ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
लंका का साम्राज्य
08-Jul-2017 08:09 PM 2432     

रामायण की कहानी का ऐतिहासिक महत्व जानना हमेशा ही चर्चा का विषय रहा है। इस कहानी में एक वीर पुरुष के यथार्थ जीवन के अनेकानेक रोचक प्रसंग दक्षिण भारत के अनेक रहस्यों से जुड़े हुये हैं। सभी रहस्यमयी वस्तुओं में से वृक्षों के ऊपर चलने वाला स्वचलित यान का वर्णन कुछ खास है। वह पर्याप्त भार ले जा सकता था और शायद वायु के प्रवाह के साथ लम्बी दूरी भी तय कर सकता था। वह अत्यंत विकसित तकनीकि प्रतीत होती है, पर आज उपलब्ध जानकारी के अनुसार पृथ्वी पर इस तकनीकी के विकसित होने के समय से वह मेल नहीं खाती है।
उस समय के सबसे धनाढ्य और शक्तिशाली व्यक्ति लम्बी दूरी के आवागमन के लिए इस वायुयान का उपयोग करते थे। भू-संसाधनों से बनाई गयी अधिकांश संपदा पर उस समय "कुबेर" नामक व्यक्ति का अधिकार था। वह "यक्ष" नाम की मानव प्रजाति का प्रमुख था। इस प्रजाति ने कृषि, खनन और निर्माण के क्षेत्र में महारथ हासिल कर ली थी। मनुष्यों की "रक्ष" नाम की प्रजाति का उस समय समुद्री संसाधनों पर पूर्ण अधिकार था। "रावण" रक्ष प्रजाति का राजा था। ऋषि वाल्मीकि के अनुसार रावण और कुबेर वांशिक रूप से भाई थे पर वह अपने-अपने गुणों के कारण एक-दूसरे के प्रतिद्वंद्वी बन गये थे।
कहानी के अनुसार रावण, कुबेर पर विजय प्राप्त करता है और उसके महल से सारी संपदा छीनकर समुद्र में एक अलौकिक साम्राज्य बनाता है। वह अद्भुत स्वर्गनुमा राज्य भारत के समुद्री तट के पास एक द्वीप पर था। इस टापू को "लंका" के नाम से जाना जाता था। समुद्री संसाधनों का पूरी तरह उपयोग कर और भूभाग से छीनी हुयी संपदा से रावण ने एक बहुत ही भव्य और विशाल दुर्ग का निर्माण किया जो चारों तरफ से जल से सुरक्षित था। उसने अत्यंत कुशल अभियंता और श्रेष्ठ कलाकारों की मदद से उस समय के श्रेष्ठतम किले का निर्माण किया जिसे आने वाले समय में भी कोई न बना सके। लंका के निर्माण के बाद कुबेर से रावण ने विमान छीन लिए जिससे वह आसानी से भूभाग और समुद्री क्षेत्र में स्वच्छंद विचरण कर सके।  
लंका भौगोलिक क्षेत्र का जिक्र वाल्मीकि रामायण से पहले के एक ज्योतिष लेख में आता है। हो सकता है कि इस द्वीप का नाम उसके आकार के कारण पड़ा हो, पर इसका मानचित्रण कैसे किया गया इस बारे में हमें जानकारी नहीं है। वाल्मीकि ने इस बात का विवरण नहीं किया कि रावण ने इस द्वीप का राज्य कैसे पाया। शायद उसे वह पैतृक रूप से मिला हो? वाल्मीकि ने लंका राज्य की भव्यता का विस्तार से वर्णन किया है। नगर बहुत ही सुन्दर था और उसके चारों तरफ चारदीवारी बनी हुई थी। चौड़ी-चौड़ी सड़कें, वृहद महल और बड़े बड़े दरवाजे थे। नगर इतना सुन्दर था कि हनुमान जी ने पर्वत शिखर से चाँदनी रात में उसके दृश्य से विमोहित हो कर कवि भाव में मग्न हो जाते हैं। केवल नगर ही सुनियोजित ढंग से नहीं बनाया गया था, बल्कि वहाँ के नागरिक भी अच्छे-अच्छे परिधान पहने हुये थे। हनुमान वहाँ की महिलाओं को सुन्दर वस्त्र और सोना, चाँदी, हीरा, जवाहरात के आभूषण पहने देखकर अचंभित थे। वह ऐसे अलौकिक नगर को देखकर अपनी सुध-बुध खो बैठे और सीता को ढूंढ़ने के अपने उद्देश्य को ही कुछ क्षण के लिए भूल गये।
गरुड़ संपाती के अनुसार लंका की दूरी भू-भाग से लगभग आठ सौ मील (शत योजन) थी, जहाँ उन्हें वानर और हनुमान मिले थे। उस स्थान को गरुड़ संपाती ने महेंद्र पर्वत के नाम से उल्लेखित किया है। वह पर्वत श्रृंखला आज भी दक्षिणी उड़ीसा के पूर्वी समुद्री तट के पास मौजूद है। पक्षी की दृष्टि के अनुसार पर्वत श्रृंखला से लंका की दूरी लगभग आठ सौ मील अनुमानित की जा सकती है। हनुमान ने अपनी लंका की यात्रा इसी पर्वत से शुरू की थी। राम ने भी अपनी लंका यात्रा के दौरान अपना डेरा महेंद्र पर्वत पर ही डाला था। ऐसा भी संभव है कि वाल्मीकि को रामायण ग्रंथ की रचना करते समय शायद महेंद्र पर्वत श्रृंखला का ही दक्षिण भू-भाग के अंतिम स्थान के रूप में जानकारी हो?
