ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
संचार-क्रांति के कालखंड में हिन्दी
01-Sep-2017 10:52 AM 2122     

हिन्दी के प्रचार प्रसार में पिछले लगभग एक-डेढ़ दशक में जितना परिवर्तन देखने को मिला है, उससे एक तरफ़ निश्चित ही सुखद अहसास हुआ है, दूसरी तरफ़ कुछ ऐसे संकेत भी मिल रहे हैं जिनसे भाषा की अस्मिता में कुछ प्रहार होते से दिखाई देते हैं। यहाँ मैं हिन्दी के शास्त्रीय पक्ष या समीक्षाओं की बात नहीं करूँगा, केवल हिन्दी पर हो रहे छोटे-छोटे प्रयोगों के सन्दर्भ में आम हिन्दी के बोलचाल, लेखन-पठन और प्रचलन की ओर ध्यान दिलाना चाहूँगा जिससे आम आदमी, विशेष तौर पर युवा वर्ग प्रभावित होता नज़र आ रहा है।
अच्छी हिन्दी कैसी हो? भारत सरकार के केन्द्रीय हिन्दी निदेशालय ने मानकीकरण सम्बन्धी अनुदेश प्रकाशित किये हैं, जो निश्चित ही ध्यान देने योग्य हैं। प्रसिद्ध विद्वान देवर्षि कलानाथ शास्त्री ने अपनी पुस्तक "मानक हिन्दी का स्वरूप" (राधाकृष्ण प्रकाशन) में आज प्रयुक्त हो रही हिन्दी की अशुद्धियों, असंगतियों और विद्रूपताओं के सुधार के लिए अत्यंत उपयोगी सुझाव दिए हैं। कुछ लोग मानते हैं कि हिन्दी में केवल हिन्दी या संस्कृत के शब्दों का ही प्रयोग किया जाना चाहिए। कुछ लोग संस्कृतनिष्ठ या क्लिष्ट शब्दों के प्रयोग से प्रभावित होते दिखाई देते हैं, किन्तु उस शब्दावली से संप्रेषणीयता किस हद तक संभव है यह विवादास्पद है। उदाहरण के लिए एक व्यंग्य में यह दर्शाया गया था कि कुछ विद्वानों की अत्यंत "परिनिष्ठित" भाषा-शैली श्रोता को प्रभावित तो करती है, पर उसका कितना अर्थ वह निकाल सकता है यह वही जाने। जैसे - "जुगुप्सित चिंतन का तथ्य सत्यापन की स्पष्टता की संभावनाओं को नहीं नकारता, किन्तु लब्धप्रतिष्ठ वैयक्तिक ऊर्जा लिंगमूलक सूक्ष्मतर आभ्यंतरिक मनोभावनाओं का प्रदर्श होती है। इसीलिए विप्रयोगात्मक भावानुवाद प्रत्यक्ष सम्वेदनाओं का प्रतिरूप नहीं बन पाता, क्योंकि चिन्तनात्मक संश्लिष्टता उन सभी कालगत व्यापकताओं की क्षुद्रवृत्तआवृत्ति ही है। विश्वानुभूतिसम्प्रसूत है बुद्धि की प्रामाणिकता और संज्ञानधारा से। यही उसका दिक्कालातीत स्वरूप है और प्रतिचैतन्य की स्वरूपभूता प्रकृति है।" भले ही यह व्यंग्य की बात हो, पर यदि वास्तव में ऐसी शब्दावली ही प्रयुक्त की जाए तो यह हिन्दी के लिए कितना फ़ायदेमंद साबित होगा, यह विचारणीय है।
मैं समझता हूँ भाषा की संप्रेषणीयता और उसके प्रवाह को बनाये रखने या उसे बेहतर करने के लिए अन्य भाषाओं, खासकर प्रचलित उर्दू या अंग्रेज़ी के शब्दों का प्रयोग यदि होता है, तो इसमें कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए। देखा जाय तो "हिन्दी" शब्द ही अरबी का है। कम्प्यूटर, प्रोग्राम, मदरबोर्ड, रेल, इंजेक्शन, मीडिया, आदि ऐसे अनेक शब्द हैं जो अब लगभग पूर्णतः हिन्दी में प्रयुक्त होने लगे हैं। इनका अनुवाद किया भी नहीं जाना चाहिए। "स्पंज" शब्द के लिए "छिद्रिष्ठ" का प्रयोग शायद ही कभी संभव हो, हालाँकि "टीवी" के लिए दूरदर्शन भी लगातार प्रयोग के कारण चल पड़ा है। अंग्रेज़ी की समृद्धि का एक कारण यह भी रहा है कि इसके लेखकों ने अनेक देशों की प्रचलित शब्दावली का हू-ब-हू या अनुवाद के द्वारा समावेश किया। विज्ञान के क्षेत्र में तो यह स्पष्ट दिखाई देता है।
