ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
सावन का महीना : डमरु बाजै चहुँओर
01-Aug-2018 01:00 AM 1910     

सावन आ गया। सावन अथवा श्रावण माह का नामकरण इस महीने की पूर्णिमा पर चन्द्रमा का श्रवण नक्षत्र के आसपास होना है। श्रवण नक्षत्र में तीन तारे हैं, जिन्हें वैष्णव मत मानने वाले वामन रूपधारी विष्णु का तीन पग बताते हैं। वामन ने पहले पग में आकाश नाप दिया और दूसरे पग में पाताल। अब उसने तीसरे पग से नापने हेतु भूमि बलि से माँगी, तो बलि वामन को दिए गए अपने ही शब्दों से बँध गया और अपना सिर वामन के पाँवों के समक्ष कर दिया। श्रावण पूर्णिमा पर मनाए जाने वाले "रक्षा-सूत्र बंधन मन्त्र" में यही वर्णन आता है - "येन बद्धो बलि राजा दानवेन्द्रो महाबल:। तेन त्वाम् प्रतिबध्नामि रक्षे मा चल मा चल।।" (जिस वचन से दानवों के राजा बलि को बाँधा गया, उसी से अर्थात् धर्म से मैं तुम्हें बाँधता हूँ; हे रक्षा सूत्र तुम स्थिर रहना, चलायमान नहीं होना।) स्पष्ट है कि श्रवण नक्षत्र का अधिदेवता विष्णु को माना गया। लैटिन भाषा में श्रवण के तीन तारों को क्रमशः अल्फा, बीटा और गामा एक्विला (ईगल) कहा गया, जो विष्णु के गरुड़ध्वज प्रतीक के करीब है। "श्रवण" का वास्तविक अर्थ है - कान यानि श्रवण करण (सुनने का यंत्र); किन्तु शैव मतावलंबी श्रवण नक्षत्र के तीन तारों को शिव का त्रिशूल या डमरू बताते हैं। जो भी हो, सुनने के लिए ध्वनि (शब्द) उत्पन्न होना ज़रूरी है। सावन शंकर (शान्ति देनेवाले) का महीना है। जब महेश्वर नटराज शिव डमरू बजाते हैं, तो कुल चौदह माहेश्वर सूत्रों के रूप में संस्कृत-हिन्दी और कपितय अन्य भारतीय भाषाओं की वर्णमाला की ध्वनि से वातावरण गुंजायमान हो जाता है :
1. अइउण्। 2. ॠलॄक्। 3. एओङ्। 4. ऐऔच्। 5. हयवरट्। 6. लण्। 7. ञमङणनम्। 8. झभञ्। 9. घढधष्। 10. जबगडदश्। 11. खफछठथचटतव्। 12. कपय्। 13. शषसर्। 14. हल्।
माहेश्वर सूत्रों की उत्पत्ति नटराज शिव के द्वारा किये गये ताण्डव नृत्य से मानी गयी है -
"नृत्तावसाने नटराजराजो ननाद ढक्कां नवपंचवारम्। उद्धर्तुकामः सनकादिसिद्धान् एतद्विमर्शे शिवसूत्रजालम्।।"
(नृत्य (ताण्डव) के अवसान (समाप्ति) पर नटराज (शिव) ने सनकादि ऋषियों की सिद्धि और कामना का उद्धार (पूर्ति) के लिये नवपंच (चौदह) बार डमरू बजाया। इस प्रकार चौदह शिवसूत्रों का ये जाल (वर्णमाला) प्रकट हुआ।)
डमरू के चौदह बार बजाने से चौदह सूत्रों के रूप में ध्वनियाँ निकली, इन्हीं ध्वनियों से अष्टाध्यायी व्याकरण का प्राकट्य हुआ। इसलिये व्याकरण सूत्रों के आदि-प्रवर्तक भगवान नटराज को माना जाता है। प्रसिद्धि है कि महर्षि पाणिनि ने इन सूत्रों को देवाधिदेव शिव के आशीर्वाद से प्राप्त किया जो कि पाणिनीय संस्कृत व्याकरण का आधार बना, हालाँकि पाणिनि के गुरू कहे जाने वाले नंदिकेश्वर कृत "नंदिकेश्वरकाशिका" में भी माहेश्वर सूत्रों के प्राकट्य से सम्बंधित यही श्लोक है। इस तरह श्रावण संस्कृत भाषा की उत्पत्ति का मास है। श्रावण पूर्णिमा के दिन से उपाकर्मन् अर्थात् श्रुति (वेद, ब्राह्मण, उपनिषद्) अध्ययन का आरम्भ शुरू होता है, जो पौष माह की पूर्णिमा तक जारी रहता है। इसी कारण इस दिन को 1969 के शासकीय आदेश के आधार पर विश्व संस्कृत दिवस मनाया जाता है।
सावन शब्द अर्थात् ध्वनि का समय है। नभ गर्जन, नदियों का नादस्वर, झरनों की झर-झर ध्वनि, पपीहों की पीहू-पीहू, मेढकों की टर्र-टर्र, झींगुरों का गायन - सब ऐसा समाँ बाँधते हैं, लगता है मानो प्रकृति परम-पुरुष की आराधना में उल्लसित होक नत्र्तन-गायन कर रही हो।
शब्द का एक पर्यायवाची वाक् है और वाक् से ही वाक्य बनता है। वाक् (लैटिन : ध्दृन्) संस्कृत के "वच्" धातु से व्युत्पन्न हुआ है, जिसका मायने "बोलना" है। इस स्त्रीलिंग संज्ञा "वाक्" का वास्तव में दो अर्थ है - 1. स्वर या उच्चरित शब्द और 2. निर्जीव वस्तुओं की ध्वनि। इस प्रकार वाक् या शब्द एक ही भाव को प्रकट करते हैं।
