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महाशिवरात्रि : एक विवाह ऐसा भी
01-Mar-2018 02:48 PM 2819     

महाशिवरात्रि कल्याण की महारात्रि है। मंगल, शुभ और स्वस्ति की रात। एक ऐसे विवाह की रात जो बहुत पुनीत था और जिसे आदर्श के रूप में प्रचलित करने के लिए एक पर्व बना दिया गया। तुलसी ने कहा था : "एहि बिबाह सब विधि कल्याना।" यह शिवजी का विवाह भर नहीं है, यह शिव यानी पवित्र और मंगलकारी विवाह की स्मृति है। आज जबकि विवाह नामक संस्था स्वयं कई विकृतियों से गुज़र रही है, शिव-पार्वती विवाह का अनुवार्षिक उत्सवन करने वाली परम्परा के मायने ज्यादा जरूरी हैं। यह विवाह किसी रूढ़िगत केटेगरी में नहीं अँटता। यानी यह वह ब्राह्म विवाह नहीं था जिसमें कन्या का पिता किसी विद्वान और सदाचारी वर को स्वयं आमंत्रित कर उसे विधि-विधान सहित अपनी कन्या ब्याह देता था। यह वह दैव विवाह भी नहीं था जिसमें किसी याज्ञिक को पिता द्वारा कन्या ब्याही जाती थी। न यह वह आर्ष विवाह था जहाँ वर पक्ष से गऊ का जोड़ा लेकर कन्यादान किया गया हो। न यह वह प्राजापत्य विवाह था जहाँ अभिजात वर्ग से किसी वर को चुनकर कन्या को, उसकी सहमति के बिना, ब्याह दिया जाता था। यह आसुर, राक्षस या पैशाच विवाह भी नहीं था। न गंधर्व विवाह ही था जहाँ परिवार वालों की सहमति के बिना वर और कन्या बिना किसी रीति-रिवाज के आपस में विवाह कर लेते हैं। फिर भी इस विवाह को सबसे पावन माना गया।
इस विवाह का संदेश ही यह था कि परिणय-संबंध "श्रेणीकरण" और "वर्गीकरण" से बहुत आगे हैं। "श्रेणी" का हम इस्तेमाल करें, इसके पहले वह हमें इस्तेमाल कर लेती है। संदेश यह है कि विवाह को कोष्ठकों में सूचीबद्ध करने से बचना होगा। यह स्पर्धा कि हम "इस" या "उस" जैसी शादी करेंगे, विवाह की अद्वितीयता की अवमानना करती है। शिव एक वर के रूप में कैसे थे? सारी तत्कथित निर्योग्यताओं से युक्त: "अगुन अमान मातु पितु हीना/उदासीन सब संसय छीना/ जोगी जटिल अकाम मन नगन अमंगल बेष/" पार्वती जी की माँ "जौं घरु बरु कुल होइ अनूपा/करिअ बिबाह सुता अनुरूपा" की इच्छा रखती थीं। घर-वर-कुल का ध्यान। शिवजी सारे गणितों से परे हैं। हमारे विवाह इन दिनों कितने कैलकुलेटिव होते जा रहे हैं। 36 गुण मिलाएंगे, शिवजी तो "अगुन" हैं, गुणातीत हैं। हम कुंडली मिलाते हैं, फिर भले ही बाद में पति-पत्नी जिंदगी भर कुंडली मार कर एक-दूसरे को घूरते रहें। ग्रह मिलाएंगे, फिर भले बाद में गृहयुद्ध होता रहे। लड़के का पद देखेंगे। इसके पहले कि लड़के वालों को चढ़े, लड़की वालों को पद-मद चढ़ जाता है। उधर शिवजी तो उदासीन, लापरवाह, निष्काम ह्दय हैं। हम चाहते हैं कि वर किसी ऐसी सर्विस में हो जिसका विवाह बाजार में सूचकांक अच्छा है। कन्या पक्ष वर के भविष्य को देखता है, उसकी भावी सम्पन्नता को और वर पक्ष लड़की वालों की वर्तमान सम्पन्नता को - जबकि यहाँ पार्वती जिस वर को चुनती हैं, वह विपन्न है, सर्वहारा है। शिव जिनकी विभूति ही उनका वैभव है। पार्वती को वे बाहरी मेल ग्रह, गुण, कुंडली, घर, कुल नहीं देखने। वे तो ये देखती हैं कि किनसे उनकी वेवलेंथ मिलती है। जेहि कर मनु रम जाहि सन ताहि तेही सन काम। जिसका मन जिसमें रम गया, उसको तो उसी से काम है।
