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मृत्यु और संस्कृतियों की रूपांतरण क्षमता
01-Nov-2017 02:19 PM 3723     

समकालीन हिंदी कवियों में सम्भवतः सर्वाधिक सम्मानित कवि कुँवर नारायण इस साल नब्बे वर्षीय हो जाएंगे। दक्षिण दिल्ली के चित्तरंजन पार्क स्थित उनका आवास अब भी रचनाकारों, आलोचकों एवं अन्य बुद्धिजीवियों की गोष्ठी का स्थल बना हुआ है। अपनी पीढ़ी के अंतिम बचे हुए इस हिंदी साहित्य के बुजुर्ग से मिलना अब भी उनके लिए बड़ी घटना है, जो स्वयं को उनके साहित्यिक परिवार का अंग मानते हैं। यद्यपि हाल के वर्षों में उनकी दृष्टि क्षमता लगभग जा चुकी है और उन्हें सुनने में भी दिक्कत होती है, तथापि वह समकालीन साहित्य और राजनीति के संवेदनशील प्रेक्षक और टीकाकार हैं। वह अपनी कमजोर किन्तु जीवंत आवाज में 1940 के उत्तराद्र्ध से लेकर समकालीन भारत और हिंदी साहित्य के संस्मरणों की प्रायः विस्मयकारी कड़ियों को जोड़ते हैं। कुँवर नारायण उत्तर प्रदेश के फैजाबाद में 1927 में जन्मे और 1950 के दशक से ही, जब वह स्नातक विज्ञान के छात्र थे, अपनी कविताएँ प्रकाशित करवाने लगे। फिर बाद में लखनऊ से आंग्ल-साहित्य के विद्यार्थी होकर वह अंग्रेजी में लिखने लगे। अंततः लखनऊ के हिंदी रचनाकार मित्रों से प्रेरणा पाकर आपने अपनी मातृभाषा हिंदी को विवेकपूर्ण विकल्प के रूप में चुनते हुए, हिंदी में लिखना शुरू किया। 1950 के दशक में लखनऊ उत्तर भारत के हिंदी लेखन केंद्रों में एक था।
आपका पहला काव्य "चक्रव्यूह" 1956 में प्रकाशित हुआ। "चक्रव्यूह" के प्रकाशन से पहले ही "तारसप्तक" के कवियों में अग्रणी अज्ञेय (हीरानन्द सच्चिदानन्द वात्स्यायन, 1911- 1987) ने उनकी कुछ कविताओं को अपने साहित्यिक मुखपत्र "प्रतीक" में प्रकाशित किया था और लखनऊ में उनसे और एक अन्य युवा कवि रघुवीर सहाय से मिले थे। आधुनिक हिंदी कविता के इतिहास में इस आंदोलन को एक सुविधाजनक नाम दिया गया - प्रयोगवाद। प्रयोगवाद को खासकर इसके मुक्त छंद और छायावाद की कट्टरता के प्रतिरोध के लिए जाना गया। कुँवर नारायण पूरी दुनिया की अंग्रेजी कवतिाओं और उनके हिंदी अनुवादों को पढ़ा करते थे और इससे कुछ वर्षों में आपने अपनी नितांत वैयक्तिक शैली का विकास किया और शायद इसी ने आपको हिंदी का सर्वाधिक सम्मानित वयोवृद्ध कवि बनाया है। रोजेन्स्टीन आपकी प्रशंसा करते हुए कहते हैं, "एक सच्चा बुद्धिजीवी... अब तक जिनके विश्वकोश सदृश ज्ञान को प्रदर्शित नहीं किया जा सका है।"
