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तमिल और हिन्दी की कहावतें
01-Oct-2018 07:52 PM 2007     

कहावत मानव जीवन का अभिन्न अंग है और भाषा की अमूल्य निधि है।
कहावतों से हमारी विचारधारा की एक परम्परा स्पष्ट हो जाती है।

हिन्दी और तमिल भारत की दो प्रमुख भाषाएँ हैं, जिनका सांस्कृतिक दृष्टि से विशेष महत्व है। तमिल भारत की सबसे प्राचीन एवं गतिशील भाषा है, जो आज तक अपना सशक्त अस्तित्व बनाए हुए है।
"कहावत" लोगों के अनुभव से उत्पन्न ऐसी मार्मिक उक्ति है जो आकार में बहुत छोटी, इच्छित अभिप्राय को व्यक्त करने में पूर्णरूप से समर्थ एवं सशक्त होती है। कहावत मानव जीवन का अभिन्न अंग है और भाषा की अमूल्य निधि है। कहावतों से हमारी विचारधारा की एक परम्परा स्पष्ट हो जाती है।
कहावत को तमिल में अनेक नामों से अभिहित किया गया है। तमिल के बहुत पुराने व्याकरणकार, तोलकाप्पिय ने इसे मुदुचोल मुदुमोषि कहा है जिसका अर्थ - मशरु प्रोढ शब्द एवं प्रौढ कथन - है।
संघकालीन रचना "अगनानूर" में लोकोक्ति को "तोण्डुपडुकिकवि" अर्थात ततपुरानि उक्ति तथा पषमोषि अर्थात पुराना कथन कहा गया है। भक्तिकालीन को "पषमोषी" मूदुरै तथा "पंषचोल" नाम से अभिहित किया गया है। मूदुरै शब्द का अर्थ प्रौढ उक्ति और पंषंचोल का अर्थ है पुराना शब्द।
कंबरामायण में लोकोक्ति के लिए पषमोषि और उलगुरैक्कुम उरै: दोनों शब्द प्रयुक्त हैं। पषमोषि का अर्थ है पुराना कथन और उलगुरैक्कुम उरै से तात्पर्य है - लोक से अभिव्यक्त उक्ति अर्थात लोकोक्ति।
चिलप्पदिकारम में इसे नेडुमोषि तथा पल्लवैयोर चोल कहा गया है। नेडुमोषि का अर्थ भी पषमोषि की ही तरह पुराना कथन ही है। पल्लवेयोर चोललल से तात्पर्य है बहुजनोक्ति अथवा सभासदों की उक्ति।
तमिल में कहावत को किसी ने "पुरानी उक्ति" या कथन माना है तो किसी ने "प्रौढ उक्ति" माना है। किसी ने उसे "लोक कथन" माना है तो किसी ने बहुजनोक्ति माना है।
तमिल में लोकोक्ति के लिए प्रयुक्त विभिन्न शब्दों मे सबसे प्रचलित शब्द "षमोषिह" है। यह प्रचीन शब्द भी है क्योंकि तमिल के प्राचीनतम साहित्य "संघसाहित्य" "अगनानूस" में ही इसका प्रयोग किया गया है।
तमिल के सब से प्राचीन व्याकरण ग्रंथ तोलकाप्पियम्् पद -77- में कहावत की परिभाषा देते हुए कहा गया है कि "कहावत" अभीष्ट वस्तु का प्रतिपादन करने के लिए प्रयुक्त सूक्ष्मता, संक्षिप्तता, स्पष्टता, कोमलता आदि गुणों से विभूषित उक्ति है। अर्थात कहावत अभीष्ट वस्तु के प्रतिपादनार्थ व्यक्त सूक्ष्म, संक्षिप्त स्पष्ट एवं कोमल उक्ति है।
कुछ कहावतें जीवन के व्यापक सत्यों को प्रकट करने के लिए बनायी गयी हैं। ऐसी कहावतें देशकाल जाति की सीमा को लांघकर सार्वभौमिक, सर्वकालीन तथा सर्वजातीय हो गयी हैं। ये कहावतें ते मानस मा; के लिए समान होती हैं। यही कारण है कि कुछ कहावतें भाषा, संस्कृति आदि की भिन्नता के बावजूद समान है।
