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ऑस्ट्रेलिया में हिंदी शिक्षा के तर्क
01-Mar-2018 01:52 PM 1936     

ऑस्ट्रेलिया सरकार की शिक्षा नीति के बारे में विमर्श करने वाली समिति एशियन सेंचुरी पर जारी श्वेत पत्र में हिंदी को एक बड़ी एशियाई भाषा के रूप में स्वीकार किया गया है। पर भाषा को सिखाने के लिए इसका क्या मतलब है?
एशियन सेंचुरी पर नई हेनरी रिपोर्ट हमें कहां रखती है? ऑस्ट्रेलिया के बहुरंगी-बहुवर्णीय समाज में हिंदी अब एक प्राथमिकता की भाषा है जो ऑस्ट्रेलियन-एशिया साक्षरता एजेंडा में चीनी, जापानी और इंडोनेशियाई भाषा के साथ शामिल की गई है। हालांकि, यदि हिंदी को स्कूलों में पढ़ाया जाना है, तो पाठ्यक्रम कौन विकसित करेगा और पढ़ाने के लिए शिक्षक कहां हैं? हिंदी शिक्षकों को कौन तैयार करेगा या प्रमाणित करेगा कि भारत के हिंदी शिक्षक ऑस्ट्रेलिया में पढ़ाने के काबिल हैं? विश्वविद्यालयों में हिंदी का क्या होने वाला है? श्वेत पत्र में इनमें से किसी भी प्रश्न का कोई सहज उत्तर उपलब्ध नहीं है।
व्याकरण के लिहाज से हिंदी और उर्दू समान भाषाएं हैं और इनकी मूल शब्दावली एक समान है। मुख्य अंतर इनके वृहद् शब्दकोशों में हैं; शब्दावली स्रोत के रूप में उर्दू भाषा में फारसी और अरबी के शब्द ज्यादा हैं, जबकि हिंदी भाषा में तुलनात्मक तौर पर संस्कृत शब्दों की अधिकता है।
दुनिया में इस समय हिंदी-उर्दू बोलने वालों की संख्या शायद 60 करोड़ से ज्यादा है। इनमें 55 करोड़ हिंदी भाषी और 5 करोड़ उर्दू भाषी भारत में और लगभग 1 करोड़ 30 लाख उर्दू भाषी पाकिस्तान में हैं। दक्षिण एशियाई फैलाव के देशों में जैसे मॉरीशस, त्रिनिदाद, सूरीनाम, दक्षिण अफ्रीका, फिजी, यूके, यूएसए, कनाडा, सिंगापुर, मलेशिया और ऑस्ट्रेलिया में हिंदी और उर्दू व्यापक रूप से बोली जाती हैं और दक्षिण एशिया और आसपास के क्षेत्रों में रहने वाले भारतीय समुदाय में से कई लोगों के लिए हिंदी-उर्दू उनकी पसंद की भारतीय संपर्क भाषा है। दुनिया भर में हिंदी और उर्दू भाषा का स्कूली पाठ्यक्रम भाषाई और सांस्कृतिक रूप से विभाजित है। ये पाठ्यक्रम आधुनिक हिंदुत्व और इस्लाम की खास धार्मिक परम्पराओं को उभारते हैं। इसके अलावा, छात्रों की भाषिक पृष्ठभूमि जो भी हो उन्हें पढ़ाते हुए यह मान लिया जाता है कि वे भाषा की साझी विरासत की समझ रखते हैं। पढ़ाने की यह परम्परागत पद्धति हिंदी या उर्दू के मौजूदा प्रयोग को आदर्श और क्षमतावान बनाने पर केंद्रित है। अक्सर, हिंदी कार्यक्रमों का उपयोग त्योहारों, धार्मिक पर्वों और रिवाजों के संबंध में सांस्कृतिक परिपाटी सिखाने के माध्यम के रूप में किया जाता है। इससे एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठता है : यदि हिंदी को ऑस्ट्रेलियाई स्कूलों में पढ़ाया जाना है, तब पाठ्यक्रम कैसा बनेगा?