अपने रचनात्मक जीवन के आरंभिक दौर से कुँवर नारायण ने एक कवि, लघुकथा लेखक और अज्ञेय के इर्द-गिर्द रहने वाले "उद्देश्यमुख यथार्थवाद" के पैरोकार रचनाकारों के उस दल के सदस्य के रूप में अपनी पहचान बनाई, जिसे अब तक प्रेमचंद (1880-1936 ई.) सदृश लेखन के रूप में जाना जाता है। कुँवर नारायण ने लगातार अंग्रेजी माध्यम में उपलब्ध विश्व कविताओं का हिंदी अनुवाद भी किया। आपको भारतीय साहित्य के बहुमूल्य पुरस्कारों, यथा- 1995 में आपके कविता संग्रह "कोई दूसरा नहीं" (1993) के लिए साहित्य अकादमी और 2005 में भारतीय साहित्य जगत के सर्वोच्च सम्मान 41वें ज्ञानपीठ पुरस्कार से अलंकृत किया गया।
नचिकेता और मृत्यु
अपने दूसरे महाकाव्य "वाजश्रवा के बहाने" (प्रकाशन वर्ष : 2008) की भूमिका में नारायण स्पष्ट करते हुए कहते हैं कि उनके तीन खण्डकाव्यों में पहला काव्य "आत्मजयी" (1965) में उनका मृत्यु की महत्ता पर झुकाव उनके द्वारा मृत्यु को नजदीक से देखने के व्यक्तिगत अनुभवों पर आधारित है। वास्तव में, ग्यारह वर्ष की उम्र से ही "मृत्यु का गहरा अनुभव" उनके साथ तब जुड़ गया, जब उनकी माँ और बहन की यक्ष्मा से पीड़ित होकर मृत्यु हो गई। इस अनुभव ने उन्हें वैसी ही सूक्ष्म अंतर्दृष्टि प्रदान की, जो कभी बुद्ध, शंकराचार्य और कबीर जैसे ऐतिहासिक पुरुषों को मिली थी।
नारायण स्पष्ट करते हुए कहते हैं कि उनका प्रथम खण्डकाव्य "आत्मजयी" जीवन को मृत्यु के दृष्टिकोण से देखने का एक प्रयास था; जबकि इसके प्रकाशन के लगभग आधी शताब्दी के बाद लिखे गए "वाजश्रवा के बहाने" का तात्पर्य मृत्यु को जीवन के दृष्टिकोण से देखने का है। कवि के अनुसार दोनों काव्य आशा और निराशा के बीच बदलती भावनात्मक तरंगों से उपजी मानसिक अवस्था को प्रतिबिंबित करते हैं। इससे परे, वैसे तो मृत्यु कुँवर नारायण के लेखन का महत्वपूर्ण विषय रहा है; उदाहरण स्वरूप उनकी लघुकथा "आकारों के आसपास" में एक बच्चे की मौत कथानक का केंद्रबिंदु है। उसी संग्रह में "दूसरा चेहरा" शीर्षक कहानी में एक वयस्क एक बच्चे की ज़िंदगी बचा लेता है, लेकिन अपने प्राण न्योछावर कर देता है। "आत्महत्या" कहानी विस्तृत योजना बनाकर आत्महत्या करने वाले एक शख्स की कहानी है, जिसे ईश्वर के द्वारा एक झूठे दुकानदार के रूप में छला जाता है, जो उसे नकली ज़हर बेचता है और वह स्वयं को मारने के लिए खरीदता है। "आत्महत्या" व्यक्ति के नज़रिए से आत्महत्या का आख्यान है।
"आत्मजयी", जिसके लिए नारायण को 1971 में महत्वपूर्ण हिदुस्तानी अकादमी पुरस्कार मिला, कठोपनिषद् के पात्र नचिकेता पर केंद्रित है; जिसकी कहानी नारायण के द्वारा नचिकेता, उसके पिता वाजश्रवा और मृत्यु के देवता यम के एकालापों की निरंतरता के रूप में कही गयी है। यह कथा मध्य औपनिषदिक काल में रचित छंदोबद्ध उपनिषदों में एक कठोपनिषद में वर्णित है, जो पॉल ड्यूसन के द्वारा निर्धारित ऐतिहासिक कालक्रमानुसार शायद पाँचवी सदी ईसा पूर्व की है।
