btn_subscribeCC_LG.gif btn_buynowCC_LG.gif

प्रवास के मंतव्य और मानसिकता
01-Nov-2016 12:00 AM 5938     

आदिमकाल में मनुष्य का कोई निश्चित स्थान नहीं था और राष्ट्र जैसी अवधारणा तो कतई नहीं थी। भोजन के लिए पशुओं का पीछा करता या पशुपालन युग में अपने पशुओं के लिए चरागाहों और पानी की तलाश में मनुष्य जाने किन-किन जाने-अनजाने स्थानों में भटकता रहा। पशुपालन से क्रमशः कृषि और व्यापार जैसे विकास के सोपानों को पार करते मनुष्य के भटकने के रूप बदले हैं लेकिन उसमें कमी कभी नहीं हुई बल्कि संचार और यातायात के साधनों के विकास के साथ यह प्रवास बढ़ता ही जा रहा है।
राष्ट्र-राज्य की अवधारणा के बाद भी विभिन्न कारणों से मनुष्यों का विश्व के विभिन्न देशों और स्थानों में प्रवास होता रहा है। जिज्ञासु विद्वान, संत और विचारक अपने विचारों को विस्तार, परिमार्जन और नए आयाम देने के लिए दूर-दूर की यात्राएँ करते रहे हैं। कुछ तो ऐसे वैश्विक व्यक्त्तित्व हुए हैं जिन्हें नए-नए भू भाग खोजने का ही जुनून रहा है। चीन, यूनान, भारत आदि के बहुत से विचारकों और संतों ने जो यात्राएँ कीं उनके फलस्वरूप वैचारिक आदान-प्रदान के साथ-साथ धार्मिक-आर्थिक साम्राज्यवाद और उपनिवेशवाद के रास्ते भी खुले। ज्ञान के लिए भी बहुत से वैज्ञानिक, अध्येता भी दुनिया के विभिन्न भागों और विश्वविद्यालयों में गए। व्यापारी तो खैर सबसे साहसी होते ही हैं जो अपने आर्थिक लाभ के लिए देश-दुनिया में आदिकाल से ही धमाल मचाए हुए हैं।
अपने देशों के संसाधनों के दोहन और विलासिता के लिए गुलाम बनाकर दुनिया के विभिन्न भागों से गुलामों व्यापार कोई नई बात नहीं है। रोम और वर्तमान अमरीका की समस्त सभ्यता और समृद्धि गुलामों के खून पसीने पर खड़ी है। अंग्रेज भी भारत से अपने उपनिवेशों में खेती, विशेष रूप से गन्ने की खेती करवाने के लिए अग्रीमेंट के तहत बहुत से मजदूरों को ले गए जिन्हें अंततः गुलामों का सा जीवन जीना पड़ा और आज वे सूरीनाम, मॉरीशस, फीजी, त्रिनिदाद आदि में अपनी अस्मिता को बचाते हुए स्थापित हो चुके हैं।
अब भूमंडलीकरण या वैश्वीकरण के नाम से जो व्यवस्था विकसित हुई है उसमें वही मुनाफा कमाने वाला उपक्रम कुछ अधिक स्वाधीन नज़र आने वाले तरीके से किया जा सकता है। अमरीका में "मेड इन चाइना" नाम से बहुत से सामान मिलते हैं जो प्रत्यक्षतः चीन का वर्चस्व दिखाई देता है जबकि वह वहाँ के सस्ते श्रम का दोहन है जो वास्तव में अमरीका में उसके अपने मजदूरों के महत्त्व को कम करता है। बहुत से प्रवासी, जिनमें भारतीय भी अच्छी मात्रा में हैं, इसी सस्ते श्रम के तहत दुनिया के विभिन्न देशों से वहाँ जाते हैं। आज भारत से अमरीका जाने वाले लोगों में अधिकतर वे लोग हैं जो अपनी इच्छा और अथक प्रयत्नों से अपने सपनों के स्वर्ग में पहुँचे है। इनमें चिकित्सकों, कम्प्यूटर विशेषज्ञों, अध्यापकों की संख्या सर्वाधिक है। इन लोगों ने भारत में रहते हुए ही अमरीकी अंग्रेजी, वहाँ की माँग के अनुसार तौर-तरीके और ज्ञान के अन्य विधि-विधान अथक परिश्रम से सीखे हैं। और जिस एकाग्रता और एकनिष्ठता के प्रयत्न किए हैं जिनके फलस्वरूप वे यहाँ भी अच्छा भला जीवन जी सकते थे लेकिन अमरीका तो अमरीका है। इस धरती पर साक्षात जन्नत।
