ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
श्रद्धा का समाजवादी पर्व
01-Apr-2016 12:00 AM 1773     

हम तीन लोग एक टेंट में सो रहे थे। साथी रिपोर्टर मनीष श्रीवास्तव, छायाकार विनय पाण्डेय और मैं। मुझे भीषण सर्दी लगी तो आंख खुल गई। बगल से दांत किटकिटाने की आवाज़ आयी तो पलटा। देखा मनीष के दांत बज रहे थे। हमारे पास चारपाई थी, गद्दे और रजाइयां थीं पर एक तो जनवरी की रात, ऊपर से खुला मैदान और गंगा का किनारा। मैंने कुछ देर सोने की कोशिश की पर मारे सर्दी के आफत पड़ी थी। जब नहीं रहा गया तो चारपाई से उतर कर टेंट में ही टहलने लगा। तब तक कुछ शोर सुनाई दिया। ऐसा लगा टेंट के बाहर कुछ लोग बोल रहे हैं। उत्सुकतावश जैकेट पर मोटा शॉल लपेटा और सिर पर टोपी, गले में मफलर चढ़ाकर बाहर निकला तो जो दृश्य दिखा कि मेरी सर्दी जाने कहां भाग गई। घड़ी देखी तो सुबह के तीन बजा चाहते थे लेकिन सामने सड़क पर रेला लगा था। महिलाएं, बच्चे, वृद्ध, धोती पहने गांव के चाचा और शहर के गाउनधारी अंकल जी सब भागे जा रहे थे संगम की ओर। सबके हाथ में एक झोला और अधिकतर नंगे पांव। अब जो यह देखा तो मैं उत्साह से भर उठा। भागा भीतर और एक थर्मस उठा लाया। हमारे टेंट से कुछ आगे चाय का ठेला लगा था। पहले तो दो गिलास चाय खुद जमायी और फिर थर्मस भरकर वापस लौटा। विनय और मनीष को जबरन जगाया, उन्हें चाय पिलायी और बताया कि बाहर चलो और सर्दी भगाओ। वे भी पत्रकार ठहरे, बाहर का मानव काफिला देखकर उनके लिए भी सर्दी मानो वसंत हो गई और तीनों चल दिये संगम की तरफ। जैसे-जैसे आगे बढ़ते, भीड़ भी बढ़ती जाती। लोग दाबे चले जाते थे और गंगा किनारे तो लाखों स्नानार्थी जमा थे। कुछ नहाने की तैयारी में थे और कुछ नहाकर वापस लौट रहे थे। एक अपूर्व संसार बसा था संगम तट पर।
ऐसी होती है कुंभ की मोहक दुनिया। भक्ति, भाव, ऊर्जा, उत्साह, आध्यात्म और श्रद्धा से सराबोर। यह अवसर था २००२ के प्रयाग पूर्ण कुंभ का। सिंहस्थ कुंभ आ रहा है और जिन्हें भी मौका मिले, उन्हें उज्जैन अवश्य जाना चाहिए। संयोग और सौभाग्य से मुझे १९९१ से प्रयाग में हुए सभी कुंभ और अर्धकुंभ में जाने का अवसर मिला। एक पत्रकार की दृष्टि से मैंने कुंभ को देखा, कवर किया और इसके साथ-साथ यह भी समझ लिया कि कुंभ धार्मिक आयोजन मात्र नहीं है। कोई पत्रकार हो या न हो, यदि वह पर्यटक है, यदि उसमें देश और समाज को समझने की इच्छा है, यदि वह अपने व्यक्तित्व को समृद्ध करना चाहता है तो उसे कुंभ जाना चाहिए। धर्म का पालन करने के लिए वह नदी में स्नान बिल्कुल न करे पर केवल नदी में नहाने का आनंद लेने के लिए डुबकी मार ले। जाइये और साधु संतों की दुनिया में विचरिये, इसलिए नहीं कि आपको आगे कभी भगवा धारण करना है बल्कि इसलिए कि जाएंगे तो समझेंगे कि संत समाज कितने कल्याणकारी कार्य करता है, कि साधुओं के अखाड़े न हों तो कुंभ में आने वाले लाखों करोड़ों लोगों के लिए भोजन भी न जुट सके। हां, इसका