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पण्डित पदयात्रियों की हिमालय यात्राएँ
01-Feb-2017 12:02 AM 4863     

भारत में सन् 1857 के असफल स्वतंत्रता संग्राम ने ईस्ट इण्डिया कम्पनी की चूलें हिला दी थीं। तत्कालीन सरकार देश के अंदरूनी इलाकों के साथ-साथ सीमावर्ती प्रदेशों को सुरक्षित करने में जुट गयी। भारत की उत्तरी सीमा बनाते हिमालय और उसके पार के क्षेत्रों विषयक भौगोलिक, राजनैतिक और सांस्कृतिक ज्ञान अधिक नहीं था। उदाहरणतः उस समय के ब्रिटिश भारत में तिब्बत के पठार को एक सफ़ेद विशाल भूखंड के रूप में ही दिखाया गया था चूँकि पहाड़ों, चोटियों, नदियों, गाँवों और शहरों इत्यादि  के बारे में जानकारी पर्याप्त नहीं थी। बहुत सी नदियों, जैसे सिंधु, ब्रह्मपुत्र इत्यादि के उद्गम स्थलों का भी पता नहीं था। उस समय पश्चिमी व्यक्तियों का तिब्बत में प्रवेश निषिद्ध और खतरनाक था हालांकि समय-समय पर प्रयास अवश्य हुए जो अधिकतर निष्फल रहे। सन् 1849 में प्रसिद्ध वनस्पति शास्त्री ख्.क़्.क्तदृदृत्त्ड्ढद्ध और उनके सहयोगी हिमालय के पेड़-पौंधों को एकत्रित करते-करते सिक्किम की ओर से तिब्बत की सीमा के अंदर पहुँच गये थे किन्तु उन्हें लौटा दिया गया। नियमों के उल्लंघन होने के कारण सम्बंधित तिब्बती सीमा रक्षकों को कठोर दण्ड मिला।
इन परिस्थितियों में ईस्ट इंडिया कम्पनी के कप्तान मांटगुमरी  का भारत में कार्यकाल बहुत महत्वपूर्ण रहा। उन्होंने सन् 1863 में देहरादून स्थित सर्वे ऑफ़ इंडिया, जो भारत का सर्वप्रथम सर्वेक्षण एवं मानचित्रकारी संस्थान था, के महान त्रिकोणमितीय सर्वेक्षण (क्रद्धड्ढठ्ठद्य च्र्द्धत्ढ़ददृथ्र्ड्ढद्यद्धत्ड़ठ्ठथ् च्द्वद्धध्ड्ढन्र्) के अन्तर्गत देसी भारतीयों के सर्वेक्षणकारी गुप्तचर दस्ते का गठन किया। इन गुप्तचरों ने छद्म रूप से कभी तीर्थयात्री और कभी व्यापारी का रूप धारण कर विभिन्न पदयात्रायें कीं। इस मिशन के लिए सीमावर्ती प्रदेशों के वे ही लोग चुने गए जो स्थानीय भाषाओं के साथ-साथ तिब्बती, अफगानी या मध्यएशिया की भाषाओं व संस्कृतियों में भी पारंगत थे।
इन व्यक्तियों को विविध सूचनाएँ एकत्रित करने और भौगोलिक और तलरूप के सर्वेक्षण की वैज्ञानिक विधियाँ सिखाई गयीं जिनमें जमीन की ऊँचाई, वायु और जल का तापमान, दिशा नापना इत्यादि शामिल थे। एक ब्रिटिश ड्रिल सारजेंट ने रंगरूटों को (गुप्त नाम "पण्डित" 1, 2, 3, इत्यादि), दो हजार कदमों से प्रति मील चलना सिखाया। इस प्रकार पैदल चलकर दो स्थानों के बीच की दूरी आसानी से नापी जा सकती