btn_subscribeCC_LG.gif btn_buynowCC_LG.gif

जन्मजात साक्षर विश्व की कविता
01-Aug-2018 12:49 AM 2195     

कुछ कवि ऐसे होते हैं जिनकी कविताएँ अलग-अलग समयों में अपने अर्थ खोलती हैं। महाकवि तुलसीदास ऐसे ही कवि हैं जो जीवन भर हमारे साथ चलते हैं।
अपने स्वभाव और प्रकृति से प्राप्त कर्मों पर आधारित हमने अपना वर्ण पाया है। उसका कोई विकल्प हमारे पास नहीं है। व्यवस्थाओं को हम कितना ही बदलें, यह वर्णव्यवस्था बनी ही रहती है।
समग्र अर्थ एक ही आयु में नहीं खुलता। जीवन का मूलधन कई प्रकार के ऋण चुकाकर ही बचाया जा सकता है। ऋण चुकाने के कुछ अभ्यास हमें सिखाये गये हैं। हम युवा होते हैं और गुरु का, माता-पिता का ऋण चुकाते हैं। फिर हमें संसार को पैदा करने की जिम्मेदारी सौंप दी जाती है कि थोड़ा-सा संसार भी पैदा करो, उसे बढ़ाओ। फिर हमसे कहा जाता है कि जिम्मेदारियों से मुक्त होना सीखो। यहीं न बैठे रहो, कहीं और चले भी जाओ, सन्यासी हो जाओ, परमात्मा में न्यास करो।
जीवन को बरतने की इस प्रणाली के बीच आज के कवियों की रूखी-सूखी कविता भी पढ़ता हूँ। तुलसीदास को भी पढ़ता हूँ। साहित्यकार भी हूँ, अत: इस नाते भी महाकवि के सान्निध्य में बैठता हूँ। अभी कुछ दिन पहले "पूर्वग्रह" पत्रिका ने कई साहित्यकारों से एक प्रश्न पूछा कि बताइए जनाब-- साहित्य क्या है। मुझसे भी पूछा। पहले तो लगा कि कहीं सम्पादक मज़ाक तो नहीं उड़ा रहे। कहीं सम्पादकों को यह शक़ तो नहीं हो गया कि ज्यादातर लेखक यह नहीं ही जानते कि साहित्य क्या है और लिखे चले जा रहे हैं।
जिस तरह आज हम लिट्रेचर को जानते हैं उस तरह तुलसीदास साहित्यकार नहीं हैं। तानपूरे पर तने हुए इस विश्व में "रामचरितमानस" एक गुणानुभूत राग है। ढाई आखर की ओंकार ध्वनि इस तानपूरे से नि:सृत हो रही है। यही वह आधार भूमि है जिस पर महाकवि रघुपति के चरितों की बंदिश रचते हैं। इन बंदिशों में विनय से भरी मति अनुरूप गुणगान की इच्छा प्रभु को चौपाइयों, दोहों, सोरठों, छप्पय आदि में बाँधती है। निरुपम सियाराम, उपमाओं से अलंकृत होकर मूर्तिमान होते हैं। अकथ कहानी वाणी पा जाती है।
हम एक अकथ कहानी के ही पात्र हैं और उस कहानी से दूर छिटककर उसे ही कहने की कोशिश करते हैं। हमारी जड़ें ज़मीन में नहीं, गगन में हैं। उल्टे पेड़ की तरह लटके हुए इस संसार में हम उसकी पत्तियों सरीखे हैं। हमारे अलग-अलग तरह के स्वाद उसी वृक्ष के फलों को चखते हैं। शायद स्वादों की भिन्नता ही कविता का रूप बदलती होगी। किसी कवि की कविता पढ़कर यह सहज ही माना जा सकता है कि उसने जीवन का स्वाद किस तरह चखा है। चखने की यह तरह ही कविता का शिल्प बनती होगी।
भाषा को अकथनीय के निकट ले आने का पराक्रम करते महाकवि सिर्फ अपना ही स्वाद नहीं बताते बल्कि उस स्वाद को अनुदित भी करते हैं जो उनसे पहले के कवियों ने प्रकट कर दिया है। वे आज के कवियों की तरह उस पर अपना गरम मसाला नहीं छिड़कते। अपने से पहले के कवियों को वे प्रणाम करते हैं, उनके प्रति अहसानमंद हैं।
कलिकाल के कवि कृतघ्न हैं। और उनमें विनय का अभाव भी है। तुलसीदास को इसकी बड़ी चिन्ता है। ये जो अब कवियों के झुण्ड पैदा हो रहे हैं जो सिर्फ अपना रोना रोते हैं। हमारे समय में प्रतिभाशाली कवियों का अभाव होता जा रहा है और प्रयत्नशील मण्डली सजा रहे हैं। सरस्वती के मंदिर के सामने प्रगतिवादी कचरे के ढेर बढ़ते जा रहे हैं। आलोचकों ने मेहतर होना बन्द कर दिया है। वे कचरे के ढेर पर बैठे कुक्कुट की बाँग को ही कविता मान लेते हैं।