परम्परागत कथा के अनुसार, नचिकेता अपने पिता से अभिशाप पाता है, क्योंकि वह वाजश्रवा से यह शिकायत करता है कि वह यज्ञ में देवताओं को बूढ़ी गाय दान में देता है। वह अपने पिता के प्रति सच्ची श्रद्धा के प्रमाण स्वरूप स्वयं को दान में दिए जाने के लिए प्रस्तुत करता है, बदले में उसका पिता वाजश्रवा उसे इस निंदा के लिए अभिशाप देते हुए उसे मृत्यु के देवता यम को दान में दे देता है। जब नचिकेता यमपुरी (यम का घर) पहुँचता है, तब यम कहीं बाहर गया हुआ होता है और उसके आने तक तीन दिनों तक उसे प्रतीक्षा करनी होती है। वापस आने पर यम यह कहते हुए क्षमा माँगता है कि उसे इतनी देर तक एक युवा ब्राह्मण अतिथि को प्रतीक्षा नहीं करानी चाहिए थी। इसके बदले में वह नचिकेता से तीन वरदान माँगने के लिए कहता है। पहले वरदान के रूप में नचिकेता अपने पिता और स्वयं के लिए शांति माँगता है। दूसरे वरदान के रूप में, वह यम से यज्ञ के नियम सिखाने के लिए कहता है। उसे दोनों वरदान मिल जाता है। तीसरे वरदान के रूप में वह "मृत्युपरांत क्या होता है?" इसकी जानकारी माँगता है। यम इसका उत्तर देने में आनाकानी करता है, क्योंकि देवताओं तक को यह रहस्य पता नहीं होता है। नचिकेता के अड़ जाने पर यम उसे आत्मा के विशुद्ध स्वभाव के विषय में बताता है कि आत्मा और ब्रह्म अभिन्न हैं और उसकी सत्ता मृत्यु के बाद भी कायम रहती है।
कुँवर नारायण का नचिकेता एक धार्मिक जिज्ञासु और युवा बौद्धिक पात्र के रूप में चित्रित हुआ है, जो अपनी निराशा को काबू में करते हुए अंततः अपने आप पर विजय पाता है। नचिकेता (या, नचिकेतस्) इतिहास से इतर पौराणिक आख्यान के चौखटे में सभी प्रकार के संदेहों से स्वयं और व्यापक तौर पर जीवन में कष्ट पाता है और उसे जीते जी मनुष्य रूप में मृत्यु के देवता यम का साक्षात्कार करना होता है। जैसा कि रचनाकार भूमिका में स्पष्ट करते हैं, "आत्मजयी में जिस समस्या को उठाया गया है, वह मौलिक रूप से बौद्धिक व्यक्ति की समस्या है।" "नचिकेता" का मुख्य विषय, जैसा नारायण वर्णन करते हैं, "वह केवल सुखी नहीं अर्थपूर्ण जीवन जीना चाहता है।" वह असहमति का अधिकार चाहता है और बहुमत पर प्रभाव भी। वह जिज्ञासा से भरा होता है, जबकि वह जानता है कि ज्ञान एक महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है। इस पृष्ठभूमि में वह वेदांत के आत्मा विषयक मुख्य प्रश्न "मैं कौन हूँ?" तक पहुँचता है। वह अपना जीवन "शून्य" पाता है और यहाँ तक कि आत्महत्या का प्रयत्न करता है।
संसार दर्पण है - परमात्मा का नहीं, बल्कि माया को प्रतिबिंबित करने वाला। जिसका अर्थ है कि हर जगह छाया-छाया घूमती है। इन पंक्तियों को आधुनिक हिंदी कविता के छायावादी आंदोलन के परिप्रेक्ष्य में पढ़ना आवश्यक है। छायावाद पद की व्याख्या छायावादी कविताओं में प्रकृति को परमात्मा का प्रतिबिंब बताने के संदर्भ में की जाती है।
यह कविता "निष्फल विकास के गौरव" पर भी प्रश्न चिह्न खड़ा करती है, अर्थात् "प्रगतिवाद", जिसने आधुनिक हिंदी कविता ने आत्मसात् किया, से एक विभाजन रेखा खींचती है।
