btn_subscribeCC_LG.gif
भाषाओं का नस्लवाद और 8वीं अनुसूची
01-Aug-2019 02:56 AM 1030     

यह बात लगभग सर्वमान्य है कि भाषा और बोली में कोई भेद नहीं होता, इसलिए अगर किसी बोली का उपयोग लाख और हजार लोग नहीं बल्कि केवल दो व्यक्ति भी करते हों तो उसे भाषा कहना ही उचित होता है। कुछ साल पहले अंडमान की बोआ सिनियर की मृत्यु के साथ "बो" भाषा समाप्त हो गयी, क्योंकि उसे बोलनेवाली वो अकेली महिला थीं। पूरी दुनिया में यह महत्वपूर्ण खबर बनी परंतु एक भी भाषा वैज्ञानिक ने उसे "बोली" नहीं कहा था। वैसे भी प्रत्येक बच्चा अपनी मां से जिस माध्यम में बात करता है वह यूं तो बोली होती है, क्योंकि उसका वाचिक प्रयोग होता है परंतु उसे मातृभाषा ही (मातृबोली नहीं) कहा जाता है।
इस बात में भी किसी प्रकार की दुविधा नहीं है कि दुनिया की सारी भाषाएं महत्वपूर्ण हैं, समान महत्व की हैं और एक स्तर पर ये सब बराबर हैं। ठीक वैसे ही जैसे कि दुनिया में किसी भी रंग का, नस्ल का, क्षेत्र का व्यक्ति हो, वह इंसान है और सारे इंसान बराबर हैं। इनमें उत्कृष्ट और निकृष्ट का भेद करना एक तरह का नस्लवाद है जो कि अमानवीय होता है। अगर यह किसी भाषा के स्तर पर लागू हो रहा है तो यहां भी यह नस्लवाद ही कहा जाएगा।
दरअसल समस्या किसी अनुसूची या भाषा या भाषा विशेष के प्रयोग करनेवाले समुदाय में नहीं है। संघर्ष का मूल हम मनुष्यों की फितरत में है। हम सबके भीतर दमित इच्छाओं का एक अंधड़ दबा होता है जो हर समय बाहर निकलने का एक रास्ता ढूंढता रहता है। इसी दमित इच्छा के कारण प्रत्येक व्यक्ति (या समूह) दूसरों से खुद को श्रेष्ठ साबित करने के लिए कोई न कोई रास्ता लगातार ढूंढता रहता है। ऊपर से भले वह नजर न आए परंतु भीतर से वह श्रेष्ठता के तर्क तलाशता रहता है। वह तर्क धन का, धर्म का, जाति का, उम्र का, लिंग का, शिक्षा का हो सकता है यहां तक कि रंग, कद, वस्त्र, घर, कार या किसी वस्तु के आकार आदि के आधार पर भी यह श्रेष्ठता बोध हो सकता है।
इसी इच्छा का एक परिणाम है पदानुक्रम या हायरार्की। इस पदानुक्रम का शानदार नमूना जातिवाद में दिखता है जिसके लिए आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी कहा करते थे कि "प्रत्येक जाति, अपने से एक छोटी जाति ढूंढ लेती है।" चूंकि हमारी सबसे बड़ी (धर्म, जाति, क्षेत्र से भी बड़ी) पहचान भाषा से निर्मित होती है इसलिए हम अपनी भाषा को श्रेष्ठतम मानने और मनवाने का कोई अवसर नहीं चूकते। दुनिया का शायद ही कोई ऐसा स्वतंत्रचेता व्यक्ति होगा जो अपनी भाषा को मीठा, सुंदर और श्रेष्ठतम नहीं मानता होगा। विश्व में जब उपनिवेशवाद की शुरुआत हुई तो यूरोपीय आक्रांताओं ने अपनी भाषा की श्रेष्ठता स्थापित करने के लिए कुछ भी उठा नहीं रखा। अंग्रेजी, स्पेनिश आदि इन औपनिवेशिक भाषाओं का कितना भारी मूल्य दुनिया को चुकाना पड़ा यह एक अलग लेख का विषय होगा पर हम सब जानते हैं कि एशिया, अफ्रीका ही नहीं अमेरिका, दक्षिण अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया की समृद्ध संस्कृतियाँ और अकूत ज्ञान परंपरा इन लोभी उपनिवेश-वादियों के लालच की बाढ़ में बह गयीं। खुद यूरोप इस बाढ़ से अछूता नहीं रहा और वहां की भाषाओं को भी मूल्य चुकाना पड़ा और अब उसी यूरोप के लोग "मैक्स प्लांक लैंग्वेज आर्काइव" और "मेमोरी ऑफ द वल्र्ड" बनाते फिर रहे हैं। ऐसा बहुत क्षेत्रों में हो रहा है कि पहले सुंदर चीज को बर्बाद कर दीजिए और बाद में उसका एक संग्रहालय बना कर उसे संरक्षित करने का प्रदर्शन कीजिए। खासतौर से जनजातीय संस्कृति के प्रदर्शन के संग्रहालय अनेक स्थानों पर बन रहे हैं।
