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शिक्षा व्यवस्था के शेष प्रश्न
01-Dec-2017 11:14 AM 3141     

शिक्षा का प्रश्न इतना महत्वपूर्ण है कि सरकार कोई भी आये देश और समाज के हित में इससे बच नहीं सकती। एक खबिरया चैनल भी इन प्रश्नों से जूझ रहा है। कुछ वाजिव् चिताऐं भी सामने आयी हैं जिसमें सबसे ज्यादा तवज्जों इस बात को दी गयी है कि हजारों पद देश भर के विश्वविद्यालयों में खाली पड़े हैं और संविदा या तदर्थ आधार पर नियुक्त शिक्षकों को बहुत कम वेतन दिया जा रहा है। ऐसे में "गुरू कैसे बना सकते हैं विश्व गुरू" की लय सबका ध्यान खींच रही है।
पहली बात तो यह है कि यह सब रातोंरात नहीं हुआ है। पिछले तीन दशक या कहें उदारीकरण की शुरूआत सबसे पहले शिक्षा, बीमा, बैंक जैसे क्षेत्रों में हुई और तदर्थ नौकरियों शिक्षा मित्र, गुरूजी जैसे नामों की शुरुआत भी। विश्व बैंक और दूसरे पश्चिमी सलाहकारों की अगुआई में। कहने की जरूरत नहीं कि हर रंग की सरकार केन्द्र और राज्यों में इस बीच रही है। इसके खिलाफ बातें तो चुपके-चुपके होती रही हैं लेकिन न तब और न अब सड़कों पर जनता या बुद्धिजीवी कभी नहीं उतरे कि आईआईटी, एम्स, आईआईएम जैसे संस्थानों में शिक्षकों के पचास प्रतिशत पद खाली क्यों पड़े हुए हैं? विद्यार्थियों के जातिगत कोटा की एक भी सीट इधर-उधर हो जाए तो सड़कों पर खून बहने लगता है लेकिन इतने महत्वपूर्ण संस्थानों में पढ़ा कौन रहा है, उनकी योग्यता कितनी है इस प्रश्न पर हमेशा चुप्पी रहती है। विशेषकर बुद्धिजीवियों के बीच। क्यों कि उनके बच्चों को तो देश के ही अच्छे कॉलेजों में जगह मिल ही जायेगी। वरना विदेश तो है ही पहली प्राथमिकता इन अमीरों की।
यही कारण है कि इस बार की विश्व रैंकिंग में फिर इंडियन इंस्टीट्यूट और सांइस, बेंगलोर समेत सभी आईआईटी कुछ पायदान और नीचे गिरे हैं। अच्छी स्थिति में तो पहले भी नहीं थे लेकिन जब पड़ोसी चीन में अकादमिक स्तर लगातार बेहतर और दुनिया के अब्बल संस्थानों को चुनौती दे रहा हो तो हमें भी तुरंत ध्यान देने की जरूरत है। विशेषकर तब जब हमारे पास दुनिया की सबसे नौजवान आबादी है।
गिरावट का एक मुख्य कारण जिससे बचकर सभी निकल रहे हैं वह है शिक्षकों की भर्ती प्रक्रिया। भारतीय विश्वविद्यालय में तो शिक्षकों की भर्ती से आसान कोई नौकरी नहीं है। बस सांठ-गांठ होनी चाहिए। पहले कॉलिज के नम्बरों में हेराफेरी करके और फिर नियुक्ति में। न यूजीसी कुछ कर सकती है न सरकारें। यही कारण है कि इस पेशे में सबसे ज्यादा भाई-भतीजा, बहू, बेटी आजादी के बाद से ही काबिज हैं। पत्रकारिता और न्यायालय भी इससे बहुत अछूती नहीं है। शायद इसीलिए कॉलेज भर्ती के इस प्रश्न से यथासंभव बचने की कोशिश होती है, देशभर में हजारों कोर्ट केस भर्ती के इन मसलों पर लंबित हैं। उत्तर प्रदेश के विश्व विद्यालयों में लगभग पचास प्राचार्यों की नियुक्ति को हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने भ्रष्टाचार के ऐसे आरोपों के मद्देनजर रद्द किया है। लेकिन किसी भी सरकार की नींद अभी भी नहीं टूटी। पूर्व केबिनेट सेक्रटरी सुब्राह्मणियम समिति ने भी अपनी सिफारिशों में सबसे ऊपर भर्ती में सुधार, पारदर्शिता, ईमानदारी के लिए संघ लोक सेवा आयोग जैसे बोर्ड बनाने की बात कही थी लेकिन सरकार, विपक्ष और विश्व विद्यालय में सभी राजनैतिक पार्टियों के जेवी संगठन सभी चुप हैं।
