ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
भाषा की इज्ज़त का सवाल
01-Aug-2019 02:53 AM 612     

गत शताब्दी के अंतिम वर्षों में हैदराबाद से प्रकाशित साप्ताहिक पत्र "दक्षिण समाचार" में मैंने एक लेख प्रकाशित किया था, जिसमें मैंने मत प्रकट किया था कि आज के युग में यदि कोई आधुनिक शूद्र हैं तो वे हैं हिंदी वाले या भारतीय भाषाओं का प्रयोग करने वाले। आधुनिक वर्णाश्रम में अब लाक्षणिक तौर पर दो जातियां रह गई हैं, अंग्रेज़ी वाले ब्राह्मण तथा हिंदी अथवा अन्य भाषाएँ बोलने वाले शूद्र। भारत की उच्चशिक्षा की भाषा का माध्यम अंग्रेज़ी है, उच्च न्यायालयों तथा सर्वोच्च न्यायलय की भाषा अंग्रेज़ी है, ऊंची नौकरी पानी हो तो अंग्रेज़ी अपरिहार्य है, भले ही नौकरी सरकारी हो या निजी क्षेत्र में हो। हिंदी को नाममात्र के लिए राजभाषा का दर्ज़ा दे दिया गया है, जिसकी इतिश्री सितम्बर के महीने में हिंदी दिवस मनाने में हो जाती है, जिनमें नेता तो हिंदी को श्रद्धांजलि अर्पित करते ही हैं, हिंदी के स्वनामधन्य लेखक हिंदी को उसका उचित स्थान न मिलने पर इस तथ्य का स्यापा भी करते हैं, जबकि वास्तविकता यह है कि यही लोग हिंदी को परोक्ष अथवा अपरोक्ष ढंग से उसकी वर्तमान स्थिति से बाहर नहीं निकलने देना चाहते। ये दोमुहे मनुष्य स्थान तथा व्यक्ति देख कर अपने विचार व्यक्त करते हैं, विशेषकर वे, जिनके हाथों में सरकार ने हिंदी तथा अन्य भारतीय भाषाओं के साहित्य के भाग्य का निर्णय करने का उत्तरदायित्व सौंपा है, उन्हें ऊंचे पदों पर बिठा कर। जो मैं लिख रहा हूँ, वह काफ़ी घिसापिटा-सा प्रतीत होता है, क्योंकि यही उद्गार हिंदी के सैंकड़ों शुभचिंतक सैंकड़ों बार व्यक्त कर चुके हैं। लेकिन जो मैंने अपने व्यक्तिगत अनुभवों से जाना है, वह हमारे हिंदी बुद्धिजीवियों का एक वीभत्स चेहरा पेश करता है। इन लोगों के निहित स्वार्थ हैं, अतः इनका दोगला आचरण समझ में आने वाली बात है। लेकिन 8-9 साल से "यह नहीं कहूँगा कि न जाने क्यों" भारत स्थित जर्मनभाषी देशों की संस्थाओं को भी हिंदी बुरी लगने लगी है, जिसमें कुछ हिंदी, मलयालम, बंगला इत्यादि के लेखकों का भी हाथ है, जो स्वयं विदेशी साहित्य को अंग्रेज़ी के माध्यम से भारतीय भाषाओं में करने की पैरवी करते रहते हैं। एक ऐसे समय में जब भारत से उड़ान भरने वाली लगभग हर एयरलाइन की उड़ान में हिंदी बोली जाती है, हिंदी बोलने वाली एयर होस्टेसें रखी जाती हैं, भारत में अंग्रेज़ी फिल्मों की कमाई का एक बहुत बड़ा अंश उनकी हिंदी में डब की गई फिल्मों से आता है, टीवी में अंग्रेज़ी सीरिअल, कार्टून सब हिंदी में डब होते है, जब अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर इस तथ्य को स्वीकारा जा चुका है कि यदि भारत से व्यापार बढ़ाना है तो हिंदी भाषा को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता, यहाँ तक कि ब्रिटेन तथा कनाडा के संसदीय चुनाव में वहां के हर पार्टी के गोरे उम्मीदवार भी भारतीयों के वोट पाने के लिए अपना प्रचार अंग्रेज़ी के अलावा हिंदी में भी करते हैं, जबकि वहां के भारतीय मुख्यतः पंजाबी व गुजराती हैं। अभी तक विदेशियों का यह मत रहा था कि भारतीयों की सम्पर्क भाषा अंग्रेज़ी है, क्योंकि भारत के गैर-हिंदीभाषी प्रान्तों में हिंदी कोई नहीं जानता। मुझे यूरोप में