ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
कुम्भ कविताएँ
01-Apr-2016 12:00 AM 1051     

(१)
एक समय था
जब देवताओं की भी मृत्यु होती थी
और असुरों की भी

गुजरते थे वे भी
जन्म और मरण के चक्र से

रहे होंगे औरों के वि·ाासों में
देवता स्वभावत& अमर

इस देश में अमरता का
अर्जन करना पड़ता है

दूध का समुद्र है
जीवन के पोषण के लिए पर्याप्त

लेकिन उससे भी आगे
पुरुषार्थ का एक और भी
पल है
भारी कशमकश के बीच

जब उसका भी मंथन करना पड़ता है।
(२)
मृत्योऽर्मा अमृतं गमय मुझे मृत्यु से अमृत की ओर ले चलो

लेकिन कोई ले नहीं जाएगा वहाँ

कि तुम किसी के कांधों पे सवार होकर
अमृत की यात्रा नहीं कर सकते

प्रार्थना पवित्र है
लेकिन निर्भर नहीं है

भारी मेहनत लगती है
कशाकश भरी है ये कोशिश

और वह भी अकेली नहीं
तुम्हारे भीतर के शुभ तत्व
और
अशुभ
के बलाबल की बहुत सी
सामूहिक परीक्षाओं को देकर

भव-संभव होता है अमृत

अमृत का उदय
अमृत घटता है इतने सारों के बीच

वही अमृत-घट है
क्षिप्रा के इस घाट पर पहचानो उसे।
(३)
वही तो आस है
अन्यथा सोचो
कभी देवत्व भी न·ार होता

पानी के बुलबुले की तरह
तो क्या हममें
इस पानी में नहाने की
इस पूतपावन इच्छा का भी

यह सामुदायिक जनम होता

हम अपनी अपनी
बहुत सी क्षणभंगुरताओं
बहुत-सी अस्थिरताओं
बहुत-सी परिवर्तनशीलताओं से
होते हुए

महाकाल के द्वार आते हैं
साक्षात् करने
उस स्थाणु को जो हमारे भीतर
अमृत की आशा का
स्फुरण करता है।

(४)
अमृत की वह बूंद जो हमारे लिए विकल है
उसकी खोज हमें भी है

यहीं गिरी थी कहीं
यहीं कहीं

गिरी थी वहां जहां नदी है
गंगा हो या गोदावरी
त्रिवेणी हो या क्षिप्रा

नदी है तो
इस पृथ्वी पर जीवन

अमृत है


(५)
आसमान से सिर्फ उल्काएं ही नहीं गिरतीं
सिर्फ बिजली ही नहीं टूटती

अमृत भी गिरता है

आसमान से गिरा सब कुछ
खजूर में ही नहीं अटकता

प्रवाहित भी होता है

अटकाने नहीं, तारने

अमृत को भी
धरती की उतनी ही प्यास है

जितनी धरती को अमृत की

अमृत आकाश की आदि आकांक्षा है

अमृत धरती की प्राचीन स्मृति है।


(६)
वे कोई और हैं
जिनके यहां शैतान भी
बराबरी से अमर है

लेकिन इस कुम्भ-कल्चर में
ऐसा कोई समानान्तर
उपलब्ध नहीं

क्या इसने देवता लोगों को
ग़ाफिल बना दिया
कि असुर उन्हें निरंतर सजग रखते

देवता और असुरों के बीच
संघर्ष उपयोगी ही रहता है

न हो
तो चार जगह भी न टपके
अमृत

हम मत्र्य मनुष्यों के हेतु।
(७)
अमृत के पूर्व विष भी निकला था
और हालांकि एक बड़ी हद तक
नीलकंठ ने
उसे धारा
लेकिन पूरा नहीं
कुछ बूंदे तब भी टपक पड़ीं
कहते हैं कि जहरीले जीव-जन्तु और
जहरीली वनस्पतियां वहीं से आर्इं

और जहरीली जिह्वा
जहरीले दिल
जहरीले रसायनों से बुझे हुए खेत
जहरीले ड्रग्स
जहरीली गैसें
कारखानों के जहरीले निर्गम

वे किस मंथन के बाइ-प्रोडक्ट थे
जो नीलकंठ के गले में भी न समाए

हम सबके हिस्से आए।
(९)
कि बात यदि कंठ की ही हो रही हो
तो यही नहीं कि
उन्होंने कंठ में विष धारण किया

बल्कि यह भी कि
कंठ में धारे हुए को दे दिया
मंथन की रज्जु की तरह
वापरने

उनके कंठ से तब भी फूटी

(१०)
मुझे तो हमेशा से शक रहा है
इन रूपकों पर
ये वैसे नहीं हैं जैसे दिखते हैं
इनके खाने के दांत और हैं
दिखाने के और
ये देखते कहीं और हैं
इनका निशाना कोई और है

