ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
जनता की आलोचना
01-Dec-2018 06:33 PM 1484     

नेताओं की आलोचना खूब होती है पर जनता की आलोचना कोई नहीं करता। आजकल नेता यह कहते हुए पाये जाते हैं कि देश की सवा सौ करोड़ जनता उनकी मालिक है और वे जनता के नौकर हैं। नौकरों की आलोचना करने वाले थक गये हैं और नौकर इतनी मोटी चमड़ी के हैं कि उन पर कोई असर ही नहीं होता। तो क्यों न जनता नाम की उस देश की मालकिन की आलोचना की जाये जो इतने गैर जिम्मेदार नौकरों को देश चलाने के काम पर बार-बार रख देती है और खुद तमाशबीन बनकर लोकतंत्र के नाम पर चल रहे फूहड़ तमाशे को देखती रहती है। नौकर मालकिन को ही नौकरी देने का सपना दिखाने लगते हैं और मालकिन दर-दर की ठोकरें खाती फिरती है।
जनता को विचार करना पड़ेगा कि जब राजनीतिक दल देशसेवा के नाम पर अपने नेताओं की नौकरी लगाने के लिए मालकिन के पास आते हैं तो वे मालकिन को किस तरह पहचानते हैं। वे अच्छी तरह जान लेते हैं कि मालकिन की संतानें जाति, संप्रदाय और छुआछूत के बाड़ों में अपने आपको फँसाये हुए हैं और इनसे बाहर निकलने की कोशिश भी नहीं करती हैं। जनता को लगा यह सदियों पुराना रोग राजनीतिक दलों के बहुत काम आता है। राजनीतिक दल इस रोग के डॉक्टर नहीं बनना चाहते बल्कि वे तो उसे असाध्य बनाये रखने में ही अपनी खैर समझते हैं। जनता का यह रोग ही उनके सत्ता पाने का मार्ग है। जात-पाँत के टुकड़ों में बँटी रोगी जनता से देशसेवा की फर्जी नौकरी लेना उनके लिए कितना आसान है।
तथाकथित राजनीतिक दलों के अवसरवादी गठबंधन जनमत को लूटकर सत्ता पाने का काला धंधा बनकर रह गये हैं। इन दलों को मालकिन की नहीं अपनी दुकान बचाये रखने की चिंता है। जब ये राजनीतिक दुकानदार भरोसा करने लायक नहीं रहे तो मालकिन को चिंता होनी चाहिए कि वह इस राजनीतिक दुकानदारी का कोई नया विकल्प खोजने के लिए तत्पर हो क्योंकि विकल्प तो मालकिन ही खोज सकती है। यह बहुत कठिन और जरूरी काम है। कठिन इसलिए है कि ये चुनावी धंधेबाज यही चाहते हैं कि मालकिन विकल्प खोजने से बेखबर बनी रहे।
क्या यह संभव नहीं कि हम भारत के लोग इन भेदभाव के गड्ढों को पूरकर और ऊँच-नीच की खाइयों को पाटकर उन सभी राजनीतिक दलों से निजात पा लें जो हमें हर चुनाव में जाति और संप्रदाय के नाम पर ललचाकर ठग लेते हैं। जाति और कौम के झूठे स्वाभिमान में डुबाया जा रहा देश हर बार वहीं का वहीं रह जाता है और हरे, नीले, लाल, केसरिया रंगों में रँगे दबंग हम पर काबिज होकर हमारा जीना हराम किये रहते हैं। देश में हिन्दू-मुसलमान नहीं लड़ रहे हैं। वे तो अपने रोजमर्रा के जीवन में एक-दूसरे के साथ रहना सीख चुके हैं। तब मालकिन को राजनीतिक दलों से पूछना चाहिए कि आप क्यों हिन्दू-मुसलमान होकर लड़ रहे हैं और हमें लड़ाने के मंसूबे बाँध रहे हैं।
क्या देश की मालकिन इतना भी नहीं देख पा रही कि जिन अनेक राजनीतिक दलों को वह जाति-धर्म के नाम पर वोट देती है उनके कई नेता अपना घर भरने वाले साबित हुए और जेल में सजा काट रहे हैं। देश की मालकिन जिन बैराग्यविहीन पाखंडी बाबाओं को पूजती है वे कुकर्मी भी सलाखों के पीछे हैं। यह कैसी जनता है जो इन आत्महीन दुष्टों के पक्ष में सड़कों पर उतर आने में कोई संकोच नहीं करती। यह कैसी मालकिन है जिसे गली-गली फैलता बाजार खुलेआम लूट रहा है और उसके नौकर उसे एक नयी आर्थिक गुलामी में रोज फँसाते चले जा रहे हैं। धर्म, राजनीति और बाजार के मतान्ध, क्रूर और स्वार्थी गठबंधन से बाहर निकलने की चाह क्या देश की मालकिन के मन में बिलकुल नहीं है।
देश में मालकिन के वंश की आबादी तो खूब बढ़ रही है पर मालकिन के चुने हुए नौकर उसके बाल-बच्चों के स्वास्थ्य, शिक्षा, समृध्दि और सुरक्षा की चिन्ता किये बिना उसे कितनी बदहाली में रखे हुए हैं। मालकिन क्यों यह विचार नहीं करती कि बिना सामाजिक और आर्थिक न्याय के केवल पचसाला मतदाता बने रहते तो सत्तर साल गुजर गये। उसके नौकरों ने उसका भला किये बिना उसे एक ऐसी राजनीतिक भीड़ में बदल दिया है जो खुद अपने देश की जिम्मेदारी लेने में असमर्थ होती जा रही है। मालकिन की यह असमर्थता ही उसके नौकरों की शक्ति बन गयी है। चलिए, संक्षेप में अपनी एक कविता में ही कुछ कहे देते हैं --
शक्तिहीन लोगों की बस्ती को दैखो
लोकतंत्र की शक्ति वहीं से आती है।
यह शक्ति जुटाकर मिल जाती जिनको सत्ता
उनसे भी उनकी शक्ति छीन ली जाती है।
कुछ शक्तिवान रचते हैं फिर अपना शासन
मतदान नहीं, सत्ता पूँजी से आती है।
लोकतंत्र को भरती रहती लालच से
जो झुके नहीं, वह उसको मार गिराती है।
देखो उनको, जो घुसे चोर दरवाजों से
इनके ही हाथों में सत्ता क्यों आती है।
उन्हें पुकारो, जो स्वराज्य को तड़प रहे
पहचानो उनको, जिन्हें गुलामी भाती है।

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