ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
हिंदी पर अंग्रेजी की प्रेत छाया
01-Jan-2019 01:25 PM 1419     

संविधान के भाग 17 के चार अध्यायों एवं भाग 5 व 6 के तहत क्रमश: नौ एवं एक-एक अनुच्छेद में राजभाषा के संबंध में व्यवस्थाएं दी गयी हैं। ये अनुच्छेद संघ की भाषा, प्रादेशिक भाषाओं, उच्चतम न्यायालय, उच्च न्यायालयों आदि की भाषा, हिंदी के संबंध में विशेष निदेश, संसद व विधान मंडलों में प्रयोग की भाषाओं से संबंधित हैं। इसी संदर्भ में 1952, 1955 एवं 1960 में दिए गए राष्ट्रपति के आदेशों में हिंदी के प्रयोग के बारे में सुनिश्चित अनुदेश दिए गए हैं। संसद द्वारा 1968 में पारित राजभाषा संकल्प में हिंदी के विकास हेतु भारत सरकार द्वारा व्यापक कार्यक्रम तैयार किए जाने, आठवीं अनुसूची की सभी भाषाओं के विकास, त्रिभाषा सूत्र के कार्यान्वयन, संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षाओं में आठवीं अनुसूची की सभी भाषाओं तथा अंग्रेजी को वैकल्पिक माध्यम के रूप में रखे जाने आदि के संबंध में संकल्प लिया गया है। तथापि उपर्युक्त उपबंधों के अलावा राजभाषा नीति के दो आधार स्तंभों----राजभाषा अधिनियम 1963 व राजभाषा नियम 1976 का हिंदी के प्रयोग के संबंध में विशेष महत्व है। विडंबना यह है कि दुनिया के किसी भी देश के संविधान की अपेक्षा भारतीय संविधान में राजभाषा के संबंध में इतने अधिक अनुच्छेदों, धाराओं, अधिनियम, नियमों, आदेशों, संकल्पों के बावजूद राजभाषा नीति के मूल स्वर में अंग्रेजी की यथास्थिति का वर्चस्व बनाए रखा गया है। कानून की किंतु-परंतुक शैली का चतुराई से प्रयोग करते हुए नीतियों के ऐसे अलक्षित जाल में हिंदी को उलझा दिया गया है कि वह इससे पहले भी अंग्रेजी की चेरी थी और आगे भी रहेगी।
कहना न होगा कि देश में सातवां दशक भाषा-राजभाषा के संबंध में संसद व संसद के बाहर अत्यंत विवादास्पद बहसों का केंद्र रहा है। असहमति के चंद स्वरों को खुश करने के लिए हिंदी का जिस निर्ममता से गला घोंटा गया, वह हिंदुस्तान के इतिहास में बेमिसाल है। ताज्जुब है कि संविधान की मान्य आठवीं अनुसूची में अंग्रेजी कहीं नहीं नहीं है तथापि उसे संविधान में सिर माथे बिठाया गया है। एक विदेशी भाषा देश की 22 भाषाओं के स्वर को जमींदोज कर हस्तक्षेप के साथ भारतीय प्रशासन एवं कार्य-संस्कृति में अपनी घुसपैठ बनाए हुए है जो समूची भारतीयता के लिए अभिशाप है। अतीत के इतिहास को पलटें तो यह जानकर हैरानी होती है कि राजभाषा संबंधी बहसें मूलत: हिंदी व अंग्रेजी की प्रतिद्वंदिता में उलझी रही हैं।
