btn_subscribeCC_LG.gif btn_buynowCC_LG.gif

"रीछ" के बहाने कुछ यादें
01-Feb-2018 10:44 AM 3984     

दूधनाथ सिंह की वे कहानियां पाठकों का खास ध्यान खींचती हैं जो दिलचस्प किन्तु प्रतीकात्मक होने के कारण उलझी हुई, जटिल और चमत्कारपूर्ण होती हैं। उनकी कहानी "रीछ" अपनी प्रतीकात्मकता, फन्तासी तथा यौन-चित्रों-संवादों के कारण पर्याप्त विवादग्रस्त और चर्चित हुई। इसमें मध्यवर्गीय व्यक्ति के सामने उपस्थित "व्यक्तित्व के द्वैत" अथवा "विभाजित व्यक्तित्व" की समस्या को व्यक्त करने के लिए प्रतीकों का बहुस्तरीय उपयोग करके ऐसी फन्तासी रची गई है, जिसके प्रतीकार्थ को पकड़ने में कठिनाई होती है। दाम्पत्य सम्बन्धों में उपस्थित "रीछ" दरअसल पति की अतीत की स्मृति-यंत्रणा का प्रतीक है!
"रीछ" को लेकर बुनी गई जटिल और उलझी हुई फन्तासी पर फ्रायड के मनोविश्लेषण का प्रभाव है। "रीछ" कहानी के बारे में, खुद दूधनाथ सिंह का कहना है कि, "रीछ" का मुख्य कथ्य यह है कि अगर आप पीछे-देखू हैं, अगर आप अतीतजीवी हैं तो आपके लिए रास्ता एक ही है कि आप या तो अतीत का वध कर दें और नहीं तो अतीत आपका वध कर देगा। यानी आदमी को अतीतजीवी नहीं होना चाहिए। बस इतनी-सी बात पर कहानी लिखी गई। कहानी में आया हुआ रीछ का बच्चा उसी अतीत का प्रतीक है जो हर समय उस आदमी का पीछा करता है और अन्ततः जब वह आदमी उसे मारने की कोशिश करता है तो वह (अतीत) उसके दिमाग को फाड़कर उसके दिमाग के अन्दर प्रवेश कर जाता है। कहानी लिखते वक्त कहानीकार के नाते यह मेरा निश्चय था कि अतीतजीवी ही मरे, अतीत नहीं। क्योंकि कहानी का पूरा कथ्य इसी ओर ले जाता था। जाहिर है कि कहानी इस प्रतीक में उलझी हुई है। एक ओर पत्नी है जो उस आदमी का वर्तमान जीवन है और दूसरी ओर एक विफल प्रेम है, जो रीछ की खूंखार शक्ल में उसके वर्तमान जीवन का पीछा करता है। ऐसी स्थिति में सेक्स और सम्भोग जैसी आनन्दमयी प्रक्रिया घनघोर यातना है। पत्नी को प्यार करते हुए पूर्ववर्ती प्रेम की याद आना दाम्पत्य जीवन का सबसे कठिन दुख है। इसी दुख को कहानी के माध्यम से व्यक्त किया गया है; इसी यातना को, किसी यौन कुंठा को नहीं - उनकी एक अन्य कहानी "आइसबर्ग" भी प्रतीकात्मक कहानी है। इसमें प्रतीक-विधान समूची कहानी पर छाया हुआ है। इस कहानी की मूल संवेदना उसी प्रतीक योजना के द्वारा उद्घाटित होता है। यहां "आइसबर्ग" एक ऐसे व्यक्ति का प्रतीक है जिसका व्यवहार अवचेतन से प्रेरित है तथा जो मानसिक द्वन्द्व एवं जीवन की सहज इच्छाओं की पूर्ति न होने से अत्यन्त दुखी है।
हिंदी साहित्य से यदि आपका थोड़ा भी लगाव है तो दूधनाथ सिंह अवश्य आपके लिए एक बड़ा नाम हैं। प्रदेश सरकार की साहित्यक पत्रिका "उत्तर प्रदेश" के सम्पादन की जिम्मेदारी के दौरान सन 1993 में मैंने उनके कृतित्व और व्यक्तित्व पर एक विशेषांक प्रस्तावित किया था। इसकी सलाह मुझे प्रसिद्ध लेखक विष्णु प्रभाकर जी ने एक बातचीत में दी थी। लेकिन उन्होंने मेरे अनुरोध को सौम्यता और सहज भाव से मात्र इसलिए अस्वीकार कर दिया कि वह अनावश्यक प्रचार नहीं चाहते थे। वह सिर्फ लेखन में ही डूबे रहना चाहते थे, प्रसिद्धि तो स्वयं खोज लेती थी उन्हें।
