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सुशीला शिवराण
सुशीला शिवराण

एक नई भोर
तूम पुरुष हो नाक्यों न हो तुममें दम्भतुम पैदा ही ताकतवर हुएतुम्हारा बनाया समाजख़ूब पोसता है तुम्हारे दम्भ कोसिखाता है तुम्हेंकि तमाम कमियों तमाम ख़ामियों के बावज़ूदतुम्हीं हो मुखियाघर-संसार के माल
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