btn_subscribeCC_LG.gif btn_buynowCC_LG.gif

भाषाओं का परिवारवाद और हिंदी
01-May-2019 04:45 PM 1100     

हिंदी, भारत की राजभाषा है। इसे बोलने वालों की संख्या लगभग 50 करोड़ है। एक बड़ा तबका इसे राष्ट्रभाषा के रूप में मान्यता देता है। यह भी तथ्य है कि भारत के बाहर अनेक देशों में हिन्दी का उपयोग होता है और नये संचार माध्यमों के आने के बाद यह तेजी से अहिन्दी भाषी प्रदेशों और देशों में भी प्रचलित हो रही है। देश के अनेक कार्यालयों/बैंकों/विश्वविद्यालयों आदि में हिन्दी के विकास के लिए अलग से प्रकोष्ठ होते हैं।
इन तमाम उपलब्धियों के बावजूद एक भाषा के रूप में हिन्दी की स्थिति अत्यंत जटिल है। शायद यह दुनिया की एकमात्र भाषा होगी जिसमें सिद्धांत और व्यवहार में बहुत बड़ा फर्क नजर आता है। इस बात को और स्पष्ट करें तो हम पाते हैं कि ज्यादातर भाषाओं की किसी न किसी क्षेत्र विशेष में एक लंबी परंपरा मिलती है। जैसे कि बंगाली या तमिल भाषा उस क्षेत्र विशेष में एक लंबे समय से व्यवहृत होती रही है। जबकि हिन्दी (खड़ी बोली) की ऐसी कोई परंपरा नहीं मिलती या इतने छोटे क्षेत्र (मेरठ के पास का कौरव क्षेत्र) में मिलती है कि वह महत्वहीन हो जाती है। जिस हिन्दी का हमलोग आज प्रयोग कर रहे हैं गद्य में उसकी परंपरा मात्र 200 वर्षों की है। और वह भी अविच्छिन्न नहीं है। 1800 ई. में फोर्ट विलियम कॉलेज में जॉन गिलक्रिस्ट के सौजन्य से हिन्दी पुस्तकें तैयार हुईं। 1800 के करीब लाला लल्लू लाल, सदल मिश्र, इंशा अल्ला खां (जिन्होंने फारसी लिपि में "रानी केतकी की कहानी" लिखी) आदि ने हिन्दी में गद्य लिखा। लेकिन इसके बाद फिर से सन्नाटा छा जाता है जिसे 1850-60 के करीब जाकर शिवप्रसाद सिंह सितारेहिंद और भारतेंदु हरिश्चंद्र तोड़ते हैं। सवाल उठ सकता है कि इतने विशाल क्षेत्र की भाषा में लगभग 50 वर्षों तक कोई उल्लेखनीय नाम क्यों नहीं आता है? मेरी दृष्टि में यह सवाल शुद्ध रूप से भाषा से जुड़ा सवाल है जिसका सीधा संबंध भाषा की परंपरा और उसके विकास से संबंधित है।
हिन्दी भाषा के इतिहास और इसकी परंपरा को विद्यालयों/महाविद्यालयों और मुख्यधारा के प्रचार माध्यमों में जिस तरह से समझाया और दिखाया जाता है, वह अपनेआप में शोध का विषय है। हिन्दी का विकास सामान्यत: निम्न रूप में दिखाया जाता है-
संस्कृत-- पालि-- प्राकृत--अपभ्रंश-- अवहट्ट-- भारतीय आर्य भाषाएंं-- हिन्दी
यानी सबसे पहले संस्कृत भाषा (1500 से 500 ई.पू.) थी, उससे पालि (500 ई.पू. से 1 ई.) बनी, फिर उस पालि से प्राकृत (1 ई. से 500 ई.) आयी। इसके बाद अपभ्रंश (500 से 1000 ई.) का विकास हुआ, उस अपभ्रंश से अवहट्ट विकसित हुई जिसमें विद्यापति की रचनाएं मिलती हैं। इसके बाद ब्रज, अवधी, राजस्थानी, गुजराती, बंगाली आदि आर्यभाषाओं का विकास हुआ और 1800 के करीब हिन्दी विकसित हुई। जबकि गंभीर भाषाविद् हिन्दी की पंरपरा को अलग ढंग से देखते हैं।
उपरोक्त विकास क्रम को बताते समय हम ये भूल जाते हैं कि संस्कृत की शानदार रचनाएं गुप्त काल में और उसके बाद लिखी गयी हैं। जो तथाकथित रूप से प्राकृत और अपभ्रंश का काल है।