नारी के विषय में लिखी उनकी निम्नलिखित काव्य संवेदनाएं कितनी सहज और अंतस को स्पर्श करती हैं :
मैं तुम्हारी पीठ पर बैठा हुआ घाव हूँ / जो तुम्हें दिखेगा नहीं / मैं तुम्हारी कोमल कलाई पर उगी हुई धूप हूँ / अतिरिक्त उजाला - ज़रूरत नहीं जिसकी / मैं तुम्हारी ठोढ़ी के बिल्कुल पास / चुपचाप सोया हुआ भरम हूँ साँवला / मर्म हूँ दर्पण में अमूर्त हुआ / उपरला होंठ हूँ खुलता हँसी की पंखुरियों में / एक बरबस झाँकते मोती के दर्शन कराता / कानों में बजता हुआ चुम्बन हूँ / उँगलियों की आँच हूँ / लपट हूँ तुम्हारी / वज्रासन तुम्हारा हूँ पृथ्वी पर / तपता झनझनाता क्षतिग्रस्त / मातृत्व हूँ तुम्हारा / हिचकोले लेती हँसी हूँ तुम्हारी / पर्दा हूँ बँधा हुआ / हुक् हूँ पीठ पर / दुख हूँ सधा हुआ / अमृत-घट रहट हूँ / बाहर उलीच रहा सारा / सुख हूँ तुम्हारा / गौरव हूँ रौरव हूँ / करुण-कठिन दिनों का / गर्भ हूँ गिरा हुआ / देवता-दैत्य हूँ नाशवान / मत्र्य असंसारी धुन हूँ / अनसुनी। नींद हूँ / तुम्हारी / ओ, नारी!
अपनी कविताओं से सामाजिक विद्रूपता की सरल अनुभूति कराते रहे दूधनाथ सिंह। जब भी लिखा, जो भी लिखा वह सटीक लिखा!
दूधनाथ सिंह बहुमुखी प्रतिभा सम्पन्न रचनाकार थे। वे साठोत्तर पीढ़ी के ऐसे रचनाकार हैं जिन्होंने कहानी, कविता, नाटक, संस्मरण, उपन्यास, आलोचना विधाओं में महत्त्वपूर्ण लिखा है। इन सभी विधाओं में लिखी उनकी रचनाओं ने अन्तर्वस्तु और शिल्प दोनों दृष्टि से नयी जमीन तोड़ी। साठोत्तर कहानी पीढ़ी में उनकी अपनी खास पहचान है। सन् साठ के आसपास से कहानी लिखना शुरू करने वाली कथाकार पीढ़ी- ज्ञानरंजन, रवीन्द्र कालिया, काशीनाथ सिंह, विजय मोहन सिंह और गंगा प्रसाद विमल- के साथ ही उन्होंने कहानियां लिखनी शुरू की। ये लोग आजादी के बाद नेहरू युग के "रोमांटिक स्वप्नभंग के कथाकार" हैं। साठोत्तर पीढ़ी के इन कथाकारों ने हिन्दी कहानी के पिछले अनुभव के ढांचे को ध्वस्त कर दिया। इन्होंने मां और पिता से सम्बन्ध, पत्नी से सम्बन्ध, इसी तरह और भी सभी सम्बन्धियों को उनकी सही रोशनी में जांचना शुरू किया तथा रोमांटिक-आदर्शवादी निर्मितियों को तोड़ना शुरू किया। इस क्रम में इन्होंने प्रेम, दाम्पत्य और यौन-सम्बन्धों के छद्मों का उपहास किया। साठोत्तर पीढ़ी के कथाकारों ने नये जीवन-अनुभव, नये कथ्य, नयी भाषा, नये कथा-शिल्प द्वारा कहानी में अनूठा स्वाद उपस्थित किया। साठोत्तर कहानी में दूधनाथ सिंह अपने निजी अनुभव, जीवन-परिवेश और भौगोलिक गंधों की ईमानदार अभिव्यक्ति तथा ताजगी भरी अनूठी शैली-शिल्प के कारण अलग से पहचाने गये।
ग्रामीण परिवेश यानी अपनी जड़ों से विलग, वियुक्त होकर शहर आने पर बेरोजगार और बेसहारा बने दूधनाथ सिंह की शुरूआती कहानियों में उस विलगाव और बेसहारेपन का चित्रण ही प्रमुख रूप से मौजूद है। "रक्तपात", "आइसबर्ग" और "सपाट चेहरे वाला आदमी" जैसी शुरुआती कहानियों में परिवेश से विलगाव और बेसहारेपन के दुख-दर्द की अभिव्यक्ति साफ तौर पर देखी जा सकती है। उनकी शुरुआती कहानियों में गांव से अलग हुए एक युवक की तकलीफों और असामंजस्य की ईमानदार अभिव्यक्ति मिली है। गांव और शहर का द्वन्द्व तथा शहरी ठंडेपन में निगल लिए जाने के भय एवं चीत्कार को उनकी शुरुआती कहानियों में देखा-सुना जा सकता है। "रक्तपात" कहानी में एक प्रवासी युवक की पारिवारिक प्रेम सम्बन्धों के बीच उपस्थित झंझावातों और बिखरावों की कचोट भरी स्मृतियां हैं। इसमें दादा-पिता-मां-बहन और पत्नी से असहज और तनाव भरे सम्बन्धों की अभिव्यक्ति में "पारिवारिक जीवन की विचित्र बेचारिगी" का ऐसा रूप प्रस्तुत हुआ है कि पाठक स्वयं उसका हिस्सेदार महसूस करने लगता है।