उलटा पक्ष भी है। यह भी देखेंगे कि भूमि के एक टुकड़े के लिए किस तरह साधु समाज प्रशासन पर दबाव बनाता है, आपस में विवाद करता है। जाएंगे तो ही समझेंगे कि कुछ आश्रमों का फाइव स्टार मैनेजमेंट कैसा होता है। वहां ऐसे टेंट भी होते हैं जिनके कक्ष होटलों के शाही कमरे जैसे लगें और जहां ठहरना धनिकों को भी अपने बस से बाहर लगे। सरकारी मशीनरी की चुस्ती को परखने कुंभ जाया जा सकता है और यह देखने भी कि कैसे समाज का आभिजात्य वर्ग वहां वैसे ही स्नान करता है जैसे कि आम कहे जाने वाले लोग। श्रद्धा जहां समाजवादी हो जाती है, वह स्थान है कुंभ। कुंभ जाता हूं तो ठहरता मेला क्षेत्र में बने खेमों में ही हूं। एक बार बाहर भी ठहरना पड़ा तो बीच-बीच में फिर मेला क्षेत्र जा पहुंचा। वहां रुकने का सबसे बड़ा लाभ और आनंद यही है कि जब मन चाहा, रात-बिरात उठे और मेले में शामिल हो गए। न सवारी का झंझट और न इस बात का कि अमुक स्थल से आगे पुलिस जाने नहीं देगी। मेले में तो सबको पैदल चलना है तो आप भी चलिए। मैं भी चलूं, गोकुल की चाची और राकेश की बुआ भी पैदल चलें।
कुंभ फिलासफी है, आध्यात्म है, स्कूल है। कुंभ को समझने के लिए जरूरी है कि हमारे पास पर्यटक का उत्साह हो। तभी हम कुंभ के भीतर उतर सकेंगे। मैंने जो देखा और महसूस किया, २८ साल के अपने पत्रकारिता के कॅरियर में वैसा आयोजन दूसरा नहीं मिलता जो एक साथ कई प्रकार की शिक्षाएं दे सके। धर्म, समाज, प्रशासन सब कुछ आपके सामने परत दर परत खुलता चलता है। २०१३ के पूर्ण कुंभ में कोरिया के एक यात्री से मैंने पूछ लिया कि आप इतनी दूर से यहां क्या करने आये हैं। वह बोला, मैंने कुंभ के बारे में पढ़ा था पर वि·ाास नहीं कर पाता था। इसलिए आया क्योंकि अपनी आंखों देखना चाहता था कि कैसे करोड़ों लोग केवल एक नदी में नहाने के लिए दूर-दूर से आकर जमा हो जाते हैं। एक कोरियाई की इस जिज्ञासा के पीछे जाएं तो कुंभ में आम आदमी की ताकत और श्रद्धा का आभास मिलता है। उसकी सामान्य व्याख्या देश के गहरे संस्कारों का प्रमाण है। सोच कर देखें कि लोग क्या करने आते हैं कुंभ। वे आये, नहाये और गंगा का पानी भरकर साथ ले गए। जिन्हें गंगा या संगम नहीं मिला, वे श्रद्धा के वशीभूत होकर यमुना में ही स्नान कर लौट जाते हैं। गंगा का पानी मटमैला हो गया है तो भी उन्हें कोई आपत्ति नहीं। इस नहाने में क्या आनंद मिल जाता है जो करोड़ों लोग धक्के खाते हुए चले आते हैं। कुंभ का असल दृश्य और शक्ति आम आदमी की यही आस्था है। उसे आश्रमों से कोई लेना देना नहीं, अखाड़ों से कोई मतलब नहीं। वह तो केवल नहाने आया। नहाया और तट पर ही बैठकर घर से लायी पूड़ी-आलू जीमा और वापसी की राह पकड़ी। बस, हो गया उसका कुंभ। इतने भर से वह प्रसन्न और गदगद। इतने भर के लिए वह अपनी बूढ़ी मां को साथ लाया, अपने पिता को सहारा देकर लाया। मां बाप को लगा कि बेटे ने कुंभ नहला दिया तो बेटे होने का अपना धर्म निभा दिया।
