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सपने और सौदागर
01-Nov-2017 04:12 PM 3471     

मॉस्को से वापिस लौटते वक्त इस बार कबीर बहुत उदास था। बहुत कुछ बदल गया। नादिया अभी- अभी उसको एयरपोर्ट के अंदर तक छोड़ कर गई थी। जाते वक्त उसने कबीर को कस कर बाहों में लिया और मुँह चूमा। बिछुड़ते समय उसकी आंखों में एक अजीब उदासी थी। कबीर को लगा शायद यह उदासी किसी औरत-मर्द की मोहब्बत की नहीं बल्कि दो अच्छे दोस्तों के बिछुड़ने की है।
कबीर के कई दोस्त मॉस्को में रहते थे। वह उनको अक्सर याद करता और कई बार उड़कर जा मिलने का मन बनाता। मॉस्को में चाहे हालात बहुत बदल चुके थे पर उसको लगता, समय कितना भी बदला हो, मुश्किल के समय तो पता करना ही चाहिए?
भारत में रूस के बारे में अक्सर खबरें आती रहती थीं। जब से सोवियत यूनियन के टुकड़े हुए, दिन-ब-दिन वहां लोगों की हालात खराब होने की खबरें अक्सर प्रसारित होती रहती थीं। कुछ भारतीय जो वहां व्यवसाय के लिये गये थे, मॉफिया के डर से ही काँपते वापिस आ गए। खबरों की इन्तहा ये थी कि रूसी संसद पर चलती तोपें भी टीवी दिखा चुका था। अधजली संसद भी कई बार दिखाई गई थी। जब वो ऐसी खबरें सुनता तो डर जाता। पता नहीं क्या हो, रूस नहीं जाना। मॉफिया के लोग तो कमरे में घुस कर सामान और पैसे लूट ले जाते हैं। वहां जुर्म बहुत बढ़ गया है। पता नहीं कौन-कौन किसमें शामिल हो गया हो?
इस बार लंदन जाते समय उसने मॉस्को का वीजा लेने की कोशिश भी की पर डर की वजह से अंत में उसने अपना मन बदल लिया। पर जब उसने लंदन से नादीया को फोन किया तो नादीया ने बहुत जिद की तो वह उसके कहने पर मॉस्को रुकने के लिये मान गया।
वीजा लेकर उसने नादिया को फोन करके बताया। नादीया ने कहा, वह उसे एयरपोर्ट लेने तो आयेगी पर साथ ही उसने यह भी कहा कि अब उसके पास सरकारी कार नहीं है। वह बस में आएगी और वापिस आते समय टैक्सी कर उसे जहां जाना होगा, छोड़ देगी।
नादीया की यह भी इच्छा थी कि वो नादिया की माँ के फ्लैट में ही ठहरे और जो होटल का खर्च हो, उसे वह नादीया की माँ को तोहफे के तौर पर दे दे।
कबीर ने सोचा कि होटल की बजाय नादिया की माँ का घर अच्छा है, उनका साथ भी रहेगा और वहां नादीया से मिलना भी आसान होगा। पिछली बार जब वो एक दिन के लिये मॉस्को ठहरा था, तब भी नादिया उसको अपनी माँ के घर ही ले गई थी।
कबीर पहले अक्सर सोवियत यूनियन आया करता था और नादिया भी एक बार भारत आई थी। हिंदी की छात्रा होने का उसे गर्व था और नादिया की माँ उसे संपूर्ण भारतीय बनाने का सपना देखा करती थी। उसने नादिया को भरतनाट्यम सिखलाया। उसे भारतीय कलाकारों, इतिहास-कारों, फिल्मकारों के बारे में अच्छी जानकारी थी। पर जब नादिया ने मॉस्को युनिवर्सिटी से डिग्री की तो उसके मन में एक सपना था। भारतीय संस्कृति से मोहब्बत का सपना। भारतीय सौन्दर्य से जुड़ने का सपना। और यही सपना लेकर वो एक बार भारत आई भी थी, पर दस दिन के सफर के बाद अधप्यासी वापिस चली गई कि फिर आयेगी।
पर देखते ही देखते सोवियत संघ की रूसी फैडरेशन बन गई। सारी अंतर्राष्ट्रीय नीतियों में बदलाव आ गया। भारतीय भाषाओं से संबंधित सभी संस्थाएं या तो बंद हो गईं या उनमें बदलाव आ गया।
रातों रात सारी उम्र की पढ़ाई बेकार हो गई। लगता था कि जिंदगी भर के सपने एक रात में चूर हो गये हों।
