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शिक्षकीय दुनिया की कहानी के पात्र
01-Sep-2019 02:02 PM 763     

एक सम्वाद के अंश : "इक्कीस साल के बाद पहली बार किसी कार्यशाला में बैठा हूं। बहुत अच्छा लग रहा है। वरना तो जी कार्यशाला में पढ़ाने वाले घंटे का तीन-तीन हज़ार लेकर चुटकुलों के सहारे या फिर अपनी अपनी कहानी सुनाकर चले जाते हैं। हमारा समय भी ख़राब होता है।"
आपने बार-बार कहा "मेरे बच्चे, हमारे बच्चे क्या सीखेंगे? मेरे बच्चों को क्या मिल रहा है स्कूलों में? मुझे ये बहुत अच्छा लगा। अच्छा लगा इसलिए मैं यह शब्द और आपका संबोधन अपने साथ लेकर जा रहा हूं। मैं स्कूल का इंचार्ज भी हूं सो अपने शिक्षकों के साथ यह अनुभव साझा करूंगा।"
ऐसी अभिव्यक्तियों की पंक्तियां और भी हैं जिन्हें लिखने लगूं तो एक अन्य लेख की ओर मुड़ना पड़ेगा। सो इन पंक्तियों के निहितार्थ की चर्चा करना अपेक्षित होगा। जब बीस-पच्चीस साल शिक्षण करने के बाद कोई शिक्षक स्वीकारे कि आज तो उसे पढ़ाने या कार्यशाला में मज़ा नहीं आया तो यह सवाल हमारी शिक्षण-प्रशिक्षण शैली पर भी उठता है। पढ़ने-पढ़ाने की ख़्वाहिश रखने वाले इस पेशे में कम नहीं हैं किन्तु उनकी ऊर्जा और प्रतिबद्धता को सही तरीके से इस्तेमाल नहीं किया गया। यह हकीकत है कि जिस लचर तरीके से सरकारी शिक्षकों की प्रशिक्षण कार्यशालाएं आयोजित होती हैं उसमें निराशा ज्यादा पैदा होती है। जो समर्थ और सक्षम शिक्षक हैं वे बेमन से आते हैं और जब कार्यशाला में उन्हें कुछ नया या चुनौतिपूर्ण नई तालीम नहीं मिलती तब वे बेहद हताश और निराश होते हैं। हम यदि शिक्षकों की निराशा और हताशा को कम नहीं कर पाए तो कम से कम उन्हें ऐसा माहौल देने में सहयोग करें कि वे अपनी क्षमता और कौशल का प्रयोग अपनी कक्षा में कर सकें।
देखा जाए तो हर शिक्षक की अपनी कहानी होती है। इस कहानी में कई सारे पात्र होते हैं। मानें या न मानें हम पूरी जिं़दगी में जितने लोगों से नहीं मिल पाते एक शिक्षक अपनी आधी जिं़दगी में उतने जीवन से भरे बच्चों से रूबरू होता है। एक प्राथमिक कक्षा को पढ़ाने वाला शिक्षक कक्षा एक में जिन बच्चों को पढ़ाना शुरू करता है उन्हें पांचवीं कक्षा तक ले जाता है। कक्षा छठीं की ओर प्रेरित कर हमारा शिक्षक बेशक उन हज़ारों बच्चों के चेहरे भूल जाए। नाम बेशक याद न रहे लेकिन एक बच्चा ताउम्र अपने शिक्षक की विशेषताओं, उसकी कमियों, उसकी खीझों, बात करने के अंदाज़ आदि को याद रखता है। अनुमान लगाएं, आप सुबह सुबह कक्षा में प्रवेश करते हैं और आपके स्वागत में चालीस, पच्चास चेहरे और 100 आंखें इंतज़ार कर रहीं हैं यही तो वे पात्र हैं शिक्षकों की कहानी के जिन्हें शिक्षक अपने तई गढ़ता, मांजता और पुनर्नवा करता है। इस प्रक्रिया में कई बार हारता है, टूटता है, टूटकर जुड़ता है। एक शिक्षक की दुनिया में इन पात्रों की बड़ी भूमिका है। जिस प्रकार से बच्चों की दुनिया में शिक्षकों की भूमिका होती है उसी प्रकार शिक्षकों की दुनिया