ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
पाषाण नगरी पेट्रा
01-Oct-2017 01:30 PM 2441     

इजराईल-जोर्डन की हाल की यात्रा के अंतिम चरण में हमें विश्व के नए सात अजूबों में से एक पेट्रा के दर्शन करना थे। इस पूरी ट्रिप में लगातार आठ दिन, हर सुबह टूर मैनेजर के अलसुबह के वेक अप काल, फटाफट ब्रेकफॉस्ट और शटाशट डिपार्चर का अनाउंसमेंट सुनते, करते दल के मेरे अन्य साथी भी बेबस थे। पर मुंबई लौटने के लिये जोर्डन की राजधाानी अम्मान से फ्लाईट रात के तीन बजे पकड़ना थी। एक पूरा दिन हमारे पास था। इसलिए तेलअवीव से सुबह-सुबह विदा होने के साथ हमें "पेट्रा" की विजिट, एक रोमांचक आमंत्रण लग रही थी। तेलअवीव से निकलकर जेरूसलेम पारकर, डेड सी के बाजू से दुबारा होते हुए, समुद्र तल से 400-500 फुट नीचे बने राजमार्ग और इजराईल-जोर्डन की बार्डर इमीग्रेशन औपचारिकताओं को पूरा कर हम जोर्डन रेगिस्तान में थे। जोर्डन का रेगिस्तान बस की खिड़की से रेतीला, धूल भरा, चांद की जमीन जैसा ऊंचा-नीचा, विस्तृत फैला हुआ था और राजमार्ग निर्जन और बियाबान था। लगभग पांच घंटे का सफर था।
दोपहर होते-होते हम एक अरबी ढाबे पर पहुंच गए थे, जो कुछ-कुछ अपने दिल्ली-जयपुर के मिड-वे की तर्ज पर था। यहां पर हमस (चने के पेस्ट में जैतून का तेल), पीटा ब्रेड और अरबी मिठाई हरीसा का भी लुत्फ उठाया। इस जोर्डनियन मिड वे के शेफ ने बताया कि हरीसा इस क्षेत्र की मनभावन मिठाई है। सूजी की बनती है। सूखे मेवे और गुलाब जल डालने से इसका स्वाद अद्भुत हो जाता है। वैसे यह हमारी खोपरा बर्फी की तरह लगती है। शुध्द शाकाहारी व्यक्तियों के लिये इन देशों में सलाद विभिन्न प्रकार के भिन्न-भिन्न रूपों में, रंगों में, स्वादों में मिलते हैं, इसलिए बन्दा भूखा तो नहीं उठता था। वैसे शाकाहारी खाने के पहले पूछ लें तो ही बेहतर। रेस्टारेंट में डिशेज दिखती एक जैसी हैं इसलिए कभी-कभी धर्मसंकट में पड़ जाता है। और आप विकट स्थिति में। खैर, दोपहर ढलते-ढलते हम पेट्रा पहुंच चुके थे। बस अव्े से लगभग तीन किलोमीटर कच्ची सड़क पैदल पहाड़ों में उतरना था। वैसे यहां बग्घी या घोड़ा भी कर सकते हैं। पर इनका भाव जरूर तय करके जाएं।
पेट्रा लगभग चालीस बरस पहले विश्व पटल पर उभरा और आज जोर्डन के टूरिस्ट नक्शे पर अहम केन्द्र है। पर्यटकों के लिये साठ से अधिक होटलें हैं और दुनियाभर से लोग इस अजूबा पाषाण नगरी को देखने आते हैं। जोर्डन का ऐतिहासिक, पौराणिक, सांस्कृतिक, शहर पेट्रा अपनी रहस्यमयी आकर्षक  वास्तुकला के लिये दुनिया के सात आश्चर्यों में शुमार है।
जोर्डन की राजधानी अम्मान से ढ़ाई सौ किलोमीटर दूर पेट्रा में वे सभी इमारतें थीं, जो सभ्यता के उस दौर में  एक शहर में होती हैं। 138 फुट ऊंचा मंदिर, पानी के लिए पहाड़ों में कटी नहरें, खुला स्टेडियमनुमा चौगान।  इतिहास बताता है कि ढाई हजार वर्ष पूर्व खानाबदोश किस्म की संस्कृति इस क्षेत्र के निवासियों में थी, जिन्हें "नेबेटियन्स" कहा जाता है।
