ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
सीता की खोज में लंका में हनुमान वाल्मीकि रामायण : आधुनिक विमर्श-19 अनुवाद : संजीव त्रिपाठी
01-Nov-2017 04:04 PM 3043     

रामायण की कहानी में वाल्मीकि का सबसे प्रशंसनीय और कलात्मक योगदान हनुमान का पात्र है। हनुमान पूर्ण विकसित मानव नहीं, अपितु वानर प्रजाति के थे। वानर एक ऐसी प्रजाति है जो मनुष्य नहीं है लेकिन मनुष्य के तुल्य बुद्धिमान और अंतज्र्ञानी है। संभवतः कवि एक बहुत ही उद्यमी और अत्यंत कर्तव्यनिष्ठ गुण सम्पन्नता की एक मिशाल प्रस्तुत करना चाहते हो, जो शायद मनुष्य प्रजाति में आसानी से उपलब्ध नहीं हो। मनुष्य अहम् के अनुसार बर्ताव करते हैं और अति कर्तव्यनिष्ठ भी अपने कर्तव्य पथ से विचलित हो जाता है, जब उसके आत्महित को खतरा होने की संभावना होती है। वाल्मीकि को ज्ञात था कि अहंकार मनुष्य के कार्य में रुकावट पैदा कर देता है। वाल्मीकि के हनुमान, दिये गये उद्देश्य को पूर्ण करने के लिए पूरी तरह समर्पित हैं। वाल्मीकि ने उन्हें पूर्ण कर्तव्यपरायणता और सच्ची निष्ठा के एक प्रारूप के रूप में प्रस्तुत किया है।
भारतीय सोच के अनुसार, वानर पूर्ण विकसित मनुष्य प्रजाति से पहले के प्राणी थे जो बोलने में पूरी तरह सक्षम थे। जैसा कि कहानी के पिछले लेखों में भी उल्लेखित किया गया है कि, वाल्मीकि एक तेजस्वी लोक में रहते थे जहाँ हर वस्तु में भावनायें और उन्हें व्यक्त करने की क्षमता थी। अलोकिल लोक की धारणा का प्रादुर्भाव भारत में इतिहास काल के पूर्व से माना जाता है। वाल्मीकि रामायण में वानरों को भाषायी संवाद से संपन्न बताया गया है। विशेषतः हनुमान तो अति विशिष्ट थे जो कई भाषाओं में संवाद कर सकते थे। बन्दर प्रजाति के करीब होने के कारण वानर लम्बी छलांग लगा सकते थे और पेड़ की डालियाँ पकड़कर वह एक पेड़ से दूसरे पर कूद सकते थे। हनुमान एक बहुत ही अच्छे वक्ता, विवेकपूर्ण, बुद्धिमान, बलवान और कर्तव्यनिष्ठ थे जो राम के कार्य के लिए समर्पित थे। वह रामजी के लिये अपने मन में संपूर्ण विश्वास भर लिये थे।
समुद्र पार कर जब हनुमान लंका पहुँचे तो वह वहाँ की सम्पन्नता और भव्यता देखकर आश्चर्यचकित रह गये। अपना अलग रूप का ध्यान रखते हुये हनुमान ने लंका में रात्रि में प्रवेश किया। पहले उन्होंने चाँदनी रात का आनंद उठाया और उसके पश्चात अपने उद्देश्य की खोज में आगे बढ़े। वह पहरेदारों को चकमा देकर गलियों और घरों में सीता की खोज के लिए निकल पड़े। आगे उन्होंने एक बहुत ही सुसज्जित मैदान देखा जिसके मध्य एक विशाल एवं भव्य महल था, जो कि लंका के राजा रावण का था। एक चौड़ी सुरक्षा खाई को पार कर वह महल के अन्दर पहुँचे। वहाँ उन्होंने आलीशान पुष्पक विमान देखा, जिसका जिक्र पिछले लेख में किया जा चुका है। हनुमान ने विमान का एक-एक कोना बड़ी ही उत्त्सुकता से देखा। विमान खाली था और उनको उसमें कोई नहीं मिला। अति उत्सुकता के कारण वह व्याकुल हो उठे।
