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स्मृति-चिह्न : मूर्तिकार वेर्नर
01-Oct-2019 11:27 AM 584     

वह सौम्य मुखाकृति वाली महिला मुझसे बोलीं कि उनका घर उसी
सड़क पर है जहाँ से मैं रोज़ आती-जाती हूँ। वह और उनके पति बहुत
दिनों से मुझे देख रहे हैं। उन्होंने आग्रहपूर्वक कहा - "आप मेरे पति
की प्रार्थना ठुकराएँ नहीं। अन्यथा उन्हें बहुत दु:ख होगा।"

जब भी मैं अपने चेहरे को मूर्तिरूप में देखती हूँ, देर तक देखती ही रह जाती हूँ। उससे जुड़ी हुई अनेकों स्मृतियाँ बिजली की तरह मन में कौंध जाती हैं। वर्ष 1963 की बात है, जब मुझे भाग्यवश "जर्मन एकेडेमिक एक्सचेंज सर्विस" की ओर से इंडोलोजी में शोधकार्य हेतु फ़ेलोशिप मिलने पर, मैं दो वर्ष तक पश्चिमी जर्मनी में रही थी। ये भी एक संयोग ही था कि मैं पश्चिमी जर्मनी के शहर ट्यूबिंगेन नगर में आकर गार्टेन श्ट्रासे (गार्डेन स्ट्रीट) पर ही रहने लगी थी। विश्वविद्यालय जाते आते समय नेकर नदी के किनारे पैदल जाते हुए, चारों ओर प्राकृतिक सुषमा निरखते हुए मार्ग कब समाप्त हो जाता था, पता ही नहीं चलता था। सड़क पर जाते हुए कई बच्चे या महिलाएँ प्राय: रुक कर मेरी भारतीय वेशभूषा को बड़े ध्यान से देखती थीं। साड़ी के संबंध में जिज्ञासा प्रगट करती थीं और कभी-कभी अपने घर पर चाय अथवा खाने पर भी निमन्त्रित कर देती थीं।
उस दिन मैं सेमिनार से काफ़ी देर से आई थी, थकी भी थी। शनिवार होने से रोज़मेरी शालर, मेरी जर्मन सखी (जिसके साथ मैं रहती थी) घर की सफ़ाई में लगी थी। सप्ताह में पाँच दिन का कार्यकाल होने से उस दिन शालर की छुट्टी थी। फ़्रायलाइन शालर (मिस शालर) मुझसे आयु में बड़ी थी और एक स्कूल में शिक्षिका थी। वह मेरा छोटी बहिन की तरह ध्यान रखती थी। मेरे ही आग्रह से वह मुझे मेरे नाम से "शकुन" बुलाने लगी थी। शालर ने मुझे आते ही बताया कि एक महिला मुझसे मिलने के लिये आई है और कुछ देर से कमरे में प्रतीक्षा कर रही है।
मैंने जाकर उसका अभिवादन किया और परिचय प्राप्त करना चाहा था। वह सौम्य मुखाकृति वाली महिला बोलीं कि उनका घर उसी सड़क पर है, जहाँ से मैं रोज़ आती-जाती हूँ। वह और उनके पति बहुत दिनों से मुझे देख रहे हैं। अपने पति की प्रार्थना लेकर ही मेरा घर खोजती हुई, उस दिन मिसेज़ वेर्नर (फ़्राउ वेर्नर) मेरे पास आई थीं। उन्होंने आग्रहपूर्वक कहा - "आप मेरे पति की प्रार्थना ठुकराएँ नहीं। अन्यथा उन्हें बहुत दु:ख होगा।" मैं अजीब असमंजस की स्थिति में उनको देखती ही रह गई। समझ नहीं सकी कि उनके पति की ऐसी क्या प्रार्थना हो सकती है, जिसकी स्वीकृति के लिये वे आज मुझ अपरिचिता के पास आई हैं? मेरे पूछने पर वे बोलीं - "मेरे पति एक मूर्तिकार हैं। कितने ही बड़े-बड़े जर्मन नेताओं की मूर्तियाँ उन्होंने बनाई हैं, किन्तु किसी भारतीय नारी का चेहरा उन्होंने आज तक नहीं बनाया है। वो बिना किसी प्रतिदान के आपकी प्रतिमा बनाने के लिये इच्छुक तथा उत्सुक हैं। कृपया उनका आग्रह मान लें।"
उनकी बात सुनकर भी कानों को विश्वास नहीं हुआ। क्या यह सच है? समझ नहीं आया कि क्या कहूँ?
