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तकनीकी और भाषा
01-Sep-2018 08:06 PM 3410     

भाषा की विशद् व्याख्या न कर भारतीय भाषाओं और मुख्यत: हिन्दी के संदर्भ में अपनी बात रखूँगा। भाषा की समझ के लिए लिपि, शब्द और व्याकरण को समझना आवश्यक है। लिपि भेद कई हैं - रैखिक, जटिल, बाएं से दाएं, दाएं से बाएं, ऊपर से नीचे, वर्णात्मक, चित्रात्मक, ध्वन्यात्मक इत्यादि। शब्द समझने के लिए शब्दावली, कोश और वाक्य का अर्थ समझने के लिए व्याकरण आवश्यक हैं। तकनीकी से तात्पर्य है वे साधन जो हाथ से लिखने के पर्याय सहायक बनें, बोल कर लिखाने में सक्षम हों, हाथ के लिखे को और पिं्रट को पढ़ सकें। इसके आगे जो लिखा या लिखाया या लिखा दिखाया है उसे समझ कर हमारे काम आसान कर दे जैसे पिं्रट निकालना, अनुवाद करना, शब्द अथवा संकल्पना के आधार पर लेखों को खोज निकालना इत्यादि। कहने का तात्पर्य है कि तकनीकी बुद्धू न हो, मानव समान बुद्धि सम्पन्न हो। यहाँ तकनीकी से तात्पर्य है कंप्यूटर और संबन्धित उपकरणों से।
बड़ी-बड़ी अपेक्षाएं हैं, भाषाविद् और तकनीकीविद् के बीच कुछ भागीदारी की भी जरूरत है। लेकिन इस भागीदारी में बड़ा असंतुलन प्रतीत होता है।
पहले हिन्दी भाषा के स्वरूप को समझ लें। हिन्दी को तीन वर्गों में बाँट सकते हैं - लोक भाषा हिन्दी (जन संवाद के लिए), राजभाषा हिन्दी (सरकारी कामकाज के लिए), तकनीकी भाषा हिन्दी (ज्ञान-विज्ञान के सम्प्रेषण के लिए)। अधिकतर आलाप साहित्यिक हिन्दी का होता है। साहित्येतर/प्रयोजन मूलक/तकनीकी हिन्दी के विकास के लिए पहल और प्रोत्साहन की नितांत आवश्यकता है। यदि साहित्यिक पक्ष को हाथ के अति सक्षम अंगुष्ठ समान मानें, तो साहित्येतर/प्रयोजन मूलक/तकनीकी पक्ष को शेष चार अंगुलियों के बराबर मान सकते हैं। इस प्रकार साहित्यिक पक्ष 1/5 अर्थात् 20 प्र.श. बनता है, शेष 4/5 अर्थात् 80 प्र.श. साहित्येतर श्रेणी में जाएगा। कार्यक्रम इसी अनुपात में किए जाएं तो हिन्दी/भारतीय भाषाओं की बहुत प्रगति होगी, अवसर-विषमता भी मिटेगी, समाज नवाचार सम्पन्न होगा। गाँव और कस्बों में हिन्दी का स्वरूप स्थानीय बोलियों से प्रभावित होता है, कचहरी में हिन्दी का स्वरूप उर्दू शब्द बहुल है, बड़े शहरों और अखबारों में हिन्दी का स्वरूप अंग्रेजी शब्द बहुल है, उच्च और सर्वोच्च न्यायालयों में केवल अंग्रेजी मान्य है, विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में अंग्रेजी में लिखे शोध को ही मान्यता मिलती है। हिन्दी अधिकारियों की हिन्दी का स्वरूप क्लिष्ट शब्द बहुल, अटपटे अनुवाद का है।