अनेकों लोगों से सुनना पड़ा है कि हमारी अपनी कोई भाषा क्यों नहीं है; हमें अंग्रेज़ी पर क्यों निर्भर रहना पड़ता है। लेकिन अब व्यावहारिक स्तर पर वे परोक्षतः मान चुके हैं कि हिंदी ही भारत की भाषा है। यदि पहले भी गैर-हिंदीभाषी प्रान्तों में हिंदी के अस्वीकार्य होने का राग अलापा जाता था तो वह हमारे नेताओं की फूट डाल कर राज करने की नीति का एक अंग था। एक ठोस तथ्य तो खैर यह है ही कि अंग्रेज़ी तो देश की सम्पर्क भाषा न कभी थी, और न ही कभी होने वाली है, क्योंकि अब हिंदी का विरोध देश के उत्तर से दक्षिण तथा पूर्व से पश्चिम तक समाप्त हो चुका है। सिलिकोन घाटी में सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में कार्यरत भारतीयों मे एक बहुत भारी संख्या आन्ध्र तथा तेलन्गाना वासियों की है, जो सब आपस में हिंदी बोलते हैं। गत शती के छठे तथा सातवें दशक में गैर-हिंदी राज्यों में हिंदी का विरोध नेताओं के उकसाने पर होता था। 1987 में मैं पहली बार चेन्नई गया था। एक सड़क से गुज़रते मेरे मन में केले खरीदने का ख्याल आया। चेन्नई में सड़कों पर बीड़ी-सिगरेट के स्टालों पर केले भी लटके होते हैं। मैंने वहां महिला विक्रेता से कहा कि मुझे "बनाना" चाहिए, साथ ही मैंने उँगलियों से दो का इशारा किया। दो-तीन बार मांगने के बाद भी उसे समझ नहीं आया कि "बनाना" क्या होता है। जब मैंने केलों कि तरफ़ इशारा करके उसे समझाने की कोशिश की तो वह बोली, "ओ, कैला!" खैर, यह दावा करना कि अंग्रेज़ी देश की सम्पर्क भाषा है, एक मूर्खतापूर्ण सोच की अभिव्यक्ति है। अंग्रेज़ी उन्हीं ब्राह्मणों के लिए सम्पर्क भाषा है, जो अंग्रेज़ी न बोलने वालों को शूद्र समझते हैं। और ऐसे लोगों में हमारे हिंदी बोलने वालों की भी कोई कमी नहीं है।
हिंदी वाले तो भारत में हिंदी को स्थापित करने के लिए लड़ते रहे, विश्व में स्थापित करने के लिए भी, यह भली प्रकार जानते हुए कि जिस भाषा को उनकी अपनी सरकार ने सम्मान नहीं दिया, विश्व स्तर पर, कम-अज़-कम संयुक्त राष्ट्र संघ के स्तर पर भी, उसे कौन सम्मान देगा। लेकिन विश्व हिंदी सम्मेलनों के बहाने इन्होंने सरकारी धन खर्च करवा के देश-विदेश में अपनी अच्छी आवभगत करवा ली। इस मुद्दे को आज तक किसी ने नहीं उठाया कि हिंदी विश्व में सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा है। अपने ही वक्तव्यों से हम स्वयं को दोयम बताते रहे और चीनी को प्रथम स्थान पर रखते रहे।
पाकिस्तान के उर्दू बोलने वालों को हिंदी बोलने वाला कहना विवादास्पद माना जा सकता है, लेकिन, गम्भीरता से सोचने का विषय है कि उर्दू को अगर हिंदी से अलग माना जाता है तो फिर हमारी तमाम हिंदी फ़िल्में तो हिंदी फ़िल्में न होकर उर्दू फ़िल्में हो गई। सच्चाई यही है कि हिंदी में अरबी तथा फ़ारसी के कुछ शब्दों का मिश्रण हो जाने से एक पृथक भाषा नहीं बन जाती। उर्दू का व्याकरण, वाक्य-विन्यास, शब्दावली, सब तो हिंदी की है। सच्चाई यह भी है कि अरबी तथा फ़ारसी के शब्दों को हिंदी में स्वीकार कर लेने से हिंदी एक भाषा के तौर पर समृद्ध हुई है, लेकिन वह एक और भाषा नहीं बन गई। एक अन्य लिपि में लिखी जाने के कारण कोई भाषा दूसरी भाषा नहीं बन जाती। आज अगर कुछ लोगों के कहने में आकर रोमन की अवैज्ञानिक लिपि में हिंदी को लिखा जाने लगे तो वह एक दूसरी