अन्ततोगत्वा, नचिकेता अपने आप को मजबूत बनाने में सफल होता है और बाहरी अंधकार के बावजूद अंतर्दृष्टि संपन्न होता है। वह जागता है और भविष्य को अपने लिए एक अवसर के रूप में देखता है। उसकी यह माया से जागने की अवस्था - रात्रि के अंधकार से दिवा के प्रकाश में जाने की चिरन्तन यात्रा उसे आत्मविद बनाती है, जो उसे उस प्रकाश में ले जाती है जिसकी चमक सहस्र सूर्य के प्रकाश की भाँति है। जैसा कि कठोपनिषद कहता है, "अब से तुम दिन में रहोगे।" उसे मुक्ति की अवधारणा समझ में आ जाती है।
वस्तुतः "आत्मजयी" किसी भी साहित्यिक चर्चा से परे है, जबकि "वाजश्रवा के बहाने" पिछले दशक में पर्यावरण चर्चा के द्वारा स्थापित प्रकृति से सम्बन्धों के अवशेषों को प्रतिबिंबित करता है। "आत्मजयी" में पहले ही नचिकेता का पिता वाजश्रवा उसका आलोचक और विपरीत ध्रुव बनकर उभरता है। "नचिकेता की वापसी" शीर्षक प्रथम खण्ड में, जब वह मृत्यु के देवता यम के घर से वापस लौटता है, तब पृथ्वी उदासीन है, अतएव नचिकेता भी उदास है और इस निराशा में उसे "जीवन की अदम्य शक्ति" की ज़रूरत है और जीवन उसके पास सूर्योदय के समय प्रकृति के जागरण स्वभाव के रूप में लौटता है।
"कवि", उसकी "कविता" और "कहीं भी" (किसी अपरिभाषित जगह में) के आरम्भ में "क" वर्ण आता है। यह निश्चितता का खोना ही रचनाधर्मिता का फलक खोलता है। रचनाकार और रचना के बीच का सम्बंध "अप्रकट" से "प्रकाशित" होने तक की प्रक्रिया है। यतीन्द्र मिश्र को दिए गए अपने साक्षात्कार में कुँवर नारायण कविता का सार बताते हुए कहते हैं कि जब "उदात्त विचार" और "उदात्त कला" का आपस में मेल होता है, तो कविता बन जाती है। इसे कविट्ज़, जीवन और भाषा के त्रिकोण के दृष्टिकोण से व्याख्या करते हुए वह पुनः कहते हैं कि जब "सूचना" और "अनुभूति" का संश्लेषण हो जाए, तो कविता बनती है। कविता के भविष्य के प्रश्न पर उत्तर देते हुए नारायण कहते हैं कि उनका मानना है कि जीवन के यथार्थ से कविता का बिलगाव ही मूलभूत खतरा है। रचनात्मक प्रक्रिया तलाश मात्र है, न कि कालजयी सच पाना।
दूसरी तरफ, "आत्मजयी" का पौराणिक पात्र के रूप में परिचय अस्तित्त्व के अनुभव का प्रतीक है। भारतीय पौराणिक रचनाओं का सतत् धार्मिक महत्व होने के कारण ये उस तरह रहस्यवादी नहीं हैं, जिस तरह ग्रीक माइथोलॉजी आधुनिक यूरोपीय रचनाकारों के लिए रही है। ग्रीक कथाओं को "समकालीन मानवों की जटिल मानसिक अवस्था" की अभिव्यक्ति के तौर पर प्रयुक्त किया जा सकता है, जबकि इस संदर्भ में नचिकेता को धार्मिक से ज़्यादा दार्शनिक चरित्र के रूप में उभारा जा सकता है। इस प्रकार कठोपनिषद में वर्णित उसकी कथा आधुनिक रचनात्मक पुनर्निर्माण के लिए ज़्यादा उपयुक्त है।
