ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
मेक इन इंडिया की मुश्किलें
01-Feb-2016 12:00 AM 1025     

आज की तारीख़ में राजनैतिक गलियारों से लेकर महानगरों, छोटे शहरों, कस्बों यहां तक कि गाँवों तक में "मेक इन इंडिया' जुमले को सुना जा सकता है। यह परियोजना यदि अपने पूर्ण स्वत्र्द्यण् में साकार होती है तो भारत को पुनः सोने की चिड़िया वाले युग की ओर प्रशस्त किया जा सकता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 25 सितम्बर 2014 को पंडित दीनदयाल उपाध्याय के जन्मदिन पर इस परियोजना का सिंहनाद किया। जिसका प्रतीक भी विभिन्न कलपुर्जों युक्त सिंह है। सिंह सारनाथ स्तम्भ से तथा कलपुर्जे उत्पादकता दर्शाने हेतु चिह्न स्वरूप लिए गए हैं। भारत की वित्तीय प्रणाली को सुडौल व सुदृढ़ आकर देने हेतु "मेक इन इंडिया प्रोजेक्ट' स्वप्न की नीव रखी गयी है। जिसके द्वारा वै?िाक आर्थिक ताकतों को भारत में निवेश के उपयुक्त अवसर प्रदान करने का प्रावधान है। इसके अन्तर्गत रोज़गार निर्माण, द्वितीय व तृतीय उत्पादक क्षेत्रों को बढ़ावा, भारतीय अर्थव्यवस्था का उत्थान व भारत को पूर्ण आत्मनिर्भर देश बनाने का प्रयोजन है। जिससे कि भारतीय अर्थव्यवस्था को सम्पूर्ण वि?ा में नयी और मजबूत पहचान मिल सके। इस परियोजना में जिन क्षेत्रों पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है, उनमें प्रमुख हैं आसान स्वरोज़गार पालिसी। जिसके द्वारा लोगों को अपना व्यवसाय शुरू करने हेतु प्रेरित किया जा रहा है। इसी के अंतर्गत लोगों को प्रशिक्षण प्रदान करके रोज़गार उपलब्ध कराना भी उद्देश्य हैं। योजना की एक अन्य उल्लेखनीय गतिविधि 100 स्मार्ट सिटी बनाना है। जिसमें कि वह सभी वि?ा स्तरीय सुविधाएं उपलब्ध हों जो कि निवेशकों का ध्यान आकर्षित कर उन्हें निवेश हेतु सहर्ष बाध्य कर सकें। इस योजना का सबसे प्रमुख लक्ष्य है भारत को मुख्य उत्पादक क्षेत्र बनाया जाए ताकि भारत प्रमुख निर्यातक बन कर उभरे। जबकि आज की तारीख में भारत प्रमुख आयातक देश है। इसमें कोई संदेह नहीं कि यह परियोजना ज्यों-ज्यों आकर लेगी भारत नव वित्तीय शक्ति बन कर उभरेगा। परंतु यह राह कई चुनौतियों से भरी पड़ी है। उनमें से कुछ प्रमुख चुनौतियों पर एक नज़र डालें। "भारत में व्यवसाय' को वि?ा अनुक्रमणिका में 142वां स्थान मिला है जो कि शर्मनाक और गंभीर बात है। इसकी मूल वजहें हैं यहां का टैक्स सिस्टम, नियम व कार्यप्रणाली, क़ानून व्यवस्था, एवम् पारदर्शिता का अभाव। अतः यहां सबसे पहली आवश्यकता है - स्वस्थ व्यावसायिक माहौल और यह तभी संभव है जब निर्णायक कार्य प्रणाली छोटी, साध्य और पारदर्शी हो। यह अभी भारत में नहीं है। एड्ढ दूसरी कठिनाई है मध्यम व छोटी इंडस्ट्रीज को नज़रअंदाज़ करना जो कि आने वाले समय में इस प्रॉजेक्ट में प्रमुख रूप से योगदान दे सकती है। "मेक इन इंडिया' प्रोजेक्ट को "मेक इन चाइना' प्रोजेक्ट के समकक्ष आँका जा रहा है। उत्पादकता की वृहद परीक्षा में अव्वल आने हेतु भारत को उन सभी बाधाओं को पार करना अभी बाक़ी है जिन्हें चाइना पार कर चुका है। इन सभी चुनौतियों के बावजूद अच्छी बात यह है कि सौभाग्य से भारत प्राकृतिक संसाधनों से परिपूर्ण है और भारत की जनसंख्या का एक बड़ा भाग युवा होने के कारण उत्पादकता के क्षेत्र में अपना अमूल्य योगदान दे सकता है। अर्थात् प्रारंभिक प्रशिक्षण के उपरान्त हमारे पास हुनरमंद मेन पॉवर की कोई कमी नहीं।

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