"पेट्रा" से लगा हुआ मूसा वादी कस्बा है। नाम से जाहिर है, कि ये पहाड़ी, घाटियों से घिरी वादी है। अरब मान्यता के मुताबिक संत मूसा ने यहां अपनी लाठी से चट्टान पर प्रहार किया और मीठे पानी का झरना फूट पड़ा। इस पवित्र झरने का पानी पर्यटक, तीर्थयात्री आचमन करते हैं, बोतलों में भरकर भी ले जाते हैं, गंगाजल की तरह। गाईड ने बताया कि इस प्रकार के 12 झरने इस मिडिल ईस्ट रीजन में है। इस झरने से ही यहां के मूल निवासी नेबेटियन्स ने पहाडों में नहरें काट कर बनाई जिनसे पेट्रा को पानी पहुंचता था।
पहाडों को काटकर पर्वतों की ओट में बसा नगर, विशाल प्रसाद, गोल, ऊंचे खंबे, रोमन-ग्रीक स्थापत्य कला से समृध्द, द्वारपालों की मूर्तियां, पाषाणों में उत्कीर्ण प्रतिमाएं, ये पेट्रा की ट्रेजरी याने अल-खजाना है। कहते हैं पेट्रा की ट्रेजरी में उस नगर का राजा अपनी दो प्यारी रानियों के साथ, पुनर्जीवित होने की आस में 1200 ईसा वर्ष पूर्व से लेटा है। साथ में उसका रोजमर्रा में काम आने वाला सामान भी रखा है। गाईड से ये सुनते हुए और खजाने के बाहर खड़े हुए, आपको भी महसूस होने लगता है कि यदि आप थोड़ी देर और रुकेंगे तो इस विशाल द्वार के भीतर से बादशाह बाहर आएंगे और आपसे आने की वजह पूछेंगे। तभी किसी शायर के शेर की एक पंक्ति याद आ गई - पत्थर के खुदा, पत्थर के सनम, पत्थर के ही इन्सां पाए हैं। लाल बालुई पत्थर से बने ये रहस्यमय राजप्रसाद नगर, बावडी अपने गर्भ में कितने युग पुरानी कहानियां समेटे हैं, ये सोचकर देखने वाला भी रोमांचक हो जाता है। आंखों के सामने घोड़ों के ऊपर सवार सैनिक, ऊंट के काफिले के साथ व्यापारी दिखने लगते हैं।
इतिहास के मुताबिक नेबेटियन्स मूलत: व्यापारी थे और पूर्व देशों से सामान खरीदकर पश्चिमी देशों को बेचते थे। पूरब से मसाले, पशु, कपास, इत्र, काली मिर्च, सोना खरीदते थे और मिस्त्र, रोम, यूनान को बेचते थे। चीन और भारत में भी इनका व्यापार होता था। महान पूर्वी और पश्चिमी सभ्यता के मध्य विचार-विनिमय, आविष्कार और संस्कृति का आदान-प्रदान भी इन नेबेटियन्स व्यापारियों द्वारा होता था। चीन, भारत और मध्य पूर्व का यह स्पाईस रूट (मसाला मार्ग) था। पत्थरों के इस शहर में मकबरे बहुत हैं। और लोग खजाने की खोज में भी गुप-चुप यहां आते रहते हैं। संभवत: "इंडियाना जोन्स" सीरीज की कोई फिल्म की शूटिंग भी यहां हुई थी। इन रहस्यमय पहाडों और गहरी वादियों के बीच इस गर्द-ओ-गुबार में क्षण-क्षण क्षर-क्षर होती प्रतिमाएं कविवर वीरेन्द्र शिवहरे की इन पंक्तियों को शायद दुहरा रही थीं -
तराशा हुआ पत्थर हूं अब बस टूटना बाकी है,
पुर्जे तो मेरे कर चुके हो, बस अब लूटना बाकी है।