सो जो कालकूट विष है
वह कहीं कूटनीति के काल का
जहर तो नहीं
या काल की कूटनीति का
कि जो महाकाल है उसी को जरूरी है
कि वह वक्त के इस हलाहल को पिये
और थाम कर रखे उसे
पूरी देह में फैलने से

समय की विषाक्तता का निवारण
है उस शख्स के ही बूते का
जो लांघ सकता हो काल की चाल को

और उसके भक्त के सिवा
कोई नहीं बोल सकता है
ओ युग!
ओ कल्प!
आ तू आ ले घनघोर गरल का आसव

मैं भी इधर पुकारता हूं
कालभैरव!
कालभैरव!
रामकथा
और निकले राग भी मधुरतम

सो यों भी निकला
अमृत

कि जिसका पान करते ही
रुंध जाते हैं अब भी

करोड़ों कंठ।
(११)

यह क्यों होता है कि
जब भी अमृत निकलता है
तो सबसे पहले असुर उसे हड़पते हैं
और बेदखल करने की कोशिश करते हैं
किसी भी समानांतर प्रतिद्वन्द्वी को
चाहे वह देवता जैसा ही क्यों न हो

देवताओं को भी ऋषि का शाप है
और वे पराजित होकर ही
समझ सकते हैं
ज़िन्दगी की असल ताकत की क़ीमत
जनम और मरण के बीच
जिसकी गति है
और जो इस मध्यावधि में
तमाम मायामोह
से गुज़रते हुए हमें देखती है

वही ताकत आधारभूत है
उसके बिना किसी रत्न का
उदय संभव नहीं

उसकी वशिमा का ही खेल है
यह सब
उसके बिना देवत्व की भी
कोई विजय संभव नहीं

(१२)
जब वे यहां आते हैं
तो स्नान करते वक्त
अपने आत्म का पुराना कपड़ा
यहीं छोड़ जाते हैं
और यों होती है उनकी
आत्मा पुनर्नवा

कभी यहीं सांदीपनि से
शिक्षा पाए
किसी ने बड़े होकर
शरीर को वस्त्र कहा था
मगर
उसके भीतर भी कुछ
इनरवियर हैं
जैसे कि यही हमारा आत्म
जो संसार से
बहुत सी रग़बत के बाद बनता है
बहुत घिस भी चुका होता है

बहुत से कषाय हैं
जिन्हें इसी घाट पर छोड़ देना है
फिर क्षिप्रा की लहरें ही
सीढ़ियां चढ़ आएंगी
और ठिकाने लगा देंगी
तुम्हारे परित्यक्त को

यह नदी
दैनिक जीवन के ढांचों में फंसे
आत्म से
एक अप्रतिहत आत्मा तक बहती है

तुम्हें इसके उद् गम
और तय की गई दूरी का
गलत भूगोल पढ़ाया
गया है

यदि ये तुम्हारे भीतर न बही
तो यह बही ही नहीं
(८)
वे तो त्यागी थे परम
और तपस्वी भी कोई
उनकी जोड़ का न था
या शायद एक अपर्णा ही थीं
जिन्होंने अपने तप के
प्रतिबल से उन्हें
अपना जीवन साथी
सिद्ध भी किया

लेकिन हम हैं
काम क्रोध मद मोह लोभ
के मारे
हम तो विष सिरजते हैं
विष को जितना धारण करते हैं
उतना वितरण भी


उनका विषधारण उन्हें
नीलकंठ बनाता है
हमारी विषधारणाएं हमें
रंगा हुआ सियार

सो उन महाकाल की नगरी में
क्षिप्रा स्नान कर
हम छोड़ने की कोशिश करते हैं
अपने रंग

कि आ सकें अपने
ज्योतिर्नित्य स्वभाव में
बारह साल में
शायद इसीलिए कहते हों
कि घूरे के भी दिन फिरते हैं।

(१३)
हम त्वरित यात्रा के युग में हैं
जहां मशीनें
तीर्थयात्रा करती हैं
हमारे पैर नहीं
चाहे वे कार हों या प्लेन

यहां कांधे पे भी हमारे कोई बोझ नहीं
वह हमारे वाहन की डिकी में है

और हम इस तीर्थ को देखते भी नहीं
पहले उसे मोबाइल कैमरे में कैप्चर
करते हैं
और व्यस्त हो जाते हैं सेल्फी में

हटाते हुए जोर से
और तनिक हिकारत से भी
बीच में आ गए
कावड़िये को
(१४)
सुविधाओं के नाम पर
इन दिनों उपभोग का
एक कांक्रीट-कानन रचा जाता है

उस स्थली पर भी
आकर्षण के ये नए इंद्रजाल
तामीर होते हैं

जो तपस्या का क्षेत्र है
जहां शिव का सुप्रभात भी
भस्मार्ति से होता है
और जहां राज त्याग के
महात्माओं ने योग साधा था

जैसे कि वह नदी जिसने
शिव के कंठ का विष ग्रहण किया
एक जरूरी पीठिका हो
आधुनिकतम सुविधाओं के लिए
इस कंट्रास्ट से ही शायद पता लगे