ये सारी बातें यहां इसलिए याद दिलाई जा रही हैं कि तुलनात्मक रूप से नये लोकतांत्रिक राष्ट्र भी इस पदानुक्रम (हायरार्की) की मानसिकता से बाहर नहीं निकल पा रहे हैं। खासतौर से भारत जैसे विविधतापूर्ण, बहुभाषी और बहुसांस्कृतिक देश में इस मानसिकता का होना अत्यंत चिंताजनक है। भारत में भाषाओं के मामले में यह काम आठवीं अनुसूची कर रही है। यह बात सुनने में थोड़ी अजीब लगेगी पर यह तथ्य है कि इस आठवीं अनुसूची में किसी भाषा के प्रवेश का न तो कोई वैज्ञानिक आधार है और न ही स्पष्ट वैचारिक तर्क है। वह चाहे अनुच्छेद 344 हो या 351, भाषाओं के प्रवेश को लेकर क्या प्रावधान है इसकी स्पष्ट सूचना नहीं मिलती। आठवीं अनुसूची में सिर्फ 22 भाषाओं के नाम लिखे गए हैं। जब संविधान बना तो इसमें 14 भाषाओं को स्थान दिया गया, फिर 1967 में सिंधी जोड़कर इनकी संख्या 15 की गयी, फिर 1992 में संशोधन कर तीन और भाषाओं (नेपाली, मणिपुरी, कोंकणी) को जोड़कर यह संख्या 18 कर दी गयी और अंत में 2003 के संशोधन द्वारा चार और भाषाओं (बोडो, डोगरी, संताली और मैथिली) को जोड़कर कुल 22 भाषाओं को अन्य भाषाओं की तुलना में श्रेष्ठतम की उपाधि से विभूषित कर दिया गया। और सबसे मजेदार तो यह रहा कि जो भाषा इस अनुसूची में कहीं थी ही नहीं, उसे अघोषित किंतु आधिकारिक रूप में इन बाइसों भाषाओं की महारानी बना दिया गया जिसका नाम अंग्रेजी है। कायदे से अच्छा तो यह होता कि साहित्य अकादमी से लेकर ज्ञानपीठ तक जब अंग्रेजी में दे ही रहे हैं और सारे विश्वविद्यालयों की एकमात्र भाषा की मान्यता जब उसे दे ही दी है तो 8वीं अनुसूची में भी स्थान दे देने से ही कौन सा पहाड़ टूट पड़ेगा। कम से कम जो भीतर है वह बाहर भी नजर तो आएगा। एक भाषा के रूप में अंग्रेजी इसकी हकदार है और मैं इस भाषा का सम्मान करता हूं परंतु इस भाषा के साथ जो हिप्पोक्रेसी जुड़ी हुई है उसका क्या करें। उदाहरण के लिए जनगणना दस्तावेजों के अनुसार अंग्रेजी कुछ हजार (या अब लाख हो गया होगा) लोगों की मातृभाषा है।
यही हाल संस्कृत का है। 2011 के जनगणना आंकड़े के अनुसार संस्कृत बोलनेवाले 25 हजार भी नहीं हैं। 25 लाख लोगों की प्राचीन भाषा "हो" का देश के बहुत सारे लोग नाम भी नहीं सुने होंगे क्योंकि यह एक आदिवासी भाषा है। पच्चीस हजार लोगों वाली संस्कृत में सारी राष्ट्रीय सुविधाएं उपलब्ध हैं जिनका अधिकतम दुरुपयोग (महाविद्यालय/ विद्यालय से लेकर अनेक संस्थानों के कर्ताधर्ता के रूप में) कुछ ऐसे संगठित गिरोह कर रहे हैं जो न तो खुद ढंग की संस्कृत जानते हैं न ही संस्कृत की समृद्ध संस्कृति से परिचित होते हैं। हालत यह है कि हर वर्ष संस्कृत में डिग्री और पुरस्कार बांटने के लिए ऐसे ऐसे धुरंधरों को ढूंढा जाता है कि अगर इन पर कभी मीडिया की कृपा हो गयी तो पता चलेगा कि संस्कृत के नाम पर कितना बड़ा घोटाला चल रहा है। आठवीं अनुसूची में दर्ज संस्कृत शायद अकेली भाषा होगी जिसके अध्ययन का माध्यम हिंदी, गुजराती से लेकर तमाम दूसरी भाषाएं हैं और इस भाषा के अध्यापक/परीक्षक भी बहुत सरलता से इस स्थिति को स्वीकार करते हैं।