शांति का टापू बना जोर्डन : नब्बे हजार वर्ग किलो मीटर के क्षेत्रफल में फैले जोर्डन का दो-तिहाई हिस्सा रेगिस्तान है। कुल आबादी 70 लाख है जिसमें से आधे याने 35 लाख लोग राजधाानी अम्मान में ही रहते हैं। जिस सुबह हम अम्मान पहुंचे, जुमे (शुक्रवार) का दिन था। सडकें वीरान, चौराहे सुनसान, हम हैरान। गाईड ने बताया शुक्रवार को सब बंद रहता है। यहां के शाही परिवार का रुतबा और सम्मान आमजन में मजबूत है। अब्दुल्ला (द्वितीय) जोर्डन के बादशाह हैं और इनका परिवार सीधा इस्लाम में नबी हुए मुहम्मद के वंशज माने जाते हैं। मिडिल ईस्ट रीजन में जोर्डन सबसे स्थायित्वपूर्ण सरकार, शांतिपूर्ण जीवन और सुरक्षित पूर्ण, पर पाश्चात्य रंग-ढंग में बसा देश है। अन्य देशों के आम शरणार्थी, निर्वासित अपदस्थ राजनेता मिलिट्री चीफ भी यहां शरण लेकर रहते हैं। हां, रहने के लिये रकम उन्हें अच्छी चुकाना पड़ती है। इसे निर्वासितों का स्वर्ग भी कहा जाता है।
मिडिल ईस्ट के अन्य देशों के विपरीत जोर्डन पेट्रोल के मामले में शून्य है। पर खनिज संसाधान यहां इफरात में हैं। यहां से रॉक फास्फेट, पोटाश निर्यात होता है। भारत भी जोर्डन से राक फास्फेट अर्थव्यवस्था को और मजबूती देने के लिये आयात करता है। पर्यटन उद्योग को बढाया जा रहा है। सात पहाडियों पर बसे अम्मान शहर में मुख्य सड़क 20 किलोमीटर लंबी सीधी रेखा में हैं। मार्ग के दोनों ओर मिलाकर साढे छह हजार दुकानें हैं, सुपर मार्केट, रेस्टारेंट हैं। हमारे गाईड अहमद ने हमारे सामने जोर्डन की आर्थिक तस्वीर भी रखी। मुद्रा के मामले में जोर्डन ने अमेरिका को पछाड़ दिया है। एक जोर्डन डॉलर के बदले आपको 1.5 अमरीकी डॉलर देने पड़ेंगे और हम भारतीय तो एकदम 90 रुपए से हल्के हो जाएंगे।
गुड लावजो : बचपन की स्मृतियां सजीव हो गईं। बाबूजी (स्व. माणिकचंद्र जी बोन्द्रिया) सफर पर जाने से पहले दादी को प्रणाम करते थे। समय पर दवाई लेना, खाना खा लेना की बातों के अलावा इसका एक सूचनात्मक महत्व भी था कि, मैं बाहरगांव जा रहा हूं। दादी आशीर्वाद देती थी - गुड लाउजो। याने यात्रा सफल हो, काम पूरा हो। जब लौटते थे तो सबके लिये कुछ न कुछ होता था। खिलौना, मिठाई, कुछ भी। बाबू जी ने दुनिया देखी। प्रदेश, देश, विदेश। टोक्यो से टेक्सास तक। अब सोचता हूं कि मीटिंग, सेमिनार की इतनी व्यस्तताओं के बावजूद वे हम सबके लिये कुछ न कुछ लेने का समय कैसे निकाल लेते थे। जैस इकॉन (जर्मनी) के बैलो (फोÏल्डग) कैमरे से लेकर इस्टेंट पोलोरॉयड कैमरा, जो 70 के दशक में एक अजूबा था, विदेश से लाए, जिससे अग्रज प्रमोद भैया ने उनके फोटोग्राफी के शौक को परवान चढ़ाया। बहरहाल गुड़ लाने की ये परंपरा अभी भी बदस्तूर कायम है। अम्मान के क्वीन आलिया इंटरनेशनल एयरपोर्ट पहुंचने से पहले मिडिल ईस्ट की मशहूर मिठाई दुकान "हबीबा" स्वीट्स से रस भरी बकलावा के डिब्बे लिये। ये मिठाई शहद में रसी-पगी होती है, और ढेर सारे मेवे डले होते हैं। मुंह में मक्खन की तरह घुलती जाती है। खेत-खलिहान, उजाड़ मकान, वीरान रेगिस्तान के साथ ये टी-3 याने टाम्ब-टेम्पल-टूर समाप्त हो रहा था। विदेश यात्रा निर्विघ्न संपन्न हो रही थी। शहद भरी मिठाई ली और घर की ओर लौटेे।

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