तभी मैंने पूछा कि "मुझे क्या करना होगा?" बातों में ही पता चला कि मुझे एक सप्ताह तक, नित्य एक घंटे के लिये उनके घर जाना होगा। विश्वविद्यालय से लौटते समय मैं उनके घर रुकती हुई आऊँ। उनके घर चाय/कॉफ़ी या फ्रÛटजूस लेकर थकान मिटा सकती हूँ। उसी समय में उनके पति हेअर वेर्नर (मिस्टर वेर्नर) मुझे देखकर चेहरा बनाते रहेंगे। मैंने शालर से पूछा तो उसने कहा कि "तुम्हें कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिये। लोग तो इस काम के लिये बहुत पैसा व्यय करते हैं। तुम्हें इस अवसर से लाभ उठाना चाहिये।"
अन्तत: मैंने उनके घर का पता पूछकर, आगामी सोमवार की शाम को उनके घर जाना स्वीकार कर लिया था। सोमवार को सेमिनार जाते समय प्रात: मैं उनका घर देखती हुई गई और लौटते समय शाम को वहाँ पहुँच गई। वेर्नर-दम्पति का घर कुछ ऊँचाई पर था। मैं घंटी बजाने ही वाली थी, तभी दरवाज़ा खुल गया। पति-पत्नी खड़े मुस्कुरा रहे थे। जर्मन में मेरा स्वागत करते हुए "शेक हैंड" हेतु अपना हाथ भी बढ़ाया था। तब तक मैं अपने दोनों हाथ जोड़कर नमस्ते करने को प्रस्तुत हो गई थी। मैंने उनको बताया कि भारत में हम इसी तरह अभिवादन करते हैं।
उन्होंने मुझसे "नमस्ते" शब्द पूछकर हाथ जोड़ लिये और बोले "न म स टे।"
उन्होंने बताया कि वे लोग खिड़की से झाँकते हुए मेरी ही प्रतीक्षा कर रहे थे। मैं "डंके श्योन" (धन्यवाद) कहकर उनके साथ अंदर चली गई थी।
वेर्नर कुछ भारी शरीर के थे। सिर पर टोपी लगाए मुस्कुराते रहे थे। उनकी आयु 75 वर्ष से कम नहीं रही होगी। तभी मिसेज़ वेर्नर ने मुझे कॉफ़ी दी थी और मेज़ पर रक्खे बिस्कुट, केक और फल आदि खाने का आग्रह किया था। उसी बीच मुझसे मेरे जर्मनी-निवास, भारतीय वेष-भूषा, संस्कृति एवं खान-पान के संबंध में बातें करने लगीं थीं। वेर्नर ने अपना कार्य प्रारंभ कर दिया था। कहने लगे कि मूर्ति बनाते हुए उन्हें मेरा चेहरा बार-बार ध्यान से देखना पड़ेगा, इसके लिये मुझे बुरा नहीं मानना चाहिये, अन्यथा मूर्ति (डद्वद्मद्य) पूरी तरह से मुझ जैसी नहीं बन पाएगी। मैं आराम से बैठकर खाती तथा बातें करती रहूँ। वे रोज़ थोड़ी-थोड़ी करके पूरी मूर्ति बना लेंगे ।
इसी बीच इस परिवार से मेरी काफ़ी आत्मीयता हो गई थी। एक दिन उन्होंने पूछा कि क्या भारतीय हाथ नहीं मिलाते? यानी कि कभी "शेक हैंड" नहीं करते? मैंने कहा "भारतीय-नारी अपने जीवन में एक ही पुरुष का हाथ पकड़ती है, जिससे विवाह करती है। इसीलिये शादी को "पाणिग्रहण" (हाथ पकड़ना) नाम से भी जाना जाता है। पति-पत्नी इस प्रतीकात्मक हाथ पकड़ने के विधि-विधान के निर्वाह हेतु जीवन जीते हुए, परस्पर पूरा-पूरा सहयोग देते हैं, मिलकर रहते हैं।" इस पर वेर्नर ने कहा था - "मैंने बहुत से भारतीयों को "शेकहैंड" करते देखा है, कई महिलाओं को