ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
श्रुतियों की भोर
01-Nov-2017 04:00 PM 2351     

श्री नरेश मेहता और जगदीश गुप्त के साथ जबलपुर में कविता सुनाने का अवसर मिला। नरेश मेहता की कविताएँ सुनकर लगा कि कविता में श्रुतियों की भोर हो रही है जैसे आधुनिक कविता की भूमि पर वैदिक ऋचाएँ उतर रही हों। कविता पाठ के बाद दोनों कवियों से गपशप करने का मौका भी मिला। दोनों जेठे कवियों से पहली बार मिलते हुए कुछ संकोच भी था। नरेश मेहता कम बोलते और जगदीश गुप्त बोलते ही चले जाते। मैंने अपना परिचय कवि पिता का नाम लेकर दिया। तो नरेश जी ने खुशी जाहिर करते हुए कहा कि जगदीश, सब कुछ डूब नहीं गया है, अभी भी हिन्दी में अपने बाप का नाम लेने वाले कवि पैदा हो रहे हैं। इस पर जगदीश जी बोले -- पिता को भूलकर कोई कवि नहीं हो सकता। नरेश जी बोले -- प्रिया को भूलकर भी नहीं हो सकता। जगदीश जी ने तुरन्त जोड़ा कि हाँ, कुछ भी भूलकर कोई कवि नहीं हो सकता।
तपाक-से बोलने का मौका मिलते ही मैंने कहा कि ऐसा तो कोई कवि नहीं जो सब कुछ याद रख सके। आपके कहने का मतलब शायद यह है कि हर नया कवि अपने पूर्वज कवियों की काव्य-स्मृति का उत्तराधिकार पाकर कुछ भी नहीं भूलता होगा तब ही वह अपने जीवन और कविता को इसी काव्य-स्मृति के सहारे अपने समय की लय में रचकर अपनी छाप लगा सकेगा।
नरेश जी ने तुरन्त पूछा, तुम पूर्वज कवियों की खोज में कितने पीछे जाना चाहोगे। मैंने कहा -- तुलसीदास तक तो जाना ही चाहिए पर अगर बीसवीं सदी में ही रहना हो तो कवि रत्नाकर तक जरूर जाऊँगा। वे बोले, फिर तो तुमने उनका "उध्दव शतक" जरूर पढ़ा होगा, उसका कोई कवित्त याद हो तो सुनाओ। शायद वे मेरी परीक्षा ले रहे थे और मैं उन्हें यह कवित्त सुनाकर उत्तीर्ण हुआ --
कर-बिनु कैसैं गाय दूहिहै हमारी वह
पद-बिनु कैसैं नाचि थिरकि रिझाइहै।
कहै रत्नाकर बदन-बिनु कैसैं चाखि
माखन बजाइ बैनु गोधन गवाइहै।
देखि सुनि कैसैं दृग स्रवन बिनाहीं हाय
भोरे ब्रजवासिनि की बिपति वराइहै
रावरौ अनूप कोऊ अलख अरूप ब्रह्म
ऊधौ कहौ कौन धौं हमारैं काम आइहै।
यह कवित्त सुनाकर मैंने दोनों जेठे कवियों का आशीष तो पा ही लिया। दोनों को ही रत्नाकर का उध्दव शतक प्रिय था। जगदीश जी बोले -- इसके कुछ कवित्त ऐसे भी हैं जो महाकवि सूरदास के भ्रमरगीत पर भी भारी पड़ते हैं। मैं सहज ही पूछ बैठा कि निर्ममता पर ममता भारी क्यों पड़ जाती है? तब नरेश जी बोले, क्या तुम्हें नहीं लगता कि निर्ममता एक कल्पना भर है, सच्चाई तो संसार है और वह ममता से चलता है। निर्ममता को साधने का अभ्यास करना पड़ता है पर ममता तो जन्मजात सच्चाई है और वही अब तक जीतती आयी है। मैंने कहा कि हाँ लगता है, तब क्या आप यह कहना चाह रहे हैं कि निर्ममता से तो मुत्यु जीती जाती है, जीवन तो ममता से ही जीता जाता है। आखिर महाभारत का युध्द ज्ञान की भूमि पर निर्ममता को साधकर ही तो लड़ा गया पर हाथ तो शव ही आये, जीवन हाथ नहीं आया। पर भागवत इतिहास की अँगनाई में रची-बसी ममता ने जगत के जीवन को अपने हृदय के जीवन की तरह सहज ही पा लिया, उसे गगन मण्डल से घर के आँगन में उतार लिया। वे बोले, तुम ठीक ही समझे। और मुझे शमशेर की यह रुबाई याद आ गयी --
हम अपने खयाल को सनम समझे थे,
अपने को खयाल से भी कम समझे थे।
होना था -- समझना न था कुछ भी, शमशेर,
होना भी कहाँ था वह जो हम समझे थे।
कोई कहता है कि होना ऊपर शुरू हुआ और फिर नीचे उतरता चला आया। पर कोई यह भी तो कहता है कि होना नीचे ही हुआ फिर भले ही उसमें ऊपर उठने की चाह पैदा हुई हो। लगता है कि ऊपर उठने की चाह और नीचे आने की राह एक ही हैं -- जहाँ चाह, वहाँ राह। वैदिक उषा सूक्त से भावप्रेरित नरेश मेहता की कविता याद आती है --