"भूसे के ढेर में सुई ढूंढना" वाले मुहावरे को अक्सर उस समय उपयोग किया जाता है जब किसी एक छोटी-सी वस्तु को एक जैसी दिखने वाली वस्तुओं के बड़े ढेर में से ढूंढना हो। जीवित प्राणियों का भोजन को ढूंढना एक आम बात है लेकिन उसमें एक लगभग अनुमान होता है कि भोजन के रूप में क्या स्वीकार योग्य है। भोजन की एक वस्तु के अभाव में दूसरी का उपयोग किया जा सकता है, यदि किसी विशेष भोजन की वस्तु को पाने की खास चाहत न हो। बहुत ज्यादा विशेषताएँ कार्य को दुर्गम बना देती हैं। अपहरण किये हुये मनुष्य को ढूंढना तो और भी मुश्किल का कार्य है। बंधक बनाया हुआ व्यक्ति बंधक बनाने वाले के इशारों पर चलने के लिए मजबूर होता है, आदेश का पालन न करने का मतलब है अपनी जान से हाथ धोना। बंधक को ढूंढना और भी कठिन हो जाता है यदि ढूंढने वाले उसको पहचानते न हों और दूसरों के द्वारा बताये गये हुलिये या अन्य विवरणों के आधार पर ढूंढना हो।
खोजने वाला बहुत ही सतर्क और होशियार होना चाहिये। उसको किसी भी सुराग को छोड़ना नहीं चाहिये और साथ ही साथ किसी अंतिम निष्कर्ष तक पहुँचने से पहले सभी तथ्यों का गहराई से अध्ययन करना चाहिये। वाल्मीकि की शैली में हनुमान के द्वारा सीता की खोज एक बहुत ही रोचक नाटक है, जिसमें हनुमान अकेले ही एक अजनबी द्वीप में खोज के लिए निकल पड़ते है, जहाँ के सामाजिक रीति-रिवाज भी भिन्न हैं। विमान के आन्तरिक भाग को अच्छी देखकर हनुमान आगे एक लम्बे गलियारे से गुजरते हैं और आगे एक विशाल गुफानुमा दालान में पहुँचते हैं। वहाँ जमींन पर कई युवा महिलायें गहरी नींद में सो रही थीं। उनकी हालत और वस्त्रों को देखकर ऐसा लग रहा था कि वह थोड़े से नशे में हैं। वह बहुत ही थकी हुई लग रही थीं। सैकड़ों की संख्या में लोगों को देखकर हनुमान चिन्तित हो उठे और सोचने लगे कि, कहीं सीता ऐसी दयनीय स्थिति में तो नहीं फँस गई?
एक सुविचारों वाला व्यक्ति सदैव सकारात्मक सोचता है और अपने उद्देश्य की अहमियत को समझता है। हनुमान ने दिमाग में आये दुर्विचार को निकल दिया और अपने आप को समझाने लगे कि जहाँ तक वह जिस सीता के बारे में जानते हैं उसके अनुसार सीता अपने आप को ऐसी स्थिति में नहीं डालेगी। आगे बढ़े तो देखा कि और भी महिलायें जमीन पर पड़ी हुई हैं। बड़ी संख्या में महिलायों को अर्धनग्न अवस्था में देख वह स्तंभित थे। वह शर्म महसूस कर रहे थे और साथ ही अपने आप को अपराधी मान रहे थे कि दूसरों की निजता में हस्तक्षेप कर रहे हैं, पर वह अपने खोज के कार्य में केन्द्रित थे। आगे उन्होंने ओजस्वी मंदोदरी को देखा और उसको सीता समझने के उनके पास कुछ कारण थे। उन्होंने सोचा कि, क्या राम के विरह के बाद भी सीता ऐसी अवस्था में हो सकती है? हनुमान ने अपने आपको समझाया कि सीता सुंदर है परन्तु ऐसी अवस्था में, वंचित और उदास होगी। वह इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि सीता के लिये शानदार