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शकुन्तला बहादुर
शकुन्तला बहादुर

अनंतचतुर्दशी 1934 को लखनऊ में जन्म. एम.ए. (संस्कृत) में सर्वाधिक अंकों का पदक हासिल किया. जर्मन एकेडेमिक एक्सचेंज सर्विस की फ़ेलोशिप पर जर्मनी में दो वर्षों तक शोधकार्य. ट¬ूबिंगेन वि·ाविद्यालय में ही संस्कृत एवं हिन्दी का अध्यापन. महिला महाविद्यालय लखनऊ में संस्कृत प्रवक्ता. विभागाध्यक्ष एवं प्रधानाचार्या के पदों पर कुल 36 वर्षों तक कार्य करते हुए सेवानिवृत्त. योरोप तथा अमेरिका की साहित्यिक-गोष्ठियों में भाग लेते हुए अनेक देशों का भ्रमण. विगत 15 वर्षों से कैलिफ़ोर्निया, अमेरिका में निवास. प्रकाशित कृतियाँ : "मृगतृष्णा' एवं "बिखरी पंखुरियाँ' - काव्यसंग्रह, "विविधा' - ललित निबन्ध-संग्रह, "सुधियों की लहरें' - लेख एवं संस्मरण.


स्मृति-चिह्न : मूर्तिकार वेर्नर
वह सौम्य मुखाकृति वाली महिला मुझसे बोलीं कि उनका घर उसी सड़क पर है जहाँ से मैं रोज़ आती-जाती हूँ। वह और उनके पति बहुत दिनों से मुझे देख रहे हैं। उन्होंने आग्रहपूर्वक कहा - "आप मेरे पति की प्रार्थना ठुकराएँ नहीं। अन्यथा उन्हें बहुत
अविस्मरणीय पड़ोसी
लम्बी अवधि से हम किसी से परिचित होकर भी कभी- कभी नितान्त अपरिचित ही रह जाते हैं किन्तु कभी- कभी हमारा अल्पकालीन परिचय भी शीघ्र ही आत्मीयता और घनिष्ठता में बदल जाता है। जब किसी व्यक्ति के गुण, स्वभाव अथवा व्यक्तित्व का कोई अन्य पक्ष मन को इतना प्रभ
ऋतुराज बसन्त
आ गया ऋतुराज बसन्त ।छा गया ऋतुराज बसन्त ।।हरित घेंघरी पीत चुनरिया  पहिन प्रकृति ने ली अँगड़ाईनव-समृद्धि पा विनत हुए तरुझूम उठी देखो अमराई।आज सुखद सुरभित सा क्यों ये मादक पवन बहा अति मन्द।।फ
कैलिफ़ोर्निया में छज्जू का चौबारा
सारी दुनिया देखी हमनेदेखा बल्ख़ बुख़ारे मेंपर वह बात नहीं पाईजो छज्जू के चौबारे में।कैलिफ़ोर्निया के कूपरटीनो नगर में प्रतिष्ठित छज्जू का चौबारा इस उक्ति को सार्थक करता है। ये बुज़ुर्गों का चमन है, जहाँ सभी को मिलता है अपनापन।
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