ऑस्ट्रेलियन स्कूलों में हिंदी कैसे पढ़ाई जाए, इसके लिए विक्टोरियन स्कूल ऑफ लैंग्वेजेज़ और हाल ही में स्थापित ऑस्ट्रेलियन हिंदी शिक्षा संघ जैसी संस्थाओं को समय और संसाधन चाहिए। दक्षिण एशिया के बाहर, विश्वविद्यालय स्तर पर हिंदी और उर्दू को विदेशी भाषाओं के तौर पर पढ़ाया जाता है। विश्वविद्यालय स्तर पर विदेशी भाषा सिखाने के लिए कई अलग-अलग शैलियां अपनाई जाती थीं, जैसे सुनकर या बोलकर सिखाने की शैली, बातचीत और "आओ करके सीखें" जैसी शिक्षण पद्धति।
1950 के दशक के दौरान, दुनियाभर के उच्च शिक्षा पाठ्यक्रमों में अकादमिक शैली का बोलबाला रहा और इस शैली से कुछ थोड़े विद्यार्थियों को ही बड़ी तेजी से भाषा सिखाई गई। इसके तहत लिखना कुछ हफ्तों में, व्याकरण लगभग एक साल में और दूसरे साल से अनुवाद-आधारित अध्ययन पाठ्यक्रम था। 1970 के शुरुआती वर्षों में ऑस्ट्रेलिया में पहला हिंदी-उर्दू पाठ्यक्रम ऑस्ट्रेलियन राष्ट्रीय विश्वविद्यालय में शुरू किया गया। भाषा शिक्षण में प्रयुक्त तकनीकें पहली बार 1977 में प्रकाशित हुई, को रिचर्ड बार्ज और योगेन्द्र यादव की "इंट्रोडक्शन टू हिंदी एण्ड उर्दू" में देखा जा सकता है।
साठ के दशक में, सुनकर और बोलकर सीखने की शैली लोकप्रिय हुई। इसमें सुनकर बोलने और फिर लिखने के अभ्यास करवाये जाते थे। आज भी दुनियाभर में हिंदी-उर्दू भाषा सीखने की यह एक आदर्श शैली मानी जाती है।
सत्तर के दशक में भाषा सिखाने की संवाद शैली लोकप्रिय हुई। खास मौकों पर कैसे बोला जाए इस पर ध्यान केंद्रित किया गया। इस दौर में मेलबोर्न में सुधा जोशी ने हिंदी सिखाना शुरू किया। उन्होंने वहां सन् 1970 से 1997 तक हिंदी पढ़ाई। अपने अधीनस्थ रिचर्ड डिलेसी के साथ उन्होंने पढ़ाने की ऐसी शिक्षण शैली अपनाई जिसमें सुनकर एवं बोलकर सीखने के अलावा संवाद आदि शैलियों के तरीके शामिल थे।
ऑस्ट्रेलिया में सबसे पहले 1997 में दूरस्थ शिक्षा पाठ्यक्रम का प्रारंभ हुआ। इसके तहत ऑस्ट्रेलियाई मुक्त विश्वविद्यालयों के लिए मैंने ला ट्रोब विश्वविद्यालय में 1997 से 2012 तक पढ़ाया। इस पाठ्यक्रम में दूरस्थ शिक्षा के लिए शिक्षण की संवाद शैली को अपनाया गया था।
सन् 2000 से "करो और सीखो" आधारित शिक्षण पद्धति लोकप्रिय हो रही है। इसमें मुख्य फोकस गतिविधि आधारित कार्य को संयुक्त रूप से हल करने पर होता है। ऐसी टॉस्क आधारित हिंदी-उर्दू अध्ययन की शैली गैर-भारतीय विद्यार्थियों के मामले में महत्वपूर्ण इसलिये है कि इससे वे दक्षिण एशिया के बारे में पढ़ने के स्तर को तय कर पाते हैं। यह हिंदी-उर्दू शिक्षण उन विद्यार्थियों के लिए भी महत्वपूर्ण है जो दक्षिण एशिया के बारे में पढ़ना चाहते हैं। बनिस्बत इसके कि उन्हें एक निर्धारित पाठ्यक्रम जिससे दक्षिण एशियाई पहचान बनती हो, पढ़ने को मजबूर किया जाए।
इस मौजूदा विश्वविद्यालयीन वातावरण में इस बात की संभावना नहीं है कि नए विश्वविद्यालय हिंदी जैसे विषय को फिर से शुरू करेंगी। ला ट्रोब विश्वविद्यालय में दक्षिण एशियाई अध्येताओं की टीम द्वारा हिंदी और संस्कृत को भारतीय संस्कृति, समाज और राजनीति जैसे सभी पहलुओं को शामिल करते हुए पढ़ाया जाता था। हालांकि, अब ऐसा लगता है कि हिंदी और दक्षिण एशियाई पाठ्यक्रम सम्मिलित रूप से एक ही हो गए हैं।
ऑस्ट्रेलियन राष्ट्रीय विश्वविद्यालय में स्थिति कुछ भिन्न है : यहां दक्षिण एशियाई पाठ्यक्रम के लिए एक उभरती हुई टीम है और हिंदी-उर्दू के लिए नई रणनीतियां विकसित की जा रही हैं। यह न सिर्फ कैम्पस और देश में पढ़ाने के लिए हो रहा है, बल्कि सन् 2014 में शुरू होने वाले हिंदी में एक नए राष्ट्रीय दूरस्थ शिक्षा डिप्लोमा के लिए किया जा रहा है। ऑस्ट्रेलियन राष्ट्रीय विश्वविद्यालय हिंदी-उर्दू पाठ्यक्रम के लिए यह विकट समस्या है कि कैसे यह पाठ्यक्रम एक आधुनिक हिंदी-उर्दू पाठ्यक्रम के लिए आवश्यक भाषा और संस्कृति अध्ययन आधारित गतिविधियों के मिश्रण को एक करता है।
तो, क्या हेनरी रिपोर्ट अपनी असंख्य पूर्ववर्ती रिपोर्टों की तुलना में ज्यादा असरदार साबित होगी? एक शब्द में कहा जाए, तो हाँ। केवल हिंदी को प्रमुख एशियाई भाषा मान लेने से ऑस्ट्रेलिया में भारत और एशिया के बारे में सोच में एक बड़ा अंतर दिखाई देता है। सामान्य अंग्रेजी उपयोग की एक उक्ति के अनुसार हम कमरे में उपस्थित हाथी को नज़रअंदाज़ करते हुए अंदर नहीं जा सकते और एशिया के भाग के रूप में भारत की बात करे बगैर एशिया की बात नहीं की जा सकती।
हिंदी-उर्दू भाषी पांच करोड़ से ज्यादा लोगों के विचारों को ध्यान में रखे बिना ऑस्ट्रेलियाई भारत को कैसे समझ सकते हैं? तो, चूंकि हेनरी रिपोर्ट में हिंदी को पढ़ाने के तरीके के बारे में कुछ नहीं बताया गया है, लेकिन फिर भी उसमें हिंदी अपनी सशक्त रूप से मौजूद दिखाई देती है। हालांकि पढ़ाने के मुद्दे पर बहस और राय भिन्न हो सकती है, लेकिन फिर भी यह आवश्यकता बनी रहेगी कि ऑस्ट्रेलिया को कैसे एशिया और भारत के बारे में उचित संदर्भों के साथ शिक्षित बनाया जाये।

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