यद्यपि मनुष्य के बाह्य जीवन जैसे खान-पान, रहन-सहन आदि देशकाल जाति के अनुरूप बदलते है, फिर भी उसका आन्तरिक जीवन समान ही है। उसका भाव-जगत एक ही प्रकार का है। ईश्वर, पाप-पुण्य, न्याय-अन्याय, सत्य-असत्य, धर्म-अधर्म आदि के संबंध में उसकी धारणाएँ समान होती हैं। अतः इनसे संबंधित कहावतें भी सर्व; समान हैं और जीवन के व्यापक सत्यों को प्रकट करने वाली है।
विश्व भर में ईश्वर की सत्ता मानी गयी है। उन्हें सभी ने सर्वशक्तिमान माना है।
ईश्वर को महान मानते हुए अंग्रेजी में "ग्रांड इस ग्रेट" कहा गया है तो उर्दू में "अल्लाह हो अक्बर" कहा गया है।
संस्कृत में जहाँ "सत्यं वद" कहा गया है वहाँ तमिल में "उण्मैये पेसुुु" अर्थात "सत्य ही बोलो" कहा गया है। जीवन के व्यापक सत्य का ज्ञान मानव के जीवन को सुधारने के लिए आवश्यक माना गया है अतः उनको छोटी उक्तियों के रूप में याने लोकोक्तियों के रूप में अभिव्यक्त किया गया है।
संघोत्तर काल में जब नीति काव्यों की रचनाएँ हुई तब मुन्डुरै अरैयनार नामक कवि ने चार सौ चुनी हुई कहावतों पर आधारित चार सौ पद्यों की रचना "पषमोषि नानूरू" नाम से की है। इसके काल के संबंध में विद्वानों में मतभेद है। कुछ विद्वान इसे पाँचवीं शताब्दी की रचना मानते हैं तो कुछ आठवीं शताब्दी की। लेकिन बहुमत तो पाँचवी शताब्दी के पक्ष में है।
पषमोषि नानूरू से तात्पर्य है : "लोकोक्ति चतुराती"। यह अपने ढंग का अनुपम नीति काव्य है। काव्य में अन्य विषयों की पुष्टि के लिए कहावतों का प्रयोग सामान्यतः देखा जाता है। लेकिन इसमें कहावतों को समझाने के लिए उदाहरण सहित व्याख्या दी गयी है। इसे तमिल का सबसे पहला कहावत संग्रह मान सकते हैं। इसमें हर एक पद्य के चार चरणों में पहले तीन कहावत की व्याख्या है और अंतिम चरण कहावत संबंध है। अर्थात पहली तीन पंक्तियों में अभिलाक्त विषय प्रस्तुत है याने कहावत का ध्वन्यर्थ है और अंतिम पंक्ति कहावत है।
उदाहरण :
जो पढ़े-लिखे हैं उनका संयम ही संयम है, इसे अपढ़ लोग नहीं जानते वे आत्मप्रशंसी होते हैं। यह इस प्रकार से जैसे भरा पूरा घड़ा कभी पानी छलकाता नहीं।
निरैकुडम तलुम्बादुुु : इसी प्रकार एकता के बारे में कहते समय अकेले कोई काम नहीं कर सकते हैं।
तनि मरम् काडादल इल : एक पेड़ से वन नहीं बनता।
आलसी : आलसी कोई काम का न काज का होता है, यहाँ तक वह होता है दुश्मन अनाज का। इसलिए वह समाज में निंदनीय है। अतरु लोको ने उन पर व्यंग्य बाण करते हैं। हिन्दी की यह लोकोक्ति है :
आलसी गिरा कुएँ में कहा, यहाँ ही भले। तमिल में आलसी की आलोचना करते हुए यहाँ तक कहा गया है।