भी। जैसे इन्दिरा गाँधी सबसे हाथ मिलाती हैं।" इस पर मुझे कहना पड़ा था कि अंग्रेज़ों के प्रभाव से तथा विदेशों में रहने के कारण कुछ भारतीयों ने उनके सम्पर्क से पाश्चात्य रीति रिवाज़ अपना लिये हैं। श्रीमती इन्दिरा गाँधी की शिक्षा भी विदेश में होने के कारण उन्हें "शेकहैंड" का अभ्यास है। कुछ नए विचारों की महिलाएँ भी ऐसा करने में संकोच नहीं करती हैं। इस पर वे चुप रह गए थे ।
इसी तरह मूर्ति बनती जा रही थी। इस प्रोग्राम में मुझे कोई विशेष परेशानी भी नहीं होती थी। शाम को वापसी में ही रुक कर, चाय नाश्ता उनके साथ करके अपने घर लौट आती थी। अलग से आना-जाना नहीं पड़ता था। मेरे घर जाते समय दोनों सीढ़ियों पर एक साथ खड़े होकर "डंके श्योन" कह कर धन्यवाद देते। दोनों हाथ जोड़कर "नमसटे"। कहते फिर हाथ हिलाकर विदा देते हुए "आउफ़ वीडर ज़ेहेन" (फिर मिलेंगे / पुन: मिलने तक) कहते थे। मैं भी जाते हुए कई बार पीछे मुड़कर देखती और हाथ हिला देती थी। वे गद्गद् हो जाते थे। प्राय: वे मेरे परिवार के विषय में पूछते थे। "माता-पिता, भाई-बहिन कहाँ हैं? पति ने विवाह के इतने कम दिनों (डेढ़ साल) बाद तुम्हें इतनी दूर अकेले आने दिया? लगता है कि वे भी अमेरिकन पतियों के समान उदार विचारों के होंगे। उन्हें तुम पर इतना विश्वास है? क्या तुम भी उन पर इतना भरोसा करती हो?"
तब मेरा उत्तर "हाँ" में पाकर दोनों जैसे चकित किन्तु आश्वस्त से हो गए थे।
वेर्नर ने अपनी जीवन-गाथा भी मुझे बताई थी। द्वितीय विश्वयुद्ध की समाप्ति के समय ये परिवार ड्रेसडेन नगर यानी जर्मनी के पूर्व भाग में था, जिस भूभाग पर बँटवारे के बाद कम्युनिस्ट यानी (रशियन) शासन तंत्र हो गया था। प्रारंभ में लोग वहाँ के नियंत्रणों से घबड़ाकर पूर्वी जर्मनी से पश्चिमी जर्मनी भाग आते थे। बाद में आना मना हो गया था। पश्चिमी जर्मनी में वातावरण स्वतन्त्र था, समृद्धि और सुख-सुविधाएँ थीं। ये परिवार भी वहाँ आने के लिये प्रयत्नशील था। शासन द्वारा उन्हें ज़बरदस्ती रोक कर, जगह-जगह बहुत सी प्रतिमाएँ (कम्युनिस्ट नेताओं के डद्वद्मद्य) बनाने के लिये विवश किया गया था। बड़ी कठिनाई से रात में किसी तरह छिपते-छिपाते ये लोग इस ओर आ सके थे। फिर से किसी तरह गृहस्थी जमाई थी। अब सम्पन्न और संतुष्ट थे। कहते थे कि पूर्वी बर्लिन जाने पर मैं उनकी बनाई मूर्तियाँ वहाँ देख सकूँगी।
उनका एक मित्र भारत होकर आया था। उसकी बातें सुनकर एक दिन वेर्नर ने मुझसे पूछा- "भारत की रेल में क्या चार क्लासेज़ होते हैं? लोग गाड़ी में बिस्तर बिछाकर सो जाते हैं। बहुत से लोग खड़े रहते हैं, कोई उनकी परवाह नहीं करता।"
उस समय भारतीय रेल में - फ़स्र्ट, सेकेंड, इंटर और थर्ड मिलाकर कुल चार क्लास होते थे जो भारत के दासता-काल के द्योतक थे। वही स्थिति तब स्वतंत्रता के इतने साल बाद भी चली जा रही थी।