एक दृश्य मुझे कभी नहीं भूलता। २००२ के पूर्ण कुंभ में किसी शाही स्नान का दिन था। जूना अखाड़े को स्नान करना था और उनकी चाक चौबंद व्यवस्था के लिए प्रशासन सिर के बल हुआ जा रहा था। नगा साधुओं का स्नान दृश्य समारोह जैसा होता है। भव्य और नयनाभिराम। अपने निश्चित समय पर टोलियों में नगा साधू निकले। सुरक्षा के लिए रस्सियों की बैरीकेडिंग की गई थी और मार्ग के दोनों ओर साधुओं के दर्शनों के लिए मनुष्यों की लंबी कतारें थीं। जयकारों के बीच साधु चल रहे थे। उनका अन्तिम साधु निकला ही था कि एक श्रद्धालु रस्सियों के नीचे से निकल कर सड़क पर जा पहुंचा। जिस रास्ते से चलकर साधुओं का दल गया था, उसने वहां की मिट्टी उठायी और अपने गमछे में बांध ली। चरण रज लेना मैंने सुना बहुत बार था, प्रत्यक्ष तभी देखा। मैं विस्मित और अभिभूत था श्रद्धा का यह निर्दाेष रूप देखकर। मैंने सोचा क्या किया होगा इस भक्त ने उस मिट्टी का। क्या इसने जाकर मिट्टी को अपने पूजागृह में रखा होगा। क्या इसने वह मिट्टी प्रसाद स्वरूप घर के सदस्यों के माथे पर टीके की तरह लगायी होगी। उस भोले भगत की पवित्र भावना के आगे मैं नतमस्तक था।
यह चमत्कार ही है कि बिना किसी निमंत्रण के लाखों लोग कुंभ का पुण्य कमाने चले आते हैं। आज तो मीडिया है, सोशल मीडिया है लेकिन कल्पना करें उस समय की जब यह सब कुछ नहीं था और लोग केवल पंचांग देखकर गणना करते और चले आते स्नान का पुण्य लेने। कुंभ असाधारण आयोजन है लेकिन, इतने वर्षाें से वहां जाते हुए मुझे यह लगता है कि इतने लोगों की जुटान का सार्थक लाभ समाज को मिलना चाहिए। पुराने समय में कुंभ ही था जिसमें देश के दूरस्थ क्षेत्रों के व्यापारी, किसान, सैनिक, विद्वान एक-दूसरे से मिलते, विचार विनिमय करते और अपने यहां की कृषि, व्यापार और ऐसी ही अन्य जानकारियों की अदला-बदली करते। संतों में शास्त्रार्थ होता जिसे सुनकर श्रोताओं का ज्ञान बढ़ता। आधुनिक दौर में इन बातों की भले ही जरूरत न हो पर ऐसे बहुत से विषय हैं जो सामूहिक चर्चा मांगते हैं। क्या ऐसा नहीं हो सकता कि संत समाज कुंभ के अवसर का उपयोग लोगों को बालिका विवाह, छुआछूत, कन्या भ्रूण जांच, दहेज प्रथा, महिला हिंसा, भ्रष्टाचार, धार्मिक भेदभाव, बढ़ती जनसंख्या और अनैतिकता के विरुद्ध जागरूक करने में करे। क्या ऐसा नहीं हो सकता कि इतनी बड़ी भीड़ वहां से लौटते समय पर्यावरण बचाने, किसानों से प्रेम करना सीखने और अन्न बचाने के उपाय सीख कर आए। बहुत से लोग स्नान करके कुंभ से लौट लेते हैं लेकिन बहुत से ऐसे भी हैं जो कुछ घंटे या एक रात किसी आश्रम में रुककर संतों के प्रवचन सुनते हैं। कुंभ सरकारी नहीं सामाजिक आयोजन है और उसका बेहतर व समयानुकूल उपयोग भी समाज को ही सोचना होगा। भारतीय परम्परा और विचारों का जगमगाता दीप है कुंभ और इसका प्रकाश यूं ही सदियों तक समाज को आलोकित करता रहे, यही हम सबकी कामना और प्रयास होना चाहिए।

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