उत्तर प्रदेश से एक और अच्छीे खबर आयी है कि प्रांतीय सिविल सेवा इंटरव्यू के नम्बर 200 से घटाकर 100 कर दिए हैं जिससे कि इंटरव्यू के नाम पर होने वाली धंधली कम से कम हो। केन्द्र सरकार ने तो सभी पदों पर इंटरव्यूज खत्म करके सराहनीय काम किया ही है। इसी संदर्भ में ध्यान जाता है एक खबरिया चैनल के शिक्षा विमर्श पर जिस पर बहुत लंबी चौड़ी बातें हुई हैं लेकिन भर्ती के प्रश्न को अब तक नहीं छुआ है।
जब शिक्षक ही ऐसे होंगे तो कैसे सुधरेगा शोध शिक्षा का स्तर? क्या ऐसे अयोग्य शिक्षकों को जनता का पेट काट कर मोटी-मोटी लाखों की तनख्वाहें दी जानी चाहिए? क्यों दिल्ली विश्व विद्यालय/कॉलिज सहित हर कॉलिज के क्लास रूम खाली हैं और विद्यार्थी उसी समय लाखों की फीस देकर मुकर्जी नगर, करोल बाग के कोचिंग सेंटरों में पढ़ रहे हैं। कोचिंग की एक-एक क्लास में तीन-तीन सौ तक की संख्या। क्या शिक्षकों समेत सरकारी कर्मचारियों को बड़ी-बड़ी तनख्वाहें, सुविधाएं, स्थायी कर देने से संविधान में लिखा समाजवाद आ जाएगा? शिक्षक भी क्या लोक सेवक नहीं हैं जब उसे सरकार के आला अफसरों की तर्ज पर लाखों में तनख्वाह मिलती है? फिर उसे क्यों भर्ती की वस्तु-निष्ठ लिखित परीक्षा, गोपनीय रिपोर्ट, शोध की अनिवार्यता, समय पालन से एतराज है। भर्ती प्रक्रिया की इसी सांठ-गांठ पर एक न्यायाधीश की टिप्पणी थी कि सांसद और लोक सेवक वेतन, सुविधाओं की होड़ में संगठित गिरोह में बदल चुके हैं।
अध्ययन, अध्यापन शोध में अपनी भाषाओं से परहेज और अंग्रेजी के आतंक को भी नजरअंदाज करने की ऐसी प्रवृत्ति हावी है कि समस्याओं पर चोट की नौबत ही नहीं आती। सभी गिरोह जानते समझते इसे विमर्श के केन्द्र में लाने से बचते हैं। क्या दुनिया के शीर्ष संस्थान पराई भाषा में अध्ययन-अध्यापन करते हैं? गौर कीजिये जैसे-जैसे अंग्रेजी हमारी शिक्षा व्यवस्था में हावी हो रही है उसी अनुपात में दुनिया भर में हम और नीचे गिर रहे हैं। क्या इस पर कभी कोई बहस कोई भी कर रहा है? इसी तरह बढ़ती आबादी का प्रश्न भी इनकी आंखों से वोट बैंक की राजनीति से सदा ओझल रहता है। आप पश्चिमी देशों से शिक्षक-विद्यार्थी अनुपात से लेकर ग्रेडिंग, सतत मूल्यांकन, परीक्षा, प्रयोगशाला सेमेस्टर जैसी कितनी बातें अपनी शिक्षा प्रणाली में शामिल करते हैं लेकिन शिक्षक की योग्यता, भर्ती के प्रश्न को उसी अंदाज में करते आ रहे हैं, जैसे किसी कबीले के सरदार की तैनाती या पंसारी की दुकान पर हेल्पर की नियुक्ति। दूसरी अन्य बातों के साथ-साथ इन शेष प्रश्नों को छुए बिना शिक्षा व्यवस्था में सुधार असंभव है।
