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नई सोच
01-Apr-2018 04:19 AM 1716     

कभी उन्हें सीने से लगा कर
हम नींद में खो जाते
लफ़्ज़-लफ़्ज़ चुपचाप
सुनहरे ख्वाब बन जाते
सफ़ा पलटने का भी कुछ
ख़ास ही था मज़ा
पाक-पकवानों से अलग
वो स्वाद था चखा
नीमरोज़ की धूप में
मिलने का बहाना बना
जहां की नज़रों से छुपाकर
प्यार का पैगाम पढ़ा
कभी मुड़ा हुआ कोना
यादों को जगा गया
कभी सूखी हुई पत्ती
हंसते अश्कों को गई सजा
अब सब छूट गए
काग़ज़ क़लम रूठ गए
अब सीने पर नहीं किताबें
लफ़्ज़ों के नहीं ख्वाब सुनहरे
बस उंगलियों के बीच
सिमटकर हम रह गए
और
कमरे के कोने में
काठ की अलमारी से
झांकती रह गईं किताबें
चुपचाप बेबस इंतज़ार
करती रह गईं
किताबें...

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