में बच्चों की भी भूमिका अहम मानी जाती है। यह अत्यधिक महत्वपूर्ण है कि शिक्षक बच्चों की दुनिया को कैसे आकार देता है। कई बार बच्चे कैसे शिक्षकों को भी गढ़ते हैं इन्हें जानना हो तो महाश्वेता देवी के उपन्यास "समा साबब" को पढ़ा जाना चाहिए। या फिर नागार्जुन की कविता "दुखहर मास्टर" को बांचें तो एक ऐसी शिक्षक की छवि बनती है जिसने अपने जीवन में मारने, डाँटने के अलावा बच्चों को गढ़ने में कोई ख़ास भूमिका नहीं निभाई। वहीं अरुण कमल की कविता "मुक्ति" पठनीय है। वे एक ऐसे मास्टर और पिता की चर्चा करते हैं जिसने अपने बच्चे को पढ़ाने में कोई ख़ास वक्त नहीं दिया। वह मास्टर पिता ट्यूशन पढ़ाने में अपने समय का बड़ा हिस्सा लगाता है। अवकास प्राप्त करने के बाद मास्टर पिता को एहसास होता है कि उन्होंने अपने बेटे को तो देखा ही नहीं। सुबह स्कूल चले जाते और रात जब बेटा सो जाता तब पिता-मास्टर घर लौटते। बतौर "मुक्ति" कविता की पंक्तियां पठनीय हैं- "दोष मेरा ही था, मैंने कभी पूछा नहीं, कैसे हो तुम, जानता भी नहीं था क्या पढ़ते हो तुम, और आज जब अचानक देखा मैंने, तुम कुछ नहीं जानते, मेरा लड़का कुछ भी नहीं जानता।" (अरुण कमल प्रतिनिधि कविताएं, पेज-36, राजकमल प्रकाशन।) आज के समय की ऐसी सच्चाई नज़र की गई है जिसे शिद्दत से पढ़ा जाना चाहिए। शिक्षकों की दुनिया को समझने में कई बार साहित्य की विधाएं कहानी, कविता, उपन्यास, नाटक या फिर संस्मरण आदि काफी मदद करती हैं। हालांकि सच्चाई यह भी है कि ऐसे हज़ारों शिक्षक अभी भी मौजूद हैं जो लगातार अपनी समझ, सौंदर्यबोध, जीवनानुभव से बच्चों को प्रकारांतर से मदद करने में ज़रा भी गुरेज़ नहीं करते।
हमारे शिक्षक पढ़ाने पर ज़ोर देते हैं। ये अपनी कक्षा में पढ़ाना भी चाहते हैं। फिर क्या वजह है कि हमारे शिक्षक न पढ़ा पाने की कसक लिए घूमा करते हैं। स्कूल की कक्षाएं पढ़ाने की सामग्रियों से भरी हुई हैं। अब कक्षाओं और स्कूलों में सीसीटीवी इंस्टॉल किए जा रहे हैं। यह एक नया-नया और ताज़ातरीन गतिविधियां दिल्ली के सरकारी स्कूलों में तेजी से पांव पसारती नज़र आ रही हैं। बेशक अकादमिक धड़ों में इन कैमरों के लगाने को लेकर विरोध किया हो, किन्तु, क्योंकि निज़ाम का फरमान है तो उसे पूरा किया जायेगा। दावा तो यह भी किया गया है कि बच्चों की गतिविधियों, उपस्थिति, कक्षा की तमाम जानकारियां भी अभिभावक पा और देख सकेंगे। इसमें इतनी-सी राहत दी गई है कि अभिभावकों को पूरी तो नहीं किन्तु कुछ कुछ फुटेज मुहैया कराई जाएंगी। बच्चे तो बच्चे, शिक्षकों के मन में भी सीसीटीवी कैमरों को लेकर एक भय और आशंका की रेखाएं देखी और सुनी जा सकती हैं। हालांकि सूचना संचार तकनीक के प्रयोग करने से किसी को भी गुरेज़ नहीं हो सकता। आईसीटी ने निश्चित ही हमारी रोज़मर्रा की जिं़दगी को प्रभावित किया है। उसमें शिक्षा अलग नहीं मानी जा सकती। पुराने काले गड्ढ़ों वाले, बदरंग बोर्ड तो बदले जा चुके हैं। जहां अभी भी नहीं बदले हैं वहां आने वाले दिनों