जब दुनिया एक गांव में तब्दील हो गयी है तो दुनिया की उन्नत शिक्षा व्यवस्थाओं से सीखने में कोई हर्ज नहीं है। अच्छी और उन्नत शिक्षा का पैमाना उनके शोध, नई जानकारियां और छात्रों की संतुष्टि का मिला जुला रस हो सकता है और इस पैमाने पर अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, सिंगापुर, इंग्लैड, जर्मन और दूसरे यूरोपीय देश दुनिया के छात्रों को आकर्षित कर रहे हैं। यहां तक की इनकी टूटती, जर्जर अर्थव्यवस्था के लिए भी यह रामबाण साबित हो रहा है। बावजूद इस सबके, शिक्षकों के पद वहां भी संविदा या ठेके पर ही हैं। लेकिन बहुत सम्मानजनक, स्पष्ट शर्तों पर जिससे प्राध्यापकों का मानसिक स्तर, प्राध्यापकीय कौशल भी आगे बढ़े और शिक्षा का स्तर भी। शोध पत्रों की अनिवार्यता है तो उन्हें जांचने वाली व्यवस्था भी सही काम कर रही है। जबकि हमारे यहां हर कदम संदिग्ध है, हेरा-फेरी का शिकार है। ठेके पर रखे शिक्षक बेरोजगारी के चलते सबसे सस्ता प्राणी है। पूरी तरह कॉलिज मालिकों की कृपा पर निर्भर। कॉलिज की, चमचमाती बिÏल्डग और उसे मान्यता दिलाने में तो करोड़ों का खर्चा कर दिया, शिक्षक, लाइब्रेरी के लिए पैसा नहीं है। देश की बढ़ती जनसंख्य उनके लिए पैसा उगाहने और डिग्री बांटने के धंधे का पर्याय है। यदि सम्मानजनक मानक और नियम लागू हो तो स्थाई शिक्षक का विकल्प भी मिल सकता है।
अमेरिका के शिक्षकों से तुलना करें तो क्या हमारे शिक्षक 360 डिग्री मूल्यांकन के लिए सहमत हैं? यानि कि उनके पढ़ाने और अन्य कामों पर छात्रों आदि की फीडबैक और उसके आधार पर उन्हें आगे पढ़ाने और वेतन का अवसर। जब हम उस युग में प्रवेश कर चुके हैं जब ओला, उबेर या टैक्सीे के ड्रायवर और अन्य सेवाओं के आकलन फीडबैक उनकी गुणवत्ता निरंतरता के लिए जरूरी है तो शिक्षकों के हर सेमिस्टर में मूल्यांकन से परहेज क्यों? शोध और दूसरे पक्षों को जांचने के लिए भी ऐसी स्वायत्त विश्वसनीय संस्थानों की जरूरत है जिनके बूते शिक्षक और शिक्षण संस्थान सिर ऊंचा करके चल सकें। अमेरिका आदि देशों में तो टीचर-शॉपिंग की भी शुरुआत हो चुकी है जहां शिक्षक की काविलियित, शोधपत्र आदि के आधार पर छात्र ऑन लाइन दुनिया के शिक्षक विशेष की मांग करते हैं। जाहिर है ऐसे में शिक्षक अपना मेहनताना अपने काम के आधार पर लेगा, किसी बनी बनाई लीक पर नहीं।
पिछले तीन वर्षों में एक नये मिजाज की सरकार आने के बाद संस्थानों के निर्माण और विध्वंस की बातें बढ़े जोर शोर से हर मंच पर की जाती है। लव्वों लुबाव उनका यह कि प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने संस्थानों को बड़े ईमानदारी, पारदर्शिता से बनाया या बनने दिया और उनमें अब मनमर्जी से नियुक्ति की जा रही है। यह आधा सच है। राजनैतिक हस्तक्षेप या नियमों को सुविधानुसार उतना ही तोड़ा-मोड़ा जा रहा है जितना पहले। अन्तर कुछ विचारधारात्मक जरूर है। आइए सिर्फ विश्व विद्यालय नाम के संस्थानों पर ही ध्यान देते हैं। क्या यह अचानक है कि जवाहर लाल नेहरू विश्व विद्यालय के हिन्दी के दिग्गज प्रोफेसर-आलोचक कवियों की बेटियां-दामाद सभी नियुक्ति पा जायें? क्या कभी नौकरशाह के साथ ऐसा संभव है? कभी नगेन्द्र युग होता है, कभी नामबर युग तो इलाहाबाद के हर विभाग में भी ऐसा ही। लखनऊ, बनारस, अलीगढ़ जैसे केन्द्रीय विश्व विद्यालयों में वंश वैसे फैलते गए हैं जैसे मध्यकालीन भारत में सूबेदार, मनसबदार... मनमर्जी।