हमारा लोक हरतालिका का पर्व मनाता है। वह उस दिन को सेलीब्रेट करता है जब पार्वतीजी अपने पैरेन्ट्स का घर अपनी सखियों की मदद से तब छोड़कर भाग गई थीं जब उन्हें पता लगा कि उनके माता-पिता उन्हें विष्णु जी से ब्याहने की सोच रहे हैं, जबकि वे शिवजी को चाहती थीं। तो यह हरतालिका उस स्वतंत्र संकल्पा युवती का पर्व है जिसे यह भी नहीं पता कि जिसे वह चाहती है, वह भी उसे चाहता है या नहीं। बल्कि उसके बारे में जितना सुना गया है, उसके अनुसार तो वह सरासर वीतरागी व संसार से उचाट-सा है और पार्वती के भागने में उसकी कोई भूमिका नहीं है। पार्वतीजी का "हरण" उनकी सहेलियां करती हैं। जो समझते हैं कि ऐसे निर्णय मनोरति (त्दढठ्ठद्यद्वठ्ठद्यत्दृद) हैं और तात्कालिक भावावेश में लिए जाते हैं, उनके बुद्धि-भ्रम को ठीक करने के लिए भी पार्वतीजी वर्षों तपस्या करती हैं और शिव-संकल्प को अपनी विभूति से विगलित करती हैं। आज मानवाधिकारों की सार्वभौम उद्घोषणा की 16वीं कंडिका प्रावधानित करती है कि सभी वयस्क स्त्री-पुरुष चाहे वे किसी जाति, राष्ट्रीयता या मजहब के हों, विवाह के संदर्भ में चाहे शादी हो या उसका भंग होना, बराबर अधिकार रखते हैं। विवाह में प्रवेश करने वाले वर-वधू की स्वतंत्र और पूर्ण संस्वीकृति विवाह के लिए अनिवार्य होगी।" यह घोषणा इस देश में हरतालिका के रूप में बहुत पहले से ही एक संस्कार और अनुस्मृति की तरह जारी रही है। तो सवाल यह है कि जो हरतालिका मनाते हैं वे अपने बच्चों को कितना यह हक देते हैं। गौरीपूजन के विवाह-पूर्व संस्कार आत्मनिर्णया लड़की के आदर्श की स्मृति कराने के लिए हैं। किंतु हमारे यहां इसे वे माता-पिता भी कराते हैं जो इस आदर्श के साथ ही द्रोह कर रहे होते हैं।
शिव पार्वती विवाह प्रसंग कन्या की चयन-स्वतंत्रता की प्रतिष्ठापना करता है। बाल विवाहों में तो वह होती ही नहीं, पर बहुत-सी अरेंज्ड शादियों में भी लड़की के लिए वह "स्पेस" उपलब्ध नहीं होती। "ऑनर किलिंग" की घटनाएं बताती हैं कि हमारे दौर में हम किस "अशिव" स्थिति में आ गए हैं। प्रणय परिणय में परिणत हो, यह एक स्वाभाविक स्थिति है। लेकिन परिणय को प्रणय के निषेध की तरह प्रयुक्त करना एक ऐसी त्रासदी है जिसका हमारी संस्कृति में कोई स्थान नहीं है। बीबीसी के अनुसार विश्वभर में प्रतिवर्ष 20 हजार से अधिक स्त्रियाँ "ऑनर किलिंग" का शिकार होती हैं। एसिड अटैक से लेकर पिटाई अलग है। लड़के का मारा जाना भी। प्रसिद्ध वकील और मानवाधिकार कार्यकर्ता हिना जिलानी ने अभी कहा कि पाकिस्तान में औरतों का जीवनाधिकार सामाजिक मानदंडों और रुढ़ियों के अनुपालन पर ही निर्भर है। इसकी तुलना में ये पार्वती हैं जो अपने मनपसंद वर के लिए तप करती हैं। अपनी पसंद की सर्वस्वीकृति के लिए सारे असह्य क्लेश सहती हैं। "ऑनर" के लिए हत्या तक कर देने वाले देखें कि शिव की वर के रूप में निर्योग्यताएं गिनाते हुए तुलसी ने उन्हें "अमान" लिखा है। जिन विष्णु से विवाह के लिए पार्वती मना करती हैं, वे ही शिवजी की बारात में हंसते मुस्काते शामिल होते हैं। बल्कि राम-रूप में वे ही शिवजी को पार्वती से विवाह को मनाते हैं। आनर किलिंग का एक बड़ा कारण मना कर दिए जाने से उत्पन्न आक्रोश भी रहा है। पार्वती तप करती हैं, वे कुर्दिश कन्याओं की तरह आत्म-दाह के लिए मजबूर नहीं की जातीं। ऋषि समाज में उनके तप से उनके प्रति आदर उमड़ता है। "देखि प्रेमु बोले मनि ग्यानी/ जय जय जय जगदंबिके भवानी"।