धार्मिक पर दार्शनिक और यथार्थ पर प्रतीकात्मक विषयों की प्रमुखता नारायण के भारतीय ऐतिहासिक और पौराणिक चरित्रों से सम्बंधित काव्य का मुख्य विषय है, जैसा कि उनकी सद्यः प्रकाशित कविता "कुमारजीव" में पाते हैं। उदाहरण के तौर पर, वह अल्बर्ट कैमस के सिसिफस कथा की आधुनिक व्याख्या और आधुनिक अस्तित्त्ववादी। पौराणिक अध्ययन को सामान्यतया इंगित करते हैं। इस संदर्भ में वह इस बात पर जोर देते हैं कि यह व्याख्या निराशावादी दर्शन की ओर न ले जाए।
कुमारजीव :
कुँवर नारायण का नया महाकाव्य "कुमारजीव" 2015 में आया। इसकी भूमिका में वह इतिहास के द्वारा महान चरित्र गढ़ने के प्रति आस्था को चिह्नित करते हुए सर्वप्रथम बुद्ध के ऐतिहासिक महत्त्व को रेखांकित करते हैं, "जितना उनके युग ने उन्हें नहीं बनाया, उससे अधिक बुद्ध ने अपने युग को बनाया।" यह नई कृति नारायण के द्वारा ऐतिहासिक चरित्र पर महाकाव्य रचने का गंभीर प्रयास है।
जबकि नचिकेता और वाजश्रवा का कोई ऐतिहासिक स्थान नहीं है, नारायण के "कुमारजीव" ऐतिहासिक पुरुष हैं, जिनकी जीवनी पूर्व ज्ञात है। उनका जीवन एक खास भौगोलिक क्षेत्र से सम्बन्ध रखता है : मध्य एशिया के कच राज्य, कश्मीर और चीन के हुबई प्रान्त के बीच का यात्री, संस्कृत और चीनी भाषा के मध्य का यात्री और विभिन्न बौद्धिक संस्कृतियों के बीच का यात्री भी। "कलाएँ, महत्वपूर्ण विचार और साहित्य सदैव यात्री रहे हैं", ऐसा पंकज चतुर्वेदी को दिए गए एक साक्षात्कार में नारायण कहते हैं। इस उत्तरआधुनिक काल में, नारायण एक बार पुनः ऐतिहासिक चरित्र, शायद सर्वाधिक प्रसिद्ध संस्कृत से चीनी बौद्ध साहित्य अनुवादक और दक्षिण और पूर्व एशिया के बीच मुख्य सांस्कृतिक मध्यस्थ पर केंद्रित महाकाव्य की ओर मुड़े।
भारतीय प्रायद्वीप से मध्य एशिया में बौद्धमत का विस्तार में महान हिंदी और बौद्ध विद्वान राहुल सांकृत्यायन (1893- 1963) की भी रुचि रही है। खासकर उनकी पुस्तक "मध्य एशिया का इतिहास" का नारायण ने संदर्भ सूची में 2015 बार अंकित किया है। नारायण ने अपने मित्र गजानन माधव मुक्तिबोध (1917 -1964) का जिक्र भी उनकी "भारत का इतिहास" और "संस्कृति" नामक पुस्तक को उद्धृत करते हुए किया है, जिसमें यद्यपि सातवीं शताब्दी के चीनी बौद्ध यात्री हुएनसांग का विशद वर्णन है, कुमारजीव का नहीं। युवा कुँवर नारायण का बौद्ध साहित्य से गम्भीर परिचय तब हुआ, जब वे समाजवादी चिंतक राजनेता आचार्य नरेंद्रदेव के साथ मुंबई मे किसी वर्ष रुके थे। आचार्य नरेंद्रदेव कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी (1948 ई. में विसर्जित) के आरंभिक मुख्य सिद्धान्त प्रदाता थे और महात्मा गाँधी के राजनैतिक और धार्मिक चिंतन के आलोचक थे, किन्तु वह सोशलिस्ट आंदोलन में अहिंसा के प्रचारक थे और उन्होंने अंत में बौद्धमत को अपनाया।
रेशम मार्ग का लाक्षणिक महत्व :