तब वो माँ-बेटी अकेली रहती थीं। मर्दों का बोलबाला बढ़ने लगा तो नादिया ने भी शादी कर ली और अब नादीया अपने पति के साथ रहती थी।
नादिया ने अपने पति को अपनी पुरानी जिंदगी के बारे में सब कुछ बताया हुआ था।
उसने कबीर के साथ अपने संबंधों के बारे में भी बताया था। यह भी बताया था कि कबीर भारत में अपने परिवार के साथ रहता है और खुश है।
उसका पति उसे समझता और बेइन्तहा प्यार करता था।
जब फोन बंद हुआ तो वो फिर सोच में पड़ गया। बहुत कुछ बदल गया है। कहीं नादिया भी न बदल गई हो। कहीं वो खुद भी मॉफिया के लोगों के साथ ना मिली हुई हो और कबीर के आने की खबर मॉफिया को दे दे। मॉफिया के लोग तो आजकल घरों में घुस कर लूट ले जाते हैं।
ऐसी खबरें उसे लंदन में भी कई लोगों ने दी थी। लंदन के कई लोगों को मॉस्को में कैसे लूटा गया था, इसकी भी कई कहानियां उसे सुनने को मिलीं। कबीर फिर परेशान हो गया। उसके पास तीन दिन बाकी थे। उसने कोशिश की कि सीधे दिल्ली की टिकट मिल जाए। पर उन तीन दिनों में से दो दिन दिल्ली की उड़ान ही नहीं थी। इसलिए उसे मॉस्को ठहरना ही था।
उसने दो दिन और दो रातें इसी परेशानी में काटीं। चलने से पहले उसने कुछ कीमती सामान लंदन में ही रख दिया और बचे हुए पैसों के ट्रैवलर चैक बनवाये और कुछ नगदी ले जहाज़ में चढ़ मॉस्को पहुंच गया। नादिया हवाई अड्डे पर उसका इंतज़ार कर रही थी। दोनों पूरी गर्मजोशी से मिले और टैक्सी लेकर चल पड़े।
कबीर के मन का डर फिर बढ़ने लगा। ज्यों-ज्यों टैक्सी शहर की तरफ बढ़ रही थी, वो हर व्यक्ति को शक और भय से देखता।
आखिर वो घर पहुंच गये। थोड़ी देर में नादिया की माँ आ गई। इस बार माँ के साथ नादिया का पिता भी था। उसे देखते ही कबीर काँप सा गया। सोचा ये ज़रूर मॉफिया का आदमी होगा। पिछली बार तो नादिया का पिता यहां नहीं था।
अंदर से डरते हुए उसने उनकी बातों में साथ दिया। नादीया की माँ ने खाने के बारे में पूछा और फिर वह खाना पकाने में व्यस्त हो गई।
नादिया, उसका पिता और कबीर एक ही कमरे में बैठे थे। नादिया का पिता मि. वलेरा, लंबा और पक्की हड्डी के शरीर वाला व्यक्ति था। थोड़ी देर बाद जब वो उठ कर दूसरे कमरे में गया तो कबीर ने नादिया से पूछा, "जब पिछली बार मैं यहां आया था, तब तो तुम्हारे पिता यहां नहीं थे?"
"मेरी माँ ने दूसरी शादी की है।" नादिया ने बताया।
भय में उलझा वो सोच रहा था कि उसके दिल की बात कैसे निकाले? उनका क्या प्लान है? उसे डर था कि ये लोग कहीं रात को सोने के समय ही कुछ गड़बड़ न कर दें।
थोड़ी देर बाद ही मि. वलेरा उस कमरे में वापिस आया और कबीर को सिगरेट पूछा। कबीर के इंकार करने पर वह स्वयं घर के छज्जे पर चला गया और सिगरेट पीने लगा। वो और नादिया अंदर बैठे रहे। कुछ देर बाद मि. वलेरा ने कबीर को छज्जे पर बुलाया और उसे बाहर का दृश्य दिखाने लगा। बाहर ठंडी हवा चल रही थी। जब नादीया भी उसके पीछे छज्जे पर आ खड़ी हुई तो वह पल भर के लिये सहम गया। यह फ्लैट काफी ऊपर की मंजिल पर था। उसने नीचे चलती गाड़ियों की ओर देखा तो एक पल के लिये ठिठक गया और मारे डर के अंदर आ गया।