और मनोरंजन की जगह यहाँ नहीं है। उद्देश्य संबंधी विचार जीवन को कठिन बनाते हैं और हनुमान भी इसका अपवाद नहीं थे। उन्होंने एक बिस्तर पर विशालकाय रावण को पड़ा हुआ देखा। हनुमान ने पूरी व्यवस्था को समझने की कोशिश की। सभी जगह से तेज दुर्गन्ध आ रही थी। दुर्गन्ध अन्य सुगंधित वायु से मिश्रित होकर एक विशेष तीव्रता पैदा करा रही थी। अलग पात्रों में धीमी ज्योति में प्रज्ज्वलित दीप विभिन्न तरह के माँस को प्रदर्शित कर रहे थे। वातावरण अशोभनीय और असभ्य था। हनुमान के मन में नकारात्मक विचार आने लगे कि, क्या सीता की मृत्यु हो चुकी है? क्या यही आखिरी उम्मीद थी? मैं वापिस जाकर राम को क्या समाचार दूँगा? वह बड़ी उलझन में थे। उन्होंने हिम्मत जुटाई और निचले तलों पर भी सीता को ढूंढा। वहाँ अन्य स्त्रियाँ दिखीं पर हनुमान की कल्पना के हिसाब से उनमें से कोई भी सीता से मेल नहीं खाती थी। निराश होकर वह महल से बाहर खुले मैदान में चले गये।
सबसे समर्थ व्यक्ति भी अत्यंत निराशा के वातावरण में एकाकी अनुभव कर सकता है। आगे का रास्ता अत्यधिक चुनौती पूर्ण हो सकता है। हनुमान ने अपने आप को शांत किया और चिंतन करने लगे। उन्होंने प्रकृति के सौन्दर्य का अच्छी तरह दर्शन किया। वनों और पर्वतों की कई श्रेणियाँ देखीं। दूर से समुद्र को देखा। क्या सीता बरबाद हो चुकी है? क्या वह मर चुकी है? वह सन्देश वाहक के रूप में सन्देश को निर्धारित करना चाहते थे। नकारात्मक सन्देश कोई सन्देश नहीं है। उनके दिमाग में कई तरह के द्वन्द उठे। क्या मैं वापस चला जाऊँ या यहीं समाप्त हो जाऊँ? या फिर रावण को मार कर उसका सर बदले के रूप में राम को जाकर दे दूँ? तो कभी इसके विपरीत विचार भी आये जैसे राम की इस पर क्या प्रतिक्रिया होगी? क्या होगा अगर राम ने क्रोधित होकर सारी वानर जाति का विनाश कर दिया? हनुमान ने अपने आपको नकारात्मक विचारों से सावधान किया और उन्होंने ऐसा विचार किया कि मुझे अपनी सोच समझ से काम लेना चाहिये। "मुझे सीता को ढूँढ़ने के और प्रयास करना चाहिये।"
नकारात्मक विचारों से दूर हटकर सकारात्मकता विचारों को ध्यान में लाना एक परिवर्तन है। एक सदाचारी व्यक्ति आशावादी होता है। सकारात्मकता भविष्य के सदाचार के उत्सव के रूप में होती है। सच्चाई किसी के गहरे विश्वास से पैदा होती है और वह उसके उद्देश्य की पवित्रता पर निर्भर करती है। उद्देश्य निःस्वार्थ और सर्मपण के योग्य होना चाहिये। समर्पण से किया गया कार्य कभी व्यर्थ और फलहीन नहीं जाता। हो सकता है कि आगे का रास्ता साफ़ नज़र न आये और निराशा के बादल चारों तरफ घिरें हों लेकिन सदाचारी व्यक्ति अपने आप को सम्हाल कर रास्ते पर धैर्य से आगे बढ़ता जाता है। हनुमान ने मन ही मन राम, लक्ष्मण और सीता का ध्यान किया और उद्देश्य में सफल होने के लिए उनका आशीर्वाद लिया। भारतीय सोच के अनुसार, ब्रह्माण्ड वह सब जानता है जो हम नहीं जानते। हनुमान ने ब्रह्माण्ड चलाने वाली उस परम शक्ति से प्रार्थना की और कहा कि "मेरा रास्ता अनजान है, मुझे आशीर्वाद और आगे बढ़ने का साहस दो।" हनुमान ने अपनी हौसला अफजाई की और सकारात्मक सोच बनाये रखने की कोशिश की।