उच्चतर तकनीकी शिक्षा का माध्यम अंग्रेजी है। माध्यमिक शिक्षा प्राय: अंग्रेजी में है। बड़े शहरों में प्राथमिक शिक्षा का माध्यम प्राय: अंग्रेजी है। प्रवेश परीक्षाएं प्राय: अंग्रेजी में होती हैं। हिन्दी विकल्प प्रश्न पत्र में अटपटे अनुवाद होते हैं। कैरियर बनाने की होड़ में अंग्रेजी के लिए मजबूरी में दौड़ना पड़ता है। लेकिन प्राय: निराशा हाथ लगती है। ऐसी शिक्षा और परीक्षा नीतियां 90 प्र.श. से अधिक जनता के लिए अनुकूल नहीं हैं। इससे अपोर्चुनिटी-डिवाइड अर्थात् अवसर-विषमता बढ़ रही है। लोकतंत्र में सभी को समान अवसर मिलना चाहिए।
भारत सरकार ने 2010-2020 को नवाचार दशक घोषित किया था। आजकल सरकार नवाचार/इन्नोवेशन पर विशेष बल दे रही है। लेकिन रटन्ति विद्या से नवाचार की अपेक्षा व्यर्थ है। लोक भाषा हिन्दी में एक भी शोध पत्र मिल जाए तो लगता है दुर्लभ नागपुष्प खिल उठा जो तीन दशक के बाद खिलता है। न्यायालयों में हिन्दी से नफ़रत मालूम पड़ती है। स्वास्थ्य के क्षेत्र में डॉक्टर मरीज को दवा अंग्रेजी में लिखता है; ग्र्क़्, एक़् से दिन में एक बार, दो बार समझ भी लें, लेकिन क्तच् से रात को सोते समय दवा लेने का अंदाजा लगाना मुश्किल है। मरीज की दुविधा को सोच सकते हैं। अंग्रेजी में शिक्षा की यह देन है कि पढ़े-लिखे विशेषज्ञ सामान्य लोगों को अपनी बात समझा नहीं पाते। विडंवना!
लोकभाषा हिन्दी के सुगम प्रसार के लिए समावेशी दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता है, बोलियों के शब्दों को मिलावें, दक्षिण की भाषाओं के शब्दों का भी यदाकदा यथोचित प्रयोग बढ़ावें। हिन्दी के लिए दिए जाने वाले पुरस्कारों में समावेशी दृष्टिकोण को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। इससे भोजपुरी, ब्रज, अवधी आदि को संविधान की आठवीं सूची में शामिल किए जाने की मांग मंद होगी।
लेखक पाठक की भारतीय प्रकृति से जुड़े, अनुवाद/ ज्ञानांतरण को पाठकोन्मुखी बनाकर सुबोध अनुसृजन करें। आधारभूत संकल्पनाओं (बेसिक कन्सेप्ट्स्) की गहरी समझ अपनी लोक भाषा में होती है, इंटरफेस के लिए अन्य भाषा की जरूरत हो सकती है।
तकनीकी स्तर पर भारतीय भाषाओं के लिए विगत दो दशकों में कई नई उपयोगी तकनीकी उपकरण और प्रणालियों का विकास हुआ। लेकिन तकनीकीविद् और हिन्दी भाषाविद् के बीच असंतुलन रहा प्रतीत होता है!