में बदल जायेंगे। सरकारी स्कूलों की कक्षाओं में जाने का मौका मिले तो सफेद बोर्ड, स्मार्ट बोर्ड, रंगीन दीवारें, पंखों पर चित्रकारी बच्चों को अपनी ओर लुभावनी बनाई जा चुकी हैं या आने वाले समय में बन जाएंगी ऐसी उम्मीद की जा सकती है। जबकि हक़ीकत यह भी है दिल्ली की नज़रों से अन्य राज्यों की सरकारी स्कूलों को न तो देखना उचित होगा और न ही देखा जाना चाहिए। दिल्ली के सरकारी स्कूलों को देखकर कुछ-कुछ भ्रम हो सकता है। क्योंकि इन स्कूलों को ख़ासतौर पर तैयार किया जा रहा है लेकिन सच्चाई तो यह भी है कि इसी दिल्ली में नगर निगम के स्कूलों में उक्त सुविधाएं अभी भी सपने ही हैं। क्या शौचालय और क्या पीने का पानी। टोटी है पर पानी नहीं। वो भी किसी एनजीओ ने एक बार लगा दिया दुबारा उसकी सफाई नहीं हो सकी और ताले लगे हैं। आईसीटी लैब है, लेकिन टीचर की कमी है। जब सामान्य शिक्षकों के पद खाली हैं तो ऐसे में आईसीटी कुछ कुछ सुस्वादु व्यंजन सा लगता है। जबकि राष्ट्रीय शिक्षा नीति के मसौदे को देखें तो एक पूरा का पूरा अध्याय आईसीटी पर केंद्रित है। लेकिन हक़ीकतन कक्षाओं की स्थिति इससे उलट है। देश के अन्य राज्यों में सरकारी स्कूलों में सामान्य कक्षा-कक्ष, अध्यापक आदि की कमी है। ऐसे में हमारा प्रशिक्षित शिक्षक कैसे अपने बच्चों को सम्यक तौर पर सीखने-सिखाने की सकारात्मक प्रक्रिया को अंज़ाम दे सकेगा।
यकीनन शिक्षक, शिक्षा और बच्चों के मध्य वह कड़ी है जो कमजोर हो, अप्रशिक्षित हो, अपने प्रोफेशन से निराश हो तो वह परोक्षत-अपरोक्षतः शिक्षा-बच्चों के स्वास्थ्य के लिए ठीक नहीं है। मई, जून, जुलाई और अगस्त माह में लगभग 150 प्राथमिक शिक्षकों और 100 प्रधानाचार्यों आदि से कार्यशाला में मुलाकात और संवाद को आधार बनाते हुए कहने की कोशिश कर सकता हूं कि इनमें से अधिकांश प्रतिभागियों के पास फोन में वाट्यऐप पर राष्ट्रीय शिक्षा नीति का मसौदा-2019 उनके अधिकारियों, मित्रों ने साझा किए थे। लेकिन क्योंकि यह दस्तावेज़ हिन्दी में 650 पेज और अंग्रेजी में 450 पेज का है जिसे देखने-पढ़ने के लिए धैर्य और समय की आवश्यकता है। इनमें से अधिकांश प्रतिभागियों ने कबूला की ऐसा कुछ मैसेज आया तो है, लेकिन देख और पढ़ नहीं पाए हैं। इन लोगों ने यह तो स्वीकारा कि इससे हमारी शिक्षा व्यवस्था पर प्रभाव पड़ेगा।
हमारे शिक्षक यह तो चाहते हैं कि पाठ्यपुस्तकों में बदलाव हो, शिक्षा नीतियों में परिवर्तन ज़रूरी है आदि-आदि। लेकिन स्वयं लिखकर सक्षम मंच तक अपनी बात रखने से चूक क्यों जाते हैं? वो क्या वजहें हैं कि शिक्षक अपने शैक्षणिक समाज में घट रही राजनीतिक और नीतिगत निर्णयों में हिस्सा नहीं ले पाते? पहली वज़ह तो यही कि उनका अटूट विश्वास होता है कि उनकी कौन सुनेगा? वो यदि अपनी बात रखते भी हैं तो क्या उन्हें शामिल किया जाएगा? हालांकि एनसीईआरटी जैसी संस्थाएं शिक्षकों को अपनी समितियों में भाग लेने, अपनी रचनात्मक क्षमता और कौशल के योगदान के लिए आमंत्रित करती रहती हैं। सबसे