन पर खरी उतरती हैं :
उसके ओझल होने तक
मेरी आँखें थीं रस्ते पर
वो जाने किस ध्यान में गुम था,
मुड़ कर जाना भूल गया
बीवी, बच्चे, सड़कें, दफ्तर और तनख्वाह के चक्कर में
मैं घर से अपना ही चेहरा पढ़कर जाना भूल गया
एक सौ चार लाजवाब ग़ज़लों से सजी इस किताब को फुल सर्कल पब्लिशिंग प्रा.लि., जे-40, जोरबाग लेन, दिल्ली ने प्रकाशित किया है।
कसीदे सुनते सुनते रक्स करने लगते हैं साहिब
तमाशा कौन-सा महफ़िल में दरबारी नहीं करते।

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