संसार तो दर्पण है पर साहित्य दर्पण नहीं। "रामचरितमानस" संसार के साथ चलने का अनुभव है। कविता से निकलता एक ऐसा अनुभवगम्य मार्ग जिस पर हम परमेश्वर की अँगुली पकड़कर चलते हैं। यहाँ किसी वाद का बन्धन नहीं है, बेहद का मैदान फैला है। इस मार्ग पर विषय बयार से बार-बार बुझ जाने वाले दिये नहीं स्वयं प्रकाशित मणि ही रौशन है जिसकी रौशनी में भूला हुआ मार्ग प्रतीत होने लगता है, दूर टिमटिमाता हुआ अपने गाँव का दीया दीखता है।
कभी हमें भूले हुए योग की याद वेदव्यास ने दिलायी थी। पर जन बोली में इस योग की याद दिलाने का काम तो तुलसीदास ने ही किया है। हम जीते जी तो "रामचरितमानस" पढ़ते ही हैं, जब मरने लगते हैं तो फिर उसे ही सुनने की इच्छा करते हैं। मृत्यु की गहराई में उतरते हुए उसे साथ ले जाना चाहते हैं। कामनाओं से भरे जीवन में ऐसा काव्यात्मक सहारा कोई दूसरा नहीं।
रामचरितमानस कितनी कामनाओं से भरी हुई है। उसमें सिवा कामनाओं के और है क्या। सारे पात्र कामनाओं से ही तो भरे हैं। तुलसीदास कामनाओं से भरे मनुज रूप ईश्वर का ही चरित गाना चाहते हैं। कामनाहीन ईश्वर तो एक श्लोक में बाँधा जा सकता है--
न कर्तृत्वं न कर्माणि लोकस्य सृजति प्रभु:।
न कर्मफलसंयोगं स्वभावस्तु प्रवर्तते।।
रामचरितमानस में राम कर्मफल के संयोग से अवतरित होते हैं। दशरथ का पूरा परिवार युगों-युगों की कामनाओं से निर्मित होता है। कलिकाल के मुमुक्षुओं को दशरथ का परिवार ही उदाहरण हो सकता है। वह परिवार की कथा है इसीलिए घर-घर में पूजी जाती है। ऐसी कविता जो घर-घर में फैले मानस रोगों का उपचार करती है। कविता औषधि बन जाती है। गुण और अवगुणों से सनी हमारी देह में उपजे भेदभावरूपी रोगों का इलाज करती है।
हम द्विज हुए बिना आत्मज होने के अनुभव में अपनी नौका नहीं खे सकते। माँ जन्म देकर सबको आत्मज ही बनाती है पर गुरु एक बार फिर हमें अपने गर्भ में धारण कर आत्मोन्मुख करते हैं। यह हमारा दुर्भाग्य है कि अब गुरु बाँझ होने लगे हैं क्या कारण है कि अब विश्वविद्यालयों में दीक्षान्त समारोह वर्षों स्थगित रहते हैं। गुरु जब शिष्य को गर्भ में धारण ही नहीं करते तो विलग करने का प्रश्न ही नहीं उठता। "रामचरितमानस" गुरुकुल की महिमा का ग्रन्थ है। वह भारतीय समाज को अपने गर्भ में धारण किये हुए है। हर भारतीय इसी गुरुकुल का स्नातक है। "रामचरितमानस" उसे सिखाती है कि वह जन्मजात साक्षर है। यही कारण है कि तथाकथित निरक्षरता को दूर करने के उपाय अब तक व्यर्थ साबित हुए हैं।
हमारे साक्षरता मिशन का अक्षर के अध्यात्म से कोई संबंध नहीं। अब श्रम करने वाले पढ़ना-लिखना सीखते हैं और पढ़े-लिखे लोग श्रम नहीं करते। जो श्रम करता है उसका काम श्रुति से चल जाता है। लिपि में उलझे हुए लोग परमात्मा को कितना कम जानते हैं। भारतीय समाज में "रामचरित मानस" सुने जाने के कारण स्थापित हुई है, पढ़े जाने के कारण नहीं।
जो पढ़ना जानते हैं वे भी कहते हैं कि पढ़ते हुए अन्र्तध्वनि सुनायी देने लगती है। शब्दों का सहारा छूटने लगता है। महान कविता यही तो करती है। फिर जो सीधे उसे सुनकर उसकी अन्र्तध्वनि को ही सुन लेते हैं, उन्हें साक्षर होने की क्या ज़रूरत। शायद इसी कारण "रामचरितमानस" को रचते हुए तुलसीदास के मन में आखर, अरथ और अलंकृति के प्रति गहरा संशय है क्योंकि भाषा में सब उपमा बनकर आता है। वह कहाँ आ पाता है जो निरुपम है।

QUICKENQUIRY
Related & Similar Links
Copyright © 2016 - All Rights Reserved - Garbhanal - Version 19.09.26 Yellow Loop SysNano Infotech Structured Data Test ^