आठवीं अनुसूची की हमारी श्रेष्ठ प्रादेशिक भाषाओं के विकास पर बल नहीं दिया गया। यही वजह है कि जहां प्रादेशिक भाषाओं को प्रदेश स्तर पर राजभाषा का दर्जा दिया गया है वहां भी अंग्रेजी का साम्राज्यवाद कायम है। इन भाषाओं के विकास की कोई सुविचारित नीति न होने के चलते ही आज ये भाषाएं स्थानीयता अथवा प्रदेश विशेष की चौहद्दी तक सीमित होकर रह गई हैं। इस तरह भारतीय भाषाओं के विकास का जो रास्ता खुल सकता था, हिंदी व अंग्रेजी के परस्पर अंतद्र्वंद्व से अवरुद्ध हुआ है।
हिंदी को संघ की राजभाषा स्वीकार करते हुए अनुच्छेद 343 तो में कहा गया था कि संविधान के प्रारंभ से 15 वर्षों की अवधि तक संघ के शासकीय प्रयोजनों के लिए अंग्रेजी भाषा का प्रयोग किया जाता रहेगा जिनके लिए उसका ऐसे प्रारंभ से ठीक पहले तक किया जा रहा था। यह भी व्यवस्था दी गई कि संसद उक्त 15 वर्ष की अवधि के बाद भी विधि द्वारा अंग्रेजी भाषा का ऐसे प्रयोजनों के लिए प्रयोग कर सकेगी जो ऐसी विधि में विनिर्दिष्ट किए जाएं अर्थात 1965 के बाद अंग्रेजी का प्रयोग केवल कुछ निश्चित कार्यों के लिए ही हो सकता था परंतु 1965 आता इससे पहले ही अपरिहार्य दबाव के कारण संसद में राजभाषा विधेयक 1963 लाया गया तथा उसमें अनुच्छेद 343(3) के प्रावधानों की अनदेखी करते हुए अंग्रेजी के प्रयोग को 1965 के बाद उन सभी सरकारी कामों एवं संसद के कार्य व्यवहार के लिए हिंदी के अतिरिक्त जारी रखने का प्रावधान किया गया जो अंततः हिंदी के विकास के लिए काफी घातक सिद्ध हुआ है। अलबत्ता इस प्रावधान से नौकरशाही को अंग्रेजी के प्रयोग का जैसे लाइसेंस मिल गया। हिंदी को अंग्रेजी के साथ चलने के लिए एक और बैसाखी पकड़ा दी गई। इस बैसाखी को अधिनियम की भाषा में धारा 3(3) कहते हैं। इस धारा के तहत सामान्य आदेशों, संकल्पों, नियमों, अधिसूचना, प्रशासनिक या अन्य प्रतिवेदनों, प्रेस विज्ञप्ति, संसद के सदनों में रखे जाने वाले प्रशासनिक तथा अन्य प्रतिवेदनों व कागजात के लिए संविदाओं, करारों, अनुज्ञप्ति, अनुज्ञा पत्र, निविदा प्रारूपों के लिए हिंदी-अंग्रेजी दोनों का एक साथ प्रयोग अनिवार्य कर दिया गया। आज भारत के गणतंत्र एवं संप्रभु राष्ट्र घोषित होने के इतने वर्ष बाद भी तथा 1963 में राजभाषा अधिनियम लागू होने के इतने सालों बाद भी वही स्थिति है। हिंदी, हिंदी भाषी प्रदेशों में भी इस कानूनी असंगति की नियति स्वीकार करने के लिए बाध्य है। हिंदी भाषी प्रदेशों के कार्यालयों द्वारा कई बार इस युक्तिसंगत सवाल को उठाया गया कि हिंदी क्षेत्रों में उक्त कार्यों के लिए अंग्रेजी की अनिवार्यता नहीं होनी चाहिए क्योंकि यहां के कर्मचारी और अधिकारी व निवासी सभी भली-भांति हिंदी समझते व व्यवहार करते हैं। परंतु हर बार इस सवाल को यह मानकर अनदेखा किया जाता रहा है कि यह संविधान-सम्मत प्रावधानों की अवहेलना होगी कि ऐसे कार्यों के लिए केवल हिंदी के प्रयोग की इजाजत दी जाए।
