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एक दो तीन : सुभाष पाठक
01-Apr-2018 04:13 AM 3280     

एक

किसी की शक़्ल से सीरत पता नहीं चलती
के आब देख के लज़्ज़त पता नहीं चलती
ख़ुदा का शुक्ऱ है कमरे में आइना भी है
नहीं तो अपनी ही हालत पता नहीं चलती
छलकते अश्क सभी को दिखाई देते हैं
किसी को ख़्वाब की हिजरत पता नहीं चलती
कहीं ज़ियादा ही सोचेगा तेरी क़ीमत से,
अगर उसे तेरी क़ीमत पता नहीं चलती
तमाम रंग जो आँखों में भर लिए इक साथ
सो अब किसी की भी रंगत पता नहीं चलती
ए ज़िन्दगी तुझे क्या-क्या न सोचता मैं भी
मुझे जो तेरी हक़ीक़त पता नहीं चलती
दिलो दिमाग़ बराबर ही साथ रखते हो,
"ज़िया" तुम्हारी तो सुहबत पता नहीं चलती।

दो

दर-ब-दर की ठोकरें खाऊं तुम्हें क्या
मैं रहूँ ज़िंदा कि मर जाऊं तुम्हें क्या
कौन-सा तुम मेरा रस्ता देखते हो
लौटकर आऊँ नहीं आऊं तुम्हें क्या
हर तमन्ना हर ख़ुशी को दफ़्न कर दूं
हर घड़ी मैं ख़ुद को तड़पाऊं तुम्हें क्या
मैं सितारा हूँ मेरी अपनी चमक है
अब रहूँ रोशन कि बुझ जाऊं तुम्हें क्या
मैं चराग़ों को जलाऊं या बुझाऊँ
जैसे भी दिल बहले बहलाऊं तुम्हें क्या
है "ज़िया" तस्वीर मेरी रंग मेरे
जैसे चाहूँ रंग बिखराऊं तुम्हें क्या।

तीन

काश तू बाम पे आया होता
मेरे दरवाज़े पे साया होता
लाल, पीले में मिलाया होता
इक नया रंग बनाया होता

रंग फूलों का न पड़ता फ़ीका
गर न तितली को उड़ाया होता
सो गया था मेरा ग़म मेरे साथ
तुमने मुझको न उठाया होता

क्या जलाता तू बुझाता क्या वो
गर दिया ही न बनाया होता
बारिशें होती न होतीं लेकिन
कम से कम अब्र तो छाया होता

लज़्ज़त ए दर्द बनी रहती "ज़िया"
काश मैं चीख़ न पाया होता।

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