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प्रवासी भारतीय दिवस क्यों मनाएं
01-Jan-2016 12:00 AM 1102     

ई शताब्दियों से भारतीय दूसरे देशों में स्थाई या अस्थायी रूप से बस रहे हैं। लेकिन प्रवासी भारतीय दिवस मनाने के लिए हमें 9 जनवरी 2003 तक प्रतीक्षा करनी पड़ी। अधिकतर प्रवासी भारतीय भावनात्मक रूप से भारत से जुड़े होते हैं परन्तु यह लगाव व्यक्तिगत या सामाजिक स्तर तक ही सीमित था। प्रवासी भारतीय दिवस ने इसे एक संस्थापक रूप दे दिया। पहली बार भारत सरकार ने प्रवासी भारतीयों की भूमिका को पहचाना और उसको सरकारी तौर पर आदर दिया। इस पहल का मूल उत्प्रेरक एक आर्थिक मुद्दा ही था। 1998 में जब भारत ने एटमी विस्फोट किया तब कई पश्चिमी देशों ने भारत पर आर्थिक और तकनीकी प्रतिबन्ध लगा दिए। वि?ा वित्तीय बाज़ारों में भारत की साख गिर गयी। देश के ऊपर एक भारी आर्थिक संकट मंडरा रहा था। इस परीक्षा की घड़ी में भारत सरकार को प्रवासी भारतीयों की याद आई। सरकार ने "रिसर्जेंट इंडिया बांड' बाजार में लाया और प्रवासी भारतीयों को उसमें निवेश करने के लिए प्रोत्साहित किया। 5 अगस्त 1998 को ये बांड बाजार में आये और 19 अगस्त तक 310 करोड़ डॉलर के बांड खरीद लिए गए थे। कुछ सालों के बाद पश्चिमी आर्थिक प्रतिबन्ध हटा लिए गए। तकनीकि प्रतिबन्ध कुछ और वर्ष रहे परन्तु अगर प्रवासी भारतीय "रिसर्जेंट इंडिया बांड' में निवेश नहीं करते तो देश घोर आर्थिक संकट में फँस सकता था। भारत सरकार "रिसर्जेंट इंडिया बांड' के द्वारा लिए हुए ऋण को ठीक समय पर चुकाती रही और प्रवासी भारतीयों का भारत सरकार पर वि?ाास बढ़ता गया। प्रवासी भारतीय दिवस को इस प्रक्रिया की पराकाष्ठा है। भारत सरकार और प्रवासी भारतीयों का यह खास सम्मलेन अब आर्थिक मुद्दों से कहीं आगे सांस्कृतिक और सामाजिक आयाम भी ले चुका है। यह सम्मलेन अब भारत के प्रदेशों में और विदेशों में भी होने लगा है। आरम्भ से ही प्रवासी भारतीय दिवस का मुख्य उद्देश्य प्रवासी भारतीयों द्वारा भारत में निवेश को प्रोत्साहन देना रहा है। आज के सन्दर्भ में जब प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) पर इतना ज़ोर दिया जा रहा है इसका महत्व और भी बढ़ गया है। इसके अलावा प्रवासी भारतीय दिवस पर कुछ असाधारण प्रवासी भारतीयों को सम्मानित किया जायेगा। इसका भी बहुत महत्व होना चाहिए। कई भारतीय विदेश जाकर अपनी विलक्षण प्रतिभा और परिश्रम के कारण विदेशी समाज में भी बहुत सम्मानित हैं। यह सब के लिए गर्व की बात है। कुछ भारतीय मूल के लोग अमेरिका में राज्यपाल हैं, कुछ मंत्री हैं, कई वैज्ञानिक, उद्योगपति और प्रोफेसर हैं। चाहे हम ब्रिाटेन में, कनाडा में, ऑस्ट्रेलिया में या और किसी देश में प्रवासी भारतीयों को देखें तो अनेकों ने असाधारण सफलता पाई है। उनका सम्मान करना, उनको भारत की आर्थिक प्रगति में सहभागी बनाना बहुत नेक बात है। परन्तु, मेरे विचार में, प्रवासी भारतीय दिवस को एक विशिष्ट वर्ग तक सीमित रखना एक भूल होगी। अगर हम आर्थिक मापदंड ही लें तो वे प्रवासी भारतीयों ने जो इस विशिष्ट वर्ग में नहीं हैं, भारत के आर्थिक विकास में बहुत योगदान दिया है। उदाहरणत: वे भारतीय श्रमिक जो मध्य-पूर्व और खाड़ी के देशों में मज़दूरी करते हैं, कई कई महिनों और सालों तक अपने परिवार से अलग रहते हैं और अपने परिवार के लिये डॉलर घर भेजते हैं, भारत के विदेशी मुद्रा कोष को बढ़ाने में बहुत बड़ा योगदान करते हैं। वि?ा बैंक के आकंड़ों के अनुसार 24.7 करोड़ लोग अपने देश से अलग किसी और देश में रहते हैं। इनमें से करीब 10 प्रतिशत (यानी 2.47 करोड़) भारतीय मूल के हैं। इन भारतीय मूल के लोगों में अधिकतर श्रमिक ही हैं। भारतीय मूल के लोग जितना धन भारत भेजते हैं उतना किसी देश के प्रवासी अपने देश नहीं भेजते। वि?ा बैंक के आकंड़ों के अनुसार भारतीय मूल के लोगों का भेजा हुआ पैसा भारत के विदेशी मुद्रा कोष के करीब 25 प्रतिशत के आसपास है और एफडीआई से थोड़ा ही कम है। इन आकंड़ों की तुलना आप भारत में बसे उद्योगपतियों के विदेशी निवेश से करेंगे तो आपको पता लग जायेगा कि ये श्रमिक भारत की आर्थिक प्रगति के लिए कितने महत्वपूर्ण काम कर रहे हैं। प्रवासी भारतीय दिवस इन जैसे श्रमिकों के लिए भी होना चाहिए। ङड्ढथ्र्त्द्यद्यठ्ठदड़ड्ढ से भेजे हुई रकम में से 8 प्रतिशत कमीशन और बैंक फीस में चले जाते हैं। इन श्रमिकों और उनके परिवारों के लिए यह बहुत बड़ा बोझ है। भारत सरकार को चाहिए कि इस कमीशन और बैंक फीस को कम करवाने का हर संभव प्रयत्न करे। मध्य-पूर्व और खाड़ी में काम कर रहे कई श्रमिकों का जीवन काफी कठिन होता है और नौकरी की असुरक्षा भी रहती है। भारत सरकार को इन सब बातों पर भी ध्यान देना चाहिये। प्रवासी भारतीय दिवस भारतीय मूल के सभी प्रवासी लोगों के लिए होना चाहिए - न कि सिर्फ एक विशिष्ट वर्ग के लिए। भारत माता के आँचल में उसके हरेक बच्चे के लिए स्थान है - चाहे वह बच्चा विशिष्ट हो या साधारण।

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