लंका द्वीप के चारों तरफ के जल विस्तार को आज बंगाल की खाड़ी के नाम से जाना जाता है। वह कम गहरा पर बड़े विस्तार में फैला हुआ है और कहीं-कहीं डूबे हुये द्वीप समूह हैं। कहानी में उल्लेख है कि हनुमान इस जल विस्तार को लाँघकर लंका के तट तक पहुँचे थे। ऐसा भी शायद संभव है कि जब वह लंका की दिशा में गहरे पानी में जा रहे हों तो किसी बड़े जलचर का सामना किया हो। रामायण महाकाव्य में समुद्री तट और समुद्री जीव-जन्तुओं के बारे में बड़े विस्तार से वर्णन है। वाल्मीकि ने इस काव्य में समुद्री यातायात का उल्लेख नहीं किया है। ऐसा संभव है कि इस द्वीप पर रहने वाले लोग पैदल पुल का उपयोग कर भारत के दक्षिणी अरण्य को जाते हों?
वाल्मीकि ने लंका द्वीप और भू-भाग के बीच व्यापार का भी जिक्र नहीं किया है। शायद ऐसा हो सकता है कि भू-भाग का दक्षिणी हिस्सा उस समय निर्जन वन हो और बाद में धीरे-धीरे इस पर राक्षसों ने अपना कब्ज़ा कर लिया हो? हो सकता है कि राक्षस उत्तर में अपना अधिकार क्षेत्र बढ़ाने की मुहिम में बढ़ रहे हों और दंडकारण्य दोनों क्षेत्रों के बीच की सरहद हो? वाल्मीकि ने "जनस्थान" नामक डेरे का उल्लेख किया है जो पंचवटी से ज्यादा दूर नहीं था। इस डेरे में हजारों राक्षस प्रजाति के लोग रहते थे। राक्षस दूर से युद्ध करने की कला में दक्ष नहीं थे। वह अपने शारीरिक बल पर ही निर्भर रहते थे। राम को अपने धनुष और बाण से उनको मारना आसन था।
वस्तुतः लंका द्वीप के वासी सभ्य और विद्वान् थे। हनुमान ने वहाँ संगीत के कार्यक्रम देखे और धार्मिक उद्घोष सुने। उन्होंने सात शीश वाले व्यक्तियों को देखा और कुछ अन्य लोगों को देखा जो जटा-जूट वाले थे। कुछ अपने सिर के बल खड़े होकर हाथ में "कुश" लेकर ध्यान मग्न थे। वहां उन्हें कई कुब्जे और विकृत दिखे  जिनको उन्होंने गुप्तचर समझा। हनुमान को कुछ लोग ज्ञान की चर्चा और ग्रंथों का अध्ययन करते हुये दिखे। प्रत्यक्ष रूप से वहाँ के लोगों की भाषा हनुमान को जानी-पहचानी सी लग रही थी। हो सकता है कि संस्कृत जैसी ही कोई भाषा हो? यह नहीं मालूम कि वाल्मीकि ने वर्णन पूरी तरह कवि के रूप में किया है या कुछ तथ्यों पर आधारित है? हम ऐसा अनुमान लगा सकते हैं कि निर्माण में प्रयुक्त तकनीकी और अभियांत्रिकी सीखने के लिए भाषा में विश्लेषण करने की आवश्यकता होती है।