अच्छी हिन्दी लिखने के लिए यदि अच्छे शब्द प्रयुक्त हों तो यह प्रशंसनीय है, किन्तु संस्कृतनिष्ठ शब्दावली को सही लिखना भी उतना ही आवश्यक है। अनेक जगह, यहाँ तक कि हिन्दी विकिपीडिया जैसे "विश्वकोश" में भी बहुधा कई ऐसे शब्दों को अशुद्ध लिखा जाता है जिनमें विसर्ग लगे हों। नियम के अनुसार यदि विसर्ग के आगे स्वर (अ, आ आदि) हो, तब संधि करने में विसर्ग "र" में बदल जाता है, जैसे दुःअआचरण उ दुराचरण, पुनःअआवृत्ति उ पुनरावृत्ति इत्यादि। यदि विसर्ग के आगे किसी वर्ग (जैसे क, च, ट, त, प, आदि) के तृतीय, चतुर्थ और पंचम वर्ण, जैसे ध, भ, या न आदि अक्षर हों, तब संधि में विसर्ग "ओ" हो जाएगा। जैसे तपःअअधन उ तपोधन, मनःअअवांछित उ मनोवांछित आदि। इसी तरह यदि विसर्ग के आगे किसी वर्ग के प्रथम और द्वितीय वर्ण, जैसे क, प, फ, आदि हों, तब विसर्ग "र" नहीं बनेगा, विसर्ग ही रहेगा। उदाहरणार्थ, पुनःअप्रवेश उ पुनःप्रवेश (पुनप्र्रवेश नहीं), पुनःअप्रकाशन उ पुनःप्रकाशन (पुनप्र्रकाशन नहीं), अन्तःअ करण उ अन्तःकरण (अंतर्करण नहीं)। यहाँ नमःअशिवाय उ नमो शिवाय नहीं होगा, नमः शिवाय ही रहेगा।    
कई बार यह भी देखने में आता है कि किसी संस्कृत वाक्य या सूक्ति को भी संस्कृत जैसा लगवाने के लिए उसमें जबरन विसर्ग लगा दिया जाता है, जैसे "अतिथि देवो भव" को अशुद्ध "अतिथि देवो भवः" लिख दिया जाता है।    
निस्संदेह, संचार क्रांति के इस युग में हिन्दी को एक नया उत्साह और आयाम मिला है, जब युवा वर्ग जो पहले अंग्रेज़ी की तरफ़ ही झुका नज़र आता था, अब हिन्दी का प्रयोग बहुतायत से करने लगा है। हालाँकि ऐसा परिवर्तन या "फैशन स्टेटमेंट" के तौर पर अधिक है, बजाय हिन्दी के प्रेम के। इसके लिए काफ़ी हद तक स्मार्ट फ़ोन, आई-पैड और कंप्यूटर जैसे नए उपकरणों को श्रेय जाता है। इस दिशा में कंप्यूटर और फ़ोन कंपनियों द्वारा नए-नए सॉफ्टवेयर और एप्लीकेशंस से भी मदद मिली है और अचानक इस क्षेत्र में एक क्रांति-सी आई दिखाई देती है। ऐसी गृहणियां भी, जो अंग्रेज़ी के डर से कभी कंप्यूटर के की-बोर्ड से खौफ़ खाती थीं, अब स्मार्टफ़ोन के जरिये रोमन या अंग्रेज़ी के अक्षरों में लिखी हिन्दी में निस्संकोच वार्तालाप करने लगी हैं और सन्देश (मैसेजेज़) भेजने लगी हैं जैसे "द्यद्वथ्र् त्त्न्र्ठ्ठ त्त्ठ्ठद्ध द्धठ्ठण्ड्ढ ण्दृ?"। युवा वर्ग तो अब भले ही सांकेतिक या संक्षिप्त भाषा में सही, पर हिन्दी में रुचि लेने लगा है और एस।एम।