उसको याद आया कि उसके पास स्कॉच की एक बोतल है जो उसने ड्यूटी-फ्री से खरीदी थी। उसने नादिया से पूछा कि क्या वह उसके पिता को यह स्कॉच भेंट कर सकता है? वह बहुत खुश हुई। स्कॉच की बोतल देखते ही मि. वलेरा की आंखों में एक गहरी सोच आई और फिर एक खास चमक। वो बहुत खुश हुआ और खुशी में झूमने लगा। थोड़ी देर बाद खाना शुरू हुआ तो स्कॉच भी खोली गई। कबीर के आने की खुशी में नादिया और उसकी माँ ने वाईन मंगवाई थी। उन्होंने वाइन के पैग से उसका साथ दिया। वलेरा और कबीर कभी स्कॉच पीते और कभी वोदका के पैग पर टोस्ट पेश करते बीच-बीच में वलेरा कहता कि कबीर की हंसी असली रशियनों जैसी है। कभी-कभी वो उठकर उसे गले लगा लेता।
वो जो भी बातें कहते, नादिया कबीर के लिए अनुवाद करती जाती। खाने की मेज़ पर बैठे वहां की गरीबी, लूटमार, माफिया, राजनीति तथा और बहुत से विषयों पर बातें होती रहीं।
धीरे-धीरे कबीर का डर कम होने लगा।
खाना खत्म हुआ तो आधी रात हो चुकी थी। नादिया को अपने घर जाना था।
उसकी माँ और बाप जब आधी रात को उसे मैट्रो स्टेशन पर छोड़ने जाने लगे तो चलते वक्त उन्होंने बताया, "आजकल रात को खतरा होता है। लड़की को इस वक्त अकेले नहीं जाना चाहिए। इसलिये वो उसे छोड़ कर जल्द वापिस आ रहे हैं।"
कबीर फिर डर गया कि अब ही कहीं कोई चाल न हो? इन लोगों के जाने के बाद कहीं माफिया के लोग ना आ जायें? पर उनके साथ बिताये समय और बातचीत ने यह डर जल्दी ही उसके मन से निकाल दिया और वह कमरे की चटखनी लगा कर लेट गया।
सुबह आँख खुली तो नादिया का फोन था। वह प्रोग्राम पूछ रही थी।
नादिया ने यह भी बताया कि उसने उसी दिन शाम को एक बैले देखने के लिये दो टिकटें भी मंगवाई हैं। थोड़ी देर में वह खुद भी आ गई। इतने समय में कबीर नादिया की माँ से रूसी भाषा सीखता रहा और पिता वोदका के साथ टोस्ट पेश करता रहा।
कबीर ने कुछ डॉलर नादिया की माँ को दिये और घर से बाहर आकर नादिया और वह शहर की ओर चल दिये। यह वही सड़क थी, जिससे वे कल आये थे, जो हवाई अड्डे से शहर की ओर जाती है। पर आज उसे कल की भांति हरेक व्यक्ति से उतना डर नहीं लग रहा था।
उन्होंने मैट्रो पकड़ी और क्रैमलिन देखने चले गये। नादिया ने वहाँ की सारी चर्चें कबीर को दिखाईं। वह हरेक चर्च का इतिहास बताती रही। कबीर को वह उस चर्च में भी ले गई, जो रूसी इंकलाब से पहले वहां के बादशाह जार का सरकारी चर्च था और वहां भी ले गई जो अब सरकारी चर्च है।
बाद में वे दोनों लाल चौक पर आ गये और घूमते हुए लेनिन मसोलीयम के आगे से गुजरे। नादिया ने बताया कि लेनिन का शरीर अभी भी वहीं रखा है। सारे स्टोर, म्यूजियम, पुस्तकालय सब वैसे ही हैं। कुछ के नाम बदल गये हैं और स्टोरों में सामान कुछ और तरह का बिकने लगा है।
होटल रोशिया भी पास ही था, जहाँ कबीर ठहरा करता था। नादिया ने बताया कि वह भी वैसे ही चल रहा है। पर गरीबी बहुत बढ़ गयी है। फैक्ट्रियां बंद पड़ी हैं। चलाने के लिये पैसा नहीं है। जिनके पास साधन थे, वे कारोबार में चले गये। माफिया के साथ मिलकर और अमीर होते जा रहे हैं। आम व्यक्ति को केवल पेट भरने जितना काम भी मुश्किल से मिल पाता है। रूबल की कीमत बहुत कम हो गई है। एक अमेरिकन डॉलर के कई हजार रूबल सरकारी तौर पर मिलते हैं, ब्लैक में तो और भी ज्यादा। नाजायज़ काम बहुत बढ़ गये हैं। जो लोग धंधा करते हैं, वे माफिए को चढ़ावा चढ़ाते हैं और फिर बिना रोक टोक के काम चलाते हैं। लड़कियों के जिस्म फरोशी का धंधा भी खूब ज़ोरों पर है। थोड़ा बहुत तो पहले भी चलता था, पर इतने बड़े पैमाने पर नहीं। अब स्कूलों की लड़कियां 15-16 साल की उम्र में ही इस धंधे में पड़ जाती हैं। शुरू में तो वे ऐशपरस्ती की वजह से इस धंधे में आती थीं पर अब तो सरवाईवल के लिये वहां हैं।
क्रैमलिन में ही मॉस्को स्टेट थियेटर की तरफ से चाईकोवस्की के संगीत पर कंपोज किया "स्वैन लेक" नाम का बैले होना था। सारा हाल फुल। कोई सीट खाली नहीं थी। वह इस बात पर भी हैरान हुआ। गरीबी और अमीरी की इंतहा देख उसे भारत याद आ गया। पर अपने शौक कायम थे।
नादिया ने पहले ही दो सीटें अच्छी जगह पर ले रखी थीं। नादिया ने सारे बैले की तफसील सीट पर रखे पंफलेट से पढ़ कर कबीर को पहले ही सुना दी। फिर जब बैले शुरू हुआ, वह उसकी एक-एक बात साथ-साथ बताती गई। इस बैले में कई मुल्कों के नृत्य भी शामिल किये गये थे। जब किसी और देश का नृत्य आता तो एकदम से फूल कर बताती की यह नेपाली नृत्य है, यह फ्रेंच है, यह जार्जियन या कोई और। कहानी एक राजकुमार की थी, जिसको समुद्र पर नाचती एक लड़की से इश्क हो जाता है। पर वह लड़की किसी जादूगर के शिकंजे में है। जब भी वे दोनों मिलते, जादूगर अपने जादू से उनको एक-दूसरे से जुदा कर देता। वे दोनों एक-दूसरे के बिना तड़पते। राजकुमार कभी अपनी माँ के पास मदद मांगने जाता, कभी वह स्वयं ही युद्ध करने के लिये जाता। पर जीत हासिल न होती तो वह एक-दूसरे से मिलने के लिये तड़पते। ईश्वर से प्रार्थना करते अंत में वह राजकुमार उस जादूगर के पंख काटने में कामयाब हो जाता है। उसे अपनी महबूबा मिल जाती है। दोनों खूब खुश होते हैं और देर तक नाचते हुए आसमान में उडारियां लगाते और ज़मीन पर उतरते हैं।
बैले देखते हुए नादिया बीच-बीच में भावुक हो जाती और कबीर के कंधे पर सिर रख देती। उसके खुले केश और मुस्कुराता चेहरा कबीर को अच्छा लगता। कभी वो एक-दूसरे का हाथ पकड़ लेते। जो लड़के-लड़कियां बैले में नाच रहे थे वो रबड़ के गुड्डे-गुड्डियां लग रहे थे। जब कोई रोमांचक संगीत बजता तो नादिया अपने दोनो हाथ खोल कर बैठ जाती। बाद में उसने बताया कि इस तरह हाथ करने से परमात्मा के पास दुआ जाती है कि इस संगीत के द्वारा मेरी आत्मा में रोमांटिक इच्छा और बढ़े। यह संगीत मेरी रोमांटिक इच्छा को और प्रबल करे। परमात्मा से यही दुआ कर रही थी। कहते हुए उसने कबीर के कंधे पर सिर रख दिया। नादिया के लंबे बाल कबीर की पीठ से नीचे तक बिखर गए। कबीर के शरीर में एक अजीब अहसास हुआ और उसने नादिया का मुंह चूम लिया। इस पर नादिया ने भी कबीर को चूम लिया।
इस बार यह पहला मौका था जब उन्होंने एक-दूसरे को चूमा।
बैले चलता रहा और वो दोनों एक दूसरे के साथ जुड़ कर बैठे रहे, कभी एक दूसरे का हाथ पकड़ लेते और कभी चूम लेते।
बैले खत्म होने के बाद वे बाहर घूमने लगे।
दोनों एक-दूसरे के इर्द-गिर्द बाहें डाल दुनिया से बेखबर चल रहे थे, बीच-बीच में वो भारत की बातें छेड़ देता। कभी वो रूस की बातें बताती।
चलते-चलते वे मॉस्को की मशहूर नदी के पुल पर पहुंच गए। होटल रशिया के पीछे इस पुल से यदि आकाश की तरफ देखो तो लगता है मानो आकाश को हाथ लगाया जा सकता है।
