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प्रवासी महिला कहानी लेखन में गाँव
02-Jun-2017 02:54 AM 3182     

ग्राम या देहात में रहने वाला ग्रामीण या देहाती कहलाता है। भारत की 70 प्रतिशत जनसंख्या गांवों में रहती है। भारत में अगर चालीस करोड़ लोग गरीबी रेखा के नीचे रह रहे हैं, तो इनमें से अधिकांश ग्रामीण हैं। कृषक हमारी अर्थव्यवस्था का आधारस्तम्भ हैं। लेकिन जनसंख्या वृद्धि, ज़मीन के बँटवारे और झगड़े, प्राकृतिक आपदाएँ (बाढ़, सूखा, तूफानी हवाएँ, धरती का अनउपजाऊ होते जाना, पानी का अभाव) ग्रामीण के कष्ट का कारण बनते रहते हैं। अत्याधुनिक सुविधाओं और उपकरणों से भी पूरा देश लाभान्वित नहीं हो रहा। कर्ज लेना और समय पर भुगतान की असमर्थता, आमदन से अधिक खर्च किसान को आत्महत्या की ओर धकेल रहे हैं।
प्रवासी महिला कहानी लेखन में गाँव दो प्रकार से आया है। भारतीय गाँव और ग्रामीण जीवन तथा प्रवास में ग्रामीण। ग्रामीण जनता के लिए रोज़गार का मुख्य स्रोत खेती है। वह किसान- जो मानता था कि उसकी पहचान कृषि और लहलहाते खेतों से है, नगर और महानगर की ओर पलायन कर रहा है। ग्राम्य जीवन की विडम्बनाओं और उच्चाकांक्षाओं की पूर्ति का स्वप्न उसे विदेश की ओर उन्मुख कर रहा है और अपने पारिश्रमिक स्वभाव के कारण वह डालरों से खेल रहा है। वह एनआरआई हो गया  है। वह बेचारा ग्रामीण या देहाती नहीं रहा। उसकी मेहनत रंग ला रही है।
प्रवासी महिला कहानीकारों ने उन ग्रामीण प्रवासियों का अंकन किया है, जो जीवन भर समझ नहीं पाते कि कौन सी ज़मीन उनकी अपनी है- भारत या विदेश। देहाती की पहचान उसका रागबोध, भोलापन, सीधापन, अपनत्व तथा अपनों पर विश्वास है। अपने खेतों से उसे बेइंतहा प्रेम है। प्रेमचंद के होरी जैसा आज भी उसका विश्वास है कि जो मर्यादा-इज्जत खेती-बाड़ी में है, वह मजदूरी में नहीं। इसीलिए वह कभी कमा-कमा कर अपना सारा धन अपने गाँव भेज रहा है और कभी वहीं पर ज़मीनों का मालिक बना हुआ है।
विदेश की धरती पर बैठा यह ग्रामीण ढेरों कहानियों में ग्रीन कार्ड की समस्या से दो-चार हो रहा है। सुनीता जैन की "काफी नहीं" में विदेश में वीज़ा और नागरिकता की समस्या के कारण बहुत से लोग अपनी और वहाँ की सरकार को धोखा दे शादियाँ रचाते और निभाते हैं और हजारों अवैध अप्रवासी विदेश बसने के स्वप्न के कारण वहाँ जेलों मे बंद हैं। विमान यात्रा के दौरान नायिका जानती है कि उसकी सहयात्री का पति विदेश में वीज़ा और नागरिकता के कारण अपने से काफी बड़ी स्त्री का दस साल पति बनकर रहा। अपने ही बेटे को भांजा बताकर गोद लिया और फिर छोटे बेटे के जन्म के बाद पत्नी से कोर्ट मैरिज कर उसे भी कुछ देर के लिए बुला लिया। विदेश जाने के लिए पंजाब के लोग फर्जी शादियाँ और तलाक लेते ही रहते हैं।  
ग्रामीण स्वभाव से ही सीधे-सच्चे, निश्छल-निष्कपट होते हैं। सुषम बेदी की "अच्छा बेटा" का अमित राजस्थान के किसी गाँव से अपनी पत्नी के साथ अमेरिका आया हुआ है। उसकी माँ और पिता भी साल में चार महीने के लिए आया करते हैं। आजकल यहीं है। सास-बहू के झगड़े के कारण पैंतीस वर्षीय बेटे पर तलाक के लिए ज़ोर डाला जा रहा है और अच्छा बेटा बनने के चक्कर में अनिच्छा से तलाक लेने के बाद अमित साइकोसमैटिक हो जाता है। गाँव का युवक नगर में पहुंचे, महानगर में या विदेश में रिश्तों के प्रति अनासक्ति वह पाल ही नहीं सकता। माँ-बाप का विरोध करने की उसकी हिम्मत नहीं, लेकिन जीवन साथी को  छोड़ना भी उसके लिए कोई मज़ाक नहीं। उसके अंदर सम्बन्धों के प्रति तीव्र रागबोध है।