एस। और व्हाट्सएप के माध्यम से अत्यंत सक्रिय हो गया है। यह अच्छा संकेत है। पर आज यदि एक बड़ी जनसंख्या से बारहखड़ी "क" से लेकर "ज्ञ" तक कोई बोलने को कहे तो वे सही नहीं बोल सकते, देवनागरी में शुद्ध हिन्दी लिखने की तो बात ही क्या। अधिक दुर्भाग्यपूर्ण बात यह है कि कई बच्चे रोमन लिपि में लिखी "हिन्दी" तो समझ सकते हैं पर देवनागरी में लिखी हिन्दी पढ़ भी नहीं सकते। अंग्रेज़ी का ज्ञान निश्चित ही उपयोगी और लाभदायक हो सकता है और इसे हासिल करना भी चाहिए, किन्तु अपनी भाषा की दक्षता और उस पर गौरव करना इन भाषाओं को सशक्त बनाएगा।
आजकल टीवी पर चल रहे ऐतिहासिक और पहले आ चुके चाणक्य, अशोक, महाभारत, रामायण जैसे हिन्दी धारावाहिकों को अच्छी संस्कृतनिष्ठ हिन्दी को छोटे परदे पर लाने के लिए श्रेय देना चाहिए, यह बात दीगर है कि उनमें अनेक पात्र शब्दों का अशुद्ध उच्चारण भी करते रहे हैं, जैसे स्वयं "राम" भी रामायण धारावाहिक में "विभीषन", "लक्ष्मन", "रावन" आदि बोलते रहे थे। यहाँ ऐतिहासिक और धार्मिक धारावाहिकों में जिस ग़लती को लगातार बरसों से दोहराया जा रहा है, वह है संस्कृत के शब्दों और व्याकरण का अशुद्ध प्रयोग, जो धारावाहिक महाभारत में सुना जा सकता था जहाँ भीष्म पितामह सहित सभी पात्र "माता" को संबोधित करते समय "माते" बोलते थे, वैसा ही समझ कर जैसे "सीता" शब्द का संबोधन "सीते" होता है। पर माता के लिए संस्कृत के "मातृ" शब्द का संबोधन "मातः" होता है, "माते" नहीं। अपनी पुत्रवधू उत्तरा को आशीर्वाद देते समय भी अर्जुन कहता है "आयुष्मान भव", बजाय "आयुष्मती भव" के। हिन्दी और संस्कृत दोनों की अस्मिता पर यह प्रहार है।
देवनागरी में अनुनासिक और अनुस्वार वाले शब्दों की स्थिति और उनके सही लेखन की व्यवस्था को समझना कठिन हो सकता है, इसलिए लेखन या टंकण की सुविधा के लिए अब यह भी लगभग पूर्णतः मान्य हो गया है कि टङ्कण, अङ्ग व्यञ्जन, टण्डन, अम्बा या रम्भा जैसे शब्दों में सभी तरह के अनुस्वारों को ऊपर एक बिंदी द्वारा टंकण, अंग, व्यंजन, टंडन, अंबा, रंभा लिखा जा सकता है। यहाँ तक कोई खास समस्या नहीं है। देवनागरी में लिखते समय चन्द्रबिन्दु के स्थान पर अनुस्वार भी चल गया है। पर आवश्यक है यह देखना कि इसका प्रयोग किस जगह अधिक उपयुक्त होगा। "मुझे हँसी आ गई" ज़्यादा ठीक है बजाय "मुझे हंसी आ गई" के। लेकिन अब उर्दू शब्दों का भी हिन्दी में बिना नुक्तों के साथ लिखा जाना मान्य हो गया है। यहाँ कुछ लोगों को रिज़र्वेशन है। हालाँकि कई पत्रिकाएं तथा ई-पत्रिकाएं अभी भी उर्दू शब्दों को सही तरीके से लिख रही हैं। पर जिस तरह फ़्रेंच शब्दों को बिना एक्सेंट के लिखा जाए तो अटपटा लगेगा, उसी तरह उर्दू शब्दों को भी बिना नुक्तों के साथ पढ़ना न केवल अजीब-सा लगता है, यह आगे जाकर हिन्दी पाठकों का उच्चारण भी बिगाड़ सकता है, जब जंग और ज़ंग में फ़र्क होना ही बंद हो जाएगा और साग़र (शराब का प्याला) भी सागर (समुद्र) बन जाएगा। देखा यह जा रहा है कि अब नुक्तों का प्रयोग लेखकों और प्रकाशकों की व्यक्तिगत सुविधा पर अधिक निर्भर हो गया है। वास्तव में हिन्दी के कई लेखक तो ऐसे भी हो सकते हैं, जिन्हें उर्दू के किन शब्दों में नुक्ते लगते हैं यह भी ध्यान रखने में समस्या होती हो।