दिल्ली विश्व विद्यालय के कॉलिजों में विशेषकर हिन्दी विभाग में न जाने कितनी बहू, बेटियां, बहनें, दामाद अपने पिता, ससुर की बदौलत नौकरी पाई हुई हैं। कितनों को तो बाकायदा उस विषय में एमए, पीएचडी कराके मनमाफिक चयन प्रक्रिया से नौकरी दी गयी। पढ़ाने की क्या चुनौती होगी ऐसे शिक्षको में और क्या शोध की संभावना। शेष पिछले दिनों आरक्षण आदि की खींचतान ने पूरा कर दी। ऐसी मीनारें तो वक्त से पहले गिरनी ही थी। लेकिन देश की तो कई नौजवान पीढ़ियों को तो डुबा दिया। न्यायपालिका में भी यही हाल है। जब भी सुधारों की बात होती है नियुक्तियों में चाहे शिक्षा जगत में हो या न्यायपालिका में कॉलिजियम बदलने की इतना शोर मचाया जाता है कि यथास्थिति से भी बुरा वक्त् आ जाता है। पिछले दरवाजों से भर्ती के लिए मशहूर यह दोनों ही संस्थान अखिल भारतीय सेवा और ऐसी ही परीक्षा से सबसे ज्यादा डरते हैं।
कुछ सही मुद्दे हैं तो कुछ सनसनी के लिए। बार-बार शिक्षकों की कमी का रोना कोई नयी बात नहीं है। दशकों से यह बात हर कोने से रेखांकित की जा रही है। पी.साईंनाथ ने अपनी दर्जनों रिपोर्टों में बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश के स्कूलों, कॉलिजों की इनसे भी ज्यादा भयानक स्थितियों का बयान दिया है। जहां न शिक्षक आते न बच्चे। खाली स्कूल में कहीं बकरियां बंधी हैं तो कहीं इतिहास का प्राध्यापक एक साथ कानून, रसायन से लेकर पांच विभागों का अध्यक्ष है। सभी शिक्षकों को स्थायी नौकरी, अच्छे कमरे, क्लास रूम की शुभाकांक्षाओं से भरे इस विमर्श में इन शिक्षकों की जबावदेही, कामचोरी और सरेआम फुलटाइम राजनीति में लगे रहने की प्रवृत्ति को छुआ तक नहीं गया है। क्या कभी उन विद्यार्थियों, शोधार्थियों से भी पूछा है जो शुरुआत में रोज में क्लास में जाते हैं लेकिन जब स्थायी शिक्षक आते ही नहीं हैं तो कैसी निराशा से वापस लौटते हैं। शोध पत्र जैसे भी हों, वर्षों तक ये स्थायी शिक्षक न जांचते हैं, न उनका शोध में कोई योगदान होता है। वर्षों से सुन रहे हैं कि नब्बे प्रतिशत शोध में नकल है तो क्या इन प्रोफेसरों की कोई जिम्मेदारी नहीं बनती कि उसमें सुधार के कदम उठाये जाएँ।
जहाँ दुनिया की हर यूनिवर्सिटी, कॉलेज में नक़ल को रोकने के लिए नयी से नयी तकनीक इजाद की है, हम सांठ-गांठ के सहारे शिक्षा के धंधे में हैं। एक बार इन स्थायी शिक्षकों के घर के ठाठ-वाठ भी देख लेते तो पता चल जाता कि इनसे बेहतर आराम की नौकरी भारतीय संदर्भ में दुनिया भर में नहीं है। वास्तव में विश्व विद्यालय सहित हर सरकारी विभाग में स्थायी या कहे परमानेंट नौकरी ने ज्यादा नुकसान किया है। अतिरिक्त सिक्यूरिटी ने धीरे-धीरे उनमें निकम्मापन तो भर ही दिया है वे एक अवांछित गरूर के भी शिकार हैं।
तुलना तो अमेरिका से की गई है लेकिन क्या हमारे विश्व विद्यालय के शिक्षक उनके पांसग भी काम करते हैं? ऑस्ट्रेलिया, इंग्लैंड, अमेरिका से लेकर यूरोप भारत के लाखों बच्चों को शिक्षा के बेहतर सपने दिखाता हुआ अपनी ओर खींच रहा है, प्रचार-प्रसार में लगा है और शोध भी स्तरीय है। लेकिन हम साल दर साल और पायदान नीचे गिर रहे हैं। वहां भी तो संविदा या ठेके पर ही ज्यादातर शिक्षक हैं फिर उनके पास क्यों भीड़ है? हमारे ज्यादातर विश्व विद्यालय तो इतिहासकार रामचंद्र गुहा के शब्दों में विश्व विद्यालय कहलाने के हकदार भी नहीं है क्योंकि न वहां दुनिया के छात्र हैं न प्राध्यापक।

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