सुधा ओम ढींगरा की कहानी "कौन सी ज़मीन अपनी" का मंजीत सिंह सोढी भले ही दशकों पहले नवांशहर के नजदीकी गाँव से अमेरिका में आकर बस गया हो, लेकिन वह कभी उस देश को अपना नहीं मान पाता। उसका वहाँ पेट्रोल पम्प है और पत्नी का बुटीक। उसे लगता है मानों वह इस स्वर्ग में काले पानी की सज़ा काट रहा है। वह बेजी की चिट्ठी आते ही पत्नी के विरोध और घर में फैले तनाव के बावजूद पंजाब में अपने भाइयों को किल्ले के किल्ले जमीने खरीदने के लिए लगातार चेक भेजता रहता है। उसका एक ही सपना है कि अपने गाँव में स्वाभिमान से आकर रहेगा। वहीं बहुत बड़ा घर बनवाएगा। अंतत: वह सारा कारोबार समेत सपत्नी गाँव आ जाता है। जल्दी ही स्पष्ट हो जाता है कि भाई-भतीजों को तो उसका मेहमान रूप ही स्वीकार था। उसके अमेरिका न लौटने के इरादे भाँप उन्हें लगता है कि वह ज़मीनों पर मालिकाना हक जमाने अथवा उनका मालिकाना हक़ छीनने आया है। अपनी हत्या के षडयंत्र से परिचित होने पर उसके पाँव तले से ज़मीन निकल जाती है और आधी रात को पति-पत्नी दोनों जान बचाकर भाग निकलते हैं। कहानी उस चीत्कार को स्वर देती है, जिसने अपने ही गाँव में मंजीत सिंह सोढ़ी को पराया कर दिया। अपने ही भाई-भतीजे जानी दुश्मन हो गए हैं। वीजा समस्या भी है। पत्नी मानिंदर के भाइयों ने वीजे के लिए कुछ वर्षों के लिए फर्जी शादियाँ की थी। नायक की स्मृतियों में गन्ने के खेत, गुड की भेली, लस्सी का छन्ना, मक्खन की कटोरी, सरसों का साग बसा हुआ है।
दिव्या माथुर की "एन आर आइज़" में तस्वीर का एक और पहलू है। यहाँ प्रवासी खान-पान की संस्कृति ग्रामीण लाजो के जीवन स्टाइल में आढ़े आ रही है। लाजो गांव से शहर झाड़ू-पोछा करने के लिए शहर इसलिए आई है कि यहाँ अच्छा खाए-पिये-ओढ़ेगी। वह एक एनआरआई परिवार में काम पर लगती है। लाजो को इन एनआरआइज़ का खाना-पीना-ओढ़ना सब अनूठा लगता है। घी, चीनी, मक्खन, आमलेट, पनीर, दूध सब से उन्हें परहेज है, तो नौकरानी भला क्या खाएगी। वह पैंट-शर्ट पहनती है, उतरन भी लाजो के किसी काम की नहीं। बेटा-बहू कमरे को ताला लगाए रखते हैं, ढंग की चीज चुरा भी नहीं सकती। अमेरिकनों की तरह नमिता का नौकरानी से दोस्ताना व्यवहार भी नहीं है। कहानी एक नौकरानी के माध्यम से भारत में रह रहे एनआरआइज़ के बारे में ग्रामीण लोगों की सोच का अंकन करती है।  
अर्चना पेन्यूली की "चाँदनी" उत्तराखंड के पहाड़ी जीवन की कठिनाइयों और गांवों से पुरुषों का लगातार हो रहा पलायन तथा प्रशासकीय उपेक्षाएं लिए है। पहाड़ी जीवन सिर्फ स्त्रियों, बच्चों, वृद्धों के बल पर ही चलता है। जो पढ़-लिख जाते हैं, वे शहरों में ही बस जाते हैं, कभी मुड़कर नहीं देखते। चाँदनी का पति उसके दूसरे बेटे के जन्म से पहले ही ऐसा शहर गया कि कभी वापिस नहीं आया। बड़े बेटे सत्य को उसने खूब पढ़ाया और वह भी माँ और गाँव से नाता तोड़ शहर का होकर ही रह गया। छोटा विजय इसलिए अब तक यहाँ है, क्योंकि वह पढ़ा-लिखा नहीं। गाँव में भयंकर भूकंप आता है। सिर्फ एक बार एक हेलिकोप्टर आता है। कोई सरकारी मदद नहीं पहुँचती। स्त्रियाँ ही घायलों का उपचार करती हैं, मृतकों का संस्कार करती हैं, मलबे के ढेर उठाती हैं। सरकार दूरदर्शन पर भूकंप पीड़ितों की मदद की झूठी घोषणाएँ करती है और शहरों में बसे पहाड़ी इन्हें तटस्थ भाव से सुनकर आश्वस्त हैं। उनकी "मोहम्मद और पंडित जी" में गुजरात और मुंबई हिन्दू-मुस्लिम दंगों के दौरान देहरादून के एक छोटे से गाँव बाघौली में एक मुस्लिम ठेकेदार मुहम्मद और एक पंडित जी में सगे भाइयों से भी अधिक अपनत्व को दिखाया गया है।   
कादम्बरी मेहरा की "जीता जीत गया" में गाँव के गंवार मानिंदर जीता को लंदन के स्कूल को वहाँ की नस्लीय सोच के कारण छोड़ सड़क पर चीजें बेचनी पड़ती हैं। लेकिन कालांतर में बिना पढ़ाई के भी, अपनी मेहनत के बल पर वह बहुत अमीर व्यक्ति बन जाता है।
उषा राजे सक्सेना की "डायरी के पन्नों सेे" में अपने ही लोग देहातियों का शोषण कर रहे हैं। पाकिस्तान के सिंध प्रांत के किसी गाँव में रहने वाली रिफ़्ता का निकाह टेलीफोन पर दूर दराज के रिश्तेदार लंदन में रहने वाले सुहेल कासिम से करवा उसे लंदन के लिए रवाना कर दिया जाता है। मूलत: सुहेल को बिना पैसे घर और बच्चों की देखभाल करने के लिए एक नौकरानी की जरूरत थी। जैसे ही वह स्थिति से अवगत होती है, रोज की मारपीट, भुखमरी, शारीरिक यंत्रणाए उसे मानसिक असंतुलन का शिकार बना देती हैं। उसके मुख पर टेप लगा उसे बाक्स रूम में पटक दिया जाता है। जहां वह दीवारों से सिर मारने को अभिशप्त  है।
ग्राम्य जीवन और न्याय व्यवस्था में पंचायत और निरंकुश पंचों  का स्थान सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। जाकिया जुबैरी की "दस्तक" में धर्म और पंचायत से, परवरदिगार और पंचों से थर-थर काँप रहा एक देहाती परिवार बेचैन है, क्योंकि उनके बेटे ने ऊंची जात की लड़की से प्रेम विवाह कर लिया है। अब पंचायत सज़ा तो सुनाएगी। सज़ा मिलेगी दस-ग्यारह साल की दो स्कूल जाने वाली बच्चियों रिदा और रीमा को। पंचों के लालच, वहशीपन, हवस, दरिंदगी से अवगत परिवार जानता है कि पंचायत न्याय नहीं केवल जुल्म करती है। भाई की करनी की सज़ा बहनों के वृद्धों के साथ विवाह करके दी जाएगी। लेकिन सरपंच को अपनी 40 साल छोटी पत्नी की बात समझ में आ जाती है और वह निर्णय पर पुन: विचार करने का फैसला लेता है।
कहानी बहु-विवाह प्रथा और स्त्री की बेबसी, बच्चियों और विशेषत: गरीबों की बच्चियों का शोषण लिए है। कहानी कहती है कि गाँव भी बदल रहे हैं।
कुंती मुकर्जी की "सोने का रथ" की विधवा प्रेमलता को गाँव वाले डायन मान लेते हैं और ननद घर से निकाल देती है। एक बस दुर्घटना को कुंती की तांत्रिक क्रिया मान गाँव वाले इतना मारते और अपमानित करते हैं कि वह आत्महत्या कर लेती है।
इला प्रसाद की "शिखा की डायरी" में आदिवासियों का मंडा मेला उनकी संस्कृति के पक्ष उजागर करता है। लावण्या शाह की "समुद्र देवा" में मुंबई के समुद्र तट के मछुआरों, उनके रीति-रिवाजों, उनकी जीवन शैली, उनके जीवन के भिन्न स्याह-सफ़ेद पक्षों का चित्रण है।

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