युवावर्ग पर फ़िल्मों और विज्ञापनों का प्रभाव आजकल देखने को मिल रहा है, ख़ासतौर से जहाँ उनके चहेते अभिनेता अशुद्ध हिन्दी बोल रहे हों। इससे हिन्दी की व्याकरण को एक नई गलत दिशा मिल रही है। जब कोई "दबंग" नायक (हीरो) कहता है "वह आगे चलते गया, चलते गया", "वह हँसते जा रही थी", "मैं अपने आपसे भागते जा रहा हूँ" तो हिन्दी जानने वालों को तो बेशक कर्णकटु लगता है, पर प्रशंसक युवावर्ग उसे तुरंत अपना लेता है। दूरदर्शन के सीरियलों और विज्ञापनों में भी इस तरह का प्रयोग धड़ल्ले से हो रहा है। शायद टीवी और फ़िल्मों के लिए लिखने वाले हिन्दी लेखक भी भूल गए कि सही "वह आगे चलता गया, चलता गया", "वह हँसती जा रही थी", "मैं अपने आप से भागता जा रहा हूँ", "वे लोग खाते ही चले गए" होता है। "वह पास आते गया सही नहीं है।" "आते बहुवचन के साथ लगता है (जैसे वे पास आते गए), स्त्रीलिंग के साथ "आती" और पुÏल्लग एकवचन के साथ "आता" लगना चाहिए। यह साधारण सी बात है, पर इसके लगातार प्रयोग से भविष्य में यही मानक स्वरूप ग्रहण कर सकती है।
टीवी के कार्यक्रमों में प्रयुक्त अशुद्ध व्याकरण के अन्य कई उदाहरण हैं, जैसे "वह न केवल दूर से निशाना लगायेगा, लेकिन अंदर भी आ सकता है" ("लेकिन" की जगह "बल्कि" होना चाहिए), "न ही हम जायेंगे, न ही उसको बुलाएँगे" (न हम जायेंगे और न उसको ही बुलाएँगे), "न केवल वह इस पवित्र स्थान पर प्रवेश करेगा, किन्तु धृष्टता भी करेगा" (न केवल वह इस पवित्र स्थान पर प्रवेश करेगा, वरन् धृष्टता भी करेगा), "तुमने यह कभी सीखा?" (तुमने यह कब सीखा?), "जितना आपसे नाराज़ है, उससे कई ज़्यादा मुझसे है" (जितना आपसे नाराज़ है, उससे कहीं ज़्यादा मुझसे है), "तुम लोग कभी मिलोगे?" (तुम लोग कब मिलोगे?), "अगर वह यहाँ आता था, तो मुझको पता चल जाता था" (अगर वह यहाँ आता, तो मुझे पता चल जाता)। ये कुछ ही गलत प्रयोग हैं जो बताये गए हैं। किसी अदालत के दृश्य में तो अमूमन सभी जज साहेबान अपना निर्णय सुनाते समय कहते हैं - "सारे गवाहों और सबूतों को मद्देनज़र रखते हुए..., बिना यह समझे कि "मद्दे" शब्द ही "रखते हुए" को इंगित करता है, इसलिए वे "रखते हुए" को बिना जोड़े केवल मद्देनज़र ही बोल सकते थे। मातृभाषा-विशेष या प्रांतीय स्पर्श के लिए उच्चारण और व्याकरण में छूट दी जा सकती है, किन्तु इसे हिन्दी-भाषी क्षेत्रों और हिन्दी के स्वरूप में भी ले आने का प्रयास उचित नहीं है।
