ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
पुण्य सलिला गंगा
01-May-2016 12:00 AM 2495     

वाल्मीकि प्रकृति कवि हैं। उनके कवित्व से घटनाएँ स्वाभाविक हो जाती हैं। वह आका¶ा, तारों, पर्वतों, मेघों, वनों, वृक्षों, प¶ाुओं, सर्पों, पक्षियों, नदियों, मछलियों, नारियों और नरों के प्रेक्षक हैं। उनके निकले बाण विषैले सर्पों की तरह डँसते हैं, उनके विजयी नायक मदमस्त हाथियों की तरह चलते हैं, उनके हार रात्रिकालीन आका¶ा में तारों की तरह चमकते हैं, उनके भय सिंह के सामने खड़े मृग की भाँति दिखते हैं, उनका रुदन जल से निकाली गयी मछली की अवस्था की तरह है, उनके सौंदर्य का विवरण चन्द्रमा की ¶ाीतल स्निग्ध चाँदनी की तरह है, वाल्मीकि की लेखनी से सम्पूर्ण प्रकृति जीवंत हो उठती है। सभी पदार्थों को जीवन मिल जाता है। वे आपस में संवाद स्थापित करते हैं। उनके प¶ाु बातचीत करते हैं। गंगा नदी पर्वतराज हिमालय की पुत्री हो जाती हैं, फिर देवी सीता के कहने से वह पवित्र माता हो जाती हैं।
उपजाऊ मिट्टी और ¶ाीतल सलिल प्रवाह की वजह से गंगा के तट इसके बा¶िंादों के लिए तीर्थ रहे हैं। अन्य नदियों से अलग, गंगा का प्रवाह तेज है और निस्सरण ज़्यादा है। यह वि·ाास किया जाता है कि जब उत्तर वैदिक काल में वेदों के प्रणेताओं ने मूल पंजाब क्षेत्र से पूर्व की ओर प्रवासन किया होगा, उसी समय गंगा की खोज हुई होगी। यह सम्भव है कि इसके तट पर वास करने वालों को इसके जल के लाभदायक गुणों का अच्छी तरह पता रहा होगा। ऋग्वेद में हमें एक सन्दर्भ मिलता है, जहाँ गंगा अन्य नदियों यथा यमुना, सरस्वती और ¶ातद्रु की साथ पूजी जाती हैं। (ऋग्वेद ज्र्.75.5)
ऊँचे पर्वतों पर अपने उद्गम पथ से अंततः सागर में तेज प्रवाह के साथ विलीन होने के कारण गंगा को त्रिपथगा अर्थात् स्वर्ग, पृथ्वी और पाताल गामिनी कहा गया है। जो स्वर्ग को पाताल से जोड़ सकती है, उस नदी की पवित्रता के उत्सव में कुछ आ¶ााओं और आकांक्षाओं उद्भव हुआ होगा। जब भारत में कर्म और मुक्ति की धारणा का उदय हुआ, तब गंगा वह साधन बनी जो मनुष्य के कर्म को धोकर उसे स्वर्ग में प्रवे¶ा के योग्य बना सकती थी। समय के साथ ऐसी सोच बलवती होती गयी। हाल तक लोग गंगा में मृतकों की राख और अस्थियों का विसर्जन करते रहे हैं, ताकि हुतात्माओं को यह पवित्र नदी मुक्त कर सके।
वाल्मीकि को गंगा के ऊँचे पर्वतों पर उद्गम और धरती पर अवतरण के लिए गहरे प्रपात का पता अव¶य रहा होगा। सम्भवतः वह उन जलधाराओं को जानते होंगे, जिनसे मिलकर गंगा बनी है और उन्हें गंगा के द्वारा स्वयं अपने रास्तों में बनाने वाले जलप्रपातों की ¶ाृंखलाओं का भी पता रहा होगा। सीधा खड़े जलप्रपातों से भँवर युक्त और वेगवान जल सर्पों और जलीय जन्तुओं को बुहारते हुए नीचे गिरा सकते हैं। यह सम्भव है की वाल्मीकि ने पर्वतों का भ्रमण किया होगा और उनकी कल्पना ¶िाखर पर होती है जब वह पर्वतों के वनों को धूर्जटि ¶िाव की जटाओं सदृ¶ा मानते हैं। वाल्मीकि कथानक में भगवान ¶िाव को जोड़कर गंगा को सजीव कर देते हैं। इससे बढ़कर, इस नदी को स्वर्ग में भगवान विष्णु के पैरों के तल से बहकर धरती पर आना होता है।
