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सुरत निरत के भेद
01-Jun-2016 12:00 AM 3477     

कभी-कभी लगता है कि इतिहास तो अपनी गति से आगे बढ़ता चला गया है, लेकिन हम वहीं के वहीं खड़े रह गए हैं, जहां थे। है तो यह विडम्बना ही। इक्कीसवीं सदी की पन्द्रहवीं ¶ाताब्दी के युग से तुलना। लेकिन लगता है, कुछ-कुछ ऐसे ही दिन रहे होंगे, जब एक जुलाहे ने समाज की एक नई बुनावट का सन्दे¶ा देने का - उसकी, व्यामोह की नींद तोड़ने का बीड़ा उठाया होगा।
चारों ओर कुछ ऐसा ही ¶ाोर रहा होगा, जब अपने-अपने मतवाद का ढिंढोरा पीटने वालों की लगभग अराजक भीड़ें अपनी आवाजों से ¶ोष सभी स्वरों को दबा देने का प्रयास कर रहे होंगी, वि¶ोष रूप से उन प्रतिवादी स्वरों को, जो इस बेसुरे कोलाहल में कुछ सुरताल वाली बात कहने का जतन कर रहे होंगे। उस समय का जितना इतिहास ज्ञात है, उससे तो ऐसा ही संकेत मिलता है। ऐसे में कोई ऐसी आवाज़ अपेक्षित थी, जो गर्जना के नहीं, बल्कि अपनी बात के तर्क के, समझदारी के बल पर लोगों का ध्यान आकर्षित कर सके। जिसमें तर्क के साथ-साथ गहरा आत्मवि·ाास भी हो। इतना कि वह निरर्थक ¶ाोर करने वालों को बेझिझक होकर फटकार लगा सके। समय की इस आव¶यकता का जवाब फक्कड़ और मस्तमौला कबीर के रूप में मूर्त हुआ, जिन्होंने अपने-अपने मत के झंडे गाड़ने वालों को डांट भी लगाई और उनकी तर्कहीनता के लिए ललकारा भी। और कबीर ने चुनौती प्रस्तुत करने का जो मार्ग अपनाया, वह भी कम अनूठा नहीं था। उनका रास्ता वाद-विवाद या पांडित्यपूर्ण ¶ाास्त्रार्थ का रास्ता नहीं था।
वह धर्म और मज़हब का आडम्बर करने वालों को सीधी-सहज लोकभाषा में मुंहफट तरीक़े से संबोधित करने में कभी नहीं चूके। और उनकी फटकार किसी एक वर्ग, एक सम्प्रदाय या एक धर्म की ओर लक्षित हो, ऐसा भी नहीं है। कबीर के लिए कहा जा सकता है कि वह कद्दद्वठ्ठथ् ग्र्द्रद्रदृद्धद्यद्वदत्द्यन्र् ग्र्ढढड्ढदड्डड्ढद्ध थे, नाराज़ करने के मामले में कोई पक्षपात नहीं बरतते थे। वह घर-बार छोड़कर संन्यास लेने वालों की स्वर्ग-कामना पर तीखे बाण छोड़ने से नहीं कतराते थे। कबीर को मज़हब को एक रस्म के तरह निभाने वाले मुल्ला-मौलवियों पर भी फ़ब्ती कसने में कभी हिचकिचाहट नहीं हुई :
कंकर पाथर जोरी के मस्जिद ली चुनाय
ता चढ़ मुल्ला बांग दे, बहरा भाया खुदाय।
सीधे-सपाट ¶ाब्द, बिना किसी लाग-लपेट के। सबसे दिलचस्प बात यह कि इन प्रहारों के पीछे अपना कोई मतवाद, कोई मठ स्थापित करने की, कोई पंथ चलाने की मं¶ाा नहीं थी। सत्य को जिस रूप में पहचाना था इस फ़कीर ने, उस रूप में बयान करने की इच्छा थी। रूढ़ियों और कुरीतियों के विरुद्ध एक रोष था, जिसे स्वर देना ज़रूरी था। और इसके लिए कबीर को किसी साहित्यिक या ¶ाास्त्र सम्मत काव्य ¶िाल्प की आव¶यकता नहीं थी। जुलाहा कर्म से जुड़े उपमान उन्हें सहज ही उपलब्ध थे, जिन्हें वह योग और अध्यात्म के गूढ़तम रहस्यों के बखान में भी बिना किसे सायासता के जोड़ सकते थे :
झीनी झीनी बीनी चदरिया
काहे कै ताना काहे कै भरनी
कौन तार से बीनी चदरिया
इड़ा पिंगला ताना भरनी
सुखमन तार से बीनी चदरिया
आठ कंवल दल चरखा डोलै
पांच तत्त्व गुन तीनी चदरिया
रामानन्द जैसे गुरु की सीख, योगियों और अवधूतों की संगति और अपने परिवे¶ा को देखने-समझने की उनकी सर्वग्राही क्षमता ने उन्हें बात कहने का ऐसा स्वाभाविक और अनूठा ढब दे दिया था कि उन्होंने जो भी कहा, वह अमूल्य हो गया।
कई बार "मसि कागद छुआ नहीं, कलम गही नहीं हाथ' का उद्धरण देकर कबीर को अपढ़ बता दिया जाता है। क्षण भर रुक कर सोचने पर कबीर भारत में अपने युग के सबसे अधिक पढ़े-लिखे व्यक्ति के रूप मे उजागर होते हैं, जिन्होंने जीव, ब्राहृ और माया की अवधारणाओं को, द्वैत और अद्वैत के मर्म को इस हद तक आत्मसात् कर लिया था कि उन्हें ऐसी बातें समझाने के लिए भारी-भरकम ¶ाब्दों की या विस्तृत व्याख्याओं की ज़रूरत नहीं पड़ती थी।
पंडित बेद पुराण पढ़ैं सब, मुसलमान कुराना