पिछले कुछ वर्षों से जितनी बड़ी संख्या में दृश्य-माध्यमों का आगमन हुआ है उतना पहले कभी नहीं हुआ। टीवी पर सैंकड़ों "चैनल्स" हो गये हैं, जिनके सैंकड़ों धारावाहिकों व अन्य कार्यक्रमों में हज़ारों की संख्या में नए-नए कलाकारों का भी पदार्पण हुआ है। कई चैनल्स केवल धार्मिक प्रवचन या कार्यक्रम ही प्रसारित करते हैं, जिनमें हज़ारों श्रद्धालु बैठे देखे जा सकते हैं। यह अच्छी बात है। किन्तु इससे जो देखने को मिला है, वह है हिन्दी के पाठकों में कमी तथा दर्शकों और श्रोताओं में वृद्धि। ज़ाहिर है, जितनी अच्छी हिन्दी का प्रयोग टीवी के पात्र करेंगे, प्रवचन करने वाले "संत" करेंगे या लोगों के भविष्य बताने वाले "ज्योतिषी" करेंगे, उतनी ही "अच्छी" हिन्दी के ज्ञान का लाभ लोगों को मिलेगा। "टीवी ज्योतिषियों" की एक नई व्यावसायिक श्रेणी आजकल पैदा हो गई है, जो बिना समझे वेदों, पुराणों के मन्त्रों को बिगाड़ कर अपना ही "मन्त्र" गढ़ देते हैं और बेचारे दर्शकों को भ्रमित करते हैं। ऐसे ज्योतिषियों और पंडितों से अमूमन अकारांत, इकारांत, उकारान्त शब्दों में गलतियाँ होती हैं।
जैसे अकारांत रामाय नमः, कृष्णाय नमः की तर्ज पर हलंत या उकारान्त शब्दों के लिए ब्रह्माय नमः (ब्रह्मणे नमः की जगह), हनुमानाय नमः (हनुमते नमः की जगह), गुरुआय नमः (गुरवे नमः की जगह) कहना अशुद्ध और हास्यास्पद है। इसी तरह सही लक्ष्म्यै नमः, विष्णवे नमः हैं। एक धारावाहिक में तो नाम भी नमः शिवाय से प्रभावित होकर "शिवाय" रख लिया गया है। हो सकता है, अगले नाम "विष्णवे" या स्त्रियों के नाम "लक्ष्म्यै" हो जाएँ।
जिस तरह बीसवीं सदी में हिदी लेखन समाज का आईना बन गया था, अब चमत्कार के लिए इसमें प्रयोग अधिक होने लगे हैं। चाहे प्रयोग के रूप में या युवा वर्ग को आकर्षित करने के लिए, आजकल अधिकतर दैनिक व कई साप्ताहिक पत्र फैशन तथा महिलाओं से सम्बंधित एक दो पन्ने/परिशिष्ट ऐसे रखने लगे हैं जहाँ वे भाषा में अंग्रेजी और हिन्दी के मिलेजुले शब्द प्रयोग करते हैं जैसे ड्रेसेज़ में भी एक्सपेरिमेंट होने चाहिये, अपने चेहरे पर ग्लो कैसे लायें? वगैरह। भले ही यह सब मन बहलाने के लिए किया जाता हो, पर इस तरह के प्रयोगों से दीर्घावधि में कदाचित हिन्दी का नुकसान ही होगा। अभी भी युवावर्ग का एक बड़ा तबका बिना अंग्रेज़ी के शब्दों को बीच बीच में लाये हिन्दी नहीं बोल सकता। ऐसा होता है कुछ अंग्रेजियत के प्रभाव के कारण और शायद कुछ इस अंदरूनी भावना या ग़लतफ़हमी के कारण कि अंग्रेज़ी के शब्दों का प्रयोग या उसकी जानकारी ही प्रबुद्धता या आभिजात्य की निशानी है। हिन्दी बोलते समय भी कई लोगों को बीच-बीच में आई मीन, लाइक, यू नो वगैरह बोलते सुना जा सकता है।