अड़चन और दिक्कत वाली स्थिति तब आती है जब मालूम होता है स्कूल के बाद या स्कूल के इतर समय और श्रम देने होंगे। तब विभिन्न किस्म की व्यस्तताएं याद आने लगती हैं। बच्चा छोटा है, भौगोलिक दूरी, स्कूल के बाद समय न दे पाना आदि कारण सामने आते हैं। उस पर ये आरोप लगाना कि शिक्षकों की कोई नहीं सुनता। हालांकि जब तक सक्षम और कुशल शिक्षक पूरी मजबूती और सतर्क सही मंच पर अपनी बात नहीं रखेंगे तब तक बहानों का तो कोई अंत नहीं है, लेकिन नीतियां समितियों में समुचित हस्तक्षेप करना मुश्किल होगा।
वास्तव में शिक्षकों के पास शिक्षण के अलावा बहुत से ऐसे स्कूली काम होते हैं जिन्हें करने ही होते हैं। इनमें जनगणना, बाल गणना, बैंक में बच्चों के खाते खुलवाना आदि। इसके साथ ही साथ विभागीय अन्य कामों की कोई सूची नहीं बनाई जा सकती। हालांकि यह कार्य सीधे-सीधे शिक्षकों से नहीं मांगे जाते बल्कि स्कूल के हेड यानी प्रधानाचार्य को देने होते हैं। वह काम विकेंद्रित कर शिक्षकों में बांट दिए जाते हैं। मसलन डाइस की रिपोर्ट तैयार करने में शिक्षकों की भूमिका को नज़रअंदाज़ नहीं कर सकते।
उक्त संदर्भों के मद्देनजर उच्च न्यायालय के आदेश को स्मरण करना मौजू होगा। उच्च न्यायालय ने अपने आदेश में स्पष्ट कहा है कि शिक्षकों से अतिमहत्वपूर्ण कार्यों को छोड़कर गैर शैक्षणिक कार्य न कराए जाएं। लेकिन इस आदेश के बावजूद भी यह गैर शैक्षणिक कार्यों का सिलसिला बतौर जारी है। हाल में संपन्न लोक सभा चुनाव के दौरान मत पेटी हासिल करने और जमा करने के दौरान शिक्षकों को किस प्रकार की बदइंतजामी का सामना करना पड़ा।
कभी जाएं तो देखेंगे कि सुबह के 7.45 से लेकर 12.30 बजे तक में एक बड़ा हिस्सा फेस पहचान उपस्थिति मशीन के सामने बच्चों को खड़ा कराने, उपस्थिति दर्ज़ कराने, मिडडे मील बांटने में चला जाता है। हालांकि बच्चे पढ़ने आएं थे, लेकिन क्या उन्हें वो समय पढ़ने के लिए मयस्सर हो पाता है जो इन कामों के बाद शिक्षकों के पास बच जाते हैं।
शिक्षक अभी भी फारिग होकर कक्षा में पढ़ा ही रहे होंगे यदि ऐसा सोच रहे हैं तो ठहरिए! बीच-बीच में शिक्षा विभागीय अन्य आंकड़ों की मांगें भी कभी भी हो सकती हैं जिसे प्रधानाचार्य/शिक्षकों को अभी के अभी चाहिए के तर्ज़ पर भेजने होते हैं। ऐसे में शिक्षक जिस शिद्दत से पढ़ाने में रमा है उसे किसी और के हाथ सौंप कर या खाली छोड़कर दफ्तरी आंकड़ों के जुटान में लगना होता है। इन सब के बावजूद ऐसे हज़ारों शिक्षक हैं जो पढ़ाना अपना पहला और प्राथमिक कर्तव्य समझते और मानते हैं। उनकी कक्षाएं जाकर देखें तो पाएंगे कि इन शिक्षकों की कक्षाएं और बच्चे किस स्तर पर सीख रहे हैं। इनके बच्चों की लर्निंग आउटकम भी कम नहीं होते। लेकिन अफसोस कि ऐसे शिक्षक अपनी ऊर्जा और रचनात्मकता के साथ स्वयं ही जूझ रहे होते हैं। उन्हें ही किसी भी कीमत पर अपनी पेशेगत पहचान बरकरार रखने और अस्तित्व के खतरे से लड़ना होता है।

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