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प्रो. गिरीश्वर मिश्र
प्रो. गिरीश्वर मिश्र
दिल्ली वि·ाविद्यालय में प्रोफेसर और मनोविज्ञान विभाग के पूर्व प्रमुख तथा कला संकाय के पूर्व डीन के रूप में कार्यरत रहे हैं। चार दशकों में फैले अपने अकादमिक कैरियर के दौरान इन्होंने गोरखपुर, इलाहाबाद, भोपाल और दिल्ली वि·ाविद्यालयों में अध्यापन का कार्य किया है। मनोविज्ञान के अलावा विभिन्न विषयों पर २५ से अधिक पुस्तकें प्रकाशित। मनोविज्ञान अकादमी के राष्ट्रीय संयोजक एवं अध्यक्ष हैं। जर्मनी, ब्रिटेन तथा अमेरिका के विभिन्न वि·ाविद्यालयों में अतिथि अध्यापक रहे। सम्प्रति - महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी वि·ाविद्यालय में कुलपति हैं।

काल-चेतना और साहित्य
पश्चिम की दुनिया में परम्परा के प्रति तीव्र असंतोष के अपने ऐतिहासिक कारण हैं परंतु भारत की स्थिति भिन्न है। अंग्रेज़ी राज एक विजयी संस्कृति को व्यक्त करता था, अंग्रेज़ी शिक्षा ने हमारे मनोभाव को बदला, हम पिछड़े देश, विकासशील देश और
लोक कल्याण से विमुख शिक्षा
पिछले वर्षों में कौशल-संपन्न और बहुपठित लोग जिस तरह आर्थिक दुराचार के मामलों में शामिल होते दिखाई पड़ रहे हैं उनसे समाज और शिक्षा के रिश्ते प्रश्नों के घेरे में आ रहे हैं। शिक्षा से मिलने वाला ज्ञान मनुष्य को क्लेशों से मुक्त करने वाला सोचा गया था।
उच्च शिक्षा की चुनौतियाँ
भारत में शिक्षा को एक रामबाण औषधि के रूप में हर मर्ज की दवा मान लिया गया और उसके विस्तार की कोशिश शुरू हो गई बिना यह जाने बूझे कि इसके अनियंत्रित विस्तार के क्या परिणाम होंगे। सामाजिक परिवर्तन की मुहिम शुरू हुई और भारतीय समाज की प्रकृति को देशज दृ
मातृभाषा की प्रतिष्ठा से होगा समर्थ समाज
भाषा के अभाव में हम कैसे जीवित रहेंगे और वह जीवन कैसा होगा इसकी कल्पना ही संभव नहीं है क्योंकि हमारे जाने-अनजाने उसने हमारी दुनिया ही नहीं बदल डाली है, बल्कि उसके साथ हमारे सम्बंध का अचूक माध्यम भी बन गई है। भाषा एक ही साथ आँख भी है, दृश्य भी और द

साझे लोक से निजी विश्व की ओर
मेरे लिए गाँव जड़ और चेतन, सृष्टि के इन दोनों रूपों के साथ, एक गहरे लगाव को रूपायित करते रहे हैं। गाँव के लोग जीवंत प्रकृति के होते थे क्योंकि उनका जीवन किसी एक व्यक्ति या घर में सिकुड़ा-सिमटा न था। वहाँ तो जीवन हित-नात, सखा-संहतिया, घर-दुआर, बाग़-बग़
महाकाल की छाया में अमृत का प्लावन
कुम्भ पर्व को सुनते ही पवित्र जल श्रोत पर एक उमड़ता महा जनसमुद्र स्मृति में कौंध जाता है। यह एक नहान (स्नान) की ओर उन्मुख तीर्थ यात्रा का आखिरी पड़ाव होता है, जिसमें भिन्न-भिन्न जाति, वर्ग, आयु और समुदाय के भांति-भांति के देसी परदेसी लोग शामिल होते
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