बौद्धमत का कश्मीर से लेकर हिन्दुकुश के पर्वत श्रृंखलाओं तक पूर्वस्थित मध्य एशियाई रेशम मार्ग होकर विस्तार के अत्यधिक मात्रा में लिखित, पुरातात्त्विक और कलात्मक प्रमाण हैं। शहरी संस्कृति, जो आज का ताजिकिस्तान है से अल्प आबादी वाले भाग टकलामकन रेगिस्तान की तरफ किर्गिस्तान के उबड़-खाबड़ रास्तों का जीवन / एक बीहड़ संसार / इनके संग परन्तु इनके असंग / सोचते कुछ विचारक / ढोते जीवन का कठोर यथार्थ।" यह "कठोर यथार्थ" भौतिकता के प्रलोभन को शामिल करता है - "यह युवती - इसका उपभोग कर, / यही है स्वर्ग / क्षितिज के इसी तरफ है सबकुछ / इसके बाहर कुछ नहीं।"
और इस संदर्भ में कुमारजीव का सौंदर्य घटित होता है - शब्दों, भाषा और अर्थ के सौंदर्य से सम्बंधित - या, सही-सही "युद्ध और तिज़ारत के रूपकों में बँधे / शब्दों को मुक्त करके।"
भाषा के अर्थ की चिंता शुरुआत से ही नारायण की कविता का विषय रहा है। अपने कविता संग्रह "कोई दूसरा नहीं" की कविता "भाषा की विपरीत परिस्थितियों में", भाषा और शब्दों का क्षरण स्वयं अर्थ के संकट की ओर ले जाता है: "एक भाषा जब सूखती / शब्द खोने लगते अपनी कविता।" "शब्दों से" कविता में कवि संसार को शब्दों के दृष्टिकोण से देखता है और "अर्थपूर्ण संधियों को" के आरम्भ बिन्दु और नए दृष्टिकोण से उनके असुरक्षित अवस्था को देखता है, जबकि "सीमाओं से परे" में "प्यार की भाषाएँ" कविता में कवि प्यार की अनुभूति और अर्थ की अनुभूति के नाजुक रिश्तों की तलाश करता है।
कुमारजीव के समय में मध्य एशिया कभी भी उनके इर्द-गिर्द वैमनस्य, संघर्ष और द्वंद से बाहर नहीं रहा। नारायण अपने आपको ल्यांगम-को (अर्थात् तुंग-हुआन) में लवी-कुमांग (अर्थात् लु कुआँग) में स्वतंत्रता की घोषणा का साक्षी बनने देते हैं और यह भी देखते हैं कि सैनिकों के द्वारा "सम्राट युग-युग जिये" की घोषणा कितनी व्यर्थ है। पूरा क्षेत्र युध्द और झगड़ों की लहर के चपेट में आ जाता है, कस्बे बर्बाद हो जाते हैं, जो अब रेगिस्तान को आश्रय नहीं प्रदान करते हैं।
सांसारिक झगड़ा, अराजकता और शासकों के युद्ध की पृष्ठभूमि में कुमारजीव की रचनात्मकता प्रकट होती है। वे एक दार्शनिक की तरह हैं और लौकिक भाषा में स्वयं भाष्य हैं - अगाध शब्दों के चिरकाल में। मध्य एशिया के रेगिस्तान मृत्यु सदृश हैं - मरुस्थल, मरूभूमि और मृत्यु के आश्रय - और कौन जानता है "न जाने कितनी नदियों और झीलों को पीकर भी, शांत नहीं हुई।"
हालाँकि, छोटे-छोटे मरुद्यानों में कुछ उम्मीद बची है, यह एक रूपक है संसार के कोलाहल में कुछ सुन्दर जगहों के लिए। लेकिन भिक्षु रेगिस्तान में स्तूप बनाते हैं - बेघर शब्द, भित्तिचित्र, किताबें और पत्र - मरुस्थल में जीवन की सांकेतिक जगह। नारायण के कुमारजीव स्वयं अपने कई अस्तित्त्वों पर पुनर्विचार करते हैं, कभी एक गृहस्थ होने की खुशी, और फिर गृहविहीन भिक्षु की व्यथा। हालाँकि, ऋषि भी गृहस्थ हो सकता है, क्योंकि पुरुष और स्त्री का सम्बंध साधना पथ से ध्यान हटाए, यह ज़रूरी नहीं है।
