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मानस प्रबंधन
01-May-2016 12:00 AM 5312     

इस दुनियाँ में सभी मनुष्य एक समान नहीं हैं। हर कोई दूसरे से व्यवहार, स्वभाव, पसंद, महत्वाकांक्षा इत्यादि में भिन्न है। यह सब वैयक्तिक अंतर कहलाता है। लेकिन हमें विभिन्न मानसिकता वाले  लोगों के बीच आराम से रहना होता है। यही इस जीवन की सुंदरता है। अभी आप किसी सह्मदय व्यक्ति से बात कर रहे हैं और अगले क्षण आपका सामना किसी क्रोधित व्यक्ति से हो सकता है। अतएव यह आप पर आश्रित है कि आप विभिन्न परिस्थितियों को कितनी सफलता से संभाल सकते हैं और इसके लिए जो महत्व रखता है वह यह है कि आप कितनी युक्ति से अपने मन को कार्य में लगाते हैं।
अपनी समझ को कैसे बढ़ाएं?
हमें अपनी समझने की योग्यता या ग्रहण करने की क्षमता को बढ़ानी चाहिए। यह गुण हमें चीजों और परिस्थितियों को सही-सही ग्रहण करने के काबिल बनाएगा। ऐसा करने पर हम समाधान के सही रूप तक पहुँच पाएंगे। यह योग्यता हमारे नज़रिये को भी व्यापक बनाएगी, जो हमें परिस्थितियों और कार्य-व्यापार को साफ़ मन और सही दृष्टिकोण से देखने में मदद करेगा। इसके साथ ही, हमें वातावरण को समझना और आत्मसात करना चाहिए। इस तरह हम अपने आप को लचीलापन युक्त बोध क्षमता से सुसज्जित कर सकते हैं, जो हमें वांछित समाधानों तक पहुँचा सकता है।
आधी क्षमता तक पानी भरे हुए ग्लास को देखकर एक व्यक्ति कहता है कि यह आधा भरा ग्लास है। दूसरा व्यक्ति इसे आधा खाली कहता है। अन्य व्यक्ति इसे भरा ग्लास कहता है, क्योंकि आधा ग्लास पानी से और आधा हवा से भरा है।
बोध क्षमता या समझने परखने की योग्यता कभी-कभी मृग-मरीचिका की तरह होती है। जैसी भावना, वैसी ही समझ। अतएव इन कृत्यों पर नियंत्रण करना ज़रूरी है, ताकि सही और सकारात्मक भावना और समझ को महसूस किया जा सके। भावनाओं के प्रवाह पर नियंत्रण का अभ्यास करना चाहिए। हर किसी को जीवन के प्रति साफ़ दृष्टिकोण विकसित करना चाहिए, ताकि इस तरह की नासमझी और भावनात्मक उबाल को रोका जा सके। हर कोई सही समझ विकसित कर सकता है यदि उसकी सोच सकारात्मक और कृत्य मानवीय हो। सबसे पहले, सकारात्मकता और मानवीयता को अंतर्मन में जगह देनी चाहिए। अन्यथा, आँखें सही-सही ग्रहण नहीं कर पायेंगी।