हमारे विश्वविद्यालयीन पाठ्यक्रमों में विवाह के प्रयोजनों में सेक्स की भूमिका की अपरिहार्यता भी बताई जाती है। शिव-पार्वती विवाह-प्रसंग इस का भी प्रत्याख्यान रचता है। इस प्रसंग में काम के भस्म होने और "अनंग" होने की कथाएं जुड़ी हुई हैं और पार्वती के वे प्रसिद्ध शब्द भी : "तुम्हरे जान कामु अब जारा/अब लगि संभु रहे सबिकारा/ हमरे जान सदा सिव जोगी/ अज अनवद्य अनादि अभोगी।" यह विवाह सेक्स को विवाह का बैरोमीटर मानने का भी खंडन है। पार्वती जब "सदा सिव" की बात करती हैं तो वे किसी क्षणिक पैशन की बात नहीं करतीं। वे प्रासंगिकता को समझती हैं पर सदाशिवत्व की वैवाहिक मूल्यवत्ता को उससे ज्यादा समझती हैं। काम का "शरीर" खत्म होना फिज़िकल रूप में विवाह को देखने से बाज आने का रूपक है। उसका अनंग होना हृदय से हृदय और आत्मा से आत्मा के मिलने के रूप में वैवाहिक अंतरंगता को देखना है। उस भावनात्मक पारस्परिकता से ही विवाह का स्थायित्व है। उसकी यांत्रिकता से, उसके रोबोटिक हो जाने से उसका आकर्षण भी शेष नहीं रह जाता। विवाह में एक-दूसरे की उपस्थिति को जीवन्त तरीके से महसूस करना, दूसरे की उपस्थिति में संवेदना के साथ प्रवेश करना, अपने पार्टनर के अशरीरी मौन को समझना ज्यादा जरूरी होता है।
शिव-विवाह प्रसंग का एक बहुत रुचिकर पक्ष शिवजी की बारात है। कभी 1954 में आई फिल्म "मुनीमजी" में "सिवजी बिहाने चले पालकी सजाय के भभूति लगाय के" वाले गीत में शैलेन्द्र ने उस बारात का बहुत अच्छा शब्द-चित्र खींचा था। और उससे भी ज्यादा दिलचस्प तरीके से सुबोध मुकर्जी ने शिवजी की उस बारात का फिल्मांकन किया था। उस बारात को ध्यान से देखें। वह बहुत क्रूड और अटपटी है। एक तरफ तो वह जगदंबा जिनके कारण तुलसी के शब्दों में "रिद्धि सिद्धि संपत्ति सुख नित नूतन अधिकाई", दूसरी तरफ ये शिव "जो ब्याल कपाल विभूषन छारा" हैं। राख ही जिनका अलंकार है। आभिजात्य को वरीयता देने वाले प्राजापत्य विवाह की जगह यह एक प्रजातांत्रिकता इस बरात में है जहाँ वे सभी जो किंचित स्खलित, विस्थापित, सब-नार्मल हैं वे सब यहाँ हैं। वे सब जिन्हें अपदस्थ किया हुआ है, वे सब जो शानो-शौकत के प्रतिमानों में बिल्कुल नहीं अंटते। वंचित लोग। जो रन-डॉडन हैं, ऐसे। विकलांग भी। ऐसे भी जिनके सर पर छत नहीं, जिन्हें देखना कई बंदों को अपशकुन लगे, वे जो इन्सान ही न लगें - साहिर यही कहते थे- "मेरे माहौल में इंसान न रहते होंगे।" फेसलेस लोग। शिवजी की बारात बैंड बाजा बारात के बहुत से प्रतिमानों को आनंद से तोड़ती है और समावेशिता के कुछ नए निकष गढ़ती है। आजकल की "बिग फैट इंडियन बारात" से ठेठ अलग। "वेडिंग आउटफिट" के लिए पैसों को उड़ा देने वालों के सामने यह "तन छार ब्याल कपाल भूषन" वाले शिव।