यह वही पुल था, जहाँ वे 12-15 साल पहले पहली बार आये थे। नादिया तब मॉस्को युनिवर्सिटी से डिग्री कर रही थी और खाली वक्त में काम करने का उसे शौक था तथा जेब खर्च बनाने का लालच भी। तब वो अनुवादक का काम कर लेती थी। पंद्रह साल पहले जब कबीर सोवियत संघ आया था तो नादिया उसके साथ इंटरप्रेटर के तौर पर काम कर रही थी। नादिया इंटरप्रेटर तो बढ़िया थी ही पर उसको भारत के बारे में बहुत कुछ जानकारी प्राप्त करने की इच्छा थी, इसलिए भी वो कबीर के साथ काम करके खुश थी। जब भी फुर्सत मिलती वो भारत के बारे में जिक्र छेड़ लेती। कैसा देश है? कैसे लोग हैं? रहन-सहन कैसा है? साहित्य, कला और पता नहीं क्या कुछ। जो भी सूझता, वो जानना चाहती थी।
कबीर ने जब पहले दिन नादिया को मॉस्को घुमाने को कहा तो वह उसे जहाँ ले गयी उस जगह का नाम लवर स्ट्रीट था। और वहां वे दोनों एक-दूसरे के बहुत करीब आ गये थे। उसी रात वे इस नदी के पुल पर एक-दूसरे में समाये खड़े थे और ऊपर से मूसलाधार बरसात हो रही थी। दोनों ने अपनी पूरी ऊँची आवाज में कहा था, "रब्बा! तेरी मेहर का अंत नहीं। हमारी जिंदगी का सपना--यह देश, इस देश के इतिहास का यह पन्ना--यह लाल चौक और यह बहता हुआ दरिया! इस पर खड़े हम तेरी हाज़री भर रहे हैं। और तुम हमारी खुशी को परवान कर बारिश का संदेश दे रहे हो, सलाम है रब्बा, तुम्हें लाल सलाम।"
उसके बाद वे दोनों कई बार इस पुल पर आए और जब भी वे यहां आते बरसात ज़रूर होती।
आज फिर वे इस पुल पर जा रहे थे। लेकिन इस बार उनके वहां पहुंचने पर ऐसा न हुआ।
शायद बहुत कुछ बदल गया था।
अगले दिन वह और दोस्तों से मिला। मॉस्को युनिवर्सिटी गया। एक प्रोफेसर दोस्त के घर खाने पर गया। वो अक्सर भारत आते रहते थे। उनकी पत्नी के साथ जब सोवियत यूनियन टूटने की तफसील से बात हुई बात हुई तो वह बहुत उदास थी। उसने तो कबीर को यह भी सीधे-सीधे कह दिया, "पहले रूस की बारी थी और वही सौदागर बाद में भारत पहुंचने वाले हैं। हम तो सह ही रहे हैं आप अपना ख्याल करो।"
कबीर ऊपर से तो हँस पड़ा पर अंदर से और डर गया कि जो हम भोग रहे हैं कि क्या जो इससे भी बदतर वक्त आने वाला है? प्रोफेसर दोस्त चाहता था कि कबीर उनके ही पास रहे। पर कबीर नादिया के पास वापिस जाना चाहता था। प्रोफेसर उसे छोड़ आया।
नादिया और उसकी माँ इंतज़ार कर रहीं थी। वलेरा वोदका लेने गया हुआ था।
वो आया तो खाना शुरू हुआ। खूब सारे टोस्ट पेश किये गए। बहुत सारे रैजोलूशन भी पास किए उन्होंने। पहले अक्सर ऐसे टोस्ट हुकूमत के नाम पर पेश होते थे, पर इस बार सब ईश्वर के नाम पर पेश हुए। ईश्वर ही मालिक। वह ही वारिस!
कबीर को लगा, नादिया की माँ, कबीर और नादिया के रिश्ते के बारे में तो जानती है, पर उसने शायद इस बारे में मि. वलेरा को नहीं बताया था। उसके चेहरे पर आते हर भाव से कबीर को लगता कि जैसे वो उसके और नादिया के रिश्ते के बारे में तलाश कर रहा हो। पर कबीर और नादिया बहुत कुछ आँखों-आँखों में ही कह जाते।
खाने की टेबल पर बैठे नादिया बता रही थी कि वहां राजनीतिक उथल-पुथल तो हमेशा होती रही है। पर पिछले दो-तीन लीडरों के समय में यह सब कुछ ऐसे बदल गया जैसे कोई सपना हो। आज़ादी की बात तो हम लोग पहले भी करते थे पर ऐसी आज़ादी किसी ने नहीं सोची थी कि बदले में रोटी भी नसीब न हो। चाहे वो यह कह नहीं रही थी, पर जो कुछ भी खाने की मेज पर पड़ा था, वो कबीर के आने की वजह से और उसके पैसे से लाया गया था। नहीं तो यह सबकुछ तो उनके लिये सपना ही रह गया था। बातें करती करती नादिया उदास हो जाती। नादिया की माँ अपने सपने सुना रही थी। वो बता रही थी कि जब नादिया पैदा हुई, तब भारत और सोवियत संघ के संबंध बहुत गहरे थे। लोगों में बड़ी मोहब्बत थी। तब उसने अपनी बेटी को हिंदुस्तानी तालीम देने का फैसला किया। वो पीएचडी कर रही थी कि अचानक एक हवा का झोंका आया और सबकुछ रातों-रात बदल गया। जिंदगी भर का पढ़ा बेकार हो गया। तमाम सपने चूर-चूर हो गए।