हिंदी भाषी राज्यों की सहमति की शर्त : मौजूदा हालत में अंग्रेजी की प्रेत छाया से हिंदी को शायद ही छुटकारा मिले क्योंकि धारा 3(5) में यह भी स्पष्ट कर दिया गया कि यह उपबंध तब तक लागू रहेगा जब तक उन सभी राज्यों की विधान सभाएं जिनकी सरकारी भाषा हिंदी नहीं है, अंग्रेजी को हटाने के लिए प्रस्ताव पारित नहीं कर देतीं और इन प्रस्तावों पर विचार करने के उपरांत संसद भी अंग्रेजी के निषेध के लिए किसी प्रकार का प्रस्ताव पास नहीं करती। स्पष्ट है कि वह दिन कभी नहीं आएगा जब सभी राज्य सरकारें अंग्रेजी को हटाने का प्रस्ताव करेंगी। अनंतकाल तक अंग्रेजी की पूजा-इबादत करने वाला कोई न कोई रहेगा ही, जिसके चलते अंग्रेजी राजभाषा नीति व हिंदी के अस्तित्व पर प्रेत छाया की तरह मंडराती रहेगी। अंग्रेजीपरस्त राज्यों की असहमति को बर्दाश्त कर सकने वाले संविधान के चलते आज ऐसी स्थिति बन गई है कि एक राज्य भी यदि अंग्रेजी को हटाने के लिए सहमत नहीं होगा तो अंग्रेजी राजभाषा के रूप में चलाई जाती रहेगी, भले ही देश के अन्य सभी राज्य हिंदी को राजभाषा स्वीकार कर लें। इस संबंध में पंडित नेहरू का संसद को दिया गया यह आश्वासन काफी महंगा साबित हुआ कि जब तक हिंदी भाषी राज्यों की ऐसी इच्छा होगी, अंग्रेजी अतिरिक्त राजभाषा के रूप में बनी रहेगी। हिंदी की वर्तमान व्यवस्था के लिए विधेयक का उक्त प्रावधान निश्चय ही उत्तरदायी है। विधेयक की बदनीयती पर अपना मत प्रकट करते हुए सांसद सेठ गोविंद दास ने कहा था यदि इस विधेयक के अनुसार काम चला तो देश में सदा-सर्वदा के लिए अंग्रेजी ही चलेगी। इस निर्णय के विरोध में तो उन्होंने सरकार को अपनी पद्मभूषण उपाधि तक लौटा दी थी।
राजभाषा हिंदी के संबंध में बनाए गए विभिन्न प्रावधानों, अधिनियम, नियमों में अंग्रेजी का इस हद तक पोषण किया गया है कभी-कभी तो लगता है राजभाषा नीति हिंदी को स्थापित करने के लिए नहीं, अंग्रेजी का वर्चस्व बनाए रखने के लिए बनाई गई। राज्यों को जहां अनुच्छेद 345 के तहत विधि द्वारा राज्य में प्रयोग होने वाली भाषाओं में से एक या अधिक भाषाओं या हिंदी को उस राज्य की राजभाषा स्वीकार करने का अधिकार दिया गया है वहां भी यह शर्त कायम करते हुए अंग्रेजी के अस्तित्व को बनाए रखने की कोशिश की गई है कि जब तक राज्य का विधानमंडल विधि द्वारा अन्यथा उपबंध न करे तब तक राज्य के भीतर शासकीय प्रयोजनों के लिए अंग्रेजी भाषा का प्रयोग किया जाता रहेगा जिनके लिए उसका इस संविधान के प्रारंभ से ठीक