ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
न हारने की ज़िद
01-Mar-2018 04:07 PM 4583     

परम्परागत ग़ज़ल का स्वरूप क्या है? हिन्दी की वर्तमान ग़ज़ल इससे कितनी भिन्न है? हिन्दी की वर्तमान ग़ज़ल की समीक्षा के लिये नया समीक्षाशास्त्र क्यों जरूरी है? ये और कुछ ऐसे ही अन्य प्रश्न, "वो अभी हारा नहीं है" ग़ज़ल संकलन के लेखक डॉ. राकेश जोशी ने इसमें उठाए हैं। मैं समझता हूँ कि हिन्दी के ग़ज़लप्रेमी और ग़ज़ल के प्रति तटस्थ सामान्य पाठकों की दृष्टि से इन प्रश्नों पर संक्षिप्त चर्चा कर लेने पर प्रस्तुत ग़ज़ल संकलन की ग़ज़लों के कथ्य, शिल्प और सरोकारों को बेहतर ढंग से समझने में मदद मिलेगी।
इसी से जुड़ा पहला प्रश्न है कि आखिर हिन्दी में ग़ज़ल की जरूरत ही क्यों पड़ी? वस्तुत: हिन्दी की रीतिकालीन छंद अलंकारयुक्त कविता जब, छायावादी, तारसप्तकीय कविता, नई कविता, प्रयोगवादी-प्रगतिवादी कविता, अकविता इत्यादि नाम और रूप में व्यक्त होती हुई, एक ऐसे दौर में पहुँची जब राजनीतिक दुरवस्था, यौनकुण्ठा, सामाजिक विषमताजन्य आक्रोश इत्यादि के नाम पर सपाट गद्य को खंडित कर पंक्तियों में लिखने का और इस लेखन के बल पर युग परिवर्तनकारी कवि कहने कहलाने का चलन बढ़ गया तो कविता, स्वतः ही श्रोताओं और पाठकों से विमुख होने लगी। ऐसे समय में कुछ रचनाशील कवियों ने कविता को जनोन्मुखी बनाने का और सामाजिक हितचिंताओं से कविता और पाठक को सच्चे अर्थों में जोड़ने का प्रयास आरम्भ किया। इस परिदृश्य पर कवि दुष्यन्त कुमार त्यागी का वक्तव्य दृष्टव्य है :
"मैं बराबर महसूस करता रहा हूँ कि आधुनिकता का छद्म, कविता को बराबर पाठकों से दूर करता गया है। कविता और पाठक के बीच इतना फासला कभी नहीं था, जितना आज है...। इस कविता के बारे में कहा जाता है कि यह सामाजिक और राजनीतिक क्रांति की भूमिका तैयार कर रही है। मेरी समझ में यह वक्तव्य भ्रामक है। जो कविता लोगों तक पहुँचती नहीं, वह किसी क्रांति की संवाहिका कैसे हो सकती है? इसलिये मैंने उकता कर उर्दू के इस पुराने और आज़मूदा माध्यम की शरण ली है।"
नई ग़ज़ल की तरफ मुड़ने का एक बड़ा कारण, प्रख्यात ग़ज़लकार एवं "नई ग़ज़ल" त्रैमासिक के सम्पादक समीक्षक, डॉ. महेन्द्र अग्रवाल के अनुसार यह भी था कि कवि को व्यापक पाठक वर्ग की तलाश थी क्योंकि ग़ज़ल का पाठक वर्ग अपेक्षाकृत अधिक था, इसलिये ग़ज़ल की लयात्मकता, गेयतत्व, कहन की विलक्षणता ने हिन्दी ग़ज़ल की विधा को कवि और पाठक-श्रोता वर्ग ने लोकप्रिय बना दिया। डॉ. महेन्द्र आगे कहते हैं कि इस ग़ज़ल ने अपने नये रूपों में इश्क के स्थान पर सामाजिक प्रश्नों का और यथास्थितिवाद पर आक्रोश का वरण किया, इससे ग़ज़ल का पारम्परिक स्वरूप ही बदल गया। यह बदलाव, शिल्प के स्तर पर भी हुआ और कथ्य के स्तर पर भी। इसलिये आज की ग़ज़ल को अरबी बहरों के मापदण्ड से मापना (या हिन्दी के मात्रिक वार्णिक छंदों से तौलना) कोई मायने नहीं रखता।
यहाँ हम लेखक के उठाये एक महत्वपूर्ण प्रश्न पर आते हैं कि हिन्दी की इस नई ग़ज़ल के लिये नया समीक्षाशास्त्र क्यों जरूरी है तथा उसके मापदण्ड क्या हों? इस प्रश्न की व्यापक मीमांसा डॉ. महेन्द्र अग्रवाल ने "नई ग़ज़ल : समीक्षा आधार" में अत्यन्त व्यापक ढंग से की है, जिसका सार यह है कि हिन्दी की नई ग़ज़ल के लिये उर्दू-फारसी में वर्णित रीति-रिवाजों से इतर नये समीक्षा शास्त्र की आवश्यकता सिद्ध है।
डॉ. अग्रवाल के अनुसार हिन्दी ग़ज़ल के नये समीक्षा शास्त्र में इस तथ्य को स्वीकार किया जाए कि उर्दू काव्य में ग़ज़ल की कहन पर या अंदाजे बयां पर अधिक जोर है। इस संकलन के ग़ज़लकार डॉ. राकेश जोशी का कहना है कि परम्परागत ग़ज़ल लहोती हैै, "कही जाती है", "हुई है" जबकि हिन्दी में ग़ज़ल होती नहीं "लिखी" जाती है, इसका यह लिखा जाना हिन्दी की अलग पहचान माना जाए। जोशी जी का तर्क है कि "होने" से "लिखे" जाने तक का सफ़र जब हिन्दी ग़ज़ल ने आदमी की आकांक्षाओं, सपनों, दर्दों को लिखकर तय किया है तो इस लिखे जाने को ही पहचान क्यों न माना जाये या कहें कि समीक्षा की प्रमुख कसौटी ही मान लिया जाये। थोड़ा विचार करने पर देख सकते हैं कि हिन्दी की नई ग़ज़ल में अंदाजे बयां या कहन को दूसरा स्थान देने पर और आम आदमी की इच्छा-आकांक्षा के नाम पर जो कुछ भी तेजी से लिखा जा रहा है उसे और ऐसे लेखन से हिन्दी ग़ज़ल का जो स्वरूप विकसित हो रहा है उसे, समीक्षाशास्त्र में समाहित करने के आग्रह को वरीयता देने पर समीक्षा के लिये अधिक कुछ बचता ही क्या है?
