ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
लायडन में रिमझिम बरसात
01-Jul-2016 12:00 AM 2399     

नीदरलैंड्स में पिछले छह दशाकों से मौसम में काफी परिवर्तन हुआ है। पहले यहां बसंत, हेमंत, शाीत और ग्रीष्म ऋतुएं निर्धारित निशिचत समय पर होती थीं। भारत की भांति यहां वर्षाऋतु निशिचत कभी नहीं रही है। कभी-कभी एक ही दिन में गहरा कुहरा, तूफान, बारिशा, ओले, हिमपात और सूरज की धूप की गर्मी एक साथ हुई है। इसका एक कारण एटलांटिक समुद्र में मौसम का परिवर्तन भी है।
यहां पशिचमी योरोप के देशाों में हर आधे घंटे में रेडियो और टेलिविजन पर जलवायु समाचार से लोगों को आगाह किया जाता है। अत्यंत तूफानी हवाओं और घनी बरसात से नगरों की सड़कों पर पानी भर जाता है और खतरे का एलार्म पीला, नारंगी और लाल रंगों के संकेतों से लोगों को चेतावनी देता रहता है। हाँ, जब बारिशा अच्छी होती है तो काशतकार किसान फसलों की वृद्धि के लिये खुशा होते हैं। मकानों और सड़कों के बनाने वाले मजदूरों को अपने काम को रोकना पड़ता है। फसलें लहराने लगती हैं। फलों के बागानों में फलों की वृद्धि होती है। सब्जियों के बाजार शाीघ्र उत्पादन से दाम सस्ते हो जाते हैं। लोग अक्सर घर पर या रेस्तरां में जाकर खाना-पीना करते हैं। हां, रेलों का, या बसों के परिवहन में रुकावट नहीं होती। सड़कों पर लोगों की साइकिलें चलती दिखाई देती हैं।
लायडन नगर कोई सात सौ वर्ष पुराना है। एम्स्टरडम की भांति यहां भी नहरों का जाल बिछा हुआ है। पहले यातायात नहरों से ही होता था। कहा जाता है कि कैथोलिक स्पेनिशा शाासन से अस्सी वर्ष तक लड़ाई चलती रही। अंत में 1575 ई। में लायटन पहला नगर था जो स्वतंत्र हुआ। प्रोटेसटेंट धर्म की जीत से उसी वर्ष लायडन नगर को स्वतंत्र विशवविद्यालय का तोहफा मिला। 1575 ई। में गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरित मानस का लिखना आरंभ किया था।
लायडन विशवविद्यालय में विद्यार्थियों की संख्या कोई दस हजार है। सभी संकाय (फैकल्टीस) हैं, केवल तकनीकी संकायों को छोड़कर। यहां भारतीय विद्या (इंडोलोजी) की स्थापना संस्कृत भाषा से हुई थी। काफी देशाों से विद्यार्थी यहां पढ़ने के लिये आते हैं। मेरे विद्यार्थियों में डच, सूरिनामी हिन्दुस्तानी, जापानी और अमरीकन रहे हैं। सूरिनामी विद्यार्थियों में युवक और युवतियां दोनों ही रहे हैं। इनमें कुछ लोगों ने अपने मित्रों को स्वयं चुना है। बाद में विवाह कर गृहस्थी भी बसाई।
जब रिमझिम बरसात होती है तो छात्र-छात्राओं को विशवविद्यालय के हरे-भरे प्रांगण में जाने का अवसर मिल जाता है और वे भारतीय संस्कृति से जुड़े और योरोपियन संस्कृति में पले भौतिकवादी आदर्शा में सिमटकर व्यक्ति की महत्ता के साथ आपसी स्पर्शा से दूर नहीं रहते।
जब यही विद्यार्थी कक्षा में होते हैं तो इनकी अभिलाषा यही होती है कि पास बैठें। एक-दूसरे के प्रति मुस्कराहट भरे शाब्दों का माधुर्य और चंचलता अवशय देखी जा सकती है। जब बारिशा का दिन होता है तो ऐसा प्रतीत होता है कि उन्होंने कालिदास का "मेघदूत' अवशय पढ़ा है। विद्यापति के शाब्दों का अनुसरण भी किया है।
राखिए चाहिअ गुप्त सनेह, एहि लिने का सोत।
बिहारी के शाब्दों में,
या अनुरागी चित की, गति समझै नहिं कोई।
गालिब के अनुसार,
शाायद इसी का गम मुहब्बत है शोफत्,
एक आग सी है दिल में हमारे लगी हुई।
रिमझिम बरसात से झूमते पेड़ और इठलाते पत्तों को देखकर वे सिमट जाते हैं। आंसमां की छाई मस्ती में बूंदों की झमझम अरमानों को स्वच्छंद रूप में विकसित कर देती है। "पहले जो आवाज दिल से आती थी यदि किसी को पता लगा तब...' सब कुछ ढह जाता है। फिर हंसकर संकल्प किया जाता है कि अब साथ ही साथ रहेंगे। सौंदर्य से जुड़ना, जीवन का जुड़ना हो जाता है। बारिशा के आचमन से आत्म-शाुद्ध के साथ स्वतंत्र विचारों में खो जाते हैं। और जब कक्षा का समय आता है तो फिर कक्षा में लौट आते हैं। बरसात का दिन उनके लिये एक नया ऐतिहासिक दिन पन्ने पर लिख देता है।
लायडन विशवविद्यालय के उदाहरण यूरोप के सभी बड़े नगरों में आम हैं। अनजानी भीड़ और परिवेशा में जब-जब बरसात की रिमझिम की ध्वनि सुनाई देती है। लोग अपने प्रेम का ढोंग नहीं रचते अपितु मिलकर एक नया संसार बसा लेते हैं। हां, कभी-कभी पुरानी पीढ़ी में पले माता-पिता अपने बच्चों की मित्रता और चुनाव से खुशा नहीं होते। पर योरोपीय परिवेशा में, नये वातावरण में बच्चों के योरोपीयकरण का विरोध भी नहीं कर सकते। बरसात की बौछार उनके लिये पुरानी स्मृतियों का खजाना ही बनकर रह जाती है।

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