उदयाचल से किरन-धेनुएँ
हाँक ला रहा वह प्रभात का ग्वाला।
बरस रहा आलोक-दूध है
खेतों खलिहानों में
जीवन की नव किरन फूटती
मकई और धानों में
सरिताओं में सोम दुह रहा वह अहीर मतवाला।
दो गोकुल हैं और ग्वाला एक ही है जो अनन्त का गोविद् है और पृथ्वी का गोपाल है। अनन्त में बसे अलौकिक गोकुल में रश्मियाँ ही गोयूथ हैं और प्रभात का ग्वाला गोविद् सूर्य है। इस अनन्त में कभी गोधूलि नहीं होती, वहाँ कोई गोवर्धन पर्वत भी नहीं जहाँ यह ग्वाला किसी गुहा में छिप सके। उसे अन्तरगुहा में छिपने के लिए लौकिक गोकुल का हृदय चाहिए जो उसकी बाँसुरी की टेर सुन सके और जहाँ गोखुर से उठती धूल उसके भाल का तिलक हो सके। वह अपनी होनी को दिखाने के लिए उस संसार में आ सके जहाँ से वापसी बड़ी कठिन है। वह संसार के स्वभाव में घुलकर उसके जीवन की कविता हो सके। नरेश मेहता प्रार्थना करते हैं --
मेरी प्रार्थना, मेरी कविता, चलो -
इस पृथ्वी पर वनस्पतियाँ बनकर
सृष्टि की भाषा बनकर चलो,
प्रत्येक चलना अवतार होता है
धूप सूर्य का
और नदियाँ बादलों का अवतार ही तो हैं।
सृष्टि मात्र को
मनुष्य मात्र को इतिहास और राजनीति नहीं एक कविता चाहिए।
नरेश मेहता के करीब से गुजरते हुए एक संकीर्तन-सा सुनायी देता है -- जैसे कोमल गांधार धूप में नैसर्गिक साधुचरित वृक्ष की छाँह तले प्रार्थना धेनुएँ रँभा रही हों, धूप में छन्द लिखती चिड़िया और सूर्योदय का कीर्तन करते पक्षियों का कलरव हो, जैसे पृथ्वी पर जल के पहली बार चलने का स्वर सुनायी दे रहा हो, नदियों के यज्ञोपवीत धारे सृष्टि धूप का आचमन कर रही हो और धरती पर ज्योति के हल चल रहे हों, जैसे पृथ्वी की सीता बाहों में फसलों का कोई संगीतलोक हो, जैसे विनम्र काव्य-दूर्वा पर कोई गायत्री फूल खिल रहा हो। वे साथ चलते हुए अक्सर कंधे पर हाथ रख लेते जैसे किसी ग्राम्या पगडण्डी की ओर ले जा रहे हों।
यह सृष्टि किसी का आदेश नहीं प्रस्तुति है -- नरेश मेहता कहते है -- इतिहास इसको कभी समझ नहीं पायेगा, वह तो शक्ति के लिए किया गया अमानुषिक रक्तस्नान है। वे अपनी कविता में फटकारकर कहते हैं कि -- तुम क्यों नहीं समझते कि यह सृष्टि तत्त्वों की पंचधातु की भाषा में लिखा एक प्रयोजन है, मनुष्य का कविता हो जाना ही जीवन का उत्सव है। वे प्रार्थना करते हैं --
ओ सम्यक् दिन, लौटो,
हमें आलोको
हमारी रचनाओं को दूबों का शील दो --
हमारी मृत चेतनाओं को धेनु करो,
धूपाभिषिक्त करो...
नरेश मेहता की कविताएँ पढ़ते हुए लगता है कि बीसवीं सदी में श्रुतियों की भोर हो रही है जैसे पृथ्वी की सबसे प्राचीन पाण्डुलिपि मिल गयी हो जिसे ऋतुओं ने लिखा है और जिसके जर्जर भोजपत्री पृष्ठों को सधे हाथों से पलटकर अपने समय की नयी स्मृति रची जा रही हो, जैसे कोई आदि स्वरलिपि आधुनिक मुक्त छन्द में गायी जा रही हो। यह कविता याद दिलाती है कि पृथ्वी के ऋतु-स्नान से ही जगत काव्य का अवतरण होता आया है। लगता है कि जैसे सारा जीवन सूर्यवंशी धूप का अवतार है जिसमें रूप-रस गंध-स्पर्श और शब्द डेरा डाले हुए हैं। सारी पृथ्वी वैष्णवता की परीक्षा के मानवीय मैदान जैसी लगती है जहाँ मनुष्य के कविता में घटित हो जाने की पूरी सम्भावना है। पृथ्वी के मैदानों में उतरकर ही विराट करुणा जीवन की पीड़ा में भागीदार हो सकती है। नरेश मेहता की उत्सव कविता मनुष्य के कविता हो जाने को ही उत्सव कहती है। कविता के उत्सव हो जाने की सम्भावना देश और उसके ऋतुकाल में ही सम्भव है उसे खोकर नहीं।

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