थी। जहाँ बौद्ध भिक्षुक की पदयात्रा अद्भुत बात नहीं थी उन क्षेत्रों का भ्रमण करने वाले पण्डितों को संशोधित बौद्ध जपमाला भी दी गई जिसमें 108 मनकों के बजाय 100 मनके थे। हर मनका 100 कदमों का प्रतीक था। उन्हें सर्वेक्षण के परिणामों व दूसरी जानकारी को कागज़ पर लिखकर तिब्बती बौद्ध प्रार्थना चक्र में छुपाना सिखाया गया। प्रार्थना चक्र के बीचोंबीच दिशा नापन के लिये कंपास छुपाई गयी थी। इसी प्रकार इस्लाम बाहुल्य क्षेत्रों की यात्रा करने वाले पण्डित आसानी से 99 मनकों की तस्बीह में एक मनका जोड़ कर 100 मनकों की सूफी तस्बीह अपने साथ ले जा सकते थे। घड़ी, बैरोमीटर (हवा का दवाब), थर्मामीटर (समुद्र तल से जमीन की ऊँचाई नापने के लिए उबलते पानी का तापमान लेने के लिये), व सेक्सटेंट (अक्षांश (थ्ठ्ठद्यत्द्यद्वड्डड्ढ) नापने के लिये) यन्त्र व एक खोखली छड़ी जिसमें चाँदी-सोने के सिक्के छुपाये जा सकें, प्रत्येक पण्डित को दिये गये। पण्डितों को खगोल विद्या भी सिखाई गयी थी ताकि वे खगोलीय पर्यवेक्षण कर सकें। एकत्रित नाप व डेटा कागज़ के टुकड़े पर बौद्ध प्रार्थना स्वरुप लिखे गये और उन्हें प्रार्थना चक्र (द्रद्धठ्ठन्र्ड्ढद्ध ध्र्ण्ड्ढड्ढथ्) में छुपाया गया। सन् 1863 से आरम्भ होकर लगभग तीस पण्डित प्रशिक्षित हुए, जिन्होंने मध्यएशिया से लेकर पूर्वी हिमालयवर्ती स्थानों की विभिन्न यात्राएँ कीं। पण्डितों के असली नाम व प्रमुख पदयात्रा क्षेत्र संक्षेप में इस प्रकार हैं :
अब्दुल हमीद (लेह से यारकंद - 1863), नैन सिंह व मणि सिंह (तिब्बत में प्रवेश का प्रयास - 1864), मनफूल (बोख़ारा - 1865), नैन सिंह, छुम्बल, मणि सिंह (काठमाण्डू से ल्हासा, गारटोक होते हुए मानसरोवर - 1865-66), नैन सिंह, मणि सिंह (सतलज, सिंधु के हिमालय में स्रोत और थोक जलौंग सोने की खान वाला तिब्बत क्षेत्र - 1867), हरीराम, कल्याण सिंह (एवरेस्ट प्रदेश, थोक जलोंग, शिगतज़े, मुक्तिनाथ - 1968), मिर्ज़ा शुजा (काबुल, काशगर, यारकंद, लेह - 1868-1869), किशन सिंह (राकस ताल, करनाली नदी - 1869), हैदर शाह, अता मुहम्मद (फैज़ाबाद, चितराल - 1870), हरीराम, किशन सिंह (ताशिराक, काठमाण्डू, कुमाऊं, शिगेत्जे, ल्हासा, गारटोक - 1871-1872), मिर्जा शुजा (बोख़ारा -1872-1873), हरी राम व  किशन सिंह (कुमाऊं, काली गण्डकी, मुक्तिनाथ, मुस्तांग, खोतान, पोलू, नोह्, लेह - 1873), हैदर शाह, नैन सिंह (दूसरा यारकंद मिशन - 1873), अता मोहम्मद  (चित्राल, वखान, यारकंद - 1873-1874), अब्दुल सुब्हान (काबुल, वखान, ओक्सस, रोशन - 