सही प्रवृत्ति या रवैया क्यों महत्वपूर्ण है?
यह अत्याव¶यक है कि हर किसी को अपने प्रोफे¶ान या वृत्ति के प्रति प्रतिबद्धता हो। कार्य के प्रति आंतरिक लगाव और उस वृत्ति के द्वारा समाज सेवा वि¶िाष्टता सुनि¶िचत करने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं। प्रतिबद्धता और सकारात्मक रवैया (प्रवृत्ति) सहचर हो अर्थात् साथ-साथ चले। प्रवृत्तियाँ दो वर्गों में बाँटी जा सकती हैं - सकारात्मक और नकारात्मक। हर किसी को नकारात्मक प्रवृत्तियों का त्याग करना चाहिए या इनसे बचना चाहिए और सकारात्मक प्रवृत्तियों की आदत डालनी चाहिए। गलत प्रवृत्तियाँ लोक सेवा के लिए विध्वंसक सिद्ध हो सकती हैं। सकारात्मक रुख से परिस्थितियों से निपटने से कार्यक्षेत्र में सदैव अच्छा होता है और सबसे ज़्यादा महत्वपूर्ण यह है कि यह जीवन के लिए भी भला होता है। व्यापार में या जिस वृत्ति से जुड़े हों, हमें कुछ लोगों या स्थितियों से वास्ता पड़ता है जो अपनी आक्रामकता से भयभीत करने की को¶िा¶ा करते हैं। सामयिक और सही रवैये का अभाव इसे और भी खराब करता है। इस मधुमक्खी की कहानी पढ़िए।
एक चिड़ियाँ ने मधुमक्खी से कहा, "तुम इतने कठिन परिश्रम वाले कार्य करके मधु बनाती हो, लेकिन लोग इसे चुरा लेते हैं। क्या तुम उदास महसूस नहीं करती हो?'
"नहीं' मधुमक्खी बोली, "वे मेरी मधु बनाने की कला को नहीं चुराते हैं। वे केवल मधु चुराते हैं और इसके लिए वे एक दिन भुगतेंगे।'
यहाँ डॉ. एस.एच. क्राइन्स के द्वारा तैयार किये गए नुकसानदेह रवैये की सूची का ज़िक्र करना प्रासंगिक होगा। सूची इस प्रकार है :
अपरिपक्व और नुकसानदेह प्रवृत्तियाँ : असहिष्णुता, अत्यधिक आलोचना, अत्यधिक भावुकता, निर्भरता, बचाव, चिड़चिड़ापन, क्रोध, संदेह करना, हीन भाव रखना, अपर्याप्त होना, स्वयं पर पछताना, अहम् भाव, स्वयं में संलिप्त रहना, स्वार्थ, आलस्य, अत्यधिक घमंड, अति करना।
परिपक्व और सर्जनात्मक प्रवृत्तियाँ : सहिष्णुता, समझदारी, वस्तुनिष्ठता, आत्म वि·ाास, खुला दिमाग, ¶ाांत मन, क्षमा¶ाीलता, न्यायोचित होना, आत्म सम्मान, पक्का इरादा, तथ्यपूर्ण होना, औरों की चिंता करना, औरों का सम्मान करना, आत्मानु¶ाासन, उदारता, परिश्रम, समुचित होने का भाव, संतुलित होना।

आंतरिक तंत्र या अन्तःकरण की सफाई कैसे होती है?
बहुधा हम में से कई लोगों को विविध मामलों पर असंवेदन¶ाीलता के कारण भारी आलोचना का सामना करना पड़ता है। कभी-कभी सामान्य समझ ऋणात्मक होती है। किसी पर अमर्यादित आचरण, भ्रष्टाचार या असंवेदन¶ाील रवैया अपनाने का आरोप उसे यह चेतावनी देता है कि वह तुरन्त अपने आंतरिक तंत्र की सफाई करे। जैसा कि किसी ने कहा है, हमें पहले अपने घर को व्यवस्थित करना चाहिए। हम पर जो भी धब्बा लगता है, उसकी सफाई के लिए आंतरिक तंत्र को झकझोरते हुए उचित उपाय करें। आंतरिक तंत्र यानि अन्तःकरण का अर्थ है  - हमारा आध्यात्मिक तल, जो हमारे अभिप्राय, महत्वाकांक्षा, नैतिकता, मूल्यों और वि·ाासों तक फैला होता है।
प्लेटो ने कहा, "अगर मन और तन को निरोग रखना है, तो तुम्हें आत्मा के उपचार से ¶ाुरुआत करनी चाहिए।'
आत्मा आध्यात्मिक, ¶ारीर भौतिक और दिमाग मानसिक तल पर कार्य करता है। अगर आत्मा सही ढंग में नहीं है, तो ¶ाारीरिक तंत्र भ्रष्ट हो जाता है। अतएव ¶ाुद्ध आत्मा सुरक्षित जीवनयात्रा और परिपूर्णता के लिए स्टीयरिंग व्हील या परिचालन चक्र का काम करता है।
अगर अ¶ाुद्धि, ऋणात्मकता और स्वार्थ को बाहर भगा दें, आंतरिक तंत्र स्वच्छ हो जाता है। तब आत्मा तन और मन को ¶ाुद्धता, सकारात्मकता और निःस्वार्थ भाव से मार्गदर्¶ान करती हुई परम आनंद युक्त जीवन की राह प्र¶ास्त करती है।
यहाँ "आत्मा' का धार्मिक तात्पर्य नहीं है। यह अंतर आचरण है, जो परोपकार, क्षमा¶ाीलता और अन्य सकारात्मक सद्गुणों को धारण करता है। जितनी ज़्यादा मात्रा में ये सदगुण रहेंगे, उतना ही ज़्यादा हमारा अन्तःकरण या आन्तरिक तंत्र ¶ाुद्ध रहेगा।