ग़ज़लकार के उठाए प्रश्नों पर चर्चा के बाद अब, "वो अभी हारा नहीं है", ग़ज़ल संकलन की बात करें तो इसमें 72 ग़ज़लें संकलित हैं जिनकी विषय-वस्तु व्यापक है अतएव इनमें पाठक को एकरसता का कम ही अनुभव होता है। जोशी जी ने ग़ज़लों में विषमताएँ, एकाधिकारवादी व्यावसायिक प्रवृत्तियाँ और इनके प्रति आम आदमी की बेबसी, निष्क्रियता, आक्रोश को बखूबी उभारा है। साथ ही व्यक्ति और समाज के मध्य मूल्यों के द्वंद्व को और नये स्वप्न और आकांक्षा के बिम्ब को विषयवस्तु की नवीनता के साथ पेश किया है तो कहीं कथ्य की नवीनता या कहन के अनोखे अंदाज के साथ शब्दांकित भी किया है जो पाठक के हृदय को छू लेती है। कमोबेश यों तो वही राजनेता, अफसर और दबंग हैं पर कहीं-कहीं कहने की सादगी सीधे मन को अपील करती है :
कहीं भी घूमने का मन अगर तेरा कभी होगा
तू अफ़सर है, वहाँ तू सरकारी काम दिखा देगा।
कहीं बदलाव का स्वप्न है, एक आक्रोश है यथास्थिति के विरुद्ध, जो कुछ इस तरह ग़ज़लकार ने व्यक्त किया है :
सच कहो, क्या कभी ये इंतज़ाम बदलेगा,
या फ़क़त तख्तियाँ बदलेंगी, नाम बदलेगा
ये अन्याय से भरी हुई व्यवस्था को
कोई राजा नहीं कोई गुलाम बदलेगा।
कवि ने आज के प्रचारतंत्र के कारण उभर रहे नये तरह के आभासीसच - "वर्चुअल टØथ" को, अपने विशिष्ट अंदाज में कुछ इस तरह व्यक्त किया है :
अंधियारा तो अंधियारा है, झूठी बात करेगा पर
झूठे ख़्वाब दिखाने वाला वो उजियारा झूठा था
बस्ती को झुलसाने वाला हर अंगारा सच्चा है
चूल्हे में जलने वाला तो हर अंगारा झूठा था
कवि ने कहीं कथ्य की नवीनता को शब्दों में ढालने के साथ कहने के अंदाज में भी चमत्कार पैदा किया है :
ख़्वाब-सा आँखों में पलकर देख लो
आज थोड़ा-सा टलहकर देख लो
है कि कठिन कितना अँधेरा दूर करना
रोज उगकर, रोज ढलकर देख लो
संकलन की भूमिका में ज्ञान प्रकाश विवेक लिखते हैं :
"राकेश जोशी की ग़ज़लों में समकाल निरंतर ध्वनित होता है और भरे-पूरे समाज की उपस्थिति, ग़ज़लों को जीवंत रखती है। सामाजिक मूल्यों के प्रति उनकी चिंताएं अश्आर में महसूस होती हैं।
उनकी ग़ज़लों में नए प्रयोग आश्वस्त करते हैं और फ़्लैप-मैटर में कुंवर बेचैन कहते हैं - "राकेश जोशी जी, वह स्वयं कैसे ग़ज़लकार हैं, इस बात को इन शब्दों में व्याख्यायित करते हैं, जो इनकी ग़ज़लों को पढ़कर ठीक ही लगता है।"
अब ग़ज़ल मेरी सुनो, इस दौर का आँसू हूँ मैं
ख़ूब चाहे ज़ौक़, ग़ालिब, दाग़ की बातें करो
संकलन पढ़कर विवेक जी और बेचैन जी की बातों की तस्दीक की जा सकती है। संकलन में संवेदनाओं की और इनकी अभिव्यक्ति की विविधता है।
डॉ. राकेश जोशी के इस संकलन से हिन्दी की नई ग़ज़ल निश्चित तौर पर समृद्ध होगी, दिशा निर्धारण में सहायक होगी और अपनी चुटीली, सरस अभिव्यक्ति के कारण पाठक और श्रोतावर्ग में लोकप्रिय भी होगी।

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