हम यह भी याद नहीं रखना चाहते कि प्राकृत किसी एक निश्चित भाषा का नाम नहीं है। यह प्रकृति और स्वाभाविकता का सूचक है। यह किसी भाषा विशेष के जनसामान्य से जुड़े होने का प्रमाण है न कि किसी भाषा का नाम। उन सभी भाषाओं को हम प्राकृत कह सकते हैं जिनका कोई प्रामाणिक रचनात्मक साहित्य आज उपलब्ध नहीं है।
हम यह भी भूल जाते हैं कि जब आज के इस परिवहन तथा संचार साधनों के अकूत विस्तार के अति वैज्ञानिक युग में कई सौ भाषाएं अस्तित्व में हैं तो आज से हजारों साल पहले जब किसी नदी या छोटे से पहाड़ के कारण भाषाएं बदल जाती थीं, तब एक ही भाषा कैसे हो सकती थी। अगर इस बात का प्रमाण देखना हो तो कोई आज भी अरुणाचल प्रदेश की भाषाओं को सामने रखकर देख सकता है, जहां कई बार पति-पत्नी की भाषा भी अलग हो जाती है क्योंकि उनके घरों (समाज) के बीच कुछ किलोमीटर का फासला होता है।
स्पष्ट है कि वैदिक काल में या पाणिनि के समय में हजारों भाषाएं रही होंगी। उस समय थोड़े भिन्न रूप में प्राकृत भाषाएं रही होंगी, यानी किसी और रूप में आज की हिन्दी भी रही होगी। तत्कालीन भाषाओं में से कुछ को अधिक महत्व मिलता होगा क्योंकि उसमें सोचने-विचारने या रचना करनेवाले लोगों की संख्या अधिक होगी। धीरे-धीरे अन्य भाषाओं की तुलना में उसका एक शिष्ट और साहित्यिक रूप विकसित हुआ होगा। फिर कुछ चिंतकों ने उसी में वैदिक सूत्र और अन्य ऋचाएं रची होंगी जिसके कारण वह अन्य प्राकृत भाषाओं की तुलना में विशेष हो गयी होगी। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि वैदिक संस्कृत में प्राकृतिक एवं आंचलिक तत्व बहुत अधिक हैं। आगे चलकर भाषाओं के अद्भुत ज्ञाता पाणिनि ने उस समय की सबसे समर्थ भाषा को वैज्ञानिक रूप दिया। उसे तमाम नियमों/ विनियमों में व्याख्यायित किया। भाषा के एक-एक अंग की गजब की व्यवस्था की और इस प्रकार उसे एक स्थायी रूप दे दिया जिसे हम संस्कृत के रूप में जानते हैं। अगर हजारों वर्षों तक संस्कृत ज्यों की त्यों बरकरार रही तो इसका श्रेय आचार्य पाणिनि को जाता है। हालांकि इसी कारण संस्कृत का स्वाभाविक विकास रुक गया और वह आम जनता से कटती चली गयी। ठीक ऐसा ही अशोक के समय की एक प्राकृत के साथ हुआ। एक प्राकृत विशेष में बुद्ध ने अपने उपदेश दिए, जिसके कारण उसे अन्य प्राकृतों की तुलना में अधिक बल मिला, बाद में वह मौर्य साम्राज्य की राजभाषा हो गयी और सम्राट अशोक ने उसमें शिलालेख लिखवाए, उसका रूप निश्चित हुआ और वह एक मान्य भाषा बन गयी जिसे हम "पालि" के रूप में जानते हैं। इसीलिए बहुत सारे विद्वान "पालि", "प्राकृत", "अपभ्रंश" आदि को यह संज्ञा न देकर क्रमश: इन्हें पहली प्राकृत, दूसरी प्राकृत, तीसरी प्राकृत कहना पसंद करते हैं। स्पष्ट है कि पहली प्राकृत से पहले भी भाषाएं रही होंगी जिनका कोई नाम हमें प्राप्त नहीं होता है। इस संदर्भ में वेदों के काल के प्राकृत (जिनका कोई नाम मुझे नहीं मिला) को मैं "आदि प्राकृत" कहना पसंद करूंगा।
