ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
सपनों को साकार करने का मिशन जारी है
01-Mar-2016 12:00 AM 2868     

भारत के पूर्व राष्ट्रपति डॉ. अब्दुल कलाम साहब कहते थे कि नई सोच का दुस्साहस दिखाओ। हमने भी अपनी सोच को नयी दिशा दी है। हमारी आँखों में भी सुनहरे सपने तैरते हैं, जो एक न एक दिन ज़रूर ही साकार होंगे।
मेरा जन्म झाँसी में हुआ। कॉलेज की पढ़ाई के बाद मैंने स्टेट बैंक ऑफ इंडिया में काम किया। मेरे पति डॉ. दिनेश मोर ग्वालियर में पैदा हुए। उन्होंने गजरा राजा मेडिकल कॉलेज से मेडिकल की डिग्री हासिल की। अस्सी के दशक में दिनेश को रेडियोलॉजिस्ट के पद पर काम करने के लिये त्रिनिडाड से ऑफर आया। हमने सोचा कि चलो काम भी देख लेंगे और घूमना भी हो जायेगा। और इस तरह त्रिनिडाड की हमारी पहली यात्रा प्रारंभ हुई। यह पहली यात्रा दो साल के लिये थी, लेकिन भारत में खुद का क्लीनिक खोलने के लिये हमें अभी काफी पैसे की ज़रूरत थी, लिहाजा त्रिनिडाड में कुछ समय और काम करते रहने का हमने फैसला किया। वक्त गुजरता गया और बाद में लगा कि इंडिया वापस तो जा नहीं पा रहे हैं तो क्यों न यहीं हॉस्पिटल खोल लिया जाये।
एक करोड़ तीस लाख की आबादी वाला त्रिनिदाद विकसित राष्ट्र है और यहां की राजधानी पोर्ट ऑफ स्पेन में हम लोगों ने कुछ मित्रों के साथ मिलकर अपने हॉस्पिटल की शुरूआत की। जैसे ही हमारा यह सपना पूरा हुआ हम इसे संजाने-संवारने में दिन-रात जुट गये। आज हमारे हॉस्पिटल में 80 बेड हैं, जिसमें ओपन हार्ट सर्जरी, कैंसर विंग, न्यूरो सर्जरी, लंग्स सर्जरी जैसे विशेषज्ञ विंग सफलतापूर्वक संचालित हो रहे हैं। हॉस्पिटल में कैंसर की विशेष देखभाल विंग है, जिसमें चौबीसों घंटे केयर की जाती है। थैरेपीज, एमआरआई की सुविधाएँ उच्च गुणवत्ता की यहां मौजूद हैं। हमने इतने सालों में लगभग तीस नर्सिंग स्टॉफ, टेक्नीशियन और डॉक्टर्स को भारत से बुलाकर यहाँ काम दिया, उनमें से कुछ स्टॉफ ट्रेंड होने के बाद दूसरी जगहों पर चले गये हैं।
त्रिनिडाड की कुल आबादी में चालीस फीसदी अफ्रीकी मूल के, चालीस फीसदी भारतीय तथा बीस फीसदी सम्मिलित प्रजाति के लोग रहते हैं। सालों से मेहनत करते हुए हमें जद्दोजहद के साथ ही जुनूनी भी होना पड़ा है। त्रिनिडाड में 170 साल पहले भारतीय मूल के लोग आये थे। वे आज कहते हैं कि त्रिनिडाड हमारी मदरलैंड है तो इंडिया हमारी ग्रांड मदरलैंड है। इन भारतीय मूल के लोगों की मूल भाषा भोजपुरी धीरे-धीरे खत्म हो गई है और अब वे सिर्फ त्रिनिडाड सलांक के साथ अंग्रेजी बोलते हैं। त्रिनिडाड की अर्थव्यवस्था में इनकी उल्लेखनीय भागीदारी है। ये हर तरह की व्यापारिक गतिविधियों में भागीदारी रखते हैं। दूसरी तरफ हमारे जैसे नये प्रवासी भारतीय हैं जो कामकाज की तलाश में यहाँ पहुँचे, उनकी संख्या कम है।
हम लोगों को यहाँ तक पहुँचने में बहुत संघर्ष और ऊँचे सपने देखने पड़े। हालांकि हम अब भी भारत में अपना क्लीनिक खोलने का सपना संजोये हुए हैं। इसे पूरा करने के लिये पिछले साल हमने दिल्ली, भोपाल आदि शहरों में इसकी सम्भावना टटोली है, लेकिन कामयाबी हमसे कुछ दूर रह गयी। भारत के किसी बड़े शहर में सुपर स्पेसिलिटी हॉस्पिटल खोलने का अब भी हमारा महत्वाकांक्षी सपना है, जिसे साकार करने के लिये हम हरेक सम्भावना की ओर सकारात्मक नजरिये से प्रयासरत हैं।

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