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माधव हम परिणाम निरासा
01-Jun-2018 12:55 AM 2385     

इस सदी में तमाम तरह के स्वप्न देखती दुनिया में मिथिला के कवि विद्यापति की याद आ रही है। देखो तो माधव के प्रेम में पगी राधा की देह में कैसी प्रलय मची हुई है। लगभग उत्सव में डूबी यह आधुनिक दुनिया कैसे अपने अवसान की ढलान उतरती जा रही है, अगर यह जानना है तो राधा की अनुभवभूमि पर हो रहे युग के अवसान की ओर भी देखना होगा :
सखि हे कि कहब नाहिंक ऊर।
सपन कि परतख कहइ न पारिअ,
की अति निकट कि दूर।
तड़ित लता तर तिमिकर समाएल,
आँतर सुरधनि धारा।
ताल तिमिर ससि सूर गरासल
चहुदस खसि पड़ तारा।
अम्बर खसल धराधर उल्टल,
धरनी डगमग डोले।
खरतर बेग समीरन संचरु
चंचरिगण करु रोले।
प्रलय प्रयोधि जले जनु छापल
एहो नह जुग अवसान।
विद्यापति कहते हैं कि अब कुछ और नहीं कहा जाता। पता नहीं यह सपना है या कि यथार्थ। दूर है कि पास। सब हिलुरकर जैसे एक हो गया है, जैसे न होने का भी अन्त आ गया हो। राधा की देह में डूबने का अंधेरा भर गया है और अन्तरतम में जल उमड़ रहा है। देह के सूर्य ओर चन्द्रमा इसी अंधेरे ने लील लिए हैं। रोम-रोम में बसे तारे अपनी जगह छोड़ रहे हें। आकाश भी जैसे अपनी जगह से हटता-सा जान पड़ता हे। देह की धुरी डगमगा रही है और पर्वत उलट रहे हैं। प्राण ऐसे व्याकुल हो रहे हैं जैसे प्रलय का समय हो। देह के उमड़ते सागर में सब कुछ डूब रहा है। देह भी डूब रही है, जैसे किसी युग का अवसान हो रहा हो।
देह में घटती इस प्रलय के बाद ही वह अनुभव भूमि धीरे-धीरे ऊपर आती है, जहाँ राधा-माधव रास रचाते हैं और जो वृन्दावन कहलाती है- जैसे श्यामघन में बिजुरी समायी हो, घनश्याम में राधा सिहरती है, दमकती है और उसी में समा जाती है फिर समय के शून्य में छायी घटा बरसती है और जब उसका जल राधा की देह को कुसुमित दीप्ति से भरता है तो समय दीखने लगता है। माधव भँवरा बन फिर नये युग की तान छेड़ते हैं।
वे हर बार एक होने के लिए दो हो जाते हैं। और दो होने के लिए फिर एक हो जाते हैं। विरह का अनन्त ही उनका मिलन स्थल है। वे एक-दूसरे के विरह में तन्मय होकर मिलते हैं और मिलन में तन्मय होकर बिछुड़ जाते हैं।
राधा श्रीकृष्ण के विरह में अनजाने ही कृष्ण बन जाती है। वह कृष्ण बनकर राधा को पाना चाहती है, वैसे ही जैसे वह राधा रहकर कृष्ण को चाहती है। वह कृष्ण होकर राधा को बुलाती है। राधा होकर कृष्ण को पुकारती है। वह दोनों ही रूप धरे विरह के अनन्त में व्याकुल होकर विचरती है- राधा होकर कृष्ण के अनन्त में और कृष्ण होकर राधा के अनन्त में-
राधा सँय इमि माधव पुनि पुनि,
माधव सँय तब राधा।
दारुन प्रेम तबहु नहिं टूटत,
बाढ़त बिरहक बाधा।
दुहु दिसि दारु दँहन जैसे दगधइ,
आकुल कीट परान।
ऐ सन बल्लभ हेरु सुधामुखि
कवि विद्यापति भान।