सभी चीजों का त्रिस्तरीय भाव होता है - 1. परा, 2. सूक्ष्म और 3. स्थूल। अगर इन स्तरों पर विचार करें, तो परा वाक् वह वाक् अवस्था है, जो प्रत्यय यानि मानस स्तर पर ईश्वर की सृष्टि कल्पना है। यह पवित्र शब्द या नाद है। किन्तु वाक् की सूक्ष्म अवस्था भी है, जिसे पश्यन्ती वाक् कहा गया। पश्यन्ती वाक् वास्तव में वाक् की मध्यमा अवस्था है, जिसे हिरण्यगर्भ शब्द भी कहा गया। इस स्तर पर वाक् ईक्षण (देखना) करता है। इसे मात्रिका अवस्था भी कहा गया, क्योंकि इसके बाद की अवस्था में ही स्थूल वर्णों का उच्चारण सम्भव हो पाता है। वाक् की अंतिम अवस्था वैखरी (द्मद्रड्ढड्ढड़ण्) की अवस्था है।
आगम ग्रंथों के अनुसार भावातीत शान्ति की अवस्था में परमात्मा या परमशिव को अशब्द, निर्विषय और प्रत्यय रहित कहा गया। इस वजह से उसका कोई नाम या रूप नहीं होता है। वह अनंत शान्ति की अवस्था में नाद बिन्दु या घनीभूत-शक्ति से ब्रह्मांड की विभिन्न शक्तियों के रूप में प्रसारित होता है। यही शक्ति का प्रसरण ही ब्रह्मांड के उद्भव का कारण है, जिसे जीवात्मा कत्र्ता और कर्म के द्वैत रूप में ग्रहण करता है। शक्ति की यह क्रीड़ा चिदाकाश में संपन्न होती है, अतएव जब परमशिव दूसरी अवस्था में आता है, तब उसका न तो क्षय ही होता है और न ही वह किसी तरह प्रभावित होता है। मात्र उसका उत्कर्ष और व्याप्त रूप प्रकट होता है। इस तरह यह सृष्टि अलग से कोई निर्माण नहीं है, बल्कि परिणाम है और परमात्मा इसके उपादान कारण हैं। दूसरे शब्दों में, ब्रह्म स्वयं अपनी शक्ति का प्रसार करता है। कुछ लोग कहते हैं कि यह सृष्टि ब्रह्म के एक दिवस पर्यन्त कायम रहती है और उसके बाद इसका पुनः महाप्रलय के रूप में विघटन होता है। जबकि कुछ अन्य लोगों का मानना है कि ब्रह्मांड सदैव कायम रहता है और कोई महाप्रलय नहीं होता है। हाँ, एक ब्रह्मांड का विलय और दूसरे ब्रह्मांड का उद्भव सम्भव है। महाप्रलय की अवस्था में परमशिव की दूसरी अवस्था अभिन्न और अप्रकट रूप में उसमें लीन हो जाती है। इस तरह शब्द-ब्रह्म पुनः शिव के उल्लास के रूप में अनंत शाश्वत शान्ति में लीन हो जाता है, जैसे सागर की ऊँची लहरें पुनः सागर की असीम शान्ति में लीन हो जाती हैं। "शब्द" की यह धारणा अत्यंत प्राचीन है।
यह ब्रह्माण्ड ईश्वर की इच्छा या काम का प्रतिफलन है। यही ईश्वर का काम सभी चीजों का सनातन आधार और मूल है। वाक् अर्थात् शब्द इसी काम से जन्मा है। पौराणिक कथाओं में इसी बात को इस प्रकार कहा गया कि सृष्टि (यानि ब्रह्माण्ड) ब्रह्मा के काम से जन्मी और ब्रह्मा ने अपनी दुहिता वाक्-देवी सरस्वती के साथ गमन किया। अथर्ववेद (9.2) में काम को सभी देवताओं से अधिक शक्तिशाली कहा गया और इस काम की तनया को ऋषियों ने "वाक्-विराट" रूपी गौ कहा। शतपथ ब्राह्मण (6.1.1.8) में कहा गया, प्रजापति ने इच्छा की कि मैं अनेक हो जाऊं, मैं व्यापक हो जाऊं और "वागेवस्या सः असृज्यत्" - इस प्रकार वाक् यानि शब्द से सृष्टि व्याप्त हो गयी। बृहदारण्यक उपनिषद मे कहा गया कि उस वाक् और उस आत्मा से उसने ऋक्, सामन्, यजुः के छन्दों, यज्ञों, प्रजाओं और पशुओं को बनाया। तैत्तिरीय ब्राह्मण में वाक् को और महाभारत के शांतिपर्व में वाक्-देवी सरस्वती को वेदमाता बताया गया है। महाभारत के भीष्मपर्व में सरस्वती और वेदों को अच्युत श्रीकृष्ण के मानस से उत्पन्न बताया गया है। इसी तरह वनपर्व में गायत्री को वेदमाता बताया गया है सारांशतः यह कहा जा सकता है कि भारतीय निगमों में इस जगत को ही वाङ्मय (जगत वाङ्मय) अथवा शब्दप्रभाव माना गया।

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