अब वो चर्च जाने लगी थी। ईश्वर का नाम लेना शुरू कर दिया था उन्होंने। अब उनका हुकूमत से ज्यादा ईश्वर पर विश्वास और बढ़ने लगा था।
कबीर सोच रहा था कि यहां बेशुमार लोग और भी होंगे, जिनके सपने इसी तरह टूटे होंगे।
कबीर ने नादिया को भारत में आकर बसने की सलाह दी तो उसकी माँ ने बताया कि उनके पूर्वजों की कब्रें यहां हैं। वो अक्सर वहां जाकर दीया जला कर आती है। भारत या किसी भी और देश से आकर ऐसा संभव नहीं और ऐसा करना अपने पूर्वजों से मुँह मोड़ने वाली बात होगी। यह अपनों के साथ गद्दारी होगी। यह बात कहती हुई वह भावुक हो गई।
कमरे में कुछ देर के लिये फिर खामोशी छा गई।
मौके की नज़ाकत को देखते हुए मि. वलेरा ने रूसी भाषा में एक गीत गाना शुरू कर दिया। वह इतना मगन होकर गा रहा था कि कबीर को आज वो कल वाले मिस्टर वलेरा से अलग लगा। जैसे कल वह सोच रहा था कि कहीं वो माफिये का आदमी न हो, पर आज जैसे एक सख्त हड्डी वाले आदमी के अंदर एक भावुक इंसान उतर आया हो।
बाद में सभी उस गीत में शामिल हो गये और नाचने लगे।
शायद ऐसा मौका उनको बहुत देर बाद मिला था। सब भावुक भी थे और खुश भी। जब सब थक गए तो नादिया की माँ और उसका पिता दूसरे कमरे में सोने के लिये चले गए।
अब कबीर और नादिया कमरे में अकेले थे। कबीर ने नादिया से पूछा, "आज उन्होंने तुम्हें छोड़ने नहीं जाना?"
"नहीं, आज मुझे यहीं सोना है। तुम्हारे साथ।" नादिया ने बिना किसी भाव के यह बात कह दी। कबीर ने कुछ बोले बिना उसके होंठ चूम लिए। दोनों सोफे पर बैठे, एक-दूसरे की ओर देखते, आँखों में आँखें डाल एक दूसरे को पढ़ने की कोशिश करते। फिर एक-दूसरे को चूम लेते। कुछ ही देर में वे एक-दूसरे में समाये हुए एक दूसरे को चूम रहे थे।
अचानक नादिया ने चुप्पी तोड़ी, "अगर आज मैं यहां न सोऊं तो तुम्हें कैसा लगेगा?"
"शट-अप! यह समय है ऐसी बात करने का? हमें तो आज अपनी जुदाई के वक्त का ब्याज भी एक-दूसरे से वसूलना है।" उसने नादिया को अपनी बाँहों में कस लिया। पर फिर वह नादिया को छोड़ कुछ सोचने लगा और कुछ समय के बाद बोला, "मैं ये उम्मीद तो ज़रूर लेकर आया था कि हम इकट्ठे रहेंगे और अगर तुम मेरे साथ यहां न रही तो मुझे मायूसी होगी।" कबीर ने अपने मन की बात कही।
"पर मैं अपनी नज़रों से खुद ही गिर जाऊंगी। अपनी इज्जत खुद नहीं कर पाऊँगी। मुझे तुम्हारे प्यार पर नाज़ है। मेरा पति भी यह जानता है। उसको यह भी पता है कि मैं इस वक्त तुम्हारे साथ हूँ। लेकिन अगर मैं तुम्हारे साथ सोई तो मैं उसके साथ भी आँख नहीं मिला सकूंगी। अपनी नज़रों से खुद ही गिर जाऊंगी! पर मैं तुम्हें भी मायूस नहीं देख सकती। शायद तुम्हारे में मैने वह शख्स पाया है जो मेरे अवचेतन में कहीं बैठा हो। इसलिये मैं तुम्हारे साथ रहकर अपने आप को पूरा महसूस करती हूँ। तुम मुझे कभी गैर लगे ही नहीं।" कहते-कहते वो कबीर के साथ चिपक गई और उसका माथा, गाल, होंठ चूमते-चूमते रोती रही।
कबीर ने नादिया को कस कर आलिंगन में लिया, फिर कुछ देर चुप रहा और बाद में कहा, "चल केश संवार ले और तैयार हो जा। आज तुझे मैट्रो स्टेशन पर मैं खुद छोड़ कर आता हूँ।"