कंप्यूटर पर काम करने के लिए 1991 में क्ष्ग़्च्क्ङक्ष्घ्च्र् मानक (क्ष्च् 13194:1991) बना, अभी तक बहुत कम प्रचलन में है, स्टाफ सलेक्शन बोर्ड ने टाइपिस्ट के टेस्ट के लिए इसे 2013 में मान्यता दी। आश्चर्य है कि इतने वर्षों तक हिन्दी जगत को कोई शिकायत नहीं। यूनिकोड की परिकल्पना से पहले सभी भारतीय भाषाओं के लिए क्ष्च्क्क्ष्क्ष् ध्वन्यात्मक कोड बनाया गया। अस्सी के दशक में छग़्क्ष्क्ग्र्क़्क की परिकल्पना ग्लिफ/ वर्ण-आकृति के आधार पर सभी विश्व भाषाओं के लिए की गई थी। वैश्वीकरण के संदर्भ में यूनिकोड को स्वीकारा गया। पहले छग़्क्ष्क्ग्र्क़्क समर्थित सौ से अधिक फॉन्ट बने, ओसीआर (पिं्रट एवं हस्तलिखित वर्ण/अक्षर पहचान प्रणाली), पांडुलिपि / पुस्तक डिजिटलीकरण, कंटेन्ट प्रबंधन, पार्जर, मशीन अनुवाद प्रणालियां, टेक्स्ट टू स्पीच, स्पीच टू टेक्स्ट, स्पीच टू स्पीच अनुवाद, फॉन्ट परिवर्तक, वर्ड-नेट, समांतर कोर्पोरा, वेब ब्राउज़र, आदि कई सॉफ्टवेयर सरकारी अनुदान से बने। 2014 में डोमेन नेम "(डॉट) भारत" भी बनाया गया। लेकिन इनका अधिकाधिक प्रयोग नहीं हो सका और तदनुसार फीडबेक नहीं मिल सका। आज भी पव्लिशिंग सॉफ्टवेयर में हिन्दी का यूनीकोड फॉन्ट मान्य नहीं है।
गूगल, माइक्रोसॉफ़्ट जैसी विदेशी कंपनियों ने हिन्दी के जरिये अपने बाज़ार को बढ़ाया है, लेकिन भारी सरकारी अनुदान प्राप्त सी-डेक जैसी संस्थाएं चुप हो गई हैं। आज भी इन्टरनेट पर 10 प्रमुख भाषाओं में हिन्दी नहीं है। इनपुट प्राय: रोमन में दिया जा रहा है। सरकार से इतना तो करा सकते हैं कि सरकारी कार्यालयों में डेस्कटॉप और लैपटॉप के की-बोर्ड द्विभाषिक हो जावें।
सभी तकनीकी उपकरणों पर देवनागरी लिपि का अवैज्ञानिक मानकीकरण हिन्दी की सरकारी संस्था ने थोपा, लेकिन हिन्दी जगत से कोई आवाज नहीं उठी, सब चलता है। अब नई पीढ़ी के उच्चारण अशुद्ध होंगे। अद्वितीय को मानक हिन्दी में अद् वितीय पढ़ेंगे इत्यादि।
2015 में प्रारम्भ डिजिटल इंडिया मिशन भारत की 10 प्रतिशत जनसंख्या तक सिकुड़ कर रह गया है। इसे डिजिटल भारत बनाना होगा लोक भाषा हिन्दी में। तकनीकी तो है, चुनौती भाषा जगत को है इसका प्रयोग बढ़ाने की और सावधि समीक्षा करने की।
गत वर्ष पुदुचेरी में एक कॉलेज के ग़्ॠॠक् मूल्यांकन के लिए गया था, विशेषज्ञ टीम का अध्यक्ष था। वहाँ छात्रों के अविभावकों ने मांग की थी कि हिन्दी को कोर विषय के रूप में पढ़ाया जाए क्योंकि इससे इन स्नातकों को नौकरी मिलना आसान होगा। शायद विरोध जनता से नहीं है ।
