ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
निर्णायक मोड़ पर सभ्यता
01-Nov-2017 03:36 PM 2651     

भारत की सभ्यता के "हिमालय" पर आक्रमण करने वाली कोई बाहरी या विदेशी ताकत नहीं, बल्कि यह भारत की अपनी बात है, अंदरूनी बात है और यह अंदरूनी बात बड़ी सशक्त और ताकतवर है। यह इसकी विशेषता भी है और यह उसकी कमजोरी भी है। यह शक्ति या ताकत है- धर्म और धर्म का पाखंड। अपनी विविधता के साथ एकता की मिसाल कायम करने वाला भारत हर दिन अपने ही लोगों के साथ किस तरह जूझता, लड़ता रहता है, यह देखने लायक बात है।
भाषा, जाति, धर्म, प्रजातियों के रूप में भारत की विविधता देखते बनती है। यहाँ की भौगोलिक विविधता भी अपना परचम लहराती है। गर्मी, ठंड, पर्वत, समुद्र, समतल जमीन, जंगल सभी का यहाँ मनोमलिन है। यहाँ विविध भाषायी, क्षेत्रीय लोगों की आदतें, खान-पान, पहनावा, त्योहार, परंपराएँ अलग-अलग हैं। दीपावली, क्रिसमस, रमजान, गणेश चतुर्थी, बुद्ध पूर्णिमा, होली, कितने ही अलग-अलग त्योहार यहाँ मनाये जाते हैं।
अलग-अलग अंदाज में उर्दू का कवि इकबाल भारत का राष्ट्रकवि है। महात्मा गांधीजी एक साथ जीने-मरने की बातें समझाते हैं। आदि शंकराचार्य भावनिक एकता की बात करते हैं। गुरुनानक सद्भावना यात्रा के जरिये लोगों को एक साथ जोड़ते हैं। संत कबीर, रैदास, स्वामी विवेकानंद, रामकृष्ण परमहंस सभी इंसानियत की बातें करते हैं। भारत का संविधान स्वतंत्रता, समानता, बंधुता और न्याय की बात करता है। राष्ट्रीय त्योहार सबको एक सूत्र में पिरोते हैं। राष्ट्रीय ध्वज तथा गान अंतरनिर्भरता से हमें मिल बांटकर खाने-जीने का वास्ता देता है। केरल का हाथी दांत, छत्तीसगढ़ और आंध्रप्रदेश का चावल, तमिलनाडु का पान, पंजाब का गेहूँ, हम एक-दूसरे की भौगोलिक कमी को ही नहीं बल्कि आवश्यकताओं को भी पूरा करते हैं।
इन सबके बावजूद यहाँ साम्प्रदायिकता का दावानल धू-धू कर जलने लगता है। यहाँ हत्यायें होती हैं, बलात्कार होते हैं, इंसान को इंसान काटता है, लूटता है, नोचता-खसोटता है, यहाँ दंगे होते हैं। यहाँ मारकाट, आगजनी होती है और यह सब यहाँ सिर्फ एक ही बात की वजह से होता है और वह बात है, धर्म, धर्म का आडंबर या धर्म का पाखंड, झूठापन।
मानव के जन्म के साथ न तो उसके साथ सभ्यता आयी और न ही धर्म। लेकिन अपनी मानवीयता को और पुख्ता और ऊँचा बनाने के लिये मानव ने सभ्यता और सभ्यता के नित नये आयाम निर्माण किये। इस सभ्यता का एक ही उद्देश्य रहा कि मानव विश्व के किसी भी कोने में रहे, उसे शांति और सुकून के साथ खुशी मिलें, लेकिन जैसा कि आप जानते हैं, उद्देश्य या लक्ष्य कुछ अलग होते हैं, लेकिन परिणाम या प्रतिफल कुछ अलग होता है। विश्व की हर एक सभ्यता, जिस उद्देश्य के साथ बनायी गयी या निर्माण की गई, उसके साथ आगे चल नहीं पायी और इसका महत्वपूर्ण कारण रहा, धर्म और धर्म का आडंबर।
संभवतः विश्व के किसी भी देश में इतनी जातियाँ या धर्म नहीं होंगे, जितने भारत में मौजूद हैं। आप किसी भी जाति या धर्म का नाम लीजिये। वह भारत में मौजूद होंगे और बेहतरीन ढंग से जिंदगी बसर करते होंगे। यह हमारी विविधता है और यह विविधता वैसे बड़ी दिलचस्प भी है। विविधता के जो रंग आपको भारत में देखने मिलेंगे, वे शायद ही किसी अन्य देश में आप देख पायेंगे। उसी तरह भारत में धर्म के नाम पर जो आडंबर या पाखंड खेले जाते हैं, वे भी आपको अन्य कहीं दिखाई नहीं देंगे। भारत में हिन्दू, सिख, ईसाई, मुसलमान, जैन, बुद्ध कितनी ही जातियाँ और धर्म सदियों से चलते आ रहे हैं। यहाँ के धर्मों की विविधता भी देखते ही बनती है।
व्यक्ति के व्यक्तित्व विश्वास तथा मानसिकता के साथ धर्म की बात जुड़ी हुई है जो व्यक्ति स्वयं को किसी एक धर्म का मानता है और अपने धर्म से सच्चा प्यार करता है वह दूसरे के धर्म के प्रति भी उतना ही सम्मान रखता है। लेकिन जहाँ स्वयं के प्रति जो ईमानदारी होती है वह डोल जाती है तब सोच और भरोसे के बीच जंग छिड़ जाती है और धर्म का पाखंड आप पर हावी होने लगता है।