विचारों की गहनता और खोजी स्वभाव एक अच्छे कवि के लक्षण होते हैं। यदि मन शांत हो तो व्यक्ति चारों ओर की प्रकृति सुन्दरता और भव्यता का आनंद ले पाता है। रावण के महल से बाहर निकलकर कुछ दूर हनुमान को एक उद्याननुमा जगह दिखाई दी। उस समय वसंत ऋतु का मौसम था और हनुमान के अन्दर का कवि चारों ओर का प्राकृतिक नज़ारा देख मंत्रमुग्ध था। रंग-बिरंगे पत्ते, कई रंगों के अधखिले फूल और नई बहारों की ख़ुशबू हनुमान को अपनी जन्मस्थली याद दिलाने लगी। वह उद्यान अशोक के मध्यम ऊँचाई के और लाल रंग के फूलों से सजे पेड़ों की लंका की "अशोक वाटिका" थी।
यह सजा वन रावण के मनोरंजन का स्थान था। हनुमान ने पास जाकर देखा कि पानी के साफ़ और सुव्यवस्थित तालाब, तैरने सुन्दर स्थान न सभी बहुत ही सुझबूझ और कुशलता से बनाए गये थे। संध्याकाल होने के कारण प्रकाश कम था लेकिन चारों तरफ झिलमिलाहट दिखाई पड़ रही थी। हनुमान थोड़ा-सा विराम लेकर अच्छी तरह वहाँ के सौन्दर्य का आनंद लेना चाहते थे। उन्होंने शीशम के पेड़ की एक डाली पर बैठकर नज़ारे का आनंद लिया।
एक खोजी की सफलता उसकी महत्वाकांक्षी सोच पर निर्भर करती है। यह स्पष्ट नहीं है कि इच्छायें भी सच्ची या हानिकारक हो सकती है? बहुत से शास्त्र और ग्रन्थ अनियंत्रित इच्छाओं से सतर्क करने के लिए लिखे गये। अनियंत्रित इच्छा एक लोभ की तरह होती है और वह परेशानी की जड़ होती है। दूसरों की मदद करने की इच्छा तब पूरी हो सकती है जब किसी के पास उसको मूर्तरूप देने की क्षमता और योग्यता हो। इच्छा उसके परिणाम से निर्धारित नहीं की जा सकती है। जीवन के संकट या कठिन समय से गुजरते समय सभी को सोचने का अधिकार है। जो इच्छा सद्मार्ग पर चलते हुये सच्चे दिल से की जाती है तो ऐसा मानना है कि वह अवश्य पूरी होती है। बहुत कम ही मनुष्य सच्चे मन की गहराई समझ पाते हैं, अधिकांश समय तो वह यही समझते हैं कि सारी उपलब्धियाँ उनकी मेहनत और संसाधनों के कारण मिल रही हैं। हो सकता है कि समर्पण का भाव व्यक्ति के मन में अंतिम क्षणों में आता हो? ऐसे लोग बहुत कम होते हैं जो अपने जीवनकाल में ही समर्पण स्वीकार कर लेते हैं। हनुमान दूसरे समूह के लोगों में शामिल हैं और वह पौराणिक भारत के महापुरुषों में से अग्रणी हैं।
संध्या का समय होता जा रहा है। "हो सकता है सीता वाटिका में टहल रही हों? उन्हें वन बहुत पसंद है। वह इन तालाबों पर सुबह और शाम स्नान आदि के लिए जरूर आती होंगी! फूलों के पेड़ों की पत्तियाँ उस अलौकिक महिला के योग्य है। उसकी चाल धीमी और शरीर दुर्बल होगा!" हनुमान के मन में विचार आया कि यदि सीता जीवित होगी तो इस जगह को वह अपनी काँति से चमका देगी!

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