हिन्दी को संस्कृत से निकला हुआ बताना उस समय की प्राकृत भाषाओं का अपमान करना है। निश्चित रूप से आज की हिन्दी सबसे अधिक संस्कृत से प्रभावित है परंतु इसे प्रभाव के रूप में ही देखना चाहिए। हमारी पाठ्य-पुस्तकें और बहुत सारे तथाकथित भाषाविद् भी भ्रम के निर्माण में खूब योगदान देते हैं। इस संदर्भ में प्रसिद्ध भाषाविद् आचार्य किशोरीदास वाजपेयी जैसे विद्वानों की बातें भी हमें याद नहीं रहती जिन्होंने स्पष्ट कहा है कि, "हिन्दी की उत्पत्ति उस संस्कृत भाषा से नहीं है, जो कि वेदों में, उपनिषदों में तथा वाल्मीकि या कालिदास आदि के काव्यग्रंथों में हमें उपलब्ध है। "करोति" से "करता है" एकदम से कैसे निकल पड़ेगा? "राम: करोति" की तरह "सीता करोति" भी संस्कृत में चलता है, परंतु हिन्दी में "लड़का चलता है, करता है, खाता है" होता है परंतु "लड़की चलती है, करती है, खाती है" होता है। कितना अंतर।"
तात्पर्य यह कि भाषा के मामले में हमारे भाषा निर्माताओं (मूलत: नीति निर्माता, भाषा को भला क्या कोई बनाएगा) ने केवल तथ्यों का ही नहीं कुछ अन्य बातों का भी ध्यान रखा। यानी इस भाषा के वर्तमान स्वरूप के निर्माण के पीछे सामाजिक-राजनीतिक (और व्यक्तिगत भी) निहितार्थ थे जिन पर विस्तार से बाद में चर्चा की जाएगी।
यहां इतना ही उल्लेखनीय है कि अक्सर हम पेड़ों और मनुष्यों की तरह भाषाओं का वंश वृक्ष तैयार कर लेते हैं और एक शाखा से दूसरी शाखा निकलती हुई दिखाते चले जाते हैं और इसी को अंतिम सत्य की तरह किताबों में प्रस्तुत कर देते हैं। हमें यह भी ध्यान नहीं रहता कि इस प्रक्रिया का कितना बड़ा मूल्य चुकाना पड़ सकता है। भाषाएं किसी एक व्यक्ति या सत्ता के कहने से अपना रास्ता नहीं बदल लेतीं, किसी नदी की तरह उसकी एक स्वाभाविक गति और प्रकृति होती है और उस नदी को कृत्रिम नहर बनाने के अपने खतरे होते हैं। निश्चित रूप से नहर अधिक सुनियोजित, परिमार्जित और मनोनुकूल हो सकती है परंतु इन विशेषताओं का मूल्य भी चुकाना पड़ता है। इस प्रक्रिया में यह अपनी प्रकृति (आम जनता) से कट जाती है और धीरे-धीरे इसकी संजीवनी शक्ति खत्म होती चली जाती है। इसका एक उदाहरण हम परवर्ती संस्कृत के रूप में देख सकते हैं।
इन मुद्दों पर विस्तार से बात करना इसलिए भी जरूरी है कि भारत में राज्यों का निर्माण भाषा के आधार पर हुआ है और किसी भी राज्य के सामाजिक/आर्थिक स्वरूप को निर्धारित करने में भाषा की बड़ी भूमिका रही है। इस दृष्टि से हिंदीभाषी प्रदेशों की स्थिति को बहुत उत्साहजनक नहीं कहा जा सकता। अक्सर इसे हिंदी पट्टी, गोबर पट्टी, पिछड़ा समाज या बंद समाज जैसे विशेषणों से नवाजा जाता है। मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं कि इन सारे विशेषणों के पीछे एक हद तक हिंदी भाषा की भी भूमिका रही है। किसी भी समाज के विकास में उसकी शिक्षा व्यवस्था, उसके संचार माध्यम, राजनीति आदि की बड़ी भूमिका होती है और ये सब उस समाज की भाषा से गहरे रूप में निर्धारित होते हैं। यह विड़ंबना नहीं तो और क्या है कि हिंदी समाज के ही कुछ लोग इस अन्याय से मुक्ति का रास्ता अंग्रेजी देवी की पूजा के रूप में देखते हैं।

QUICKENQUIRY
Related & Similar Links
Copyright © 2016 - All Rights Reserved - Garbhanal - Version 19.09.26 Yellow Loop SysNano Infotech Structured Data Test ^