कि हम कितना आगे बढ़ आए हैं


कि हम जो मंहगे दस्तरख्वान वाले
होटल में आके ठहरे हैं
बहुत प्रगति कर गये हैं

गुफाओं में लेटे हुए
भरथरी से

वह जो हम देखते हैं
यहां आकर
वह दृश्य भी हमारा दर्शक है

वह हमारे कौतुक को
देखता है
कौतुक से
(१५)
मैंने कहा वाट लग गई कावड़िए की
अवंती
जब से तेरा टूरिस्टीफिकेशन हुआ

तूने तो शिव के इस तट पर
केवल एक प्रतीक्षा की थी
गड़ते कंकर
गड़ते कांटे
लेकिन बात परीक्षा की थी

सो लगता था
प्रस्थान किया है एक कठिन
अज्ञात की ओर
जाने वाले राही ने
और साथ में चना चबेना लिए हुए
वि·ाासों का
ढूंढ ही लेगा अपना तीरथ
वह
जिसके लिए रहा आया
जनम जनम का सपना तीरथ

आज अवंती बोली मुझसे
तीर्थ तो अब भी उसका है
जो कावड़िए-सा आता है

और वह भी तो
शहर ही पहुंचता है
तीर्थ नहीं

यों गंतव्य आज भी खुद को
मंतव्य से ही परिभाषित करता है
और इसीलिए मैं कहती हूं
वे दो फरक लोग हैं और
एक दूसरे की राह नहीं काटते

इसलिए खुश रह कावड़िए
कभी भी
तेरी वाट नहीं लगने की


(१६)
इस बीच बहुत-सा
जहर फैल गया है
राष्ट्र के शरीर पर

और हम खड़े देख रहे हैं
तटस्थता के तीर पर
यह क्षिप्रा का तट नहीं है

वे घड़ा फोड़ रहे हैं
लेकिन वह अमृत कुम्भ नहीं है

उनका भांडा फूटे या वे
किसी पर ठीकरा फोड़ें

फैलता तो विष ही है

सांप अब अशिव से गले लगते हैं

अमृत की गिरी बूंदों के बारे में तो
कहानी भी प्रसिद्ध हुई

और वे स्थान भी

किन्तु लगता है
जहर की भी बूंदें गिरी थीं
और उनके लिए तब तो कोई
छीनाछपटी न हुई

आज स्पर्धा है।
(१७)
क्या पता
वह वहीं मिल जाये
फक्कड़ तो है ही वो
निकल पड़ा होगा खुद भी
लाखों की भीड़ में
अपना ठौर ढूंढने
और इतनी धुन में कि महीने भर
दाढ़ी भी न बनाई हो
और बाल भी न कटवाये हों
शिप्रा की सीढ़ियों पर वह
तब तक नींद निकाल रहा हो जब तक
किसी कांस्टेबल की सीटी उसे
असमय न जगा दे

और उधर खुद उसके मंदिर
कितने तो दर्शन
कितनी तो पूजा
कितने तो पुष्प
कितनी तो धूप
कितनी दियाबाती
और कितना नैवेद्य

उसके दर्शन मिलेंगे
या उसका दर्शन मिलेगा

जब इंसान उसकी खोज में है
तो वह भी तो उनके बीच

खोजता होगा
इंसान।
(१८)
होगा वह बहुत दिनों का भूखा
होगा वह बहुत दिनों का प्यासा

समझता होगा यों वह
बहुत से लोगों की
भूख प्यास का मतलब

लोग उसे भंडारी समझते हैं
कि वह अपना कोष खोल देगा
और उम्मीद करते हैं कि उसकी और
पैंडोरा की पेटियों में फर्क होगा

जबकि वह तो भस्म रमाये है
और बैठा भी एक चट्टान पे ही

लोग उसे पहचानने में गफलत कर दें

लेकिन वह उन्हें पहचानता है
जो उसे घूमने आए हैं

अनादिकाल से
घूमता है स्वयम् नक्षत्रों
और सौरमंडलों
ब्रह्मांडों और काले गढ्ढों में।

(१९)
वह मिला उसे
जो उससे मिलना तो चाहता था
लेकिन मन में इस बात का
बोझ लिए था
कि अयोग्य है उसके
इसलिए कि विधर्मी है

उससे मिलकर कहा उसने
कि उसका कोई मज़हब नहीं
जो है वह उसने नहीं बनाया
उसने नहीं सरहद खींची

वह तो वह विराट्
कि आकाश से जिसके
केशों में उतरती है गंगा
और चांद भी वैसे ही कटा हुआ
कला हुआ उसके शीश पर

वह मिला उसे नहीं
जो उस पर वंशगत अधिकार का
दावा करता था
और इस कारण ऐसे आ·ास्त था

कि उसे उतनी उत्कटता से
खोजता भी न था

उसे इतना हथियाये था कि
उसे सोचता भी न था।

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