कहें कबीर दोउ गए नरक में, जिन हरदम राम न जाना
कुछ लोगों को अचरज भी हो सकता है और इस बात से नाराज़गी भी कि कबीर वेद-पुराण में निष्णात पंडितों के साथ-साथ क़ुरान पढ़ने वालों को भी "राम' को जानने सन्दे¶ा क्यों देना चाहते हैं। यहां यह बात समझना ज़रूरी है कि कबीर उस राम की बात नहीं कर रहे हैं, जिसके नाम की उन्होंने अपने गुरु रामानंद से दीक्षा ली थी।
कबीर के राम सगुण नहीं, बल्कि निर्गुण राम हैं। निर्गुण राम? ये दो ¶ाब्द, निस्संदेह विरोधाभास का चरम उदाहरण जान पड़ सकते हैं, पर थोड़ा ध्यान से सोचें, तो यहां विरोधाभास तो है, लेकिन तत्व रूप में कोई अंतर्विरोध नहीं है। सगुण उपासना भी अंततः निर्गुण तक पहुंचने का माध्यम ही तो है।
कबीर निर्गुण के उपासक थे, सगुण-साकार के पीछे छिपे मर्म को, अध्यात्म के असली तत्व को उन्होंने पहचान लिया था। इस अ¶िाक्षित या अर्ध¶िाक्षित जुलाहे के सीधे-सरल ¶ाब्दों में निहित गहरे अध्यात्म को, उसके पदों और साखियों में से झांकते चिरंतन सत्य को बीसवीं ¶ाताब्दी के मनीषी कवि रवींद्र नाथ टैगोर ने पहचाना था। भारत में आध्यात्मिकता समुदायों और सम्प्रदायों की सीमाओं को कैसे पीछे छोड़ गई थी, यह स्पष्ट करने के लिए टैगोर कबीर का और साथ ही नानक और चैतन्य का उदाहरण देते थे।
टैगोर व्यक्ति और ई·ार या ई·ारीय ¶ाक्ति के सम्बन्ध की चर्चा में भी अक्सर कबीर का उल्लेख करते थे। 1917 में अमरीका में दिए गए अपने भाषणों पर आधारित पुस्तक घ्ड्ढद्धद्मदृदठ्ठथ्त्द्यन्र् (व्यक्तित्व) में उन्होंने इस सम्बन्ध को व्याख्यायित करते हुए कहा - मनुष्य को "व्यक्ति' और "परम व्यक्ति' के सम्बन्ध में भी ज्ञात रहा है, रूपों और परिवर्तनों के या काल और अंतरिक्ष में विस्तार की दुनिया के माध्यम से नहीं, बल्कि चेतना के अंतरतम एकांत में, गहनता और उत्कटता के क्षेत्र में। इस धारणा की पुष्टि में उन्होंने कबीर के एक पद के स्वयं के किए हुए अनुवाद का उदाहरण दिया :
तू सूरत नैन निहार वह अंड में सारा है
तू हिरदै सोच विचार ये देस हमारा है
सतगुरु दरस होय जब भाई
वह दें तुमको प्रेम चिताई
सुरत निरत के भेद बताई
तब देखे अंड के पारा है।
Open your eyes of love, and see Him who pervades the world! Consider it well, and know this is your own country. When you meet the true Guru, he will awaken your heart; he will tell you the secret of love, and detachment, and then you will know indeed that he transcends this universe.
गहरे से गहरे आध्यात्मिक सत्य का सीधे सरल ¶ाब्दों में सामान्य जन से साझा करने में समर्थ कबीर अपने समय में बहुत लोकप्रिय थे, इसमें तो कोई संदेह नहीं है। एक बड़े पैमाने की सामाजिक क्रान्ति उस दौर में ¶ाुरू हुई, जिसके केंद्र में कबीर थे। लेकिन यह क्रान्ति परवान नहीं चढ़ सकी। बरसों पहले मुक्तिबोध ने अपने एक लेख में इस सम्बन्ध में चर्चा करते हुए चंडीदास की इन पंक्तियों का हवाला दिया था : ¶ाुनह मानुष भाई, ¶ाबार ऊपरे मानुष ¶ातो, ताहार ऊपरे नाई।
मुक्तिबोध ने कहा था- इस मनुष्य-सत्य की घोषणा के क्रांतिकारी अभिप्राय कबीर में प्रकट हुए। कुरीतियों, धार्मिक अंधवि·ाासों और जातिवाद के विरुद्ध कबीर ने आवाज़ उठाई। वह फैली। निम्न जातियों में आत्मवि·ाास पैदा हुआ। उनमें आत्मगौरव का भाव हुआ। समाज की ¶ाासक सत्ता को यह कब अच्छा लगता। निर्गुण मत के विरुद्ध सगुण मत का प्रारम्भिक प्रसार और विकास उच्चवं¶िायों में हुआ। निर्गुण मत के विरुद्ध सगुण मत का संघर्ष निम्न वर्गों के विरुद्ध उच्चवं¶ाी संस्कार¶ाील अभिरुचि वालों का संघर्ष था। सगुण मत विजयी हुआ।
क्या यह कहानी सचमुच पंद्रहवीं ¶ाताब्दी की कहानी है? तो फिर ऐसा क्यों लगता है कि यह इक्कीसवीं ¶ाताब्दी के भारत का आंखों देखा हाल है। अंतर इतना भर है कि इस सदी में अभी इतिहास को अपना निष्कर्ष देने का समय नहीं मिला है। कबीर ¶ाायद कभी इतने प्रासंगिक नहीं रहे, जितने आज हैं

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