दूधनाथ सिंह की कहानियां मध्यवर्ग की ढोंगभरी सामाजिक संरचना के विरुद्ध सवाल उठाती हैं। वे मुख्यतः शहरी मध्यवर्ग की कहानियां लिखते हैं। ऐसी कहानियों में कलकत्ता एवं इलाहाबाद शहर प्रायः उपस्थित होते हैं। वे प्रायः शहरी मध्यवर्ग की प्रदर्शनप्रिय तथा आदर्शवादी जीवन पद्धति का, यथास्थितिवादी मूल्यों और जीवनादर्शों का, प्रेम-दाम्पत्य और यौन-सम्बन्धों के छल-छद्मों का उद्घाटन कर उनका उपहास करते हैं। उनकी कहानियों में एक सर्वथा नयी भाषा, नया कथ्य और अनूठा शिल्प मिलता है। उनकी कथाभाषा में बिम्बों का सर्जनात्मक उपयोग होता है। कई बार सघन बिम्ब-मालाएं देखने को मिलती हैं। उनकी अनेक कहानियां "आत्मवाची" हैं। उन सभी का वाचक "मैं" है। "सुखांत", "विजेता", "दुःस्वप्न", "सपाट चेहरे वाला आदमी" आदि अनेक कहानियां उत्तम पुरुष (सर्वनाम) में लिखी गई हैं। "मैं" (उत्तम पुरुष) और "वह" (अन्य पुरुष) के रूप में लिखी गई उनकी कहानियों के पात्र "अनाम" हैं और प्रायः प्रतीकात्मक बन जाते हैं। उन्होंने "प्रतिशोध", "स्वर्गवासी", "रीछ", "कोरस" आदि अनेक कहानियां "अन्य पुरुष" में लिखी हैं।
दूधनाथ सिंह की कहानियों में एक खास तरह का खिलंदड़ापन, बेबाकी और भाषा की ताज़गी दिखाई देती है। उनके पात्र सिद्धान्तों के चौखटे में बंधे पात्र नहीं हैं, न ही लेखक के हाथों की कठपुतली हैं। उनके पात्र वास्तविक ज़िन्दगी के द्वन्द्व, असंतोष, असहमति और नकार से भरे उबलते-खिझते-झटपटाते और ऊबे हुए पात्र हैं।
आजादी के मूल्यों का विखंडन और आजादी से मोहभंग की सच्ची अभिव्यक्ति दूधनाथ सिंह की कहानियों में देखी जा सकती है। नोच-खसोट, भ्रष्टाचार, नौकरी के लिए गांव-घर से शहरों की ओर पलायन, संयुक्त परिवारों के सुखद स्वप्न के विखंडन की ईमानदार अभिव्यक्ति उनकी कहानियों में देखने को मिलता है। नये अनुभव-यथार्थ की अभिव्यक्ति के लिए एक अराजक शिल्प और कथन की अविश्वसनीय भंगिमाएं उनके कथा-शिल्प की खासियत है। वे कहानी में वर्णन और ब्यौरों का प्रायः व्यंग्यात्मक उपयोग भी करते हैं। हर शब्द, हर वाक्यांश में तोड़फोड़ कर कुछ नया और सार्थक रचना करना उनका मूल स्वभाव है। समग्रतः कहा जा सकता है कि साठोत्तर हिन्दी कहानी में दूधनाथ सिंह की कहानियां नये अनुभव संसार, नयी कथाभाषा और कथ्य के अनूठेपान युक्त विशिष्ट सृजन हैं, जिन्हें नजरअन्दाज करके हिन्दी कहानी की मुकम्मिल तस्वीर नहीं बन सकती।
दूधनाथ सिंह उन कथाकारों में शामिल हैं जिन्होंने नई कहानी आंदोलन को चुनौती दी और साठोत्तरी कहानी आंदोलन का सूत्रपात किया। "हिन्दी के चार यार" के रूप में ख्यात ज्ञानरंजन, काशीनाथ सिंह, दूधनाथ सिंह और रवीन्द्र कालिया ने अपने जीवन के उत्तराद्र्ध में हिन्दी लेखन को नई धार दी। लेखकों की पीढ़ी तैयार की और सांगठनिक मजबूती प्रदान की। चार यार में अब सिर्फ काशीनाथ सिंह और ज्ञानरंजन ही बचे।