जैसा लेख में पहले उल्लेख किया गया है कि लंका का राज्य प्रकृति के द्वारा सुरक्षित था। नगर का आन्तरिक हिस्सा एक किले के रूप में बना हुआ था और उसके चारों तरफ एक परिकोटा और गहरी खाई थी। दरवाजों पर बड़े ही चुस्त-तंदुरुस्त पहरेदार पहरा देते थे। हनुमान ने सुरक्षाकर्मी और मदमस्त सैन्य दस्तों को हाथों में तलवार और बरछी लेकर चारों तरफ घूमते हुए देखा। वाल्मीकि ने एक घटना का कहानी में जिक्र किया है जिसमें हनुमान दरवाजे पर एक महिला पहरेदार के चेहरे पर आसानी से घूँसा मारकर उसको चकमा देकर आगे निकल जाते हैं। ऐसा भी संभव है कि पहरेदार मल्लविद्या में प्रशिक्षित हों पर उन्हें मुक्केबाजी नहीं आती हो? समस्त रूप से अनुशासन सैन्यवादी था और अनुशासनहीनता के लिये कठोरतम मृत्युदंड तक दिया जा सकता था। रावण ने लंका पर तानाशाह शासक की तरह राज्य किया। यह प्राचीन राजशाही प्रथा का एक उदाहरण था और हम इससे अनुमान लगा सकते हैं कि शुरूआत के दौर में यह प्रथा कैसे विकसित हुई होगी।
लंका अत्यंत सुन्दर थी। हनुमान समुद्री तट के पास के पर्वत शिखर पर बैठकर लंका का मनमोहक दृश्य देखकर अति आनंदित हुये। चारों तरफ साफ़-सुथरा नीला जल, पेड़-पौधों की हरियाली और वन के मध्य सुन्दर सफ़ेद भव्य भवन अत्यंत शोभायमान लग रहे थे। चारों तरफ उपयुक्त उष्ण कटिबंधीय और कुदरती औषधीय लता-पतायें एवं फूल और फलों के वृक्ष सौन्दर्य बिखेर रहे थे। कहीं-कहीं सुन्दर सरोवर व झीलें शोभा बढ़ा रही थीं। वहाँ हाथ और नख प्रसाधन के स्थान और खुबसूरत उपवन सुंदर पगडंडियों से सुसज्जित थे। सीता को पहरेदारों की निगरानी में इन्हीं में से एक विशेष खास बगीचे में रखा गया था। हनुमान की कवि की दृष्टि से मानो तो लंका जैसे कुदरत के द्वारा बनाई गयी एक अप्सरा हो और उसे मनुष्य ने अपने कला कौशल से और निखार दिया हो।  
जब राम ने पूछा तो हनुमान ने बताया कि लंका को भेदकर सीता को छुड़ाना अत्यंत कठिन है। जब राम समुद्र को सुखाने या उस पर पुल बनाने के अपने साहस के बारे में बता रहे थे तभी हनुमान ने लंका में देखी एक मशीन का जिक्र किया जिसका उपयोग खाई की देखरेख के लिए किया जाता था। जब कोई बाहरी आदमी सीमा में प्रवेश करने की कोशिश करता था तो यह यन्त्र पहरेदारों को सतर्क कर देता था। जिससे बाद में बड़ी संख्या में सैनिकों को सुरक्षा के लिए बुलाया जाता था। सैनिकों के साथ हाथियों का झुण्ड गलियों की देखरेख करते हुये चलता था। चारों तरफ खाई में मगरमच्छ और अन्य डरावने जलचरों को सुरक्षा के लिए पाला जाता था।
हनुमान ने बताया कि लंका को भेदने का कोई रास्ता ही नहीं है। उसकी सुरक्षा के लिए चार अलग-अलग सुरक्षा चक्र बनाये गये हैं और वह इस प्रकार हैं- 1. द्वीप के चारों ओर एक विशाल नदी, 2. ऊँचा पर्वत जिस पर नगर बसा था, 3. नगर के चारों ओर घना जंगल, और 4. नगर के चारों ओर परिकोटा एवं खाई। हे राम, लंका में प्रवेश करना देवताओं के लिए भी मुश्किल है और वहाँ जाने की सोचकर ही सभी को डर लगता है!

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