भारत में किसी भी धर्म पर किसी भी बात की पाबंदी नहीं है और कोई भी धर्म या उससे संबंधित धर्मग्रंथ लोगों को अपने धर्म से प्यार करो लेकिन दूसरे धर्मों का भी सम्मान करो, यहीं सिखाते हैं। धर्म यानी एक विश्वास, श्रद्धा, आचरण और जीने का अंदाज। हिन्दुओं के लिये यह "प्रार्थना" बन गई, सिक्खों के लिये "गुरुवाणी", क्रिश्चनों के लिये "प्रेयर" बन गयी तो मुसलमानों के लिये "नमाज" बन गयी। फिर अपनी-अपनी मान्यताओं के अनुसार धर्मग्रंथ, पहनावा, खान-पान, क्षेत्र, रहन-सहन सभी में धर्म फैलता गया और इस फैलाव में सही और सच्ची बात कहीं गुम हो गयी।
आपने पढ़ा होगा सदियों से भारत पर जो आक्रमण हुये, उनमें अधिकतर धार्मिक स्थलों को पहले हानि पहुँचाई गई। यही नहीं, राजा, महाराजाओं, बादशाहों ने सर्वप्रथम अपना अधिकार जमाने के लिये धार्मिक स्थलों, प्रार्थना गृहों का निर्माण किया। इसकी वजह यही है कि जहाँ निर्माण, वहाँ संपत्ति का एकीकरण, धार्मिक स्थानों को सदियों से शक्ति के प्रतीक के रूप में माना गया। जिसने इन धार्मिक स्थलों/ निर्माणों पर अधिकार पाया, उसने लोगों के बीच अपनी शक्ति को स्थान दिया, धार्मिकता पर उसने अधिकार पाया। अर्थात धार्मिकता पर अधिकार यानी लोगों की मानसिकता, भावनिकता पर अधिकार अर्थात उन धार्मिक स्थलों को तहस-नहस करना यानी लोगों की मानसिकता, भावनिकता को भड़काना, उकसाना। इस तरह धार्मिकता पर अधिकार पाकर इस तरह की राजनीति भी खेली जाती है। राजनेताओं, धर्म के ठेकेदारों को पता होता है कि लोगों को एक-दूसरे के खिलाफ भड़काने का आसान रास्ता "धर्म" ही है। "धर्म" के तहत लोगों को भड़काकर, उकसाकर तथा उससे फायदा उठाकर अपना स्वार्थ साध्य किया जा सकता है। ये धार्मिक स्थल फिर आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक शक्ति स्थल कब बन जाते हैं, इसका पता लगाना मुश्किल हो जाता है। जैन मंदिरों पर शैवों का आक्रमण, बुद्ध की मूर्तियों का ध्वंस, अन्य जातियों द्वारा हिन्दू मंदिरों को नष्ट करना, मुसलमानों द्वारा मंदिरों पर आक्रमण, बाबरी मस्जिद को ढहाना आदि कुछ ऐसे ही उदाहरण हैं। धार्मिकता के मद्देनजर आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक शक्ति को स्थापित करना तथा उससे लाभ उठाना।
धर्म के प्रति संवेदनशीलता अपने यहाँ इतने बड़े पैमाने पर चलती है कि उसी के तहत "भेदनीति" को भी सहजता से उछाला जाता है। यहाँ के गरीब, अनपढ़ लोगों को धर्म के नाम पर गुमराह करना आसान है। फिर यहाँ धर्म के नाम पर मतों का बंटवारा होता है। लोगों की संवेदनशीलता को भुनाने में माहिर यहाँ के राजनेता फिर अपने भाषणों, वक्तव्यों के जरिये गलत बातों को भी सही साबित कर देते हैं और लोगों में उत्तेजना फैला देते हैं। यह बहुत बड़ा "षड़यंत्र" राजनेताओं द्वारा खेला जाता है, जिसे भोली-भाली जनता सच मानने लगती है और फिर धार्मिकता का पाखंड साम्प्रदायिकता में तब्दील होता जाता है।
हमारे यहाँ धर्म के नाम पर हर गली-चौबारों, चौराहों पर बनाये गये बुत अब इकट्ठा कर किसी म्यूजियम में रखने होंगे। धर्म के नाम पर हर गली, चौराहों, रास्तों पर बनाये गये प्रार्थनागृहों को ताला लगाकर सिर्फ एक शहर या गाँव में एक ही प्रार्थनागृह बनाकर, वहाँ सभी धर्मों के लोगों को इकट्ठा आकर अपनी-अपनी प्रार्थना करनी होगी। हमारे यहाँ अंतिम संस्कार हेतु भी जमीन का बंटवारा होता है। जमीन का यही एक उपयोग बचा है?
यूँ इस तरह का बंटवारा होता रहेगा तो हमारे हिस्से टुकड़ों के अलावा और कुछ नहीं आयेगा। सभ्यता धूमिल होती जा रही है। मानवता मलिन होती जा रही है और धर्म का पाखंड पूरा माहौल में विषाक्तता घोल रहा है। यह सावधान होने का समय है अन्यथा जो होगा, वह इससे भी बदतर होगा।

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