शायद नादिया कबीर से इस तरह कि उम्मीद नहीं रखती थी। पर इस बात ने उसे झंझोड़ कर रख दिया। जैसे उसके दिल से एक भारी बोझ उतर गया हो, दोनों ने एक दूसरे को कस कर आलिंगन में लिया, चूमा और फिर तैयार होकर मैट्रो की तरफ चल पड़े।
नादिया मैट्रो में बैठी आखिर तक हाथ हिलाती रही और कबीर उसे देखता रहा।
जब वो आँखों से ओझल हुई तो कबीर वापिस पैदल ही चल पड़ा।
यह वही सड़क थी जिस पर वो पहले दिन आया था और हर इंसान से डर रहा था। पर आज उसे किसी से डर नहीं लग रहा था। वह सबकी ओर देख मुस्कुरा उन्हें विश करता घर की ओर चलता रहा।
घर पहुंच कर उसने अपने कमरे की चिटखनी लगाई और लेट गया।
जब वह सुबह उठा तो नादिया फोन पर अपनी माँ से बात कर रही थी। उसकी माँ हैरान थी कि रात नादिया यहाँ नहीं रही? अकेली स्टेशन गई थी? शायद ऐसे और कई सवाल वो नादिया से फोन पर पूछ रही थी। पता नहीं, नादिया ने क्या जवाब दिया। पर फोन के पश्चात नादिया की माँ काफी देर तक कबीर के साथ बोली नहीं। कुछ सोचती रही।
जब नादिया आई तो उसकी आँखों में चमक थी और चेहरे पर आत्मविश्वास।
वे तैयार होकर बाहर के लिये चल पड़े। आज वे धर्म, ज्ञान और आपसी रिश्तों की बुनियाद की बातें करते रहे।
किसी एक स्टेशन से मैट्रो पकड़ वे गोर्की पार्क चले गए। पहले वह पार्क के किनारे पानी की और मुंह कर बैठे रहे। फिर पानी में चलती किश्तियों में सैर करते रहे। गोर्की पार्क के अंदर आकर एक दूसरे का हाथ पकड़ कर बैठ गए। जब करीब हुए तो एक दूसरे को चूम लिया। दोनों के बदन का सेक एक दूसरे को लगा। कबीर का दिल किया, वो नादिया को कहे कि, जो फैसला हमनें कल रात किया वो गलत था। हम इंसान हैं। इतनी दूर आकर भी वे एक-दूसरे को पूरी तरह मिल नहीं सके तो क्या फायदा? पर वो हिम्मत न कर सका। उसे खुद को लगा कि यह कितनी घिनौनी और कमीनी बात है। नादिया उसे प्यार करती है। वो सब कुछ को तैयार थी, पर उसने अपने मन की बात उसके सामने रखी तो उन्होंने हम-बिस्तरी का ख्याल अपनी मर्ज़ी से छोड़ा था।
अब नादिया भारतीय दर्शन की बातें करने लगी। फिर वह उठ कर उसी नदी के पुल पर आ गए।
आज कबीर नादिया को बहुत ध्यान से देख रहा था। आज वह उसे बहुत सुंदर लग रही थी। कबीर, नादिया की खूबसूरती का ज़िक्र करने लगा तो वह सुनती रही। आखिर में केवल धन्यवाद ही कहा। शायद वह जानती थी कि वाकई वह बहुत खूबसूरत है। इस बात की उसे खुशी तो थी पर घमण्ड नहीं।
बातें करते आधी रात हो चुकी थी। समय का पता ही न चला। वो घबराई। जल्दी से घर चलने को कहा। माँ को फोन किया। वह भी घबराई हुई थी। कबीर को स्टेशन पर लेने आ गई। नादिया वहीं से दूसरी गाड़ी पकड़ अपने घर चली गई।
कबीर और नादिया की माँ घर की तरफ चल दिए। रास्ते में नादिया की माँ उससे पूछ रही थी कि उन्होंने सारा दिन क्या किया? शायद नादिया से वह फोन पर ये बात पूछ भी चुकी थी। जैसे कबीर से केवल बात करने के लिये ही बात कर रही हो। उसने यह भी पूछा कि रात को नादिया वापिस क्यों चली गई। तो कबीर ने बताया कि यह कुछ निजी मामला है, विस्तार से बताऊंगा कभी।
"खाक बताएगा? मैं अपनी लड़की को जिस्म-फरोशी के धंधे में नहीं डालना चाहती थी। तेरे साथ उसके रिश्ते के बारे में मुझे पता है। मैंने सोचा तुम्हारे साथ उसके संबंध बने रहें, तुम इसी तरह हमारे यहाँ आते-जाते रहो, तो हमारा घर भी चलता रहेगा। पर अब खाक चलेगा? तुम्हें क्या लालच? अब तुम उसे केवल ख्वाबों में ही मोहब्बत करोगे। मिलने थोड़ी आओगे? मुझे तो अपने चूल्हे की आग भी बुझती नजर आ रही है!" वह यह कहते-कहते रो पड़ी।