हिन्दी में कंप्यूटर प्रशिक्षण दिए जाने की दिशा में कुछ प्रयोग किए गए हैं। 1985 में हिन्दी में "डिप्लोमा इन कंप्यूटर एप्लीकेशन" दक्षिण भारत हिन्दी सभा, गुरुकुल कांगड़ी हरिद्वार और वनस्थली विद्यापीठ में शुरू किए गए। बाद में बंद भी हो गए लेकिन हिन्दी जगत ने कोई सुधि नहीं ली। वर्ष 2017 में ॠक्ष्क्च्र्क ने हिन्दी में इंजीनियरिंग में स्नातक प्रोग्राम के लिए महात्मा गांधी हिन्दी विश्व विद्यालय, भोपाल को स्वीकृति दी। लेकिन तीन महीने बाद ही प्रोग्राम बंद कर दिया गया। वैज्ञानिक एवं तकनीकी शब्दावली आयोग की शब्दावली तो बनी है, लेकिन ई-शब्दावली रूप में नहीं है, इन्टरनेट पर खोज संभव नहीं है। सरकारी अनुदान से विज्ञान एवं तकनीकी क्षेत्र में संगोष्ठियां, सेमिनार, कॉन्फरेंस होते हैं, लेकिन उनमें एक भी शोध पत्र हिन्दी में नहीं पढ़ा जाता। हिन्दी में शोध नहीं तो समावेशी नवाचार की कल्पना व्यर्थ है।
भाषा प्रौद्योगिकी के विकास में चुनौतियां मशीनी अनुवाद के क्षेत्र में हैं, कंप्यूटर से संवाद के स्तर पर हैं, और बहु भाषिक सूचना खोज में है। तकनीकी में सुधार फीडबेक के आधार पर होते हैं, अधिक प्रयोग और बारम्बार फीडबेक से कम समय में और कम लागत परिशुद्ध तकनीकी में मिल सकती है। भारतीय भाषाओं का उद्गम संस्कृत से है, इसलिए वर्णक्रम और वाक्य संरचना में समानता है, इनके बीच अनुवाद सरल है, मशीनी अनुवाद प्रणालियां उपलब्ध हैं। भारतीय भाषाओं के बीच मशीन अनुवाद प्रणाली "संपर्क" से पंजाबी-हिन्दी, हिन्दी-पंजाबी, उर्दू-हिन्दी, तेलगु-तमिल के बीच उच्च स्तर का अनुवाद होता है। "अनुवादक्ष" से इंग्लिश से हिन्दी, मराठी, बंगाली, उड़िया, उर्दू, तमिल में अनुवाद होता है। "आंग्ल-भारती" से इंग्लिश से हिन्दी, बंगाली, पंजाबी, उर्दू, मलयालम में अनुवाद होता है। असमिया, बंगाली, गुजराती, हिन्दी, मराठी, उड़िया, पंजाबी, तमिल, तेलुगू के बीच शब्द/पद के आधार पर अंतरभाषिक खोज से डॉक्युमेंट निकालने की क्ख्र्क्ष्ॠ प्रणाली भी विकसित की गई है। अनुवाद प्रक्रिया में महत्त्वपूर्ण लोकीकरण (ख्र्दृड़ठ्ठथ्त्द्मठ्ठद्यत्दृद) और अंतर-राष्ट्रीयकरण (क्ष्दद्यड्ढद्धदठ्ठद्यत्दृदठ्ठथ्त्द्मठ्ठद्यत्दृद) के क्षेत्र में भी काम हुआ है।
विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने एक अच्छी नई योजना अवसर (ॠज़्च्ॠङ : ॠद्वढ़थ्र्ड्ढदद्यत्दढ़ ज़्द्धत्द्यत्दढ़ च्त्त्त्थ्थ्द्म ढदृद्ध ॠद्धद्यत्ड़द्वथ्ठ्ठद्यत्दढ़ ङड्ढद्मड्ढठ्ठद्धड़ण्) शुरू की है। इसके अंतर्गत घ्ण्क़् और घ्दृद्मद्य घ्ण्क़् कर रहे विज्ञान शोधकर्ता लोक भाषा हिन्दी अथवा पोपुलर अंग्रेजी शोध वर्णन करें। प्रथम (1 लाख रुपए ), द्वितीय (50,000 रुपए), तृतीय (25,000 रुपए) और 100 अन्य चयनित प्रतिभागियों के लिए (प्रत्येक 10,000 रुपए ) के पुरस्कारों का भी प्रावधान है।