विस्तृत दृष्टिकोण का क्या महत्व है?
उद्यमी या पे¶ोवर हमे¶ाा समाधानोन्मुखी होते हैं, न कि समस्या-उन्मुख। इस वास्ते उसे अपने आसामी या ग्राहक से मात्र परम्परागत तरीके से ही बात-व्यवहार नहीं करना चाहिए, बल्कि विस्तृत दृष्टिकोण अपनाना चाहिए। कानूनी ज़रूरतों के अनुपालन के अलावे, उसे मानवीय दृष्टिकोण अपनाते हुए अपना विवेक इस्तेमाल करना चाहिए। यह तरीका उसे तब लाभ पहुंचायेगा, जब वह जीवन की विभिन्न परिस्थितियों को सुलझाने  विवेक का इस्तेमाल करेगा। अपने विवेक को इस्तेमाल करने के लिए, अपने अंतर और बाह्र वातावरण की तारतम्यता को ध्यान में रखते हुए, उसे स्थितियों का मनोवैज्ञानिक अध्ययन करना पड़ेगा, असामियों के व्यवहार को पढ़ना होगा और तब कार्य के भावी रास्तों को चुनना होगा।
परम्परागत तरीके किसी समस्या समाधान के वास्ते सीमित विकल्प देते हैं। किन्तु विस्तृत दृष्टिकोण अनंत समाधान का रास्ता खोलता है।
उदाहरण के लिए, पाइथागोरस का प्रमेय कहता है कि किसी समकोण त्रिभुज के कर्ण का वर्ग के उसके अन्य दो भुजाओं के वर्गों के योग के बराबर होता है। समीकरण है : अ2अब2उ स2।
अगर हम इस "वर्ग मॉडल' के अलावे अन्य दृष्टिकोण भी अपनाते हैं तो इस प्रमेय को यह कहकर सिद्ध कर सकते हैं कि किसी समकोण त्रिभुज में विकर्ण के ऊपर बना अर्धवृत्त का क्षेत्रफल उसके अन्य दो भुजाओं के ऊपर बने अर्धवृत्तों के क्षेत्रफलों के योग के बराबर होता है।
अधोलिखित प्रसंग में देखिये कि किस प्रकार एक महान छात्र ने भिन्न दृष्टिकोण को अपनाते हुए रहस्य का समाधान किया था।
1902 ई. में एक प्रोफेसर ने अपने छात्र से पूछा कि क्या ई·ार ने इस ब्राहृाण्ड की सारी वस्तुओं को बनाया।
छात्र ने कहा, "हाँ'। प्रोफेसर ने फिर पूछा, "¶ौतान के विषय में क्या राय है? क्या उसे भी ई·ार ने ही बनाया?'
छात्र विचारमग्न हो गया... फिर छात्र ने प्रोफेसर से निवेदन किया कि क्या वह कुछ प्र¶न पूछ सकता है। प्रोफेसर ने अपनी सहमति दे दी। उसने पूछा, "क्या ठण्ड का अस्तित्व है?' प्रोफेसर ने उत्तर दिया, "क्यों नहीं, क्या तुम ठण्ड को महसूस नहीं करते हो?' छात्र बोला, "मुझे खेद है महा¶ाय! किन्तु आप गलत कह रहे हैं।' ठण्ड मात्र ऊष्मा का अभाव है... ठण्ड का कोई अस्तित्व नहीं है।' छात्र ने फिर पूछा, "क्या अन्धकार का अस्तित्व है?' प्रोफेसर ने उत्तर दिया, "बिल्कुल!' छात्र पुनः बोला, "आप फिर गलत कह रहे हैं महा¶ाय! अंधकार जैसी कोई वस्तु नहीं होती है। यह वास्तव में प्रका¶ा का अभाव है महा¶ाय! हम सदैव प्रका¶ा और ऊष्मा पढ़ते हैं, अन्धकार और ठण्ड नहीं। इसी तरह ¶ौतान का कोई अस्तित्व नहीं है। वास्तव में यह ई·ार के प्रति प्रेम, आस्था और वि·ाास का अभाव है।'
वह छात्र स्वामी विवेकानंद थे।

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