कबीर ने उसे चुप कराने की कोशिश की तो वह चुप भी हो गई।
घर पहुंच कर कबीर को सारी रात नींद न आई।
वह इस देश में बहुत बार आया था। उसने इस देश को पूरी बुलंदियों को छूते देखा था। दुनिया इस देश का लोहा मानती थी। संसार के आर्थिक और राजनीतिक फैसले इस देश की मर्जी के बिना कभी नहीं हो सकते थे। ये लोग, जिनकी मोहब्बत और आज़ादी के अफसाने अब तक अक्सर सुनते थे, आज इतने मोहताज हो गये हैं? वह समझता था कि सोवियत यूनियन टूटने का सबसे बड़ा नुकसान भारत को हुआ। पर उसे लगा, वह गलत है। उसने महसूस किया जैसे इतिहास की तमाम पुस्तकें उसके ऊपर आ गिरी हों और उनके पन्ने उसके दिमाग में उलट-पलट रहे हों और जब इतिहास की पुस्तकें उल्ट-पुलट होती हैं तो कितना खून बहता है। कितने अरमान टूटते हैं। कितने सपनों का कत्ल होता है और सौदागर कितनी लाशों का व्यापार करते हैं।
फिर कुछ समय वह चुपचाप बैठा रहा। उसकी तिलमिलाहट बढ़ती गई। उसका मन किया कि वह उड़ कर जाये और इन सौदागरों के पंख काट दे। पर उसे लगा कि वह राजकुमार थोड़े ही है? और यह कोई परी कथा तो है नहीं, हकीकत है। ऐतिहासिक हकीकत, जो इतिहास के पन्नों ने तब तो नहीं पहचानी जब वक्त था और गया वक्त कभी लौट कर तो आता नहीं।
कबीर ने फैसला किया कि जितने भी डॉलर, ट्रेवलर चैक व तोहफे उसके पास हैं, चुपचाप वह वहीं उसी कमरे में रख जायेगा, जहाँ रात को सोया करता था। ट्रैवल चैक वह नादिया के नाम भर देगा। कुछ डॉलर नादिया की माँ को देने के लिये ही अपने पास रखेगा, जिससे उसको कोई शक न हो।
अगली सुबह नादिया के आने से पहले वह अपना काम कर चुका था। उसने सारा कुछ ऐसे किया जिसका पता उसके जाने के बाद ही चले।
प्रोफेसर ने कार भेज दी जो कबीर को हवाई अड्डे तक छोड़ने के लिये काफी थी। वह नादिया के माँ-बाप से गले मिला। कुछ डॉलर उसने नादिया की माँ को दिये। उसकी आँखें बता रही थी जैसे वो अंदर से दुआएं दे रही हो। जैसे कह रही हो, "बेटा फिर भी आना!"
नादिया और कबीर हवाई अड्डे पर बैठे एक-दूसरे को देखते, आँखों में कुछ कहते और एक-दूसरे को चूम लेते। नादिया कस्टम के बाद अंदर वाले कमरे में जाने में कामयाब हो गई। चैक-इन के बाद जब उसने कबीर को अपने आलिंगन में लिया तो उसका शरीर काँप रहा था। पता नहीं यह एक-दूसरे से बिछुड़ने या किसी अधूरी इच्छा के कारण था? कबीर को लगा नादिया ने दूर जाना है। रात काफी हो गई थी। उसने नादिया को जाने के लिये कहा।
अंत में नादिया अपनी गीली आँखें लिये दूर तक हाथ हिलाती कबीर की आँखों से ओझल हो गई।
कबीर जहाज़ में बैठा बहुत उदास था। बहुत कुछ बदल गया। सब कुछ बदल गया।
उसे नादिया का सुनाया वह लतीफा याद आया। कहती उनके देश में आज कल यह लतीफा बहुत मशहूर है।
जब एक फॅमिली दूसरी फॅमिली से मिलती है तो एक-दूसरे से कुछ इस तरह बातचीत होती है :
"कैसे हो?"
"सब ठीक है!"
"काम-काज कैसा?"
"बस गुज़ारे के लिये मिल जाता है!"
"और खाना?"
"बस तीन मर्तबा खा लेते है!"
"अरे! बहुत रिच हो? हफ्ते में तीन बार खा लेते हो?"
यह लतीफा याद आते ही कबीर को हँसी आने की जगह आँसू निकल आते हैं।

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