भाषा नहीं बन जाएगी। आम आदमी तो यह भी नहीं जानता होगा कि उर्दू के बहुत से शब्दों की व्युत्पत्ति संस्कृत से है। भारत में तथा उसके पड़ोस में भी उर्दू को एक पृथक भाषा का दर्ज़ा देने के पीछे राजनैतिक कारण हैं, वर्ना काश्मीरी को ताक पर रख कर काश्मीर में तथा पंजाबी, सिंधी, बलूची अथवा पुश्तू को ताक पर रख कर पाकिस्तान में उर्दू को देश या प्रदेश की भाषा का दर्ज़ा न दिया जाता। भारत के उत्तर पश्चिम में रहने वाले काश्मीरियों ने तो अपने देश के पूर्व में बोली जाने वाली "भाषा" को अपनी मातृभाषा बना लिया, तो पंजाबी बहुल पाकिस्तान ने एक "विदेशी" भाषा को, जिसके बोलने वालों को वे आज तक "मोहाजिर" कहते है, अपनी मातृभाषा का दर्ज़ा दे दिया। विदेशों में मैं पाकिस्तानियों से हिंदी में बात करता हूँ, दोनों की शब्दावली में उतना ही अंतर होता है, जितना हरयाणा में एक हरियाणवी से बात करने से होता है; वैसे ही बंगलादेश तथा नेपाल में हिंदी वैसे ही समझी जाती है, जैसे भारत के अन्य इतर-हिंदीभाषी प्रान्तों में।
एक भ्रम हमारे अंग्रेजीदां, कुछ विदेशी सांस्कृतिक दूत तथा बहुत से हिंदी लेखक, जिन्हें विदेशी दूतावासों में प्रवेश मिलता है, यह फैला रहे हैं कि हिंदी की पुस्तकों की कोई मार्केट नहीं है, कोई पढ़ता नहीं हिंदी पुस्तकों को। हिंदुस्तान टाइम्स में मनोज शर्मा की एक रिपोर्ट को पढ़ें तो फ्लिपकार्ट और इन्फीबीम के अनुसार हिंदी पुस्तकें पढ़ने वाले बहुधा 20 से 35 वर्ष के हैं और उनकी वजह से गत वर्षों में हिंदी पुस्तकों की बिक्री में 40 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। अंग्रेज़ी से अनूदित पुस्तकें युवा पाठकों में अत्यंत लोकप्रिय हो रही हैं। वाणी प्रकाशन के अनुसार ऑनलाईन पुस्तकें खरीदने वाले अब हिंदी पुस्तकें बहुत खरीदते हैं।
यह मेरी समझ से बाहर की बात है कि अचानक गैर-अंग्रेज़ीभाषी यूरोपियों को हिंदी से क्या वैमनस्य हो गया कि उन्होंने भारत की मुख्य तथा सम्पर्क भाषा को अंग्रेज़ी मान लिया। एक दिन अचानक जब मुझे भारत में आस्ट्रियाई सांस्कृतिक केंद्र के तत्कालीन निदेशक मिषाएल बेर्गेर ने यह ज्ञान दिया कि दिल्ली से बाहर कदम रखो तो भारत में हिंदी कोई नहीं बोलता मिलेगा, सबसे अंग्रेज़ी में बात करनी पड़ेगी, तो मैं सुन कर हक्का-बक्का रह गया। जर्मनी तथा स्विट्ज़रलैंड के सांस्कृतिक केन्द्रों, अर्थात माक्स म्युल्लर भवन तथा प्रो. हेल्वेत्सिया से तो ये आवाज़ें उभर रही थीं, पर आस्ट्रियाई सांस्कृतिक दूतों द्वारा भारतीयों तक को यह पाठ पढ़ाना एक नया अचम्भा था, जो भारत में इस देश के सांस्कृतिक केन्द्र के खुलने से शुरू हुआ था, जिसकी पहली निदेशिका थी गेर्टा हार्डी। हार्डी उसके अँगरेज़ पति थे। उसके आने से पहले आस्ट्रियाई दूतावास के सांस्कृतिक दूत ही साहित्य, संगीत, कला के क्षेत्र में अपने काम को बखूबी निभा रहे थे। गेर्टा से पहले वाले का नाम था आलेग्जान्दर एयरलिष आदम, जिसे उनके मित्र आलेक्स कह कर बुलाते थे; जितने परिश्रम तथा लगन से आलेक्स ने वहां अपना काम निभाया, वैसा किसी ने न उससे पहले न उसके बाद किया होगा। बरसों आलेक्स तथा उनकी राजदूत युट्टा श्टेफ़ान बास्टल ने हिंदी के लिए जो अच्छा काम किया था, इस शख्स ने उस सब पर पानी फेर दिया है।

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