एक दिन श्रीमती वेर्नर बड़े संकोच से बोली थीं - "मैंने खजुराहो मन्दिर की फ़ोटोज़ देखी थीं। मंदिर तो पूजा की जगह होती है, फिर वहाँ इतनी रोमांटिक मूर्तियाँ क्यों बनी हैं? मुझे बड़ी हैरानी हुई।" दार्शनिक पक्ष लेकर मैंने उन्हें उस कला के लिये आश्वस्त किया था।
फिर... एक दिन मेरी मूर्ति पूरी हो गई थी। वेर्नर ने कहा - उन्हें दु:ख हो रहा है कि अब मैं उनके यहाँ आना छोड़ दूँगी। शाम का वो एक घंटा उन्हें उदास कर जाएगा। पूछने लगे कि मेरे पति कब जर्मनी आएँगे? मैं उन्हें पहले से इसके बारे में न बताऊँ। उनके आने पर वे हम दोनों को निमन्त्रित करेंगे और मूर्ति को ढंक कर, उनसे ही उसका अनावरण करवाकर उनको आश्चर्यचकित कर देंगे। विदाई की भेंट के रूप में वह मूर्ति उनको दे देंगे। उन्हीं दिनों चीनी आक्रमण के कारण भारत सरकार ने शासकीय सेवाओं में रत लोगों के भारत से बाहर जाने पर रोक लगा दी थी। अत: मेरे पति का पूर्वनिश्चित प्रोग्राम भी निरस्त हो जाने से उन्हें वहाँ आने की अनुमति नहीं मिली थी। अन्तत: मुझे ही लौटकर आना पड़ा था। इसी बीच वेर्नर ने उस पर सफ़ेद सा रंग करके उसे श्वेत प्रतिमा बना दिया था, जो अधिक आकर्षक लगने लगी थी। उसको आधार बनाकर एक मुखौटा बनाकर उसे भी श्वेत सा कर दिया था।
चलने से पूर्व मैं उनसे मिलने गई तो दोनों बड़े प्रेम से मिले। मिसेज़ वेर्नर ने मुझे गले लगा लिया था। मेरी ही तरह उन दोनों की आँखें भी सजल हो आईं थीं। वे बोले - "ऐसा लग रहा है कि मेरा कोई अपना मुझसे बहुत दूर चला जा रहा है। पता नहीं कि फिर कभी मिल पाएँगे या नहीं? मेरी बनाई प्रतिमा तुम्हें मेरी याद दिलाती रहेगी।"
मुझसे वो प्रतिमा उनकी ओर से अपने पति को देने को कहा था और वह मुखौटा मेरे माता-पिता के लिये उपहार दिया। मेरे पारिवारिक जीवन के लिये दोनों ने अपनी शुभकामनाएँ दी थीं। चलते समय पुन: मिलने की अधिक आशा न होने पर भी, एक बार फिर उनके साथ ही मैंने भी कहा था "आउफ़ वीडर ज़ेहेन"।
इस लम्बे अन्तराल में कुछ समय बाद उनसे सम्पर्क टूट सा गया था, क्योंकि मैं भी अपने घर परिवार के चक्करों में व्यस्त हो गई थी, वे भी कहीं और चले गए थे। नहीं जानती, अब वे कहाँ हैं? समय का दरिया बहुत बह गया है। वे अपरिचित, जो मेरे आत्मीय से हो गए थे- उनके मुस्कुराते चेहरे, विदाई का वह क्षण आज भी हृदय में अंकित है। फिर मिलने की आशा लिये मैं अपनी आँखों से अपनी ही प्रतिमा निहारती हूँ, उनके स्नेहशील स्वभाव को, अपनेपन को याद करके सुधियों की लहरों में डूब जाती हूँ। मैंने कभी स्वप्न में भी नहीं सोचा था कि मेरे जैसे अतिसामान्य व्यक्ति की भी कभी कोई प्रतिमा बनाएगा।
हे मूर्त्तिकार! तुमको प्रणाम।

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