1874), नैन सिंह, छुम्बल (लेह, तेंग्री नोर, ल्हासा, तवांग (असाम)- 1874-1875), लाला, अता मोहम्मद, सईद अमीर (दार्जीलिंग, शिगेत्जे, त्सोना, शिगेत्जे, गिलगित- 1875-76), अब्दुल सुब्हान (उदयपुर, 1876-1877), लाला (दार्जीलिंग, लाचेन ला- 1877), अता मोहम्मद (स्वात नदी - 1878), नेमसिंह किंथुप (दार्जीलिंग, ल्हासा, सीतांग, सांन्ग पो, गयल, फारी - 1878-1879), मुख़्तार शाह (ऑक्सस नदी, वाखान, बदख्शांन, गिलगित - 1878-1881), किशन सिंह, छुम्बल (दार्जीलिंग, ल्हासा, पूर्वी तिब्बत, दक्षिणपूर्वी तिब्बत, खमबारजी, दार्जीलिंग - 1878-1882), रिंजिन नामग्याल, नेम सिंह अलाग (सिक्किम- 1879), शरतचन्द्र दास एवं लामा उग्येन ग्यात्सो (ऊपरी इरावदी, जोनसांग ला, शिगेत्जे- 1879), नेम सिंह (शिगेत्जे, खम्बा जोन्ग- 1880),  सुखदर्शन सिंह (पोपटी ला (नेपाल-तिब्बत सीमा) एवं पूर्वी नेपाल- 1880-1881), शरतचन्द्र दास एवं लामा उग्येन ग्यात्सो ( शिगेत्जे, ल्हासा - 1880-1882), रिंजिन नामग्याल (सिक्किम, तालुंग घाटी- 1883), किंथुप एवं एक चीनी लामा (त्संगपो, गएला, ओलोन, दार्जीलिंग- 1880-1884), लामा उग्येन ग्यात्सो ( शिगेत्जे, कुला  कांगड़ी, ल्हासा, छुम्बी- 1883-1884), सैयद मियां, पश्चिमी नेपाल, कुमाऊं - 1884), रिंजिन नामग्याल (दार्जीलिंग, जोनसोंग ला, छोरटन नइमा ला, लाचन, दार्जीलिंग- 1884- 1885), हरी राम (सोला खुम्बू, टेंगरी, काठमाण्डू - 1885), रिंजिन नामग्याल (सिक्किम, पूर्वी और मध्य भूटान, दक्षिणी तिब्बत- 1885-1886), रिंजिन नामग्याल, (पश्चिमी और मध्य नेपाल सीमा का सर्वेक्षण- 1887- 1888), अता मुहम्मद (अफगानिस्तान- 1888), रिंजिन नामग्याल (ब्रह्मपुत्र नदी के छोर पर स्थित सदिया तक- 1888-1889), अता  मुहम्मद (लेह से बतांग तक, नैन सिंह के 1874 पथ से 50 मील उत्तर में, - 1891-1893), हरीराम और पुत्र (नेपाल और तिब्बत - 1892-1893), एवं रिंजिन नामग्याल (कंचनजंगा की परिक्रमा - 1899)।  
भारत के इन भूमिपुत्रों ने प्राणों पर खेलकर अनेकानेक कष्ट उठाते हुए अपनी-अपनी यात्राएँ पूर्ण कीं। इनमें सबसे प्रसिद्ध पण्डित नैनसिंह रावत (1830-1882) हुए, जिन्होंने सर्वप्रथम सर्वेक्षण यात्रा सम्पूर्ण कर शेष पण्डितों का मार्गदर्शन किया। नैनसिंह का जन्म उत्तराखण्ड की मुंसियारी तहसील के मिलम गाँव में हुआ था। उन्हें तिब्बती भाषा, संस्कृति व सीमावर्ती क्षेत्रों का ज्ञान था। वह अपने पिता के साथ भारत से तिब्बत व्यापार हेतु आते-जाते थे। उन्होंने सर्वप्रथम ल्हासा की भौगोलिक स्थिति एवं ऊँचाई नापी। अपने