इन दिनों जैसा नहीं कि शादी तो हुई 110 मिलियन अमेरिकन डॉलर में, टिकी ज्यादा देर नहीं। सिल्वर-बॉक्स में आमंत्रण आ रहे हैं, बारात को प्लेन टिकेट और पेरिस के फाइव-स्टॉर होटल में ठहराया जा रहा है, रॉयल्स और नोबल्स ही बराती हैं, सात लाख डॉलर तो फूलों पर ही खर्च कर दिए हैं, प्राइव्हेट जेट्स में बाराती लाए जा रहे हैं। शिवजी की बारात अभिरुचि के ढर्रे को विचलित करती है और "एब्सर्ड" का एक नया सौंदर्यशास्त्र रचती हैं। वह प्रसाधन के ऊपर जीवन की सच्ची पवित्रता की विजय है। इसीलिए वह शिव-बारात है। उसमें शिव अपने गणों को शामिल करते हैं और अपने व्यक्तिगत संबंधों के अवसर को गणतांत्रिक बनाते हैं। अपनी खुशी में समाज के वंचित वर्गों को शामिल करना है न कि विलासिता, प्रदर्शनप्रियता और तड़क-भड़क में पैसा बर्बाद करना।
शिव हैं तो योगी, ध्यानस्थ। लेकिन विवाहोपरांत वे घरबार वाले भी हैं। यदि सम्पूर्ण परिवार किसी एक का है तो शिव का। विष्णु के अवतारों के परिवार हैं लेकिन स्वयं विष्णु ऐश्वर्य रूप में सिर्फ लक्ष्मीपति हैं। शिव की पत्नी पार्वती बराबर की भूमिका निभाती हैं। वे हमेशा शिव के बराबर और साथ दिखाई पड़ती हैं जबकि लक्ष्मी विष्णु के चरण कमलों की ओर। एक तो इसका कारण यह रहा होगा कि पार्वती और लक्ष्मी दोनों अपने-अपने रूपक का भी निर्वाह करती हैं। शिव के साथ शक्ति का होना, पुरूष के साथ प्रकृति का होना, एक्स के साथ वाय क्रोमोसोम का होना है तो बराबर में होना है।
अर्धनारीश्वर की संकल्पना तो यह है कि उन्हें न केवल बराबर होना है बल्कि संयुक्त भी होना है। भृंगी की कथा यही स्थापित करने के लिए है कि शिव और शक्ति में भेद पैदा करना मूर्खता है। उनके लिंग स्वरूप में योनि का सान्निध्य है। विष्णु की लक्ष्मी उनके चरणों में है, इसका मतलब यह नहीं कि नारी का स्थान नर के चरणों में है। रूपक यह है कि विष्णु जीवन हैं और लक्ष्मी के स्वामी। पतन तब होता है कि जब लक्ष्मी आपकी स्वामिनी हो जाए। धन को भृत्य-स्वामी के उपयोगितावादी संबंध में न देखकर पति-पत्नी के आत्मीय संबंध में तो देखा गया, लेकिन रूपक यह भी कहता था कि सम्पदा को सिर नहीं चढ़ाना है। लक्ष्मी के सर पर न चढ़ने का यह एक वैयक्तिक अर्थ होगा, लेकिन इसका एक सामाजिक अर्थ भी है। लक्ष्मी टॉप-हेवी नहीं होनी चाहिए। वह जीवन और समाज विकृत है जहाँ लक्ष्मी शीर्ष के कुछ चुनिंदा लोगों तक सुरक्षित है।
दशानन होना सम्पत्ति का टॉप हेवी होना है और यह विष्णु लक्ष्मी के द्वारा प्रस्तुत आदर्श के सर्वथा विपरीत है जहाँ लक्ष्मी को नीचे के अंगों की सेवा करनी है, हमारे समाज के निचले स्तरों तक लक्ष्मी को पहुंचना होगा। रावण और राम इसलिए दो सर्वथा भिन्न आदर्श हैं। शिव के भभूत, गज चर्म, नंगे बदन, फक्कड़ जीवन की तुलना में विष्णु का पूरा परिवेश वैभवशाली है लेकिन वैभव निचले स्तरों तक पहुंचता है तो विष्णुत्व है, यदि टॉप हेवी रह जाता है तो रावणत्व है।
विष्णु का लक्ष्मी को सिर के पास रखकर ट्रिकल डाउन थ्योरी चलाने का कोई इरादा नहीं है। वे तो लक्ष्मी को उन्हीं की सेवा करने को कहेंगे जिन्हें पुरुष सूक्त में पुरुष का पैर कहा गया था। सभी को पवित्र करने वाली गंगा विष्णु के इसी पद से निकली है। "अलंकारप्रियो विष्णु: अभिषेकप्रिय: शिव:" के शैव सिद्धांत का इशारा विष्णु के वैभव और शिव की विभूति का अवश्य है, लेकिन है इसी परिप्रेक्ष्य में। बहरहाल शिव योगी होते हुए भी एक अच्छा-ख़ासा पारिवारिक जीवन व्यतीत करते हैं और उसका अर्थ यह भी है कि यदि पत्नी हमारी शक्ति है तो परिवार भवसागर की बाधा नहीं है।

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