देश के भाषा विशेषज्ञ और भाषा संबंधी नीति निर्माताओं के बारे में क्या टिप्पणी की जाय कि अभी आठवीं अनुसूची की विभाजनकारी हायरार्की से हम जूझ ही रहे थे कि भाषाओं को बांटने का एक और तरीका इन सरकारी विद्वानों ने ढूंढ लिया। इस कोटि का नाम "क्लासिकल" यानी शास्त्रीय भाषाएंं रखा गया है। इसे संविधान द्वारा मान्यता दी गयी है और फिलहाल इस श्रेणी का लाभ उठाने वाली 6 भाषाएं हैं :
1. तमिल 2. संस्कृत 3. कन्नड़ 4. तेलुगु 5. मलयालम 6. उडिया।
शास्त्रीय भाषाओं की इस सूची में पाली क्यों नहीं हैं? जिस उडिया को बंगाली भाषी बांग्ला का ही एक रूप मानते थे और जिसे अपना अलग स्वरूप पाने के लिए कुछ दशक पहले ही भरपूर संघर्ष करना पड़ा था वह बांग्ला इसमें क्यों नहीं है? देश के सबसे प्राचीन निवासी माने जाने वाले आदिवासी समाज की कोई भी भाषा इसमें क्यों नहीं है? इस संदर्भ में इस प्रकार के सवाल पूछना उचित नहीं माना जाएगा। क्योंकि ऐसे सवालों के सिरे आठवीं अनुसूची तक भी पहुंचेंगे। फिर यह सवाल भी आएगा कि 2003 (बोडो, संताली) से पहले इसमें एक भी आदिवासी भाषा क्यों नहीं थी या फिर आज भी अंडमान निकोबार से लेकर तमाम उपेक्षित क्षेत्रों/समाजों की भाषाएं इसमें क्यों नहीं हैं।
असल में इन सवालों का जवाब श्रेणीबद्ध भाषाओं को मिलनेवाली सुविधाओं में ढूंढा जा सकता है। मसलन शास्त्रीय भाषा का दर्जा पाने वाली प्रत्येक भाषा के विद्वानों को हर साल दो बड़े अंतरराष्ट्रीय सम्मान से नवाजने की व्यवस्था की गयी है। ऐसी प्रत्येक भाषा के अध्ययन के लिए सरकार "सेंटर ऑफ एक्सेलेंस" की स्थापना करेगी। इसके अलावे इन शास्त्रीय भाषाओं के लिए केंद्रीय विश्वविद्यालय अनुदान उपलब्ध कराएंगे और इन भाषाओं के पीठ (चेयर) स्थापित करेंगे। अगर यह सुविधा किसी भाषा को मिलती है तो किसे बुरा लगेगा और अन्य भाषाएं शास्त्रीय का दर्जा पाने के लिए क्यों नहीं हर प्रकार की कोशिश करेंगी। इससे भी बड़ा मुद्दा आठवीं अनुसूची की भाषाओं का है जिसकी विस्तार से चर्चा इस श्रृंखला के आगामी लेखों में की जाएगी।
इस संदर्भ में चिंताजनक यह है कि देश का बौद्धिक वर्ग भी भाषा के सवालों को बहुत ही सपाट ढंग से या निजी लोभ-लाभ की दृष्टि से देख रहा है। वह भाषाओं के नाम पर चलनेवाली साजिशों और दुरभिसंधियों से भी अनजान है। यह कहने की जरूरत नहीं कि जो भाषाएं जैसी नजर आ रही हैं या जिस स्थिति में आज हैं, वे सहज स्थिति में वहां नहीं पहुंची हैं, इनके पीछे और भी बहुत कुछ है जो सामान्यत: नजर नहीं आता। शोधार्थियों और बौद्धिकों की भूमिका यहीं शुरू होती है कि वे निजी राग द्वेष से मुक्त रहते हुए चीजों को उनके सही आकार और परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत करें।

QUICKENQUIRY
Related & Similar Links
Copyright © 2016 - All Rights Reserved - Garbhanal - Version 19.09.26 Yellow Loop SysNano Infotech Structured Data Test ^