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पुष्पा सक्सेना
पुष्पा सक्सेना
एम.ए., पी.एच.डी. हिन्दी, पी.जी. डिप्लोमा (भाषा विज्ञान), अवका¶ा प्राप्त अध्यक्षा, हिन्दी एवं भाषा विज्ञान विभाग, उच्च ¶िाक्षा एवं ¶ाोध संस्थान चेन्नई, केन्द्र के कोयला एवं एनर्जी मन्त्रालय में हिन्दी सलाहकार के रूप में सदस्या (1985-93)। अमेरिका से प्रका¶िात अन्तर्राष्ट्रीय पत्रिका "वि·ाा' में सह-सम्पादक।

सिस्टर रोजी
बन्द कमरे से अनिता की चीखें स्पष्ट सुनाई दे रही थीं, साथ ही सिस्टर रोजी का डपटता हुआ कर्कश स्वर मेरे सीने पर हथोड़े मार रहा था। बार-बार जी चाहता था, दरवाजा तोड़ कर अन्दर घुस जाऊं, पर साथ खड़ी मीनाक्षी ने मुझे रोक रखा था। अचानक दरवाजा खोल मुझ पर आग्ने
सिआटेल में उदासीन मन-मयूर
सिआटेल आने के पहले इस नगर के सौन्दर्य के विषय में सुन रखा था। सिआटेल में पहुंचते ही यहाँ की हरीतिमा ने मुग्ध कर दिया। मेरी कल्पना से भी अधिक सुन्दर है यह नगर। ऐसा लगता है मानो विधाता ने हरे रंग की कूची से पूरे नगर को हरे रंग में रंग दिया है। यहाँ
कबिरा खड़ा बाज़ार में
मानस में एक चित्र उभरता है, राग-द्वेष से परे, कौन है यह संत जो सबकी खैर की कामना करता है? यह संत और कोई नहीं, मध्यकालीन भारत में व्याप्त अन्धकार को अपने ज्ञान की ज्योति से ज्योतिर्मय करने वाले अग्रदूत, महान भक्त कवि और संत कबीर दास हैं। उनका पूरा
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