पहले तक प्रयोग किया जा रहा था। संविधान की अंग्रेजी के प्रति बरती गई उदारता का लाभ राज्यों की नौकरशाही ने उठाया। राज्यों में शासन सूत्र संभालने वाले केंद्रीय हितों के पक्षधर आईएएस अधिकारी हिंदी में "विचार-विमर्श करें" लिखने की बजाए "प्लीज स्पीक" लिखना ज्यादा पसंद करते हैं और संविधान की इसी कृपा दृष्टि के चलते अंग्रेजी अल्पमत की भाषा होकर भी हिंदी पर हुकुम चला रही है।
स्रप्रति निचली अदालतों को छोड़कर उच्च न्यायालय व उच्चतम न्यायालय में अंग्रेजी का बोलबाला है। यह आतंक यहां तक है कि हिंदी माध्यम से पढ़े विधि स्नातक को बार काउंसिल की सदस्यता तक नहीं मिलती। यह और बात है हिंदी व संस्कृत प्रेमी न्यायाधीशों ने इतिहास में मिसाल कायम करने के लिए भले ही हिंदी व संस्कृत में यदाकदा फैसले दिए हों परंतु जहां तक उच्च न्यायालय या उच्चतम न्यायालय की कार्य पद्धति का संबंध है वहां अंग्रेजी का ही वर्चस्व है। न्यायालयों में अंग्रेजी को बने रहने का अधिकार संविधान ने ही दिया है। 348वें अनुच्छेद में यह प्रावधान किया गया है कि जब तक संसद दूसरा कानून नहीं बनाती है तब तक उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों की सभी कार्यवाहियों में अंग्रेजी का ही प्रयोग होगा। संसद और राज्य विधानमंडलों के कानूनों तथा संविधान के तहत संसद या किसी भी राज्य के विधान मंडलों द्वारा बनाए गए सभी आदेशों, नियमों, नियमों और विधियों के प्राधिकृत पाठ अंग्रेजी में होंगे। हां राष्ट्रपति की पूर्व सहमति से राज्यपाल को उच्च न्यायालय की कार्यवाहियों के लिए हिंदी अथवा गुजराती किसी अन्य राजभाषा के प्रयोग को प्राधिकृत बनाने का अधिकार दिया गया है परंतु कितने राज्यों के राज्यपालों ने न्यायालयों में हिंदी लाने के लिए अपने इस अधिकार का इस्तेमाल किया है? और तो और 349वें अनुच्छेद में तो राष्ट्रपति के हाथ बांध दिए गए हैं। इसमें कहा गया है कि उपर्युक्त किसी भी कार्य के लिए प्रयोग की जाने वाली भाषा की इजाजत देने वाला कोई विधेयक राष्ट्रपति की अनुमति के बगैर संसद में प्रस्तावित नहीं किया जा सकता तथा राष्ट्रपति भी ऐसे किसी विधेयक या संशोधन पर, राजभाषा आयोग व समिति की रिपोर्टों पर विचार करने के बाद ही मंजूरी दे सकेंगे।
इस बारे में संसदीय समिति की सिफारिश भी गौरतलब है। समिति यह तो मानती है कि उच्च न्यायालयों व उच्चतम न्यायालय की कार्यवाही अंतत: हिंदी में की जाए तथा निर्णयों, डिक्रियों व आदेशों की भाषा सब प्रदेशों में हिंदी में होनी चाहिए। परंतु उसका कहना है कि ऐसा "इस परिवर्तन के लिए उपयुक्त समय आने पर ही" किया जाए। यह समय कब आएगा, राम जाने। समिति को सिफारिश दिए