भाषा प्रौद्योगिकी के विकास संबंधी अपेक्षाएं हैं, जैसे :
1. यूनिकोड ग्लिफ आधारित है। ध्वनि आधारित फोनीकोड (घ्क्तग्र्ग़्क्ष्क्ग्र्क़्क) का विकास किया जाए, यह भारतीय भाषाओं के इतर अन्य भाषाओं के लिए भी उपयोगी होगा।
2. छग़् यूनिवर्सिटी, जापान ने 1995 में विश्व भाषाओं के बीच अनुवाद को सरल बनाने की दृष्टि से छग़्ख्र् यूनिवर्सल नेटवर्किंग लेंग्वेज का विकास आरंभ कराया था। यह शब्द आधारित प्रणाली थी। आज के संदर्भ में वेब प्रधान टेक्नोलोजी उपयोगी होगी। प्रस्तावित है संकल्पना आधारित/कांसेप्ट बेस्ड नेटवर्किंग लेंग्वेज क्ग़्ख्र् का विकास। संस्कृत में संकल्पनाओं का विपुल विवरण है।
3. वाक्य संरचना को समझने के लिए कारक आधारित व्याकरण के आधार पर पार्जर बनाए जाएं। द्मड्ढथ्र्ठ्ठदद्यत्ड़ ध्र्ड्ढड अर्थ मूलक वेब पर क्षेत्र विशेष में ज्ञान निरूपण विधि और कंटेन्ट के विकास की आवश्यकता है। इस दिशा में नव्य न्याय भाषा प्रविधि उपयोगी होगी।
4. गूगल, माइक्रोसॉफ्ट के ऑन-लाइन ट्रांसलेटर उपलब्ध हैं। भारत का अनुसृजन (द्यद्धठ्ठदद्मड़द्धड्ढठ्ठद्यत्दृद) सिस्टम भी बनाया जाए, जो भारत के सांस्कृतिक वैविध्य और वैशिष्ट्य को सही ढंग से प्रस्तुत कर सके। इसके अतिरिक्त स्पैल चेकर, ग्रामर चेकर, टर्मिनोलॉजी मेनेजर, ई-कोश, ट्रांसलेशन मेमोरी टूल्स, हिन्दी / भारतीय भाषाओं में लेखों/ शोध पत्रों में नकल पकड़ने के लिए च्र्द्वद्धदत्द्यत्द, घ्थ्ठ्ठढ़त्ठ्ठद्धत्द्मथ्र् क्ण्ड्ढड़त्त्ड्ढद्ध, क़्द्वद्रथ्त् क्ण्ड्ढड़त्त्ड्ढद्ध जैसे सॉफ्टवेयर के विकास की आवश्यकता है।
5. अंग्रेजी, जर्मन, फ्रेंच आदि भाषाओं में मेस्सिव ओपेन ऑन-लाइन कोर्स (ग्ग्र्ग्र्क्द्म) और ई-ट्रेनिंग प्रोग्राम बनाए जा रहे हैं, मुफ्त में उपलब्ध हैं। इनके अनुवाद/अनुसृजन और लोकीकरण की आवश्यकता है जिससे गुणवत्तापूर्ण प्रशिक्षण की सुविधा मिल सके। स्किल डेवलपमेंट/कौशल विकास प्रोग्राम में इसकी बहुत जरूरत है।
6. ट्रांसलेशन/ट्रांसक्रिएशन वर्कबेंच और लोकलाइजेशन एंड ट्रांसलेशन क्लाउड का विकास किया जाए।
7. तकनीकी शब्दावली तेजी से वेब पर खोजनीय बनाई जाए। उत्तम शैली के लेख वेब पर उपलब्ध कराए जाएं।
तकनीकी स्तर पर भाषाविदों/भाषा प्रेमियों को भी कुछ चुनौतियां हैं, जैसे :
1. भारतीय भाषाएं ध्वन्यात्मक हैं। एक सर्वमान्य परिवर्धित देवनागरी वर्णमाला को आधार मानकर इण्टर-नेशनल फोनेटिक अल्फाबेट (क्ष्घ्ॠ) का विकास किया जाए। इण्टरनेशनल बनाने में कठिनाई हो तो इंडियन फोनेटिक अल्फाबेट (क्ष्घ्ॠ) बनाएं।