सन् 1936 में जन्मे इस लेखक ने न जाने कितनी रचनाएँ की और एक से एक बढ़कर योगदान दिया लेकिन "आखिरी कलाम" उनकी अपनी प्रियतम रचनाओं में से एक था। यह उपन्यास बाबरी मस्जिद के विध्वंस के पहले और बाद के सांप्रदायिक माहौल का सजीव चित्रण करता है। उन्होंने जो मुख्य किरदार गढ़ा है वह एक प्रतिरोध है साम्प्रदायिकता के खिलाफ। उसका कोई रूप नहीं है। हालांकि, तत्सत पाण्डेय के किरदार की प्रेरणा मुझे सीपीआई के वरिष्ठ नेता होमी दाजी से मिली। मैंने जब लिखना शुरू किया तो मुझे लगा कि मैं होमी दाजी को एक प्रतिरोध की शक्ति के रूप में दर्ज कर रहा हूं। लेकिन वह सिर्फ एक प्रतिरोध है सांप्रदायिकता के खिलाफ।
उनका मानना था कि "एक लेखक का दायित्व है कि वह अपने समय की सामाजिक समस्याओं का चित्रण करे। उन समस्याओं के प्रति प्रतिबद्ध रहे। लेकिन कोई भी लेखक समाज को बदलने का अगर सपना देखता है तो वह पूरा नहीं हो सकता। क्योंकि समाज एक लेखक की रचनाओं से नहीं बदलता, उसके बदलने के अपने तर्क होते हैं।"
एक समीक्षक के शब्दों में, अपनी सम्पूर्ण औपन्यासिक संरचना में "आखिरी कलाम" हिंदू फासीवादी खतरे की पृष्ठभूमि में एक ऐसी जीवन्त जिरह है जो धर्म, धर्मनिरपेक्षता, जनतन्त्र, मीडिया, मुसलमान वामपंथ से लेकर लोहियावादी राजनीति तक का विस्तार लिए है। लेकिन उपन्यासकार का सर्वाधिक मुखर है हिन्दू धर्म की मनुष्यविरोधी संरचना को बेपर्दा करने तथा धर्मनिरपेक्ष शक्तियों के उस पोले आधार को उजागर करने में जो उसकी विफलता के लिए जिम्मेदार हैं। अयोध्या में कारसेवकों की आक्रामकता व बाबरी मस्जिद के आसन्न ध्वंस पर धर्मनिरपेक्ष शक्तियों से उसका सीधा चुनौतीपूर्ण सवाल करते हैं- कहाँ है तुम्हारे वर्ग-मुक्त मानस की जनता? यह मस्जिद-मस्जिद का सवाल नहीं। यह मनुष्य होने या न होने का सवाल है।
कथाकार ने उपन्यास का जो ताना-बाना बुना है, उसके समूचे में तत्सत् पांडेय की आत्मग्लानि से भारी यह बड़बड़ाहट पहले पन्ने से लेकर उन आखिरी पन्नों तक फैली हुई है, जिन पर कारसेवकों का तांडव, फौजी बूटों का आतंक, कफ्र्यू का सन्नाटा और दिसंबर की कड़ाके की ठंड एक साथ मौजूद हैं।
उपन्यास इसी शोर और सन्नाटे का मिला-जुला करुण संगीत है जिसे सुनते हुए ऐसा लगता है कि हिंसक कार-सेवकों की भीड़ में तत्सत पाण्डेय, सर्वात्मन और बिल्लेश्वर निरीह निरुपायों की तरह फँस गए हैं जिसका परिणाम आचार्य जी के जीवन के अंत से होता है- "मुझे घर ले चलो सर्वात्मन। आचार्य जी के मुँह से आर्तभाव से निकला। फिर एक हिचकी।" खगेन्द्र ठाकुर "आखिरी कलाम" का मूल कथ्य बताते हुए लिखते हैं- "भारतीय समाज और राजनीति के बढ़ते हुए रूढिवाद, अंधविश्वास और धर्मतांत्रिक राजनीति के अभिमानों के फलस्वरूप बढ़ता हुआ उन्माद और उसके प्रभाव से पैदा हुआ आतंक।"
नमन आपकी रचनाधर्मिता को दूधनाथ सिंह जी!

QUICKENQUIRY
Related & Similar Links
Copyright © 2016 - All Rights Reserved - Garbhanal - Version 19.09.26 Yellow Loop SysNano Infotech Structured Data Test ^