ऊँचाइयों से जुड़ाव के कारण, वाल्मीकि इस नदी को आका¶ा की दुग्धधारा से जोड़ते हैं। उत्तरकालीन साहित्य में आका¶ा की दुग्धधारा सदृ¶ा तारामंडलों को आका¶ागंगा की उपमा दी गयी है। वाल्मीकि का दायित्व दुग्धधारा को अन्तरिक्ष की गंगा को हिमालय पर्वत श्रृंखला से जोड़ना है। वह कथा रचते हैं कि गंगा को धरती पर बहने की ज़रूरत है और पाताल तक सगर के उन साठ हजार पुत्रों को मुक्त करने के लिए जाना है, जो वहाँ अपने पिता के अ·ामेध यज्ञ के घोड़े को छुड़ाने हेतु गए थे। वाल्मीकि कथानक बुनते हैं कि सगर के वं¶ा में राजा भगीरथ होते हैं, जो गंगा के स्वर्ग से धरती पर अवतरण और समुद्र होते हुए पाताल तक गमन में निमित्त बनते हैं।
कथा इस प्रकार है। राम और लक्ष्मण ऋषि वि·ाामित्र के साथ गए और उनकी यज्ञ स्थली की रक्षा की, ताकि वे सफलतापूर्वक अपने तप को पूरा कर पाएं। तब ऋषि ने यह इच्छा प्रकट की कि वह उनके साथ मिथिला जाएंगे और वे सब सोन नदी को पार कर गंगा के तट पर पहुँचे। राम ने नदी को पहले भी एक बार अयोध्या के निकट पार किया था, जब वह ऋषि के साथ विंध्य को प्रस्थान कर रहे थे। उस समय उन्होंने ऋषि से अयोध्या नगर के समीप प्रवाहित होने वाली सरयू के विषय में पूछा था। अब इस वापसी यात्रा में राम ने ऋषि से गंगा को त्रिपथगा कहे जाने की पहेली को बुझाने का निवेदन किया।
वाल्मीकि पर्वतराज हिमालय की दो बेटियों के विषय में बतलाते हैं, जिनमें गंगा बड़ी थी। गंगा स्वतंत्र इच्छा की स्वामिनी थी। उसे तीन लोकों के कल्याण हेतु देवताओं को समर्पित कर दिया गया। उनकी दूसरी बेटी उमा तपस्विनी की तरह जीती थी और अंततोगत्वा रूद्र को वर के रूप में पाने में सफल हुई थीं। फिर अयोध्या के राजाओं की वं¶ाावली में राजा सगर हुए, जिन्होंने अ·ामेध यज्ञ आयोजित किया। यज्ञ के अ·ा को इंद्र ने दुष्टता से चुरा लिया और उसे पाताल में कपिल मुनि के आश्रम में छोड़ दिया। राजा ने अपने साठ हजार पुत्रों को अ·ा को खोजने के लिए भेजा। उन्होंने समुद्र की गहराई को खोद कर अंत में अ·ा का पता लगा ही लिया, लेकिन मुनि के श्राप से जलकर राख में तब्दील हो गए।
राजा सगर को अपने पौत्र अं¶ाुमान से ज्ञात हुआ कि उनके मृत बेटों को मुक्ति मिल जायेगी यदि उन्हें ताजा जल मिल जाये। अतएव, यह प्र¶न उठा कि किस प्रकार ताजा जल को पाताल कुएँ तक ले जाया जाए? कई पीढ़ियों के अनन्तर इक्ष्वाक् वं¶ा के राजा भगीरथ ने पर्वतों पर ब्राहृा की तपस्या की ताकि वह प्रसन्न होकर गंगा को स्वर्ग से धरती पर लाने की अनुमति प्रदान करें। ब्राहृा ने ¶िाव को मनाया कि वह प्रकट होवें और अत्यधिक ऊँचाई से गिरने वाले जल को धारण करें। वेगवती गंगा ¶िाव की जटाओं में विलीन हो गयी, परिणाम स्वरूप राजा भगीरथ को पुनः ¶िाव की जटाओं से गंगा को मुक्त करने के लिए तपस्या करनी पड़ी। राजा भगीरथ ने नदी को समुद्र की ओर बहने का निर्दे¶ा किया, किन्तु स्वतंत्र इच्छा की स्वामिनी गंगा स्वेच्छा से घुमावदार रास्ते पर प्रवाहित हो चली।
पहाड़ों पर अपने गमन के क्रम में गंगा गुफाओं में गुम हो गयी, फिर झरनों में फूट पड़ी। वाल्मीकि ने कल्पना की कि गंगा ने जह्नु ऋषि के आश्रम को जल प्लावित कर दिया, अतएव उन्होंने इसे पी लिया। पुनः वह अपने कानों से मुक्त कर लिया। इस तरह गंगा जाह्नवी नाम पाती है। अंत में गंगा समुद्र तक पहुँचती है और कवि को इस बात का अहसास है कि समुद्र के जलीय जीवों को ताजा जल की कितनी आव¶यकता है। ऐसा प्रतीत होता है कि गहन तल में ताजा जल के प्रवाह का ज्ञान रहा होगा। जल वैज्ञानिक अभी तक यह जाँच नहीं पाये हैं कि गहरे हिन्द महासागर में ताजा ¶ाुद्ध जल का प्रवाह हो सकता है। वाल्मीकि ऐसे बहाव की उपस्थिति का सुझाव करते हैं। इस प्रकार हम त्रिस्तरीय यात्रा त्रिपथगा का आका¶ा से धरती होते हुए पाताल जाकर समापन करते हैं।