ई-माध्यम के हिन्दी के प्रसार में योगदान का भी मूल्यांकन करने से अच्छे संकेत मिल रहे हैं। भारत और कई अन्य देशों से हिन्दी में कई अच्छी ई-पत्रिकाएं निकल रही हैं जो हिन्दी की अस्मिता की रक्षा करते हुए स्तरीय सामग्री देती हैं। उनका यह प्रयास सराहनीय है। इंटरनेट पर बहुत से ब्लॉग भी बन गए हैं जिनका हिन्दी के प्रचार-प्रसार में योगदान कमोबेशी है ही। ऐसे में पाठकों का स्वतः ही वर्गीकरण होता दिखाई देता है, जिनमें कुछ चलताऊ हिन्दी में रुचि लेते हैं, और कुछ गंभीर लेखन-पठन और हिन्दी के शास्त्रीय स्वरूप में। कुछ दशकों पहले तक हिन्दी के पाठकों को अच्छे लेखन और लेखकों से रूबरू होने का अवसर इसलिए मिल जाया करता था कि पुस्तकों की क़ीमत बहुत कम हुआ करती थी। इस दिशा में हिंद पॉकेट बुक्स का उल्लेख करना आवश्यक है जिनके प्रयास से एक-दो रुपयों के मूल्य पर ही सभी अच्छे लेखकों की पुस्तकें पढ़ने को मिल जाया करती थीं। हिन्दी के प्रचार-प्रसार में इस तरह की भूमिका लाभदायी सिद्ध हुई थी। इसी तरह गोर्की, इवान तुर्गनेव, तोल्स्तोय, बोरिस पास्तरनाक, जैसे दिग्गज रूसी लेखकों की पुस्तकें भी रूसी प्रकाशनगृहों द्वारा अत्यन्त कम दामों पर उपलब्ध थीं।
प्रकाशन अब पूर्णतः व्यवसाय ही बन गया है। पहले जहाँ कई प्रकाशन-गृह हिन्दी की सेवा के रूप में प्रकाशन करते थे, अब मात्र धनोपार्जन का माध्यम ही समझते हैं। पुस्तकों की ख़रीद फरोख़्त में भ्रष्टाचार, कमीशन, लाइब्रेरियों में या पाठ्यक्रम में लगवाने के लिए रिश्वतखोरी आदि अन्य कारण हैं जिनसे सभी भाषाओं में, विशेषकर हिन्दी में, पठन-पाठन कम हुआ है।
अधिकतर छोटे प्रकाशक हिन्दी पुस्तकों की कम बिक्री होने का हवाला देते हैं। नतीजतन वे लेखकों से उनकी पुस्तक छापने के लिए प्रकाशन सहयोग लेते हैं, जो लगभग छपाई की पूरी क़ीमत ही होता है। इस स्थिति में उनका ध्यान इस ओर कम हो जाता है कि प्रकाशनाधीन पुस्तक का स्तर कैसा है। कोई भी लेखक कुछ भी लिख कर पुस्तक छपवा सकता है और स्वनामधन्य लेखक बन जाता है। इससे हिन्दी के जिस स्वरूप की अपेक्षा हमें रहती है, उसकी गुणवत्ता में निश्चित ही गिरावट तो देखने को मिलती ही है। तब पुस्तकालयों या पुस्तक विक्रेताओं को जो भी पुस्तकें प्रकाशक बेच सकें, वह उनका अपना अतिरिक्त लाभ होता है। उनका दूसरा तर्क होता है कि सरकारी (या ग़ैर सरकारी भी) पुस्तकालयों में बड़ी ख़रीद के लिए उन्हें अच्छा खासा कमीशन देना पड़ता है। इसका परिणाम यह होता है कि प्रकाशक पहले से ही पुस्तकों का मूल्य बढ़ा चढ़ा कर निर्धारित करते हैं।
पुस्तक यदि वास्तव में अच्छी भी हो, तब भी प्रकाशक अपना शुद्ध लाभ कम हो जाने के डर से विज्ञापन में कोई ख़र्चा नहीं करते। इसलिए कई बार तो इसी वजह से पाठकों को पता तक भी नहीं चलता कि कोई अच्छी पुस्तक बाज़ार में आई है। चूंकि अधिकतर और विशेषकर छोटे, प्रकाशकों का मुख्य उद्देश्य प्रकाशन की लागत वसूल करना ही रहता है, ऐसे में पुस्तक की गुणवत्ता प्रभावित होती है और अच्छी पुस्तकों के बारे में पता चलने पर भी अधिक मूल्य होने के कारण पाठक पुस्तक ख़रीदने में झिझकते हैं। यह भी हिन्दी पाठकों की गिरती संख्या का एक कारण है, जो हिन्दी के लिए शुभ नहीं है।

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