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प्राण जी, मैं अनल बोल रहा हूँ
01-Jun-2018 03:08 PM 2057     

विगत माह प्राण जी का निधन हो गया। उनका जाना एक बड़ी क्षति है। उनका ब्रिटेन के साहित्यिक परिदृश्य में क्या महत्व है मैंने वर्ष 2006 में लिखे एक लेख में विश्वेषण करने का प्रयास किया था। प्रस्तुत है प्रवासी टुडे के दिसंबर 2006 के अंक में प्रकाशित यह लघु लेख - उनका जाना परिवार के बड़े का जाना है। मेरी विनम्र श्रद्धांजलि।
हाल में ही लंदन में आयोजित कवि सम्मेलन में यूके हिंदी समिति द्वारा प्राण शर्मा को उनकी हिंदी सेवा के लिए सम्मानित किया गया। ब्रिटेन के हिंदी साहित्य में प्राण शर्मा का विशेष महत्व है। क्या वे एक बड़े उपन्यासकार हैं? नहीं। कोई महान कहानीकार हैं? नहीं। लेखक, आलोचक, हाँ लिखते तो हैं पर साहित्य के पुरोधाओं में गिने जाने को उन्होंने कभी महत्व नहीं दिया। हिंदी की कोई संस्था चलाते हैं? नहीं। तो फिर आप कहेंगे क्या हैं वो और उन्हें क्यों सम्मानित किया गया है! प्राण शर्मा इसलिए सम्मान के पात्र हैं क्योंकि वो पोर-पोर साहित्य में डूबे हुए व्यक्ति हैं। चूंकि उनकी हर धमनी में साहित्य की सरिता बह रही है। चूंकि हिंदी में लिखने वाला हर व्यक्ति उनका प्रिय है।
साठ के दशक में ब्रिटेन पहुंचे प्राण शर्मा ने जीवन में कई पापड़े बेले। कट्टर आर्य समाजी परिवार में रहते हुए उन्होंने गीत, संगीत, गजल को आत्यंतिक प्यार किया। जहालत झेली, पिटाई खाई। पर साहित्य के अखाड़े से बाहर नहीं आए। बंबई फिल्म नगरी में जा पहुंचे किस्मत आजमाने। बात न बनी। घूमते-घामते किस्मत ब्रिटेन ले आई। यहां बस कंडक्टरी भी की। जीवन की चक्की में अपने फर्ज निभाते रहे। पर साहित्य को दिल से लगाए रखा। धीरे-धीरे रिटायरमेंट आ गई। अब तो सारा समय पुस्तकालय और पुस्तकों में लगने लगा। उनका शौक है साहित्य पर घंटों बात करना। साहित्य पढ़ना और उसकी विशिष्टताओं को रेखांकित करना। हर अच्छी रचना के लिए रचनाकार को बधाई देना। गजल के तो वो मास्टर हैं। ब्रिटेन के बहुत से ग़ज़लकारों की रिपेयर शाप उनका घर ही है। प्राण शर्मा के प्राण हर पत्रिका में बसते हैं। उन्हें पत्रिकाओं का इंतजार सुबह के समाचार-पत्र की तरह होता है। पत्रिका ना आने पर उनकी पूछताछ, पहले चिंता फिर शिकायत से होते नाराजगी में बदल जाती है। अपने पंजाबी अंदाज में सातवें सुर पर बोलते हुए उनका फोन ब्रिटेन प्रवास में अक्सर आ जाता था- "अनल जी, मैं प्राण शर्मा बोल रहा हूँ" और घंटों साहित्य के बारे में बातें होती। सोचता हूं साहित्य में प्राण शर्माओं का क्या महत्व है। एक लेखक को दूसरे लेखक की प्रशंसा करने में प्रायः कष्ट हो जाता है। दोनों महानता और अमरता की चांदनी का एकछत्र रस पीना चाहते हैं। वो अपने लेखन को दूसरे के लेखन के बरक्स देखते हैं। उन्होंने लेखन को सिविल सर्विसेज की परीक्षा बना दिया है। अगर साहित्य मानवीय सरोकारों और श्रेष्ठ जीवन मूल्यों का प्रसार है तो यह प्रतियोगिता कैसी।
शशिकांत की एक लघुकथा याद आती है - "एक व्यक्ति ने एक लेखक से पूछा दो अच्छे लेखकों के नाम बताओ। जवाब आया एक मैं और दूसरा, दूसरा... दूसरा...।"
इस तथ्य को प्राण शर्मा ने समझा। वो एक तरफ सत्येन्द्र जी की कविताओं की प्रशंसा करते हैं तो दूसरी तरफ दिव्या और उषा जी की कहानी की। पद्मेश को अच्छी पत्रिका निकालने की बधाई देते हैं तो हम लोगों को हाईकमीशन में अच्छा काम करने की। गौतम जी की समीक्षा की समीक्षा करते हैं तो तेजेन्द्र की सक्रियता और तितिक्षा के संगठन कौशल की सराहना करते हैं। सोहन राही की गजलों के सहयात्री हैं। मसलन कौन है जो उनका स्नेह, दुलार और प्रोत्साहन न पाता हो। इसलिए मैंने ब्रिटेन के कवियों की कविता का संकलन उन्हें समर्पित किया था। वास्तव में साहित्य में ऐसे लोगों का जिक्र भूमिका में हाशिए में आता है। सच तो यह है कि सच्ची मानवीय ऊष्मा और ऊर्जा से भरे ये लोग ना हों तो साहित्य ही हाशिए में चला जाता है। ये ही साहित्य के सच्चे कद्रदान हैं। मानवीयता के सच्चे हितैषी। इन्हें सम्मानित करना साहित्य को सम्मानित करना है।

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