हुए भी काफी समय हो चुका है। इस अवधि में संसदीय राजभाषा समिति 1959 से जून 2011 तक राष्ट्रपति को अपनी रिपोर्ट के नौ खंड पेश कर चुकी है जिसकी बहुत-सी सिफारिशें राष्ट्रपति मान चुके हैं तथा उन पर आदेश भी जारी कर चुके हैं। संसदीय समिति की सिफारिशों में राष्ट्रपति समेत मंत्रियों के हिन्दी में भाषण देने की बात कही गई थी जिसे राष्ट्रपति ने स्वीकार किया है। इस सिफारिश के अनुसार, जो हिन्दी बोल या पढ़ सकते हैं, राष्ट्रपति, मंत्री और अधिकारियों को हिंदी में ही भाषण देना चाहिए। संसदीय समिति ने सीबीएसई से जुड़े सभी स्कूलों और केंद्रीय विद्यालयों में कक्षा 10 तक हिंदी को अनिवार्य विषय के रूप में पढ़ाने का प्रस्ताव भी दिया था जहां अभी इन स्कूलों में कक्षा 8 तक ही हिंदी पढ़ना अनिवार्य है। वहीं गैर-हिन्दी भाषी राज्यों के विश्वविद्यालयों को कहा गया है कि परीक्षाओं और इंटरव्यू में हिन्दी में उत्तर देने का विकल्प दें। इन सिफारिशों में यह भी है कि गैर हिंदीभाषी राज्यों के विश्वविद्यालयों से मानव संसाधन विकास मंत्रालय कहेगा कि वे विद्यार्थियों को परीक्षाओं और साक्षात्कारों में हिंदी में उत्तर देने का विकल्प दें। यह सिफारिश भी स्वीकार की गई है कि सरकार सरकारी संवाद में कठिन हिंदी शब्दों के उपयोग से बचे और हिंदी शब्दों के अंग्रेजी लिप्यंतरण का एक शब्दकोश तैयार करे। सभी मंत्रालय ऐसा शब्दकोश बनाएं और मानव संसाधन विकास मंत्रालय की ओर से तैयार किए जाने वाले 15,000 शब्दों के शब्दकोश का भी उपयोग करें। उदाहरण के तौर पर "डीमॉनेटाइजेशन" जैसे शब्दों के लिए "विमुद्रीकरण" या आम बोलचाल में प्रचलित "नोटबंदी" जैसे शब्द का उपयोग किए जाने को प्राथमिकता दिए जाने की बात कही गयी है। पर सरकारी नौकरी के लिए हिंदी के न्यूनतम ज्ञान की अनिवार्यता की सिफारिश को अभी स्वीकार नहीं किया गया है जो कि हिंदी के प्रयोग की आधारभित्ति है। एक बार सेवा में आने के बाद प्रशिक्षण व हिंदी के कार्यसाधक ज्ञान की जो मुहिम चलाई जाती है वह आंकड़ों के दिखावे के अलावा बहुत कारगर नहीं हो पाती। क्योंकि बिना बुनियादी व निर्धारित स्तर तक हिंदी की तालीम में भाषाई दक्षता हासिल कर पाना संभव नहीं है। ऐसे हालात में हम अनुवाद के जरिए संवैधानिक आवश्यकताओं की पूर्ति तो कर सकते हैं पर हिंदी का स्वाभाविक कामकाजी माहौल नहीं तैयार कर सकते।
समिति की ये रिपोर्टें हजारों पृष्ठों की हैं, परंतु देखने की बात है कि देश की विधानसभाएं और सरकारें इन पर क्या टिप्पणियां करती हैं और इन सिफारिशों में हिंदी को लागू करने के लिए किन-किन उपायों पर बल दिया गया है तथा उनका कार्यालय में किस तरह हो पाएगा?