2. सभी भाषा पाठ्यक्रमों में क्ष्क्च्र् कंप्यूटर एवं संचार प्रौद्योगिकी अनिवार्य कोर विषय हो, सभी प्रोजेक्टों में क्ष्क्च्र् का अधिकाधिक प्रयोग किया जाए। अनुवाद प्रशिक्षण में मशीन अनुवाद सॉफ्टवेयर का प्रयोग हो, सुझाव भी बनाए जाएं। अनुसृजन प्रक्रिया को प्रोत्साहित किया जाए। प्रयोजन मूलक हिन्दी/भाषा पाठ्यक्रम बनाए जाएं, शोध कार्य को बढ़ावा दिया जाए।
3. क्ष्च्र्, क्च्क, क़्क्ॠ, ग्क्ॠ के डिप्लोमा / डिग्री पाठ्यक्रमों में यूनिकोड और भारतीय भाषा संसाधन विषय अनिवार्य किए जाएं।
4. डिजिटल भारत को साकार करने की दिशा में इलेक्ट्रॉनिकी एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय से संपर्क साधकर सार्थक प्रयास किए जाएं। (डॉट)भारत डोमेन नेम का प्रयोग बढ़ाया जाए। डिजिटल सर्विस मेनेजमेंट का प्रोग्राम हिन्दी-अंग्रेजी मिश्रित सुबोध भाषा में शुरू किया जाए।
5. सरकारी अनुदान से विकसित 20 सुंदर फॉन्ट, सकल भारती फॉन्ट, फॉन्ट कन्वर्टर, ट्रांसलेशन मेमोरी मोड्युल्स, ओसीआर, समांतर कोर्पोरा, लोकलाइजेशन टूल्स आदि सर्व सुलभ हों। गूगल, माइक्रोसॉफ्ट जैसी कंपनियों को भी इन्हें उपलब्ध कराया जाए। इसका प्रयोग अधिकांश तो भारतीय ही करेंगे।
6. देवनागरी लिपि के अवैज्ञानिक मानकीकरण को निरस्त कराया जाए।
7. उच्च तकनीकी संस्थानों में जिस प्रकार जर्मन, फ्रेंच, जापानी भाषाएं सिखाने की व्यवस्था होती है उसी प्रकार भारतीय भाषा अध्ययन के लिए भी सुविधा उपलब्ध कराई जाए।
8. 10अ2 के बाद विज्ञान, तकनीकी, मेडिकल, प्रबंधन जैसे प्रोफेशनल प्रोग्रामों में प्रथम वर्ष में शिक्षा का माध्यम हिन्दी-अंग्रेजी मिश्रित हो जिससे विषय को अच्छी तरह समझने में आसानी हो। इस प्रकार की शिक्षा से जनता से संवाद भी सार्थक बन पड़ेगा।
9. सरकारी अनुदान प्राप्त सभी संगोष्ठियों और कार्यशालाओं में न्यूनतम 30 प्र.श. चर्चा, लेख प्रस्तुति हिन्दी/भारतीय भाषा में हो। इनके सूचना पत्रों और प्रोसीडिंग्स, रिपोर्ट में भी इसी अनुपात प्रकाशन हो। विद्वत् चर्चाओं में समावेशी संस्कृति को बढ़ावा दिया जाए। छक्रक्, ॠक्ष्क्च्र्क, ग़्एॠ, ग़्ॠॠक् जैसी संस्थाएं व्यक्ति अथवा संस्था के मूल्यांकन में ऐसे योगदान को महत्त्व दें। प्रोमोशन में भी हिन्दी/भारतीय भाषा के पियर रिव्यूड जर्नल में प्रकाशित शोध पत्रों को भी मूल्यांकन में शामिल किया जाए।
10. एक स्वतंत्र समीक्षा समिति बनाई जाए जो तकनीकी दृष्टि से विविध प्रोग्रामों में प्रगति की समीक्षा करे।

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