ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
परकटी चिड़िया एक और पड़ाव
01-May-2016 12:00 AM 2087     

परकटी चिड़िया


क्या बिगड़ गया
जो पंख कट गया
अब भी देखो
घूमती हूँ मस्ती से!

न हुआ आसमान
ज़मीन ही सही
परवाज़ के लिए
आका¶ा ज़रूरी तो नहीं!

तुम यूं ही उदास
मत होना मेरे लिए
उड़ने को मन का
विस्तार कम तो नहीं!


 

एक और पड़ाव

इन रंग-बिरंगी
चिड़ियों की भी
क्या ज़ुबान
लड़खड़ाती होगी?
जब अपने दे¶ा से
दूर कहीं और
उड़ कर जाती होंगी।

उड़ते-उड़ते  
इनकी देह भी क्या
थकान से चूर
हो जाती होगी?
जब वे पूर्वी तट से
प¶िचमी तट की
लम्बी उड़ान
भरती होंगी।

क्या इनको भी
अपने पुराने नीड़
वापस बुलाते होंगे?

नई जगह के नए
मौसमों को देख
क्या ये भी चहकना
भूल जाती होंगी?

कोई रि¶ता तो है
इंसान से इनका
जो दे¶ा-परदे¶ा में
घायल टूटे पाँव पे
भटक रही हैं
यहाँ से वहाँ!

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