कवि विद्यापति कहते हैं कि राधा होकर माधव की और माधव होकर राधा की याद प्रेम को नहीं तोड़ती; वह तो विरह को ही इस तरह बढ़ाती है जैसे एक ही लकड़ी के दो चिरे हुए पाटों में आग लगी हो और उनके बीच में फँसा कोई कीट अकुला रहा हो।
प्रेम तरु की देह पर विरह बेल ही लिपटती है जो तरु के प्राणों को अपनी ओर खींच-खींच कर हरियाती है और पूरे तरु को ढँक लेती है। दोनों ही दावँ पर लगे हुए हैं; पर न प्रेम तरु गिरता है और न बिरह बेल मुरझाती है। प्रेम तरु की जड़ें श्याम शून्य गगन में हैं जहाँ अमीरस की धारा कभी नहीं सूखती। वह उसे सीचती है। प्रेम का पथ जड़ों से पत्तियों की ओर फैला है जबकि विरह का पथ पत्तियों से जड़ों की ओर है। पथ एक ही है जिस पर प्रेम से विरह और फिर विरह से प्रेम की ओर चलना पड़ता है। यह प्रेम तरु ऊध्र्वमूल है; उल्टा लटका है।
जो सीधे पेड़ों की दुनिया में रहते हैं; वे फलों की माया में फँस जाते हैं। सीधे पेड़ों से लिपटी कामनाओं की अमर बेल बार-बार मुरझाती है; तरु को गिराती है। यही तो जन्मों की कथा है। माधव और राधा तो अजन्मे तरु-लता हैं; जो न जाने कब से विरह के अनन्त में एक-दूसरे से निष्काम लिपटे हुए हैं।
राधा-माधव गिने जाने वाले समय के बाहर रहते हैं, तभी तो एकाकार होकर अनुभव के वृन्दावन में नाच पाते हैं। इतिहास के समय में वे दो होकर दीखते हैं। गिना जाने वाला समय जोड़ियाँ तो बनाता है पर आपस में जोड़ता नहीं। इतिहास की चौहद्दी से घिरी बन्द धरती पर राधा-माधव जैसा प्रेम सम्भव नहीं। ऐतिहासिक समय में भटकती देहें न तो एक-दूसरे के करीब आ पाती हैं और न ही एक-दूसरे में घुल पाती हैं।
जहाँ दो हैं परिणाम भी वहीं आता है। एक दूसरे से शर्त भी वहीं लगती है। एक प्रतियोगिता शुरू होती है जहाँ दौड़-दौड़कर दोनों ही हार जाते हैं। इतिहास में ही उमर बीतती है। इतिहास के बाहर रहकर ही राधा-मानव अमर हैं। वे न तो प्रतियोगी हैं और ना ही अपने प्रेम का परिणाम चाहते हैं। वे सिर्फ़ एक-दूसरे के ध्यान में खोये हुए हैं; तभी तो उन्हें विरह भी मिलाये रखता है; वे कभी नहीं बिछुड़ते। राधा-माधव सदैव वर्तमान में जीते हैं; बीतते नहीं।
अतीत और भविष्य की भूमियों पर बसेरा करने वाला जीवन वर्तमान में कहाँ रह पाता है। तभी तो एक सदी छोड़कर दूसरी में जा रहे लोगों ने एक साल पहले ही अपने वर्तमान को भूलकर भविष्य में चलना शुरू कर दिया है। जब वे अगली सदी के भविष्य में पहुँचेंगे तो इस सदी का आखिरी साल भी अतीत हो चुका होगा। पल-पल घटते वर्तमान को पहचाने बिना लगातार अतीत होते जाते भविष्य में प्रवेश करने की व्यर्थ होड़ लगी हुई है।
समय न तो बीतता है और न आता है। वह तो हर पल हमारे सामने खड़ा है। हम ही उसके सामने से गुजरते हुए बीत रहे हैं। वह हमें नहीं दीखता --- सुबह की सैर पर जाते हुए किसी बूढ़े की तरह हम ही उसे दिख जाते हैं। वह हमें छूता तक नहीं। बस हम ही उसी की धुन्ध में खो जाते हैं और अन्त में यही कह पाते हैं --
माधव हम परिणाम निरासा।

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