अंत में, वे गृहकार (ईश्वर) से प्रार्थना करते हैं कि वे इस गृह (शरीर) के अलावे, जो स्वयं गृहयुद्ध से भरा पड़ा है, कोई दूसरा गृह नहीं बनाएं - यह कुमारजीव की इच्छा है। साथ ही साथ वह जानते हैं कि अंत में उन्हें विश्राम गृह यानि मृत्यु तक जाना है।
कुँवर नारायण अन्तर्मुखी व्यक्तित्व हैं और शायद ही कभी उन्होंने किसी राजनैतिक घटना पर, खासकर अपनी कविता में टिप्पणी की है। इसका एक दुर्लभ अपवाद उनकी कविता "अयोध्या, 1992" है, जो कुँवर नारायण के अपने कस्बे फैजाबाद के जुड़वाँ शहर अयोध्या में बाबरी मस्जिद के विध्वंस और उसके भयावह दुष्परिणामों से सम्बंधित है, जिसमें वह राम के नाम पर आंदोलनरत लोगों की तुलना रामायण में वर्णित रावण की सेना से करते हैं। विष्णु अवतार राम को संबोधित करते हुए कवि लिखते हैं, "अयोध्या इस समय तुम्हारी अयोध्या नहीं।"
"कुमारजीव" महाकाव्य लगभग दस वर्षों की अवधि, 2005 से 2015 तक में रचा गया। राष्ट्रीय राजनीति में यह अवधि अटल बिहारी वाजपेयी की भाजपा सरकार के दौर के बाद कांग्रेस के नेतृत्व में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का काल और फिर 2014 के चुनावों में भाजपा के मजबूती से लौटने का समय था। इस राजनीतिक फेरबदल के पीछे 1990 में नरसिम्हा राव की सरकार के द्वारा आर्थिक उदारीकरण का राजनीतिक सातत्य है। हालाँकि, 26 जनवरी 1950 से ही संविधान की प्रस्तावना में भारत को "सोशलिस्ट" (समाजवादी) गणराज्य घोषित किया गया है, लेकिन इंदिरा गाँधी के प्रधानमंत्रित्व काल से यह लगता रहा कि यह नुस्खा अधिक से अधिक अर्थहीन बयानबाजी ही रहा है। हालाँकि, पहचान की राजनीति और धर्मनिरपेक्षता, जो संविधान की प्रस्तावना के वाक्य का हिस्सा है, के बीच बड़ी विभाजन रेखा है।
इस तरह से, प्रारम्भिक शताब्दियों में कल्पित मध्य एशिया संस्कृतियों का एक समन्वय स्थल है, जो अपनी इच्छाओं के लिए कुछ जगह का दावा करते पहचान की सामान्य परेशानियों से परे है। तीसरी और पाँचवी शताब्दियों के मध्य बौद्ध धर्म न केवल भारत में और दक्षिण-पूर्व एशिया में बल्कि अफगानिस्तान और मध्य एशिया के बड़े हिस्सों में भी एक प्रमुख धार्मिक और सांस्कृतिक कारक था। कुमारजीव जैसे उत्कृष्ट अनुवादकों के चलते इससे पूर्व एशिया में भी इसकी सीमा बढ़ गई।
निष्कर्ष :
मध्य एशिया में रचित संस्कृत साहित्य का स्वामित्त्व वहाँ फले-फूले विभिन्न बौद्ध केंद्रों को दिया जा सकता है। संस्कृत विस्तृत भाषा हो गई, जब यह दक्षिण एशिया के उत्तरी हिस्से से मध्य एशिया तक पहुँची और जब तक मध्य एशिया में बौद्ध धर्म कायम रहा तथा कुमारजीव के अनुवादों की वजह से पूर्वी एशिया में चीनी भाषा बौद्ध की मानक भाषा नहीं हो गई, यह इतिहास में लंबे समय तक क्षेत्र से परे भाषा बनी रही।