सर्वेक्षण कार्यकाल में कुल मिलाकर उन्होंने 31 स्थानों के अक्षांश और 33 स्थानों की ऊँचाई नापी थी। वे प्रथम व्यक्ति थे जिन्होंने सर्वेक्षण कर तिब्बत की त्सांगपो और भारत की ब्रह्मपुत्र नदियों को एक ही नदी बताया था। भारत के इस भूमिपुत्र को रॉयल जियोग्राफिक सोसाइटी, पेरिस की ज्योग्राफिकल सोसाइटी, व अन्य यूरोपियन संस्थानों ने सम्मानित किया। तत्कालीन ब्रिटिश सरकार ने उन्हें क्.क्ष्.क. (क्दृथ्र्द्रठ्ठदत्दृद दृढ द्यण्ड्ढ क्ष्दड्डत्ठ्ठद कथ्र्द्रत्द्धड्ढ) पुरस्कार दिया। 1877 में उन्हें रिटायर होने पर रु. एक हजार एवं बरेली जिले में एक जागीर दी गयी। पण्डित नैन सिंह ने एक पुस्तक "अक्षांश दर्पण" (ग्त्द्धद्धदृद्ध दृढ ख्र्ठ्ठद्यत्द्यद्वड्डड्ढद्म) लिखी जो बाद के सर्वेक्षणकारियों एवं अन्य पण्डितों के लिए बहुत उपयोगी सिद्ध हुई। कहना न होगा की नैनसिंह जी के साथ-साथ अन्य पण्डितों की उपलब्धियाँ अतुल्य थीं। कई को राजबहादुर सम्मान और जागीरें मिलीं। पण्डित हरीराम ने 1871-72 और 1885 में एवरेस्ट की परिक्रमा की थी किन्तु बीच में कई अन्य पहाड़ की चोटियाँ होने के कारण वह स्वयं एवरेस्ट दर्शन नहीं कर पाये। पण्डितों द्वारा एकत्रित सूचनाओं व गुप्त सर्वेक्षण के आधार पर तिब्बत का सर्वप्रथम आधुनिक मानचित्र/नक्शा सन् 1906 में प्रकाशित हुआ।
सन् 2004 में पण्डित नैन सिंह, महान त्रिकोणमितीय सर्वेक्षण व बाबू राधानाथ सिकदर के नाम से डाक टिकट चालू किये गये। बाबू राधानाथ सिकदर ने गणित में अप्रतिम योग्यता के कारण उन्नीस वर्ष की आयु में सर्वे ऑफ़ इण्डिया के महान त्रिकोणमितीय सर्वेक्षण में "कम्प्यूटर" का पद ग्रहण किया था। उसके बीस वर्ष बाद पश्चात कोलकाता में मौसम विभाग के सुपरिटेंडेंट रहते हुए उन्होंने दार्जीलिंग के पास की चोटियों की ऊँचाई भी नापी जिसमें मॉउन्ट एवरेस्ट भी शामिल है। परिपाटी के अनुसार माउंट एवेरस्ट का नामकरण बाबू राधानाथ सिकदर के नाम पर होना चाहिए था।
वर्तमान के सन्दर्भ में तमिल मूल का इक्का-दुक्का प्रवासी परिवार होगा जिसने महान गणितशास्त्री श्री रामानुजन के विषय में अपनी दूसरी पीढ़ी को न बताया हो। इसी प्रकार अधिकतर बंगाली अपने बच्चों को श्री जगदीश चन्द्र बसु के विषय में गर्व से बताते हैं। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि उत्तर भारत से बाहर के लोगों को भारत के महान त्रिकोणमितीय सर्वेक्षण में संलग्न इन भूमिपुत्रों के विषय में अधिक ज्ञान नहीं है। ऐसा क्यों?

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