रात भर जिसने उपवास किया उसने पूछा : क्या केला बिना छिलके का बिकता है। इसे "मडिये वियंगोल्लिन, मटत्रैक् कीफमम, मुडियादवारे मुयलुम:ः कोडी अन्नाय। पारित्तवनै नलिन्दु तोषिल कोडल मूरि एडुत्तान उषवु।" यानि हे सखी : यदि हम आलसी से एक काम करवाते हैं तो वह उस काम को बिना इच्छा के करेगा। यदि डाँट-फटकार के उससे करने के लिए कहें तो वह बूढ़े बैल से खेत जोतने के समान होगा।
पारिवारिक जीवन में सबसे महत्वपूर्ण स्थान माता-पिता का है। भारतीय संस्कृति ने माता-पिता को विशेष महत्व दिया है। "मातृ देवो भव:, पितृ देवो भव, आचार्य देवो भव" का उच्चारण कर विद्यारंभ करने से यह ज्ञात होता है कि माता-पिता को ईश्वरतुल्य स्थान दिया जाता है। तमिल मे माता-पिता गुरफ देयवम् कहकर माता-पिता को सबसे अधिक आदरणीय स्थान दिया जाता है।
“अन्नैयुम पितावुम मुन्नरि देयवम््" यहाँ इण्डत्री अमैया इरफ मुदु मक्कलुम, पोण्डत्रीमै कण्डुम, पोरफल पोरफलागक् कोल्पवोऋ, ओण्डत्रुम वगैयान अरम सेयग उफरन्दु उरफलिन, कुण्डत्रु वषि अडुप्पदु इललल।"
सभी भाषाओं के साहित्य में माता-पिता का स्थान ईश्वर से भी ऊँचा दिया गया है।
ऐतिहासिक दृष्टि से तमिल भाषाओं की लोकोक्ति परम्परा पर दृष्टिपात किया जाये, तो कुछ बातें स्पष्ट होती है। दोनों भाषाओं की अपनी-अपनी सुदीर्घ परंपराएँ रही है। तमिल में लगभग दो हजार वर्ष पूर्व ही लोकोक्तियाँ अथवा लोकोक्ति जैसी उक्तियाँ प्रचलित थीं। तिरुवल्लुवर ने उनको सुरक्षित रखा। तिरुवल्लुवर ने सामाजिक लोकोक्तियों के आधार पर अपने "कुरल" लिखे हों, चाहे उनकी उक्तियाँ हों, अपनी मार्मिकता के कारण लोकोक्तियों के रूप में प्रचालित हो गयीं। दोनों दशाओं में यह कहा जा सकता है कि उस काल में ही तमिल में लोकोक्तियों का अस्तित्व था। उनकी परम्परा को आगे बढ़ाकर स्थायित्व देने मे नालडियार, औवैयार आदि की नीति रचनाओं ने सहायता दी।
अन्त में हम कह सकते हैं कि इस नीतिपरक ग्रंथों की विशेषता यही है कि ये आकार में छोटी है। इसलिए सामान्यतः जनता तक इसका प्रभाव पड़ता है और पीढी दर पीढी तक इसे पहुँचाया जा सकता है। काल रचना के अनुसार ये लोकोक्तियाँ भी अपने रूपों को बदलकर समाज में स्थिरता पाती हैं ये लघु होते हुए भी सरल एवं स्पष्ट हैं क्योंकि ये सब जनमानस के दैनिक जीवन के अनुभवों से उद्धृत हैं। जिन विषयों को हम अनेक पृष्ठों में समझा नहीं सकते हैं उसे कहावतों द्वारा आसानी से कह सकते हैं। इसकी एक और विशेषता यह है कि इसे प्रयोग में लाने वाले भी साधारण जनता है। इसलिए कहावतें अपने रूप में सरल एवं सुंदर हैं। नीतिपरक ग्रंथों में कहावतों का सभी भाषाओं में अपना एक अलग स्थान रखता है।

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