शिक्षा व्यवस्थाएं व भर्ती परीक्षाएं : अब देश की शिक्षा व्यवस्था व भर्ती परीक्षाओं पर भी एक नजर डालें। यह सच्चाई है परंतु देश के लिए दुर्भाग्यपूर्ण कि हमारे यहां आज भी कमोबेश मैकाले की शिक्षा पद्धति लागू है। राष्ट्रीय स्तर पर शिक्षा नीति में समानता नहीं है। वर्तमान शिक्षा नीति के मसौदे में जहां शिक्षा के पुनर्गठन, तकनीकी एवं प्रबंध शिक्षा, मूल्यों की शिक्षा, विज्ञान शिक्षा, गणित व कंप्यूटर शिक्षा जैसे मुद्दों पर जोर-जोर से बातें उठाई जाती रहीं, वहीं भाषा और माध्यम के प्रश्न को लगभग अनदेखा किया जाता रहा। यहां तक कि 1968 के राजभाषा संकल्प में समूचे भारत में त्रिभाषा सूत्र लागू किए जाने की आवश्यकता पर बल दिया गया था किंतु कालांतर में यह सूत्र भी न जाने कहां विलीन हो गया। इसमें हिंदी भाषी क्षेत्रों में हिंदी अंग्रेजी के अलावा दक्षिण भारत की भाषाओं में से किसी एक और हिंदी भाषी क्षेत्रों में प्रादेशिक भाषाओं एवं अंग्रेजी के साथ-साथ हिंदी के अध्ययन का प्रावधान रखे जाने का संकल्प लिया गया था, परंतु राष्ट्रीय शिक्षा नीति इस बिंदु पर भी विफल रही है। आज न तो सर्वत्र माध्यम के रूप में और न त्रिभाषा सूत्र की एक भाषा के रूप में हिंदी और अन्य दक्षिण भारतीय भाषाओं का अस्तित्व शिक्षा नीति के मसौदे में कायम है। बल्कि राजभाषा हिंदी के प्रति शिक्षा नीति की उदासीनता के चलते गली-गली में कान्वेंट स्कूलों की इकाइयां खुल गई हैं जो देश की राजभाषा नीति, नियम, नियमों और आदेशों के गाल पर खुला तमाचा मारकर हिंदी व संस्कृत जैसे विषयों को भी अंग्रेजी माध्यम से सिखा रही हैं।
क्या विडंबना है कि कानून कहता है, हिंदी किसी पर थोपी नहीं जाएगी, अधिनियम कहता है, हिंदी के साथ फलां-फलां चीजों के लिए अंग्रेजी का प्रयोग अनिवार्य होगा। राजभाषा नियम कहता है, कोई भी कर्मचारी किसी भी फाइल पर टिप्पणी या नोटिंग हिंदी या अंग्रेजी में लिख सकता है; उससे अनुवाद की अपेक्षा नहीं की जाएगी। नियम कहता है हिंदी भाषा-भाषी क्षेत्रों के कार्यालयों और अर्ध हिंदी भाषी क्षेत्रों के कार्यालय के साथ पत्राचार हिंदी या अंग्रेजी में किया जा सकता है। पर अहिंदीभाषी इलाके के कार्यालयों को हिंदी में पत्र भेजने पर उसका अंग्रेजी अनुवाद भी भेजना होगा। इसके विपरीत हिंदी पत्राचार का लक्ष्य हिंदी भाषी क्षेत्रों में 100 प्रतिशत है। नियम 8(4) के तहत विनिर्दिष्ट कार्यालयों में टिप्पण तथा अन्य समस्त कार्य हिंदी में अनिवार्य है। ऐसे हालात में जब अंग्रेजी के प्रयोग को जारी रखने के लिए हिंदुस्तानी अंग्रेजों को राजभाषा नीति ही आश्रय देती हो वहां हिंदी के प्रयोग के लिए हिंदी जनों की कोशिश अथवा सरकार की कोशिशें सफल नहीं हो सकतीं। आज के संदर्भ में क्या यह जरूरी नहीं हो गया है संविधान के अनुच्छेदों पर राजभाषा अधिनियम व नियमों पर फिर से गौर किया जाए तथा हिंदी को उसका खोया हुआ आत्म सम्मान वापस किया जाए। कम से कम हिंदी क्षेत्रों में द्विभाषिकता की अनिवार्यता को खत्म कर हिंदी को अंग्रेजी की छाया से मुक्ति दिलाई जाए। शिक्षा के स्तर को देशभर में एक समान किया जाए, सभी परीक्षाओं नौकरियों में हिंदी सहित देश की सभी मान्य भाषाओं में लिखित परीक्षा पत्रों व साक्षात्कार का विकल्प रखा जाए। बहुमत पर अल्पमत की भाषा थोपने का प्रयत्न अब तो कम से कम खत्म होना चाहिए।

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