कुँवर नारायण उपनिषद के "नचिकेता" और "वाजश्रवा" से "समर्पित साधक, विचारक, कलाकार", "जो अपने समय के समानांतर रचता है अपना प्रतिसमय भी", की तरफ क्यों मुड़े? वह बौद्ध धर्म के शिक्षक नहीं होना चाहते हैं, बल्कि "बौद्ध दर्शन ग्रंथों का अनुवादक, अध्येता, ज्ञाता और व्याख्याता।"
वह भारतीय प्रायद्वीप से "अनुवादक मात्र नहीं, अपना भी एक संदेश हूँ, उनके संदेशों में शामिल" कहते हैं। नारायण का कुमारजीव बिना किसी भारतीय संदर्भ के बुद्ध के संदेशों का अग्रदूत बनते हैं। अतएव वह काल्पनिक कुमारजीव के रूप में पुस्तक की शुरुआत में ही स्वयं कहते हैं, "मैं तथागत के साथ हज़ारों साल लंबी महान यात्रा पर निकला हूँ।" इस तरह वे "बहती हवाओं की तरह" कहीं रुक नहीं सकते, केवल कुछ शब्द, कुछ भटकते विचार उनके साथ रहेंगे। अंत में, शाश्वत और सर्वव्यापी प्रश्न रह जाता है, "कहाँ से आया हूँ, कहाँ जा रहा हूँ?" नारायण की कविताओं में, कुमारजीव का परम् धर्म ज्ञान है, शेष सब मार्ग की बाहरी विघ्न बाधाएँ हैं।
नारायण के कुमारजीव लगातार भारतीय, मध्य एशियाई और चीनी जगत के बीच ऐतिहासिक भिक्षु और मध्यस्थ और अंतर्मुखी बौद्धिक व्यक्ति की उपमा के रूप में झूलते हैं। इस तरह, इस महाकाव्य को ऐतिहासिक अनुवादक की सराहनात्मक काव्य जीवनी साथ ही साथ वत्र्तमान समय में कवि और बुद्धिजीवी, जिसका कर्तव्य ज्ञान को फैलाना और साथ ही अपने अपने व्यक्तिगत अनुभव के प्रकाश में स्वयं को प्रतिबिंबित करना है, की भूमिका के रूप में पढ़ा जा सकता है; जैसा कि नारायण यतीन्द्र मिश्र को दिए गए साक्षात्कार में स्पष्ट करते हैं, "जीवन के कठोर यथार्थ से कविता का विलगाव" दूर करने के लिए।
सांस्कृतिक संकरण और उनके रूपान्तरण की भावना नारायण के कुमारजीव की रचना के केंद्र में है। साथ ही, ऐतिहासिक चरित्रों की भाँति आधुनिक बुद्धिजीवी और कवि अपने घर में ही बेघर हैं। अपनी पारस्परिक सांस्कृतिक रचनात्मकता के लिए ऐसी स्थिति, जो कि रचनात्मकता का एक तरह का प्रतिदर्श है, जिसमें नारायण भारतीय पारम्परिक संवेदनशीलता और यूरोपीय अस्तित्त्ववाद के बीच स्वयं को बताते हैं, जो सांस्कृतिक स्वामित्त्व के दावों की अनुपस्थिति थी। कुमारजीव का संस्कृत पाठ अनुवाद के लिए खुला है और कुमारजीव स्वयं एक संदेश हैं, जो एक संस्कृति से दूसरी संस्कृति तक के और संस्कृत से चीनी रूपांतरण में स्वयं को महसूस करता है। अब तक मध्य एशिया के एक खास अत्यधिक रचनात्मक युग में भाषा के स्वामित्त्व का प्रश्न महत्वपूर्ण नहीं था, जिसने पूर्व एशिया में बौद्ध धर्म के विस्तार को उर्वर भूमि प्रदान की।

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