गंगा की कथा की महाभारत और उत्तरकालीन पुराणों में पुनः आवृति होती है। चूँकि रामायण पुराना ग्रन्थ है, अतः हम इस निष्कर्ष पर पहुँच सकते हैं कि वाल्मीकि ही मूल कथा के जनक हैं और दूसरों ने उनसे ही कथा ली है। तीन स्तरों पर जलप्रवाह और गहरे पाताल में ¶ाुद्ध जल पाने का भूगर्भीय प्रमाण वाल्मीकि की अद्भुत वैज्ञानिक बात है। वह नदी के बहाव के वर्णन में सर्वोत्तम होकर सर्वश्रेष्ठ कथावाचक हो जाते हैं, खासकर जब वह हिमालय के आच्छादित वनों की तुलना ¶िाव की जटाओं से करते हैं और गंगा के उद्गम को ¶िाव के मस्तक से होना बताते हुए पौराणिक कथा रचते हैं। इस कथा के बाद हजारों ऐसी कथाओं का जन्म होता है और ¶िाव के सानिध्य की वजह से गंगा की पवित्रता कई गुणा बढ़ जाती है। फिर गंगा की कड़ी आका¶ा स्थित विष्णु से जुड़ जाती है।
चूँकि राम वन प्रस्थान के क्रम में गंगा तट पर विश्राम करते हैं, इसलिए वाल्मीकि ने गंगा का सजीव चित्रण किया है। अयोध्याकाण्ड के पचासवें अध्याय का अनु¶ारण करने के क्रम में हम वाल्मीकि के वर्णन की भव्यता को देखते हैं। ""गंगा सुंदर है, जल हंसों और बगुलों से आच्छादित है। रहस्यमय चक्रवाक पक्षी आसपास खेल रहे हैं। दूसरे रंग-बिरंगे और आनंदित पक्षी उसके जल में डूबते उतराते हैं। तट के वृक्ष कुंज मालाओं की तरह नदी को सुसज्जित करते हैं। कहीं-कहीं नील कमल के सरोवर बन गए हैं। कभी-कभी तो पूरा कमल वन ही नज़र आता है। अपने इर्द-गिर्द रंगीन फूलों से चित्रित गंगा भावमयी स्त्री की तरह दिखती है। नदी विष्णु के पैरों से प्रवाहित होती है। उसका जल लोगों के पापों को धो देता है। नदी रवे की तरह साफ़ नज़र आती है। हाथियों के झुण्ड उसके प्रासादों को घेरे हुए हैं। जंगली हाथियों के झुण्ड उसके जंगलों में विचरण कर रहे हैं। पालतू हाथियों के झुण्ड गंगा तट पर टहल रहे हैं ताकि इंद्र को जंगल की सैर करा सकें। गंगा सर्वोत्तम आभूषणों से सुसज्जित नारी सदृ¶ा है। लता कुंज, पेड़-पौधे, फल-फूल और पक्षियों से सु¶ाोभित पुण्यसलिला नदी सांसारिक पापों को धो डालती है। इसके गहरे जल में ¶ाार्क, सर्प और मगरमच्छ हैं। वे सब धूर्जटि ¶िाव की जटाओं से भगीरथ के आमन्त्रण पर नीचे गिरे हैं।''
नदी पार करने के क्रम में सीता भावुक हो जाती हैं। वह घोष करती हैं, "ऐ गंगा! तुम विद्वान राजा द¶ारथ के इस पुत्र की रक्षा करना, ताकि उनकी प्रतिज्ञा पूर्ण हो सके। ऐ भगवती गंगा! तुम मेरे सारे मनोरथों को पूर्ण करना। जब वह चौदह वर्ष के बाद अपने छोटे भाई और मेरे साथ पुनः तुम्हारे तट पर वापस लौटेंगे; मैं तुम्हारी पूजा करूँगी। ऐ देवि! तुम ब्राहृलोक में त्रिपथगा दिखती हो और पृथ्वी पर सागर के राजा की पत्नी सदृ¶ा। ऐ सुंदर सरिता! मैं तुम्हें प्रणाम करती हूँ और तेरी स्तुति करती हूँ। ऐ पापरहित गंगा! हमें आ¶ाीर्वाद देना ताकि महान गुणी राम वनवास के बाद पुनः अयोध्या लौट सकें।' नदी के बीच में सीता ने गंगा से ऐसी प्रार्थना की थी, अब हम गंगा को पवित्र माता से संबोधित करते हैं।

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