ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
शूल
01-Aug-2016 12:00 AM 1180     

मैंने फूलों को भी
काँटों से प्यार करते देखा है
चुपचाप बातें करते देखा है
रात की अमराइयों में
सोये थे दोनों चुपचाप
सुबह देखा तो पत्ती-पत्ती
बिखरी पड़ी थी
मेरी विकलता पर कह रही थी
धैर्य धर ओ संसारी।


मैत्री है कंटक से मेरी
है नहीं कोई हेराफेरी
एक दिन और रहती शाख पर
तोड़ लेता फिर भी हाथ किसी का
कुचल देता सूंघकर
पर इसकी नुकीली धार में
क्या दोष है इसका
मेरे स्निग्ध सौरभ को इसने जब भी दुलारा
ये बेचारा हर बार हारा
हम महकते हैं एक पहचान लेकर
ये सिसकते हैं अपमान लेकर
आँखें होती हैं सजल
मिल नहीं पाते हम एक पल
चाह अन्तर में लिये हम भी भटकते
भावनाओं के सपन हमको हर बार छलते
विवश हैं हम क्या करें
इस निष्ठुर जग को क्या कहें
करते विलग हमें हमारी डालियों से
मौन हो हम संताप सहते।

हमें इन काँटों से बिधना
बिंधकर बिछ जाना बुरा नहीं लगता
नृशंस लगते हैं
मानवता का ढोंग रचने वालों के वे हाथ
जो क्षण भर में ही अपने स्वार्थ के लिए
हमें चीरकर रख देते हैं।

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