सारे प्रयत्नों और पुण्य-प्रताप स्वरूप वहाँ पहुँचने के बाद, समस्त मनोकामनाओं के पूरे हो जाने के बाद, उम्र के ढलान पर उन्हें लगता है कि वे एक दुविधा का जीवन जीते रहे हैं। यही तनाव और दोहरा जीवन वे अपने बच्चों से भी चाहते हैं, लेकिन इन बच्चों के लिए अमरीका वह स्वप्न नहीं रह जाता जैसा उनके माता-पिता के लिए रहा था। इसलिए वे उस दोहरे जीवन से निकलना चाहते हैं और बहुत बार तो वे अपने माता-पिता की ख़ुशी के लिए, दिखावे के लिए भारतीयता का आवरण ओढ़ते हैं। तीसरी पीढ़ी तक आते-आते यह मात्र नमस्ते और कुर्ते-पायजामे तक रह जाती है। अभी अमरीका में भारतीयों के इस वर्ग का इस दोहरे जीवन और सोच से निकलने की कोई संभावना नज़र नहीं आती। बॉबी जिंदल की तरह वे अमरीकी कहलाना तो चाहते हैं लेकिन उनका रंग न तो उन्हें कालों में मिलने देता है और न गोरे उन्हें अपने जैसा मानने को तैयार हैं। अजीब मनःस्थिति में है भारतीयों का यह वर्ग। इसका संघर्ष मॉरीशस, सूरीनाम और फीजी के प्रवासी भारतीयों जैसा नहीं है। न तो इन्होंने वैसे कष्ट झेले हैं और न ही अपनी अस्मिता को बचाने के लिए अत्याचार सहे हैं। यह वह सुविधाभोगी वर्ग है जो दोनों हाथों लड्डू रखना चाहता है।
इसके अतिरिक्त अमरीका में भारतीयों के बीच जिस राष्ट्रीय एकता की बात की जाती है वह किसी एक समान भाषा के अभाव में संभव नहीं होती। जब भी बहुत से भारतीय इकट्ठे होते हैं तो वे शीघ्र ही भाषा और प्रान्त के आधार पर अलग-अलग समूहों में बँट जाते हैं। हिंदी भाषी खुद तो अन्य भारतीय भाषाएँ सीखते नहीं हैं बल्कि गैर हिंदी भाषी भारतीयों से हिंदी सीखने की उम्मीद करते हैं। हाँ, यह वर्ग अपनी रट्टा लगाने की क्षमता के कारण अच्छी अंग्रेजी सीख लेता है और विनम्र व अधिक काम करने की तत्परता के कारण अच्छा नौकर भी सिद्ध होता है। लेकिन दूसरी तरफ यह भी विडंबना है कि उन्मुक्त सोच के अभाव में अन्य नस्लों की तरह वैज्ञानिक और आविष्कारक नहीं दे पाया है।
नौकरी और अमरीका में बने रहने के लिए सभी तरह के समझौते करने की मनोवृत्ति के कारण यह वर्ग अमरीका में अपनी स्वतंत्र और मौलिक पहचान नहीं बना पाया है। अभी तक वहां के कैलेंडरों में कहीं दिवाली का नाम नहीं होता था जबकि ईद और रमजान दर्ज होते थे। भारतीय कभी भी, किसी भी भारतीय दिवस के लिए सामूहिक रूप से एक दिन का भी अवकाश नहीं लेते। सुविधा के लिए दिवाली आदि त्यौहार तक नज़दीक के शनिवार-रविवार को ही मनाते हैं। इसी एकता के अभाव में बहुत बार भारतीय (हिन्दू) प्रतीकों का अपमान होता रहता है। वैसे जहाँ तक इन प्रतीकों के निहितार्थों की बात है तो अधिकतर इनका पालन रूढ़िवश करते हैं। खुद इन्हें उनका अर्थ मालूम नहीं है। वहीं क्या, भारत में भी स्थति बहुत भिन्न नहीं है। भारतीयों को खुश करने के लिए अमरीका में इस वर्ष दिवाली के महत्त्व को स्वीकार करने वाला 47 सेंट का "फॉर एवर" डाक टिकट जारी किया गया है लेकिन जिसका लम्बे समय तक जारी रहना उसकी बिक्री पर निर्भर करेगा।
इस संबंध में दो उदाहरण याद आते हैं। नब्बे के दशक में मुंबई की एक लड़की छात्रवृत्ति लेकर अमरीका पढ़ने गई लेकिन वहाँ सब कुछ अपने आप करना पड़ता है और न ही भारत के मध्यम वर्गी परिवार जैसी सुविधाएँ थीं। सो वह बीच में ही पढ़ाई छोड़कर भारत आ गई। इसी तरह चेन्नई का एक विद्यार्थी मेम्फिस विश्वविद्यालय में पढ़ने गया। वह वहाँ अपने हिसाब से नितांत मितव्ययिता से रहा, खुद अपना खाना बनाता था, जैसे ही पढ़ाई ख़त्म हुई वह वापस चला आया जबकि उसे वहाँ जॉब ऑफर किया गया था। अपने-अपने मंतव्य, अपनी-अपनी मानसिकता।

QUICKENQUIRY
Related & Similar Links
Copyright © 2016 - All Rights Reserved - Garbhanal - Version 19.09.26 Yellow Loop SysNano Infotech Structured Data Test ^